श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
DevanagariHindipublished110 पृष्ठ
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महावीरी व्याख्या चौ. ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा
हनुमन्जीका आगमन प्रसिद्ध ही है। यथा—
(१) बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ (रा.च.मा. ४-१-६)।
(२) बिप्र रूप धरि बचन सुनाए (रा.च.मा. ५-६-५)।
(३) बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत (रा.च.मा. ७-
१क)।
कंचन-बरन—गौर शरीरकी उपमा काञ्चन वर्णसे ही दी जाती है। तथा
ब्राह्मणका गौरवर्ण उसकी कुलीनताका द्योतक होता है—गौरो ब्राह्मणः
कुलीनः (लोकोक्ति)। बहुवेषधारी आञ्जनेयका कुलीन भद्रवेष एवं केशोंका
कुञ्चित होना उनके रूपानुरूप ही है। यही ध्यान अगली चौपाईमें भी समझना
चाहिए।
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