शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
९२ शालिहोत्रम् ।
घोडा वैसाही परिश्रम करते रहते हैं, मिहनतसे परिश्रान्त नहीं
होते हैं ।
परिश्रम आदि की रीति-घोडे पर सवारी करते ही उसे
बहुत वेग से नहीं चलाना चाहिये, प्रथम ही धीरे धीरे चलावे
फिर वेग से परन्तु रोकने के समय एक साथ रोक भी न लेना
चाहिये, जैसे धीरे धीरे उसका वेग बढाया था वैसे ही धीरे
धीरे उसका वेग कम करके रोकना चाहिये ।
परिश्रम के पीछे उसी समय उसे घुडसाल में ले जाकर न
बांध देना चाहिये, किन्तु स्वच्छ पानी से उसके मुख के फेन
और अंड तथा उसके छोर पास के फेन धोकर इधर उधर
टहलावे, जब पसीना सूख जाय तब घुडसाल में लेजाकर बांध
दे और सूखी घास से उसका शरीर रगड कर कपडे से पोंछ
डाले ऐसा करने से उसकी सब थकावट दूर होजाती है तब
उसकी पिछाडी बांध कर उसके सामने सूखी घास डाल देवे ।
गर्भादि धारण विधि-घोडी सांड़ के अनुसार बच्चा देती है ।
कभी २ गर्भधारण के समय उत्तम जाति का घोडा उसके सम्मुख
लाकर खडाकर देते हैं, इससे भी उत्तम बच्चा होने की संभावना
होती है ।
घोडी के ग्यारह महीने में बच्चा हुआ करता है और पैदा
होते ही खुर से जानु तक जितनी ऊंचाई होती है,
उससे तिगुनी ऊंचाई उस बच्चे की युवावस्था में होती है ।
जब बच्चा पैदा होता है तब उसके मुख के सामने कोई
दांत नहीं होता है । परन्तु जावडे के दोनों किनारों पर दो २
पेषण दंत निकला करते हैं जिन में से एक को प्रथम पेषण
शालिहोत्रम् । १३
दन्त और दूसरे को द्वितीय पेषण दंत कहते हैं । जब बच्चा
सात दिन का हो जाता है तब उसके प्रत्येक जावडे में दो
छेदन दंत निकल आते हैं । जो दांत पैदा होने ही साथ
निकलते हैं उन्हें क्षीर दंत कहते हैं । पांच सप्ताह के पीछे
सामने की ओर दो छेदन दंत तथा एक पेषण दंत और निकल
आता है तथा आठवें महीने में साम्हने की ओर दो छेदन दंत
और निकल आते हैं, इन सब दांतों का रङ्ग अत्यन्त सफेद होता
है और इनके ऊपर एक काले रङ्ग का छोटा गढ़ाभी होता है ।
जब बच्चा बारह महीने का हो जाता है तौ चौथा पेषण दंत
और दो वर्ष में पांचवां और कुछ दिन पीछे छटा दांत निकल
आता है ।
त्रिंशन्मासोद्भवास्सर्वे अखण्डाः परिकीर्तिताः ।
द्वौ स्यातां वाः त्रय स्स्यातामूर्ध्वाधस्तु यथाक्रमम् ॥
ढाई वर्षकी अवस्थासे ऊपर दो तीन महीने निकल जाने पर
बीचके दो छेदन दंत गिरकर उनकी जगह ऊपर नीचेके जावडों
में क्रम से दो और तीन स्थायी दंत निकल आते हैं जिन्हें
अखण्ड बोलते हैं, यह दांत भी सफेद गड्ढेदार होते हैं ।
चतुर्भिर्वत्सरैर्दन्ताश्चत्वारः पतितोत्थिताः ।
पञ्चभिर्हुदन्तेषु जायन्ते त्वथकालिका ॥
जब घोडा साडे तीन वर्ष से ऊपर और चार वर्ष के भीतर
होता है तब उसके दो छेदन दंत और गिर कर दो बडे
दांत ऊपर की ओर और निकल आते हैं और पांचवें
वर्ष के अन्त तक शेष दो दांत निकल आते हैं इसी अवसर
में नेश भी निकल आती हैं । जो नेश निकलती है तौ हरएक
९४ शालिहोत्रम् ।
जावडे में बीस दांत, और न निकलने पर केवल अठारह दांत
होते हैं ।
षष्ठे संवत्सरे जाते कालिकादशनद्वये ।
तथा स्यात् सप्तमे वर्षे दाशो दंतचतुष्टये ॥
छठे वर्ष में बीचवाले दो अखण्ड दांतों का गढा भर जाता
है और उनका कालापन भी जाता रहता है, और सातवें वर्ष में
उनके पासवाले और दो दांतों का गढा भर जाता है उनका
कालापन भी जाता रहता है ।
अष्टमे वर्षेऽतीते तु नष्टाः स्युः सर्वकालिकाः ।
नवमेऽथ ते सर्वे पीतत्वं सम्भवन्ति च ॥
आठवें वर्ष में शेष दो दांतोंका गढ़ा भर जाता है और उनका
कालापन भी जाता रहता है और नवें वर्ष में उनमें पीलापन
आने लगता है ।
यावदेकादशं वर्षं तावत् पीतत्वमागतम् ।
तिष्ठन्ति दशनास्तेषां वाजिनां ससिताभ्रमाः ॥
ग्यारहवें वर्ष तक पीलापन बढता रहता है, इसके पश्चात् उन
में सफेदी की झलक मारने लगती है ।
ततः श्वेताः प्रजायन्ते चतुर्दशसमाश्रिताः ।
ततः काचप्रभास्तदृक् यावत् संवत्सरास्त्रयः ॥
तदन्तर चौदह वर्ष की अवस्था पर पहुँचने पर दांत फिर
सफेद होजाते हैं, फिर सत्रह वर्ष की अवस्था तक कांच के
तुल्य रहते हैं ।
तावत्संवत्सरादूर्ध्वं यावद्वर्षाणि विंशतिः ।
माक्षिकाभा रदास्तेषां यावद्वर्षत्रयं पुनः ॥ ४ण
शालिहोत्रम् ।
फिर तीन वर्ष तक अर्थात् बीस वर्षकी अवस्थातक उन दांतों
का रंग मत्तिकाके तुल्य होता चला जाता है ।
त्रयोविंशात्पराः पश्चात्पूर्वे दृपलकास्मृताः ।
षड्विंशात्परतो दन्ताः स्थानाच्चलनमाप्नुयुः ॥
तेईस वर्षकी अवस्थातक उनका रंग शंखके तुल्य रहता है फिर
छब्बीस वर्ष तक दृपलक रहते हैं इससे पीछे हिलने लगते हैं
यावर्द्धत्रयमश्चात् पातम्बर्षत्रये पुनः ।
द्वात्रिंशद्वत्सरे प्राप्ते वाजी निर्याणमाप्नुयात् ॥
ये सब दांत बत्तीस वर्षकी अवस्थातक गिर पडते हैं और यही
घोडे के जीवन कालकी परमावधि है ।
घोडेका प्रमाण ।
सप्तविंशत्प्रमाणेन मुखमश्वस्य शस्यते ।
कर्णौ षडंगुला प्रोक्ता तालुकं चतुरंगुलम् ॥
चत्वारिंशच्च सप्ताढ्यः स्कंधः संपरिकीर्तितः ।
पृष्ठवंशश्चतुर्विंशस्सप्तविंशस्तथा कटिः ॥
घोडेके मुखकी लंबाई २७ अंगुल, कान ६ अंगुल, तालु ४
अंगुल, कंधा ४७ अंगुल, पीठ चौबीस अंगुल और कटिप्रदेश
२७ अंगुल का होता है ।
मति सूक्ष्मं तथा निम्नं पुच्छं हस्तद्वयान्वितम् ।
लिंगं हस्तप्रमाणन्तु तथाण्डौ चतुरंगुलौ ॥
मार्गस्थानं चतुर्विंशद् हृदयं षोडशात्मकम् ।
५, कटिकक्षान्तरं प्रोक्तं चत्वारिंशत्प्रमाणकम् ॥
में नेशत्यन्त महीन बालोंसे युक्त दो हाथ लंबी पूछ, गुह्येन्द्री
९६ शालिहोत्रम् ।
एक हाथ लंबी, अंड चार अंगुल, गुदामार्ग २४ अँगुल, छाती
१६ अंगुल कटि और कच्छका मध्यम प्रदेश ४० अंगुलका होताहै ।
इसी तरह फारसी ग्रन्थोंमें लिखा है कि घोडेकी गर्दन ४० अं-
गुल दुमसे सिरतक १६० अंगुल, ऊँचाई १०० अंगुल होती है,
इस प्रमाणवाले घोडे अच्छे समझे जाते हैं जो इससे न्यूनाधिक
होते हैं वे उत्तम नहीं होते ।
नापनेकी रीति-एक आदमी डोरका एक सिरा पकड कर कंधे
पर लगादे और दूसरा आदमी इसे सुमतक लेजाय यही ऊ-
चाई होती है । लंबाई जाननेकी यह रीति है कि आंखके कोण
से दुमकी जड तक नापा जाता है ।
उपयोगमें लानेका समय-जब तक घोडेका बच्चा चार वर्षका
होता है तब तक उसकी अवस्था बालक समझना चाहिये, इस
व्यवस्था में उससे किसी प्रकार का परिश्रम लेना उचित नहीं है,
इस समय उनको कार्य में लगाने से उनकी युवा अवस्था में ही
बुढापा आ जायगा और वे किसी काम के नहीं रहते हैं ।
परन्तु इस समय में भी उनको लगाम का अभ्यास कराता रहें
पांच वर्ष से ऊपर यौवन काल आता है, तभी से उनको काम
सिखलाने का यत्न करना चाहिये बीस वर्षकी अवस्था तक ये
हर प्रकार के कठिन काम कर सकते हैं, बीस वर्ष से ऊपर वृद्धा
वस्था आ जाती है इस समय काम लिया जावै तो बहुत दिन
तक काम दे सकते हैं ।
संस्कृत ग्रन्थसे ऋतुचर्यादि वर्णन ।
कूपोदकं सदा शस्तं पानाय जलदागमे ।
अभ्यंगे कटु तैलेन निर्वातस्थानबन्धनम् ॥
शालिहोत्रम् । १७
एकाहान्तरितं दद्याल्लवणं च विचक्षणः ।
पलद्वयप्रमाणे मुखतापविशुद्धये ॥
वर्षोदकेन सिक्ताङ्गस्तेजसा त्यज्यते हयः ।
मुखरोगमवाप्नोति शालिहोत्रेऽब्रवीदिदम् ॥
अशुद्धोदकतः रोगान् प्राप्नोति शतशः परान् ।
वर्षोदकस्य पानेन बलहीनश्च जायते ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रावृट्काले उपस्थिते ।
अनेन विधिना प्राज्ञो वाजिनं परितोषयेत् ॥
वर्षा ऋतुमें कूपका जल, कडुवे तेलका लगाना निर्वात
स्थान में बांधना, एक दिन बीच में छोड़कर चार तोले नमक
देना, गुण कारक होता है, इससे मुखका ताप जाता रहता है ।
वर्षा का जल ऊपर पड जाने से घोडा तेज हीन होजाता है
और उसके मुखका रोग भी उत्पन्न होता है । वर्षाका मैला जल
पीने से और भी सैकड़ों रोग तथा बलहीनता होती है, इस
लिये यत्नपूर्वक वर्षा काल में पशुकी रक्षा करना उचित है ।
शरद ऋतुमें कर्त्तव्य विधि ।
ततश्शरदमासाद्य बहुखण्डसमन्वितम् ।
शस्तं क्षीरोदनं पानं पलाष्टपग्निसंख्यया ॥
दुग्धं वा केवलं रात्रौ कथितं संप्रशस्यते ।
अथान्यदपि यत्किंचित् मधुरं सम्प्रदापयेत् ॥
पानाय सारसंतोयं यवसं सुमनोहरम् ।
नीलवर्णं मकुण्ठं च घृतं मांसेन संयुतम् ॥
वाहनं च प्रयत्नेन सूस्त्वल्पमपि जायते ।
१८ शालिहोत्रम् ।
एवं शरदि यःसम्यक् पुष्टिन्नयति वाजिनम् ।।
शरदऋतुके आनेपर बहुतसी शकर डालकर ८ पल दूध चांव-
ल खिलावै, अथवा रात्रिके समय ओटाया हुआ केवल दूध देवै,
अथवा औरभी कोई मधुर पदार्थ देवै, पीनेके लिये सरोवर का
जल, खानेके लिये हरी दूब, मूंगका दाना अथवा घृतयुक्त मांस
देवै । इस तरह शरद ऋतुमें घोडेकी परिचर्या करने से कैसा
ही छोटा घोड़ा हो वह भी सवारी के योग्य हो जाता है ।
हेमन्त ऋतुमें घोडेकी परिचर्या ।
ततो हेमन्तमासाद्य निर्वाते निदधेद्धयम् ।
मासार्द्धं यवसं दद्यात् पानीयञ्च यथेच्छया ।
घृतं वा यदि तैलं वा पानं दद्याद्विचक्षणः ॥
वाहयेच्च शनैर्नित्यं सर्वदोषप्रशान्तये ।
हेमन्त ऋतुमें घोडेको निर्वातस्थान में बांधै । आधे महीने तक
घासदे और यथेच्छ जलपान कराता रहे, घी वा तेलभी कभी २
देता रहे और प्रति दिन उसपर सवारी करता रहे, जिससे सब
दोष शान्त रहते हैं ।
ततः शिशिरमासाद्य दद्यात्तैलं हि वाजिनाम् ।
प्रमाणञ्च पलान्यष्टौ दिनानाञ्च त्रिसप्तकम् ।।
यवोत्थं यवसं दद्यात्पश्चाद्विंशद्दिनानि तु ।
यवाभावेऽथ चणकं दद्यादार्द्रतरं सदा ।
तदभावे मसूरांश्च शुष्कार्द्रान् स्तैलसंयुतान् ॥
शिशिरऋतुमें २१ दिनतक घोडेको आठ पलतैल देता रहे फिर
बीस दिनतक जौका भुसा देवै, जौ न मिलैंतौ भीगे हुए चने देवै
शालिहोत्रम् । १६
चने भी न मिलें तो सूखी वा भीगी हुई मसूर तेल मिला
कर देवे !
पर्वतानां यथामेरुरायुधानां च वज्रकम् ।
तथा सर्वोपचाराणां सस्ये श्रेष्ठतमा यवाः ।
जैसे पर्व्वतोंमें सुमेरु और शस्त्रों में वज्र सर्वोत्तम हे इसी तरह
घोडे के लिये जौ सर्वोत्तम है।
यश्चाश्नाति यवान् वाजी शुष्कांश्च स्वेच्छया सदा ॥
न तस्य जायते रोगः कदाचिदपि चान्यथाक् ॥
जो घोडा अपनी इच्छा के अनुसार सूखे जौ खाता रहता है,
उसको कभी किसी प्रकार का रोग नहीं होने पाता है ॥
हमारे देशमें बहुत दिनों से मुसलमान बादशाहोंका राज्य रहा
और उनके समयमें घोडों की परीक्षा आदि का काम भी इन्हीं
लोगों के हाथमें रहा इससे अबहम घोडेके नाम भेद, रंग, भोंरी
आदिका वर्णन फारसी ग्रन्थों के अनुसार लिखते हैं ।
भोंरियों की पहचान ।
भोंरी आठ प्रकारकी होती है ( १ ) पानीके भंवरसी, ( २ )
काली सी ( ३ ) खिले हुए फूल के सदृश, ( ४ ) मृगना-
भिसी, ( ५ )
गुलरसी; [ ६ ] सेवके समान [ ७ ] जूती के सदृश और
[ ८ ] भोंरी ऐसी होती है जैसे गौके चाटने से बच्चे के बालों
पर चिन्ह पड जाता है।
भोंरियों का स्थान ।
घोडेकी देहपर दस जगह भोंरियां होती हैं, दो छाती पर, दो
सिरपर, दो माथेपर, एक टीके पर, एक ओष्ठ के नीचे और दो
२० शालिहोत्रम् ।
नाभि के पास जिस घोडे के यह दस भौंरी नहीं होती हैं वह
उत्तम नहीं समझे जाते हैं ।
भौंरियों के नाम ।
टीके के पास वाली भौंरी को ढकनी कहते हैं, यह भौंरियां
यदि एक वा दो से अधिक होंतो सीकन कहते हैं । ईरानी वा
मुग़ल लोग इसे खेश वा हेजचल कहते हैं । पञ्जाबी लोग दो
गर और कोई कोई चुनक भी कहते हैं जुल्फ के नीचे की
भौंरी एक, दो वा तीन हों तो उसे नसरत बीनी कहते हैं
यवन लोग इसे अच्छा बताते हैं ।
आंसू ढाल की पहिचान-आंख के कोने के दाहिनी वा बाईं
ओर हो अथवा कान के ऊपर नीचे होवे तो बुरी होती है ।
अरवल की पहिचान-कानों की जड में या ठुड्डी के दोनों ओर
या सिर के ऊपर होवे तो सिर की भौंरी को छोडकर सबका
नाम अर्रवल है, जो दो २ भौंरी होवें तो अच्छी और जो एक
एक हो तो बुरी होती है ।
चांद सूरज की पहिचान-सिर के ऊपर की दो भौंरियों को
चांद सूरज कहते हैं ये शुभ होती हैं ।
गंदा बागल की पहिचान-पिंडली, घुटने, गुह्येन्द्रिय और
दुम इनमें से किसी जगह पर भौंरी हो तो अशुभ होती है,
और इन भौंरियों का नाम गंदाबागल है ।
मारुत की पहिचान-घुटने के पीछे, अंडकोश के नीचे ऊपर
नाभिके ऊपर नीचे, एक वा दोनों कंधोंके ऊपर, मुँहपर या ओष्ठ
के नीचे जो भौंरियां होती हैं वह सब अशुभ होती हैं ।
शालिहोत्रम् । ९९
सर्पिणी की पहिचान-कंथों को जड़ में बालों के पास जो
भौंरी होती है वह बुरी होती है ।
खूंटीगाठकी पहिचान-किसो २ घोडे के हाथ पर भौंरी होती
है, जो भौंरी का मुंह नीचे को होवे तो अच्छी समझे और
गांठ के नीचे की ओर बाहर वा भीतर की ओर होवे तो कोई
उसे बुरा और कोई अच्छा बताते हैं ।
खूंटी उखाड़ की पहिचान-जो भौंरी का मुख ऊपर की ओर
होता है तो अशुभ होती हैं ।
भुजबद्ध की पहिचान-जिस घोडे की भुजा पर भौंरी होती
है, वह बड़ा पराक्रमी होता है ।
छत्र भङ्ग की पहिचान-जिस घोडे की पीठ पर अथवा जीन
के नीचे भौंरी होती है उसे छत्रभंग कहते हैं यह भौंरी अशुभ होती है।
हरदावलकी पहिचान-छातीपर वा दोनों हाथोंके जोडपर जो
भौंरी होती है उन्हें हरदावल कहते हैं ये बहुत बुरी होती है।
गामकी पहिचान-नाभिके सन्मुख जो पेटके ऊपर भौंरी होती
है उसे गाम कहते हैं उसे कोई शुभ बताता है और कोई अ-
शुभ, मरहटे लोग ऐसे घोडे को लेना नहीं चाहते हैं ।
देवमन की पहिचान-जो भौंरी कंठमणि के निकट वा कुछ
ऊपर नीचे भी हो तो यह बहुत शुभ होती है, इसके होने पर
सहस्र दूषण भी कुछ नहीं कर सक्ते हैं ।
गङ्गापाट की पहिचान-यह भौंरी पेट पर होती है, जो यह
भौंरी तङ्ग के भीतर आजाय तो अच्छी होती है और तङ्ग से
हटने पर बुरी समझी जाती है ।
२२ शालिहोत्रम् ।
घोडे की गति-संस्कृत में घोडे की गति पांच प्रकार की
लिखीहै यथाः-आस्कन्दित, धौरितक, वल्गित, प्लुत और रेचित
(१) आस्कन्दित गति-वह है जिसमें घोड़ा क्रोधित मनुष्य
की तरह सिरको झुकायेहुए चारोंचरणोंसे दुरकी भरकर चलता है।
(२) धौरितक गति-इसके चार भेद हैं यथा-धौरितक, धौर्य,
धोरण और धोरित। नकुल की तरह चलने को धौरितक,
कौवारी पक्षीकी तरह चलने को धौर्य, मोरकी तरह नृत्य करते
हुए चलने को धोरण और वाराह के सदृश गति को धोरित
कहते हैं। इसी में एक 'धाण' गति भी लिखी है जिसमें
घोडा ऐसे वेग से दौड़ता है कि न कुछ सुन पड़ता न देख
पड़ता है।
(३) वल्गित गति-जो घोडा ऊंचा मुख करके और रीर
दवा कर चलता है उसे वल्गित कहते हैं।
(४) प्लुत गति-हरिणों की तरह चौकडी भरकर वा मंडूक
की तरह चलने को प्लुत कहते हैं।
(५) रेचित-जो समान चाल से चलता है अर्थात् न वेगसे
न धीरे से उसकी गति को रेचित कहते हैं।
फारसी ग्रन्थों के अनुसार ।
(१) रपट-उछलकर अत्यन्त वेगसे चलनेको रपट कहते हैं।
(२) छारतक-उछलकर धीरे से चलनेको छारतक कहते हैं।
(३) दुलकी-सब देहको हिलाकर चलना दुलकी कहलाता है।
(४) कूदना-अगले दो पैर उठाकर चलने को कूदना
कहते हैं।
(५) कदम-कदम चार प्रकार के होते हैं (१) सागम उस
शालिहोत्र । २३
गति को कहते हैं, जिसमें सवार के हाथ से पानी भरे हुए
कटोरों में से बूंद भी न पडे ।
( २ ) गला उठाकर अगले पैरों को घुमाकर चलने का नाम
इन्गा है ।
( ३ ) गर्दन और सिर इतना उठाले कि सवार की पगड़ी
भी दिखाई न दे ।
( ४ ) चारों पांव से एक ही बार उछल उछल कर कूदता
चले उसे रहोवाल कहते हैं ।
घोडे के चार अङ्ग ।
दीर्घाणि चत्वार्यथ चोन्नतानि चत्वारि रक्तान्यतिसूक्ष्म-
ङ्गानि । ह्रस्वानि चत्वार्यथ चायतानि भूयस्तु चत्वार्यथ
निम्नानि ।
घोडेके अङ्ग प्रत्यंगोंमें चार दीर्घ, चार उन्नत, चार रक्त, चार
सूक्ष्म, चार लघु, चार विस्तृत और चार निम्न ग्रहण किये
गये हैं । यथाः—
आस्यं भुजौ केश कटी च दीर्घमेतच्चतुष्कन्तुरगस्य शस्तम् ।
तथोन्नते प्राणपुटे ललाटे शक्रश्च तज्ज्ञाश्चरणौ वदन्ति ॥
मुख, भुजा, केश, और कटि ये चार दीर्घ अच्छे होते हैं ।
नासिका, मस्तक, खुर और चरण ये चार उन्नत अच्छे होते हैं ।
ओष्ठौ च जिह्वात्वथ, तालुकश्च मेऽढ्रं सुरक्तं शुभदं हयस्य ।
लघूनि बन्धाश्चरणौ सुकोष्ठे श्रोत्राणि सर्वाणि तथैव पुच्छम् ॥
ओष्ठ, जिह्वा, तालु, और पेढू ये चार रक्त वर्णके अच्छे होतेहैं.
इसी तरह बन्ध, कोष्ट, कान और पूंछ छोटे अच्छे होते हैं ।
करणान्तरी कर्णसमन्विता च वंशी तथा ह्रस्वतरं प्रशस्तम् ।
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९९ शालिहोत्रम्
वदत्रं सुखं कन्धरजानुदी च पार्श्वं च सप्तः शुभदं प्रदिष्टम् ॥
कानोंका मध्यभाग, दोनों कान पीठ का वांसा ये ह्रस्व अच्छे
होते हैं । मुख, कन्धा जानु और पार्श्व यह लंबे अच्छे होतेहै !
कक्षान्तरं चोदरमध्यमं च निम्ना कटी तालुसजानुकानि ।
वक्षश्शिफोरूजघनस्थलंच चतुष्कमेतत् पृथुलं प्रदिष्टम् ॥
कक्षाओंका मध्य भाग, उदर मध्य भाग, कटि और तालु ये
चार निम्न शुभ है । वक्षस्थल, शेफ, ऊरू, और जंघा ये चार
पुष्ट अच्छे होते हैं ।
घोडेके खेत—जिस २ स्थानोंमें घोडे पैदा होतेहैं वे उसी देशके
नामसे प्रसिद्ध होतेहैं और उनके शारीरिक बल आदि भी उन्हीं
देशों के अनुसार होते हैं ।
सर्वोत्तम घोडे—अर्बी, खुरासानी, इराकी, यमनी, तुर्की, तातारी,
खतन अदन, चीनी, काबुली, काश्मीरी, काठियावाडी, भोटिया
शालिहोत्रम् । २५
काठियावाड के घोडे बहुत अच्छे होते हैं इन्हें काठियावाडी
कहते हैं, ये घोडे ग्यारह प्रकारके होते हैं; जैसे-चादरिया, मा-
किया, मांग़लिया, ताजनियां, रेडिया, लखमियां, रेशमियां, देश-
रियां, हरनियां बादलिया और मोटरियां ।
मारवाडी घोडे मारवाड से आते हैं ये चार प्रकारके होते हैं
जैसेः-डहा, राजघडा, बालेवडा और तलवाडा ।
दक्षिणी घोडे-यह घोडे दक्षिणसे आतेहैं, ये मिली हुई नस्ल
के होतेहैं अर्थात् अर्त्री और काठियावाडी से मिलकर उत्पन्न
होतेहैं. इनमें से भीमरा; मकुन्दासी, कन्दासी और नागपुरी
बहुत अच्छे होते हैं ।
सिन्ध देशके घोडे सिन्धी कहलाते हैं।
पंजाब के घोडे पंजाबी कहलाते हैं, परन्तु सिंधी और पंजाबी
दोनों दोगले होते हैं. ये ईरानी और हिन्दुस्तानी घोडों से
उत्पन्न होते हैं, यह भी चार प्रकार के हैं. जैसे:-धन्नी, घेप,
सायडू और भटंडा ।
मालवी घोडे-यह घोडे मलवा देशमें होतेहैं, परन्तु वहां अ-
नेक प्रकारके घोडे रहने से मिली हुई नस्लके होते हैं ।
टांगन घोडे-ये घोडे बहुत छोटे और सुन्दर होते हैं। छोटे
होने ही के कारण इनको टांगन कहते हैं, येछः प्रकार के होते
हैं यथाः-
(१) वर्म्मापेगू-यह प्रायः ब्रह्मासे आते हैं। (२) मनीपुरी ये
मनीपुर के होते हैं। (३) भूटानी भुटानसे काफरी गुट आते
हैं। यहांके घोडोंको भोटियाभी कहते हैं। (४) नेपाली टांगन
२८ शालिहोत्रम् ।
ये नेपालमें देवीपाटन से आते हैं ( ५ ) तुर्की टांगन-ये तुर्कि-
स्थान से आते हैं ( ६ ) कुर्दी टांगन कुर्दिस्थान से आते हैं ।
इनके सिवाय और भी अनेक प्रकारके घोडे होते हैं, जो अपने
देश भेद से भिन्न २ प्रकार के होते हैं ॥
इनके सिवाय और भी अनेक स्थानों के अनेक प्रकारके घोडे
होतेहैं उन सबका वर्णन करना इस जगह बन नहीं सकता है ।
रंगके अनुसार घोडोंके नाम-असली घोडे चार रंगके होते हैं
( १ ) नुकरा, ( २ ) मुश्की, ( ३ ) सुर्खा और ( ४ ) जर्दा ।
नुकरेके लक्षण-इस घोडेका रङ्ग चारों सुम्मोंतक सफेद मोती
के समान चमकदार होता है ।
मुश्कीकी पहिचान-मुश्की घोडा काली कोयल से भी काला
होताहै। सुर्खाकी पहिचान-यह घोडा केशरके रंगके समान होता है
जर्दाकी पहिचान-अलसी सुवर्णके से रंगवाला अथवा मशाल
की लौके समान चमकदार जर्दा कहलाता है । इन चारों के सि-
वाय घोडे और और रंगतके भी होतेहैं, वे सब इन्हीं चारों के
अवान्तर भेद हैं जैसेः-
रहदा, मंगल, समंदर, फुलवारी, काठुआ, चाल, सन्दली, मगसी
सरगा, चीत्री, सुरंग, संजाब, गर्रा, चौधर, हरा गर्ग, महताब,
दोरद, खजरई, सनवानी, मुर्गा; टपर, फिरोजी नीला, अरूकूक
पतंग, टपाक, घुरकुल्ला, मन्होर, खीटा, सब्जा, श्यामकर्ण,
फाखताई, कचम्भा, अर्जन, सुनक, लक्खा; पदमकल्याण; परियल,
बारू, अबतक, सूहा, बादामी, कुम्मेत, इकरंग, तुःही, विल्लौरी,
खुतंग, गर्गामरगा, बाघंबरी, विल्ली, ये सब ५२ प्रकारके भेदहैं ।
शालिहोत्रम् । २७
अबलक की रंगत-जैसे कुम्मेत कितने ही रंग का होता है
उसी तरह अबलक के भी कितने ही भेद हैं । अबलक हिसार्द,
पीला, लाल, उजला और नीले रंगका होता है । कुम्मेत तेलिया
और लाखौरी रंगका होताहै । खंगका अर्थ सफेद है, यह खंग
घोडा कई प्रकार का होता है जैसे:-नुकरा, खंग, सब्ज रंग यूज
खंग; सुर्ख खंग ।
इन रंगोंके सिवाय और रंग के घोडे देखनेमें नहीं आतेहैं।
घोडे को लेते समय प्रथम ही उसकी चोटी और दुम की
परीक्षा करनी चाहिये ।
सर्गा आदि घोडों की परीक्षा ।
( १ ) घाकरा-इसका माथा सफेद होता है । ( २ ) खदहम
इसका रंग काला होता है । ( ३ ) मुजाहिल जिसके दाहिने
हाथ पांव सफेद होते हैं । ( ४ ) जरसम इसका ऊपर का होठ
सफेद होता है । ( ५ ) वोहताद । ( ६ ) अश्कर यह सिर से
पैर तक लाल रंग का होता है । ( ७ ) कुम्मेत यह तेलिया,
लाखौरी या छुहारे के रंग का होता है ।
जिसकी देह का रंग बादामी, किशमिशी वा छुहारे का सा
होवे और चोटी तथा दुमका रंग मैलाहो उसे कुल्ला कहते हैं ।
जिसकी देह पर सिंह की सी चित्तियां होती हैं, उसे वाघंबरी
कहते हैं ।
जिसकी देह का रंग बादामी तथा दुम घुटने और हाथ पांव
काले हों वह समन्द होता है ।
जिसकी सेली और कान कालेहों देहपर छोटी २ वा वडी २
पास पास वा अलग अलग धारियां हों उसे अवस कहते हैं
२८ शालिहोत्रम् ।
जिसके हाथ पांव, दोनों कान, माथा छाती और दुम सफेद
होते हैं यह बहुत अच्छा होता है। जिसके अण्डकोश और
गुह्येन्द्रिय पर चित्तियां होती हैं वह भी अच्छा होता है ।
लड़ाई के योग्य घोडे–जिन घोडों की हरिण की सी काली
आंखें ओष्ठ और नथने पतले महगवक की सी गर्दन, माथा नीचा,
लम्बी जिह्वा; मोर का सा सिर और गर्दन, चञ्चल गति, गर्दन
की जंड सफेद छोटा शिर, चौडी छाती, मोटे चूतड़, मोती की
लड़ी के से दांत चौड़ा मुख और नासिका, दोनों बाहु पुष्ट,
झुकी हुई पीठ; मोटे खुर पतली गठीली दुम, दोनों कान और
दुम के बाल नरम, तथा चमकीले, खड़े और घने होते हैं, ऐसा
घोडा लडाई में ले जाने के योग्य होता है ।
बुरे घोडे के लक्षण–फाख्ताई, दूधिया, काला; सौर, नीला;
किद्दह, जर्द चोटीवाला; सञ्जाव, कुरका, गर्दास ( जिसके माथे
से नाक तक एक सीधी लकीर तलवार के समान हो और सब
देह पर सफेदी का चिन्ह भी न हो ) शेर, गीदड़, भेडिये की
सी सूरतका चूहे वा हरिण की रंगत का, जिसके पेट पर सफेद
बाल हों, चल अर्थात् जिसके देह पर दो दो सफेद बाल मिल
कर फैले हों ये सब घोडे अशुभ समझे जाते हैं ।
शकील और माहरू के लक्षण–जिसके माथे पर एक सफेद
लकीर नाक तक चली गई हो और वैसी लकीर हाथ पांवों में
न हो उसे शकील कहते हैं । और जिसके माथे की चौड़ाई
पर एक लकीर हो उसे माहरू कहते हैं ये दोनों शुभ समझे
जाते हैं ।
शालिहोत्र । २९
सितारा पेशानी के लक्षण-जिसके माथेपर सफेद बाल नख के
समान अर्द्ध गोलाकार हों और जो अंगूठे से ढक जाते हों उसे
सितारा पेशानी कहते हैं, यह घोडा अशुभ होता है। चाहे ऐसे
घोडे के हाथ पांवों में सफेदी हो।
पटल के लक्षण-जिसके मस्तकपर नील कमल के समान चांद
सूरज बने हों उसे पटल कहते हैं, यह घोडा शुभ होता है।
अकवर के लक्षण-जो घोडा पटल, सितारा पेशानी वा शको-
लकी सूरतहोवे परन्तु साफ न हो और जैसे चन्द्रमा में झांई
होती है वैसेही सफेदी में कुछ रंगीन बाल लिपटे हुए, गोल वा
छिटके हुए से होते हैं। इन लक्षणों से युक्त घोडे को अकवर
कहते हैं। यह घोडा अशुभ होता है।
मुतलकुद्दीन के लक्षण-जिसके चारों हाथ पांव सफेद हों,
जिसके दोनों हाथ सफेद हो, या दोनों पांव ही सफेद हों अथ-
वां बांया हाथ सफेद हो, वा जिसके पांव के मोजे (नीचेके भाग)
सफेद हों। ये घोडे बहुत अच्छे होते हैं। इन घोडे के
नाम मुतलकुद्दोन, मुतलकुलयसार, और मुतलकुल रजलैन
कहते हैं।
गुलदस्तके लक्षण-जिसका हाथ सफेद होता हैं उसे गुलदस्त
कहते हैं यह बुरा नहीं समझा जाता है
चम्पदस्त की पहंचान-इसका दाहिना हाथ घुटने तक सफेद
होता है, यह बुरा हैं।
पद्म के लक्षण-जिनके हाथ पांवों की सफेदी में तिल होते हैं
यह घोडा पद्म कहाता है। इस देश में इसे बुरा नहीं समझते
३० शालिहोत्रम्
है परन्तु ईरानी मुग़ल इसे अशुभ समझते हैं।
अरजल के लक्षण-जिसके संपूर्ण देहका रंग एक प्रकार काहो
और एक पांव दूसरे रंगका हो वह घोडा बुरा समझा जाता
है इसे हिन्दी में यमदूत कहते हैं।
फूलका लक्षण-मुश्की, जर्दा, छल्ला, कुम्मैत कैसा हो हो उ-
सके चार जामेके तंग के बाहर सफेदी के दागहों, अथवा एक
या दोनों पुट्ठोंपर हों उसे फूल कहते हैं यह घोडा बुरा समझा
जाता है।
कृष्ण तिलके लक्षण-खंग या नुक्तरे पर फुलवारी की तरह
काले फूल हों, यूजपर सफेद या जर्द फूल हों और जर्देपर
गुलाब के सदृश फूल हों, तौ अच्छे समझे जाते हैं और
इनके सिवाय जो रङ्गत होती हो वह बुरी समझी जाती है।
शकल के लक्षण-जिसके भिन्न २ हाथ पांव सफेद हों जैसे
दाहिने हाथ और बांया पांव सफेद हों अथवा बांया हाथ और
दाहिना पांव सफेदहो वह शकल कहलाता है, यह घोडा
बहुत ही बुरा समझा जाता है।
आंख के दोषों का वर्णन-आंख में कई रङ्ग हों, कञ्जई, सुलै-
मानी, पीली वा सुनहरी कितने ही रङ्ग की हो एक आंख एक
रङ्ग की हो, दूसरे रङ्गकी दूसरी हो अथवा आंखें सुअर, बन्दर
वा कबूतर की सी हो ऐसा घोड़ा बुरा समझा जाता है।
चुगर की पहिचान-जिस घोडे की आंखें आदमी की सी
हों और कद छोटा हो वह घोडा अच्छा समझा जाता है।
ताफी की पहिचान-जिसकी एक आंख काली दूसरी सफेद
शालिहोत्रम् । ३१
हो अर्थात एक आंख आदमीकी सी हो दूसरी हरिणकी सी हो
यह घोडा बहुत ही बुरा समझा जाता हे ।
शाखदारकी पहिचान-जिसके सिर, कंधे, माथे जुल्फ या चो-
टीके नीचे आदमी की छोटी उंगली का सा चिह्न पाया जाय
उसे शाखदार कहते हैं. यह बहुत अशुभ होता है ।
गोशदारके लक्षण-जिस घोडेके कानकी जड में एक और कान
सा होता है, उसे गोशदार कहते हैं यह भी बुरा होता है।
थनीकी पहचान-जिस घोडेकी गुह्येन्द्रीकी बाहर की त्वचापर
छुहारे के समान दो थन लटकने हों उसे थनी कहते हैं । यह
भी बुरा होता है ।
अनी के लक्षण-जो थन के से चिन्हों पर लटके हुए न हों वह
अनी कहलाता हे यह घोडा अच्छा कहाता हे ।
एकांड के लक्षण-जिस घोडे के अंडकोष मुहरेदार हों अथवा
एक ही हो यह बुरा होता हे ।
अरुनाधारकी पहचान-जिस घोडेके अंडपर कुछ सीवनकासा
चिन्ह हो और थैली साफ हो उसे अरुनाधार कहते हैं, यह
घोडा अच्छा होता है ।
शुतरदंदान की पहचान-जिसके ऊंटके से बडे दांतहों, गिनती
में न्यूनाधिक हों, एकके ऊपर एक चढ गयाहो, अथवा एकही
दांत हो उसे उष्ट्रदंत कहते हैं, यह बुरा समझा जाता है ।
गजदंतकी पहचान-जिस घोडेका दांत हाथी वा सुअरकी त-
रह बाहर निकला हो वह अच्छा नहीं होता है ।
सगजुबानके लक्षण-जिसको जिह्वा सर्प वा कुत्तेकी तरह लट
की हुई हो उसे भी बुरा समझते हैं ।