सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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होती रही है, परन्तु इसके उपचार भी तो हैं। यदि तुम्हें शारीरिक पीड़ा है तो
किसी वैद्य से कहकर उपचार करवाओ और यदि मानसिक पीड़ा है और मुझसे
कह सकते हो तो कहो। तब उस श्रमण को एक ओर ले जाकर नन्द ने अपनी
मानसिक व्यथा सुनाते हुए कहा—मित्र ! मैं प्रिया-वियोग में तड़प रहा हूँ। मैं मर
जाना पसन्द करता हूँ, परन्तु उसके बिना जीना नहीं चाहता। यह सुनकर उस
भिक्षु ने हितकर परन्तु कटुसत्य समझाते हुए उसे कहा—जिसका मन शान्त है,
उसका ही धार्मिक अनुष्ठानों में मन लगता है। कामासक्त व्यक्ति धार्मिक कृत्य
में आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर ही नहीं सकता। तृष्णावान् व्यक्ति ही काम-
सुख में आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। तुम्हें यह पता नहीं है कि औरतें
मीठी बोली से आकृष्ट करती हैं, परन्तु तीक्ष्ण चित्त से प्रहार भी करती हैं। उनकी
बातों में मधु और हृदय में हलाहल भरा रहता है। नारी का शरीर और मन
दोनों ही दोषपूर्ण हैं। उनके प्रति अपने चंचल मन को रोको। काषाय वस्त्र
धारण कर फिर उस नियम को तोड़ना अन्याय है। मृत्युभय से ग्रस्त कच्चे
बर्तन की तरह इस क्षणभंगुर संसार के प्रति यह आसक्ति छोड़कर मुक्ति-मार्ग
में मन लगाओ।
नवम सर्ग
उस भिक्षु के उपदेश का नन्द पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह कामोन्मत्त
घर जाने के लिए कृतसंकल्प हो गया। भिक्षु ने उसकी शान्ति के लिए उसे
पुनः समझाने की चेष्टा की। उसने कहा—मैं तुम्हारी जवानी के जोश को
पहचानता हूँ। तुम्हारी यह युवावस्था, तुम्हारा लावण्य, तुम्हारा बल सबके
सब क्षयिष्णु एवं क्षणिक है। सोचकर देखो—हड्डी, मांस और रक्त-मज्जा से
निर्मित इस देह पर घमंड करना कितनी मूर्खता है। शरीर तो सदैव विपत्ति से
ग्रस्त है। यह तो मिट्टी के घड़े से भी गया बीता है। विधिपूर्वक रखने पर घड़े
तो कुछ दिनों तक रह सकते हैं, परन्तु यह देह तो अच्छी तरह से रखने पर भी
नष्ट हो जाती है। जब जाड़े से कांपता आग की, गरमी से तड़पता ठंड की,
प्यासा पानी की और भूखा अन्न की इच्छा करता है तो फिर बल कैसा ? हे
नन्द ! रूप, तारुण्य और बल के अनायं अभिमान को दूर करो। पाप रहित मन
से मुक्तिमार्ग को पहचानो। भिक्षु के उपदेश से भी जब नन्द का मन शान्त नहीं
हुआ, तब उस भिक्षु ने भगवान् बुद्ध को नन्द की स्थिति से अवगत करा दिया।
दशम सर्ग
परम कृपालु बुद्ध ने नन्द को बुलाकर उससे ही उसकी सारी बातें जान
लीं। उन्होंने दार्शनिक पृष्ठभूमि में उन्हें समझाना प्रारंभ किया। तत्पश्चात्
तथागत नन्द को साथ लेकर योगविद्या के बल से आकाश में उड़ गये। वे
हिमालय के ऊपर निर्मल आकाश में, एक सरोवर में पंखों को फैलाकर तथा
दूसरे से सटाकर विचरते हुए दो चकवों को दिखला दिये।
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काषायवस्त्रौ कनकावदातौ विरेजतुस्तौ नभसि प्रसन्ने ।
अन्योन्यसंश्लिष्टविकीर्णपक्षौ सरःप्रकीर्णाविव चक्रवाकौ ॥'
—सौ० न० १०।४
इसके बाद बुद्ध ने हिमालय की तलहटी में एक पेड़ पर बैठी एक कानी
बंदरिया को दिखलाकर नन्द से पूछा—क्या तुम जिस सुन्दरी को चाहते हो, वह
इस बंदरिया से अधिक सुन्दर है ? नन्द ने कहा—भगवान् आपकी अनुज-वधू से
इस तुच्छ बंदरी की तुलना ही क्या है, तब उन्होंने नन्द को देवलोक ले जाकर
अप्सराओं को दिखलाया, उनके दीर्घकालीन अतिविलासपूर्ण जीवन को
दिखलाया और पूछा—अब तुम्हें क्या कहना है ? इन्हें देख-सुनकर नन्द
उन अप्सराओं को पाने के लिए लालायित हो उठा । बुद्ध ने उन्हें कहा—ये
अप्सराएँ तप से प्राप्त होती हैं । तथागत ने उसे शीलवान् बनने की सलाह
दी । नन्द अप्सराओं को पाने के लिए तपस्या में निरत हुआ ।
एकादश सर्ग
कामचर्या में निपुण एवं भिक्षुचर्या में अकुशल नन्द ने अपने चपल चित्त
को संयमित किया । अप्सराओं को पाने के निमित्त भार्या-प्रेमी होते हुए भी
स्थिर चित्त से ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना सीखा । वीतरागी भिक्षु की तरह
उसे एकाग्रचित्त देखकर आनन्द को बड़ी प्रसन्नता हुई । एक दिन उसने एकान्त
में नन्द से पूछा—तुम अपने कुलानुरूप धैर्यवान हो, क्योंकि अनार्य के लिए
सज्जनता, अभिमानी के लिए सदाचरण, लोभी के लिए दान और कामी के
लिए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन असंभव है । परन्तु मुझे सुनने में आया है कि यह
धर्माचरण तुम केवल अप्सराओं की प्राप्ति के लिए ही करते हो । क्या यह सच
है ? या परिहास ? क्योंकि विषय-तृष्णा कभी शान्त होती ही नहीं । विषयों
की खोज शोक है और शोक दुःखमूलक है । स्वर्गीय सुख भी सावधिक है ।
पुण्य क्षीण होते ही स्वर्ग से जरा-जन्म-मरणरूप संसार-चक्र में मनुष्य को आना
पड़ता है । अतः स्थाई सुख रूपी मुक्ति के लिए ही तपश्चर्या में लगो । मुक्ति-
मार्ग ही रक्षक है, कल्याणकारी है और अमृत है । अतः उसी के लिए प्रयत्न-
शील बने रहो ।
द्वादश सर्ग
प्रत्यवमर्श नामक बारहवें सर्ग में आनन्द के इस कथन से कि अप्सरा के
लिए वह तप कर रहा है, अतः तापस समाज में उसकी खिल्ली उड़ाई जा
रही है । यह सुनकर नन्द में स्वतः ज्ञानोदय होता है । वह बुद्ध की शरण में
जाता है । उनसे उसने प्रार्थना की—भगवन् ! मुझे पूर्ण ज्ञान दें । तब शास्ता ने
कहा—आज ही तुम्हारा जन्म सार्थक हुआ । निश्चय ही आकुल व्यक्ति दुर्बल
है । उसकी चंचल श्रद्धा अनिष्ठा के सिवा और कुछ नहीं है । तत्त्वज्ञान के बिना
न तो श्रद्धा बलवती होती है और न बुद्धि ही स्थिर । संयम के द्वारा इन्द्रियों
४ सौ० भू०
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को जीतकर ही मनुष्य तत्त्वदर्शी बनता है। उसी को श्रद्धा फल और आश्रय
देने में समर्थ होती है।
त्रयोदश सर्ग
तेरहवें सर्ग में बुद्ध के उपदेश और आर्य-सत्य की पृष्ठभूमि का वर्णन है।
जितेन्द्रिय नन्द को श्रद्धावान् देखकर भगवान् बुद्ध ने सर्वप्रथम श्रेय का क्रम
निर्दिष्ट किया। श्रद्धा रूपी साधन से युक्त निर्वाण के लिए उन्हें शील की रक्षा
का उपदेश दिया। शील के आश्रय से श्रद्धा श्रेयस्कर होती है। मुक्ति का
आधार वैराग्य है। वैराग्य का सम्यक् ज्ञान तत्त्वदर्शन है। तत्त्वदर्शी ही
समाधि का अधिकारी है। सम्यक् समाधि का सम्बन्ध मानसिक और शारीरिक
सुख से है। शारीरिक और मानसिक सुख परमशान्ति से सम्बद्ध है।
परमानन्द से जीवों के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है। परम प्रीति से कुकृत्य एवं
अकृत्यों का मानसिक अभाव होता है और इस अभाव का आश्रय शील है।
अतः हे नन्द ! शीलवान् बनो। हथियारों से हत व्यक्ति नरक नहीं जाता है,
किन्तु इन्द्रियों से मारा गया व्यक्ति घसीट कर नरक को ले जाया जाता है।
विषयों की अयथार्थ कल्पना से मनुष्य बाँधा जाता है और उन्हीं विषयों को
यथार्थ रूप में देखता हुआ व्यक्ति जीवन्मुक्त हो जाता है।
चतुर्दश सर्ग
आदिप्रस्थान इन्द्रिय-विजय का प्रथम सोपान है। स्मृति रूपी किवाड़ों
से इन्द्रिय रूपी बाँधों को बन्द कर दो। ध्यान और आरोग्य के लिए भोजन
की मात्रा को पहचानों। बुद्धिमान् व्यक्ति अनुराग, तृष्णा, भक्ति से अभिभूत
न होकर भूख मिटाने के लिए ही भोजन करता है। जब तक अस्त्रयुक्त शत्रुओं
को शान्त न कर लिया जाय, तब तक नींद को अपने अधिकार में रखना
चाहिए। रात्रि के प्रथम प्रहर में योगाभ्यास करना चाहिए। द्वितीय प्रहर में
दाहिने करवट प्रज्ञावान् पुरुष को आत्मचिन्तन करते हुए सो जाना चाहिए।
अन्तिम प्रहर में संयतभाव से योगाभ्यास करना चाहिए। निर्जन, शान्त एवं
एकान्त स्थान में योगाभ्यास करना चाहिए। स्मृतिहीन व्यक्ति दोषों का शिकार
होता है। अतः स्मृतिवान् बने रहना चाहिए। इन्धनहीन आग जैसे स्वयं शान्त
हो जाती है, उसी तरह अकम्पित चित्त स्वतः शान्त हो जाता है।
पञ्चदश सर्ग
इस सर्ग में शील का पालन करने के लिए समाधि का उपयोग अत्या-
वश्यक है। पर्यङ्कासन में बैठकर शरीर को सीधे रखकर स्मृति की सहायता से
चंचल चित्त को स्थिर कर समाधि साधने का अभ्यास करना चाहिए।
कुतर्कों का परित्याग मानसिक शुद्धि है। वितर्क-प्रहाण एकाग्रता से ही
समुपलब्ध होता है। स्वर्ग-प्राप्ति की कामना, धनार्जन की लालसा, काम-सुख
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की तृष्णा नरक का द्वार खोलती है। अतः द्वेष और हिंसा का परित्याग
कर, काम-सुख की आशा का परित्याग कर, वितर्कों का विनाश कर ध्यानाव-
स्थित होने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। संसार की विविधताओं और
विचित्रताओं के प्रति आसक्ति ही छन्दराग है। छन्दराग की निवृत्ति से
जीवन आलोकमय हो जाता है। सुनार जैसे सोने से अनेक तरह के आभूषण
तैयार करते हैं, उसी तरह शान्तचित्त व्यक्ति अनेक श्रेय का भागी स्वतः ही
बन जाता है।
षोडश सर्ग
मानसिक एकाग्रता से योगी तत्त्वविद् बन जाता है। वह इनमें कुछ
तत्त्वों को स्वीकार करता है और कुछ का बहिष्कार। फिर वह चार तरह के
ध्यानों तथा पाँच प्रकार के अभिज्ञाओं का अधिकारी बन जाता है। फिर
वह तत्त्वों का स्वयं परीक्षक बन जाता है। तत्त्वों का विश्लेषण कर आर्य-
सत्य का अधिकारी बन जाता है। फिर उसका चित्त मल-रहित निर्मल
बन जाता है। चार आर्य-सत्यों का ज्ञान ही योगी का आत्मदर्शन है। चार
आर्य-सत्यों के ज्ञान से वह दुःखमुक्त हो जाता है। बीज का जो स्वभाव है, वही
रहेगा। आग अपनी प्रकृति नहीं बदलती है। दोषों से ही संसार की
उत्पत्ति होती है। शान्त एवं मंगलकारी धर्म का साक्षात्कार करना चाहिए।
तृष्णा विनाशी है। शान्ति-प्राप्ति के लिए मनुष्य को वैसा ही प्रयास करना
चाहिए, जैसे कृषक खेत जोत कर अन्न का उत्पादन करता है।
सप्तदश सर्ग
ससदश सर्ग में परमशान्ति के लिए नन्द की तपस्या एवं विगत-मोहस्थिति
का वर्णन है। इस सर्ग में अनुगामी नन्द को तत्त्वमार्ग का उपदेश प्राप्त हो
गया। वह गुरु को प्रणाम कर जंगल के लिए प्रस्थान कर गया। वहाँ
जाकर उसने मुक्तिमार्ग का सम्भारप्रत्यय, स्वभाव और दोष-विशेष की
दृष्टि से पदार्थों और धर्मों की विधिवत् परीक्षा की। उसने रूप और अरूप
के सारतत्त्वों को देखने की इच्छा से शरीर का विश्लेषण किया। परीक्ष-
णोपरान्त इन्हें नन्द ने अनात्म और अनित्य पाया। उसने संसार को सकारण
पाया। इस अनुगामी ने अपने उद्योग से उस दुष्कर मार्ग को प्राप्त कर लिया,
जहाँ सामान्य योगी का प्रवेश नहीं हो पाता है। चतुर्थ ध्यान का सहारा लेकर
प्रज्ञारूपी तलवार से इसने मार्ग की सारी बाधाओं को विनष्ट कर डाला। अन्त
में मन ही मन उसने तथागत को प्रणाम किया और कहा कि मैं अब मुक्त हूँ,
सुखी हूँ। अनेकों बार अपने इस मार्गदाता को प्रणाम करता हूँ।
अष्टादश सर्ग
बौद्धदर्शन दुःखवाद के लिए प्रसिद्ध है। जीवन कुछ नहीं है, चेतना की
परिवर्तनशीलता या प्रवाहमयिता है और यही दुःख या क्लेश है। इसी का
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विनाश मुक्ति का स्वरूप है। यह सब जानकर कृतार्थ नन्द ने बुद्ध के समीप
पहुँच कर सोचा कि मेरे लिए किया गया श्रम सफल हुआ। उसने मुनि के
दर्शन करना चाहा। उनके सामने प्रणिपात कर कहा—हे मुनिराज ! आसक्ति
से वशीभूत मैंने जो विषय-भोग रूपी विष पिया था, आपने उसे अपने वचन
रूपी औषधि से उतार दिया। यद्यपि मैं अभी भी संसार में हूँ, परन्तु सांसारि-
कता के प्रति थोड़ा भी आसक्त नहीं हूँ। अतः अब मैं कह सकता हूँ कि मैं संसार
के बंधनों से पूर्णतः मुक्त हूँ। मुनि ने नन्द से संतुष्ट होकर कहा—हे साधु
पुरुष ! अब तुम जन्म, जरा और मरण से मुक्त हो। तुम्हारी प्रज्ञा अत्युत्कृष्ट
है। तुम अब स्थिरात्मा हो। अब तुम अपना कार्य छोड़कर परोपकार में
लगो। अज्ञानरूपी अन्धकार में भटकते प्राणियों के बीच प्रज्ञा रूपी दीप का
प्रकाश फैलाओ। अन्त के दो पद्यों में कवि ने यह काव्य लिखने के कारण का
संकेत किया है।
॥ श्रीः ॥
महाकवि-अश्वघोषप्रणीतं
सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
'विमला'-संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्
प्रथमः सर्गः
कपिलवस्तुवर्णनम्
गौतमः कपिलो नाम मुनिर्धर्मभृतां वरः ।
बभूव तपसि श्रान्तः काक्षीवानिव गौतमः ॥ १ ॥
टीकाकर्तुः मङ्गलाचरणम्
कामारिर्भूत्वाऽपि सकामचेतसा भोगीव योगी गिरिजां ददर्श ।
प्रयत्नसंस्तम्भितविकृतियंः स मे शिवः मङ्गलमातनोतु ॥ १ ॥
नमो ब्रह्मस्वरूपाय परेशाय यतात्मने ।
निर्विकल्पाय नित्याय विश्वरूपाय शम्भवे ॥ २ ॥
बुद्धं सङ्घहितं नत्वा त्वाचारं विभाव्य च ।
व्याख्येयं क्रियते 'विमला' प्रीतये च सतां मुदा ॥ ३ ॥
सौन्दरनन्दार्णवात् किञ्चिद्रत्नान्युद्धृत्य ग्रथ्यते ।
मालेयमश्वघोषस्य सुखयेद्विबुधानपि ॥ ४ ॥
मिश्रजगदीशचन्द्रेण वाणीं संवर्द्धितात्मना ।
बालानां सुखबोधाय क्रियते विमला मया ॥ ५ ॥
अथ तत्रभवान् महाधीमान् बौद्धसङ्घचूडामणिः प्राज्ञजनस्तुत्यजनिः चूडान्तप्रतिभा-
विकासोऽश्वघोषः सत्काव्यस्य सर्वजनाऽभिलाषविषयचतुर्वर्गफलप्राप्तिहेतुतया भगवतो
बुद्धस्यानवद्यभव्यचरित्रपवित्रमतिशयरुच्यं सौन्दरनन्दाऽभिख्यं महाकाव्यं चिकीर्षुः
'आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्' इति शास्त्रात् आदौ प्रस्तुतविषया-
नुकूलं वस्तु निर्दिशति—
अन्वयः—कपिलः गौतमः नाम मुनिः धर्मभृतां वरः काक्षीवान् गौतमः इव
तपसि श्रान्तः बभूव ॥ १ ॥
२ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
व्याख्या—कपिलः = एको मुनिस्तद्वंशावतीर्णः, गौतमः = शौद्धोदनिः, नाम = एत-
न्नामकः, मुनिः = शास्ता, 'मुनीन्द्रः श्रीघनः शास्ता मुनिः' इत्यमरः; धर्मभृताम्—धर्मं
विभर्त्तीति धर्मभृत्, तेषां धर्मभृताम् ( धर्म + √भृञ् + क्विप् + षष्ठीबहुवचने 'यतश्च
निर्धारणे' इत्यनेन षष्ठी ) = धर्माचरणकर्तॄणाम्, वरः = श्रेष्ठः, काक्षीवान्--काक्षी =
सुराष्ट्रजा 'काक्षी मृत्स्ना तु वरिकामृतालकसुराष्ट्रजे' इत्यमरस्तथा 'काक्षी तु वरिकायां
च सौराष्ट्रमुद्यपि स्त्रियाम्' इति मेदिनी; कक्षे भवा इति काक्षी ( 'तत्र भवः' ४।३।५३
इत्यण् ), काक्षी अस्ति अस्य इति काक्षीवान् ( काक्षी + मतुप् ), गौतमः =
अहल्यापतिगौतमनामकः, मुनिः = ऋषिः, इव = सदृशः, तपसि = तपस्यायाम्,
श्रान्तः = निरतः, बभूव = अभवत् । अनुष्टुप् छन्दः ॥ १ ॥
हिन्दी—धार्मिकों में श्रेष्ठ महातपस्वी, अहल्यापति ज्ञानी गौतम की तरह कपिल
वंश में गौतम बुद्ध नामक एक तपस्वी हुए ॥ १ ॥
अशिश्रियद्यः सततं दीप्तं काश्यपवत्तपः ।
आशिश्राय च तद्वृद्धौ सिद्धिं काश्यपवत्पराम् ॥ २ ॥
अन्वयः—यः काश्यपवत् सततं दीप्तं तपः अशिश्रियत्, तद्वृद्धौ काश्यपवत् परां
सिद्धिम् आशिश्राय च ॥ २ ॥
व्याख्या—यः = गौतमः, काश्यपवत् = एकः प्रसिद्धः ऋषिः तदिव ( कश्यप् +
अण् ), सततम् = अनवरतम्, दीप्तम् = प्रज्ज्वलितम् ( दीप् + क्त ), तपः = नियम-
स्थितिः, अशिश्रियत् = अकरोत् ( 'श्रिञ् सेवायाम्' लुङ्लकारश्च्लेश्चङादेशः छित्व-
ञ्चेति ) । अथ च तद्वृद्धौ = तपोवृद्धौ, काश्यपवत् = कणादमुनिरिव, पराम् = परमो-
त्कृष्टां, सिद्धिम् = साफल्यम्, आशिश्राय = लब्धवान् । ( 'आ' उपसर्गात् श्रिञ् धातोः
लिट्, प्र० पु० एकवचनस्य रूपम् ) ॥ २ ॥
हिन्दी—उन्होंने मुनि काश्यप की तरह कठोर तपस्या की तथा उस प्रदीप्त तप
को बढ़ाकर परम सिद्धि की प्राप्ति की ॥ २ ॥
हविःषु यश्च स्वात्मार्थं गामधुक्षद् वसिष्ठवत् ।
तपःशिष्टेषु च शिष्येषु गामधु(धो)क्षद् वसिष्ठवत् ॥ ३ ॥
अन्वयः—यः च वसिष्ठवत् स्वात्मार्थं हविःषु गाम् अधुक्षत् तपःशिष्टेषु शिष्येषु
वसिष्ठवत् गां च अधुक्षत् ॥ ३ ॥
व्याख्या—यः = गौतममुनिः, चः = पुनः, वसिष्ठवत् = वसिष्ठमुनिरिव ( वसिष्ठ +
मतुप् ), वसिष्ठो हि मुनिः निजगोभ्यः स्वकृतयज्ञार्थं दुग्ध-दधि-घृतादिकमलभत । तद्वत्
स्वात्मार्थम्—स्वस्य=आत्मनोऽर्थमिति=निजार्थं, हविःषु=हविष्यान्नेषु, गाम् = धेनुम्,
अधुक्षत् = दोग्धवान् । ( 'हविषे' इति पाठान्तरे 'निमित्तात् कर्मयोगे' इत्यनेनात्र सप्त-
मीति ) तपःशिष्टेषु = तपस्विषु, शिष्येषु = छात्रेषु, वसिष्ठवत् = वसिष्ठमुनिरिव, च =
पुनः, गाम्=धेनुम्, पक्षान्तरे—पृथिवीं वाणीञ्च, अधुक्षत् = दुदोह । तपःशिष्टेष्वत्र बहु-
कपिलवस्तुवर्णनम् ] प्रथमः सर्गः ३
व्रीहिः तपःशिष्टं येषां तेषु । वसिष्ठ इवात्रेवेन सहोपमालङ्कारः । गाम् शब्दस्य च
द्विरावृत्त्या यमकाऽलङ्कारोऽप्यस्ति ॥ ३ ॥
हिन्दी—अपनी हवन-सामग्री के लिए मुनि वसिष्ठ ने जैसे अपनी गायों को दुहा,
उसी तरह गौतम बुद्ध ने भी अपने तपस्वी शिष्यों को उपदेश देने के लिए अपनी
वाणी को दुहा ॥ ३ ॥
माहात्म्याद् दीर्घतपसो यो द्वितीय इवाभवत् ।
तृतीय इव यश्चाभूत् काव्याङ्गिरसयोर्धिया ॥ ४ ॥
अन्वयः—माहात्म्यात् यः, द्वितीयः दीर्घतपस इव अभवत्, च धिया यः तृतीयः
काव्याङ्गिरसयोः इव अभूत् ॥ ४ ॥
व्याख्या—माहात्म्यात् = निजप्रभावात्, यः = गौतमो बुद्धः, द्वितीयः = अपरः,
दीर्घतपसः = दीर्घं तपः यस्य सः तस्य, महत्पुण्यभाग्, इव = यथा, अहल्यापति-
गौतमस्य विशेषणम्, अभवत् = आसीत्, च = पुनः, धिया = बुद्ध्या, तृतीयः काव्या-
ङ्गिरसयोः = एतन्नामकयोः मुन्योः, काव्यश्च आङ्गिरसश्च तयोः काव्याङ्गिरसयोः,
काव्यः = रक्षसां गुरुः शुक्राचार्यः ( कवि + ण्यत् = काव्यः ), आङ्गिरसः = देवानां गुरुः
बृहस्पतिः, अङ्गिरसः अपत्यं पुमान् आङ्गिरसः ( अङ्गिरस् + अण् ), बृहस्पतिः
ऋग्वेदस्य मन्त्रद्रष्टाऋषेरङ्गिरसः पुत्र आसीत् । इव = तद्वत्, अभूत् = बभूव । गौतमं
काव्याङ्गिरसयोरिव कथितमस्ति । अतोऽत्र उपमालङ्कारः ॥ ४ ॥
हिन्दी—अपनी महिमा में वे मानों दूसरे अहल्यापति गौतम थे और ज्ञान में तो
शुक्र और बृहस्पति की तरह तीसरे ज्ञानी थे ॥ ४ ॥
तस्य विस्तीर्णतपसः पार्श्वे हिमवतः शुभे ।
क्षेत्रं चायतनं चैव तपसामाश्रमोऽभवत् ॥ ५ ॥
अन्वयः—तस्य विस्तीर्णतपंसः हिमवतः शुभे पार्श्वे तपसाम् आश्रमः आयतनं
क्षेत्रं च अभवत् ॥ ५ ॥
व्याख्या—तस्य = गौतमस्य, विस्तीर्णतपसः = विस्तीर्णं तपः यस्य सः, तस्य =
दीर्घतपसः, हिमवतः = हिमालयस्य, शुभे = कल्याणिने, पार्श्वे = अञ्चले, तपसाम् =
साधनानाम्, आश्रमः = आस्थानम्, आयतनम् = निकेतनम्, च क्षेत्रम् = स्थानम्,
च अभवत् = आसीत् ॥ ५ ॥
हिन्दी—हिमालय की सुखद तराई में उस महातपस्वी का आश्रम था, जो संसिद्धि
का क्षेत्र था ॥ ५ ॥
चारुवीरुत्तरुवनः प्रस्निग्धमृदुशाद्वलः ।
हविर्धूमवितानेन यः सदाभ्र इवाबभौ ॥ ६ ॥
अन्वयः—चारुवीरुत्तरुवनः प्रस्निग्धमृदुशाद्वलः यः हविर्धूमवितानेन सदा अभ्र
इव आबभौ ॥ ६ ॥
४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
व्याख्या—चारुवीरुत्तरुवनः—वीरुधश्च, विशेषेण रुणद्धि अन्यान् वृक्षान्; ( वि+
रुध् + क्विप्, उपसर्गस्य दीर्घः ) 'लताप्रतानिनी वीरुत्' इति भट्टिः; लताश्च, तरवश्च =
वृक्षाणि च ( व्रश्च् + क्सू ), वीरुधश्चेति तरवश्चेति वीरुत्तरवः, चारवः वीरुत्तरवः इति
चारुवीरुत्तरवः, तैः सहितं वनम् इति चारुवीरुत्तरवनं यस्मिन् सः चारुवीरुत्तरवनः=
सुन्दरलतावृक्षारण्यः, प्रस्निग्धमृदुशाद्वलः=मसृणकोमलशाद्वलः, प्रस्निग्धे=चिक्कणे,
मृदुः = कोमलम्, शाद्वलम्—शादाः सन्ति अत्रेति ( शाद् + वलच् ), शाद्वलम्=तृणयुक्त-
भूमिः, हविर्धूमवितानेन—हविषः धूमस्तस्य वितानस्तेन =यज्ञधूमाच्छादनेन, यः=
आश्रमः, सदा=सर्वदा, अभ्रः=मेघः, इव=यथा, आवभौ=सुशोभितो बभूव
( आङ्+√भा+लिट् ) । इवपदेनात्रोपमालङ्कारः ॥ ६ ॥
हिन्दी—सुन्दर लताओं और वृक्षों से वह वन आकर्षक बना था। वहाँ की धरती
पर चिकनी, कोमल एवं हरी घासों की चादर बिछी थी। होम के धुएँ से बने बादलों
का ऊपर चंदोवा टँगा था ॥ ६ ॥
मृदुभिः सैकतैः स्निग्धैः केसरास्तरपाण्डुभिः ।
भूमिभागैरसङ्कीर्णैः साङ्गरागा इवाभवत् ॥ ७ ॥
अन्वयः—मृदुभिः सैकतैः स्निग्धैः असङ्कीर्णैः केसरास्तरपाण्डुभिः, भूमिभागैः,
साङ्गरागाः इव अभवत् ॥ ७ ॥
व्याख्या—मृदुभिः =कोमलैः, सैकतैः = सिकतामयैः, स्निग्धैः=मसृणैः, असङ्कीर्णैः
—न सङ्कीर्णास्तैः=पवित्रैः, केसरास्तरपाण्डुभिः—केसराणाम् आस्तरस्तेन पाण्डुस्तैः =
केसरशय्यापीतैः, भूमिभागैः—भूमेः भागास्तैः=भूखण्डैः, साङ्गरागाः—अङ्गरागेन
सहिताः साङ्गरागाः = अङ्गरागयुक्ताः, इव=यथा, अभवत्=बभूवेति ॥ ७ ॥
हिन्दी—अत्यन्त कोमल एवं चिकने फैले हुए सुगन्धित पुष्प-पराग से पीली बनी
धरती ही उस आश्रम के लिए सुगन्धि लेप दी ॥ ७ ॥
शुचिभिस्तीर्थसङ्ख्यातः पावनैर्भावनैरपि ।
बन्धुमानिव यस्तस्थौ सरोभिः ससरोरुहैः ॥ ८ ॥
अन्वयः—शुचिभिः तीर्थसङ्ख्यातैः पावनैः भावनैः अपि ससरोरुहैः सरोभिः यः
बन्धुमान् इव तस्थौ ॥ ८ ॥
व्याख्या—शुचिभिः=पवित्रैः, तीर्थसङ्ख्यातः—तीर्थानां सङ्ख्यातानि, तैः =तीर्थ-
स्वरूपैः, पावनैः = निर्मलैः, भावनैः=सुन्दरैः, अपि=चेत्, ससरोरुहैः—सरसि रोहन्तीति
सरोरुहास्तैः=कमलैः, सरोभिः=जलाशयैः, यः =आश्रमः, बन्धुमान्—बन्धवः सन्ति
अस्येति बन्धुमान् ( बन्धु+मतुप् )=बन्धुयुक्तः, इव =यथा, तस्थौ = ( √स्था + लिट्
+तिप् ) तस्थिवान् ॥ ८ ॥
हिन्दी—विकसित कमलों से भरा परिगणित एवं पवित्र घाटों वाले सरोवरों से
घिरा वह आश्रम बहुकुटुम्बी की तरह लग रहा था ॥ ८ ॥
कपिलवस्तुवर्णनम् ] प्रथमः सर्गः ५
पर्याप्तफलपुष्पाभिः सर्वतो वनराजिभिः ।
शुशुभे ववृधे चैव नरः साधनवानिव ॥ ९ ॥
अन्वयः—सर्वतः फलपुष्पाभिः वनराजिभिः साधनवान् नरः इव ववृधे शुशुभे
चैव ॥ ९ ॥
व्याख्या—साधनसम्पन्नमानवमिवाश्रममाह—पर्याप्तेत्यादि । सर्वतः=परितः,
फलपुष्पाभिः=( वनराजिभिरित्यस्य विशेषणम्, विशेषणविवक्षायाऽत्र लिङ्गनिर्देशः,
किन्नूद्देश्यविशेषणस्य विधेयविशेषणत्वं क्लिष्टम् ) फलकुसुमयुक्ताभिः, वनराजिभिः=
वनपङ्क्तिभिः, साधनवान्=साधनसम्पन्नः, साधनानि सन्ति यस्य सः (साधन + मतुप्);
नरः=मानवः, इव=यथा, ववृधे=एधाञ्चकार, शुशुभे=शोभितवान् ( शुभ् + लिट् ),
चैव=अपि चेति । साधनसम्पन्नमानवमिवाऽत्र सादृश्यं सुन्दरं वाक्यार्थोपकारकमुप-
मालङ्कृतिर्बोध्यम् ॥ ९ ॥
हिन्दी—चारों ओर फल-फूलों से लदे पेड़ों की कतारों से इस आश्रम का सौन्दर्य
एवं अभ्युदय मानों साधनसम्पन्न व्यक्ति की तरह प्रतीत हो रहा था ॥ ९ ॥
नीवारफलसन्तुष्टैः स्वस्थैः शान्तैरनुत्सुकैः ।
आकीर्णोऽपि तपोभृद्भिः शून्यशून्य इवाभवत् ॥ १० ॥
अन्वयः—नीवारफलसन्तुष्टैः स्वस्थैः शान्तैः अनुत्सुकैः तपोभृद्भिः आकीर्णोऽपि
शून्यशून्य इव अभवत् ॥ १० ॥
व्याख्या—नीवारफलसन्तुष्टैः=धान्यविशेषफलतुष्टैः, नीवाराश्च फलानि च तैः
सन्तुष्टैः ( नि+वच्+घञ्, दीर्घश्चेति ), स्वस्थैः=निरोगैः, शान्तैः=शान्तचित्तैः,
अनुत्सुकैः=निरभिलाषैः, न उत्सुकाः अनुत्सुकास्तैः, तपोभृद्भिः=तपस्विभिः, तपः
बिभ्रतीति तपोभृत्, तैः, आकीर्णोऽपि=व्याप्तोऽपि, शून्यशून्य=निर्मक्षिकमिव,
अभवत्=बभूवेति । आकीर्णोऽपि शून्यशून्य इवाऽत्र चमत्कारजनकत्वे सति उपमान-
तावच्छेदकधर्मविशिष्टसम्भावनात्वमुत्प्रेक्षेति ॥ १० ॥
हिन्दी-तिन्नी, धान और फलों से संतुष्ट, स्वस्थ, शान्त एवं निरभिलाष
तपस्वियों से भरे रहने पर भी वह आश्रम सूना-सूना-सा लगता था ॥ १० ॥
अग्नीनां हूयमानानां शिखिनां कूजतामपि ।
तीर्थानां चाभिषेकेषु शुश्रुवे यत्र निःस्वनः ॥ ११ ॥
अन्वयः—यत्र हूयमानानाम् अग्नीनां कूजतां शिखिनाम् अपि अभिषेकेषु च
तीर्थानां निःस्वनः शुश्रुवे ॥ ११ ॥
व्याख्या—यत्र=तपोवने, हूयमानानाम्=हवनं क्रियमाणानाम्, अग्नीनाम् =
पावकानाम्, कूजताम्=मुखराणाम्, शिखिनाम्=शिखा अस्ति अस्येति तेषां =
कलापिनाम्, अपि=चेत्, अभिषेकेषु=स्नानेषु, तीर्थानाम्=पवित्रजलाशयानाम्,
निःस्वनः=शब्दः, शुश्रुवे=श्रुतवान् ॥ ११ ॥
६ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
हिन्दी—इस शान्त तपोवन में केवल आग में हवन करने की, मोरों के बोलने
की एवं घाटों पर नहाने की आवाज ही सुनाई पड़ती थीं ॥ ११ ॥
विरेजुर्हरिणा यत्र सुप्ता मेध्यासु वेदिषु ।
सलाजैर्माधवीपुष्पैरुपहाराः कृता इव ॥ १२ ॥
अन्वयः—यत्र मेध्यासु वेदिषु सुप्ता हरिणाः सलाजैः माधवीपुष्पैः उपहाराः कृताः
इव विरेजुः ॥ १२ ॥
व्याख्या—आश्रममृगसौन्दर्यवर्णनप्रसङ्गे विरेजुरित्याह—यत्र = यस्मिन् स्थाने,
मेध्यासु = पूतासु 'मेध्यं त्रिष्वशुचौ रक्तवचारोचनयोः स्त्रियाम्' इति मेदिनी । वेदिषु
=वेदिकासु 'स्याद्वितर्दिस्तु वेदिके'त्यमरः । सुप्ताः = निद्रिताः, हरिणाः = मृगाः,
सलाजैः = अक्षतयुक्तैः 'लाजैः सहिताः तैः, माधवीपुष्पैः = चन्द्रवल्लीकुसुमैः, उपहाराः
कृताः =( उप + √हृ + घञ् ) उपहृताः, इव=यथा, विरेजुः ( वि + रेज् + लिट् +
झि ) =सुशोभिरे । अत्र मृगाणामुपहारकरणकसम्भावनायामुत्प्रेक्षाऽलङ्कारः ॥ १२ ॥
हिन्दी—यज्ञ की वेदी पर सोये हुए चितकबरा हिरण ऐसा लगता था, जैसे धान
के लावे और माधवी फूलों के साथ उसे भी उस पवित्र वेदी पर किसी ने उपहार ही
चढा दिया हो ॥ १२ ॥
अपि क्षुद्रमृगा यत्र शान्ताश्चेरुः समं मृगैः ।
शरण्येभ्यस्तपस्विभ्यो विनयं शिक्षिता इव ॥ १३ ॥
अन्वयः—यत्र शान्ताः क्षुद्रमृगाः अपि मृगैः समं शरण्येभ्यः तपस्विभ्यः विनयं
शिक्षिताः इव चेरुः ॥ १३ ॥
व्याख्या—यत्र = आश्रमे, शान्ताः = निरुद्वेगाः, क्षुद्रमृगाः = हिंस्रजन्तवः, क्षुद्राश्च
ते मृगाः इति क्षुद्रमृगाः, अपि = चेत्, मृगैः = हरिणैः, समम् = साकम्, शरण्येभ्यः =
शरणप्रदातृभ्यः, शरणे साधु शरण्यः, तेभ्यः ( शरण + यत् + पं० ब० व० ),
तपस्विभ्यः = तपोधनेभ्यः, विनयं = नम्रताम्, शिक्षिता इव = अनुशासिता इवेति,
चेरुः = भ्रमन्तिस्म ( चर् + लिट् + झि ) । सम्भावनार्थकोत्प्रेक्षाऽत्र ॥ १३ ॥
हिन्दी—बाघ-सिंह जैसे हिंसक पशुओं के साथ उस आश्रम के वनप्रान्त में क्षुद्र
हिरण भी शान्तिपूर्वक विचरण करते थे । लगता था मानों उन्होंने अपने शरणदाता
मुनियों से ही विनय की शिक्षा पाई हैं ॥ १३ ॥
सन्दिग्धेऽप्यपुनर्भावि विरुद्धेष्वागमेष्वपि ।
प्रत्यक्षिण इवाकुर्वंस्तपो यत्र तपोधनाः ॥ १४ ॥
अन्वयः—यत्र अपुनर्भावि सन्दिग्धेऽपि आगमेषु विरुद्धेषु अपि तपोधनाः तपः
प्रत्यक्षिण इव अकुर्वन् ॥ १४ ॥
व्याख्या—अथ यद्वक्तव्यं तदाह—सन्दिग्ध इति । यत्र = यस्मिन् तपोवने,
अपुनर्भावि = पुनर्भवंतीति पुनर्भाविः, न पुनर्भाविः अपुनर्भाविस्तस्मिन् अपुनर्भावि = मोक्ष-
कपिलवस्तुवर्णनम् ] प्रथमः सर्गः ७
प्राप्तौ ('यस्य च भावेन भावलक्षणमि'त्यनेनाऽत्र सप्तमी), सन्दिग्धेऽपि = निश्चयाभावेऽपि,
आगमेषु = वेदेषु, विरुद्धेषु = विपरीतेषु, अपि = चेत्, तपोधनाः = तपस्विनः, तपः =
साधनां, प्रत्यक्षिण इव = साक्षिण इव, अकुर्वन् = चक्रुः । अनिश्चयेऽपि बौद्धधर्मानुया-
यिभ्यः 'मोक्षसिद्धान्तः' मान्यो नास्ति, तेषां निर्वाणम् मोक्षाद्भिन्नेतर एवास्ति ।
आगमविरुद्धत्वाद् बौद्धधर्मः अवैदिकधर्मोऽस्ति । तेनायं धर्मः 'शास्त्रविरोधी' इति
कथ्यते । तपस्विभिः तपःप्रत्यक्षीकरणसम्भावनाऽस्ति, तेनाऽत्र चमत्कारजनकत्वे सति
उपमानतावच्छेदकधर्मविशिष्टसम्भावनात्वमुत्प्रेक्षात्वम् ॥ १४ ॥
हिन्दी—परमगति पाने में भ्रान्त तथा वेद-विरोधी होने के बावजूद भी तापसों
ने वहाँ वैसे ही तप किये, मानों उन्हें वहाँ अपने तपफल के प्रत्यक्ष दर्शन हुए हों ॥१४॥
यत्र स्म मीयते ब्रह्म कैश्चित् कैश्चिन्न मीयते ।
काले निमीयते सोमो न चाकाले प्रमीयते ॥ १५ ॥
अन्वयः—यत्र कैश्चित् ब्रह्म मीयतेस्म, कैश्चित् मीयते न काले सोमः निमीयते
अकाले च कैश्चित् न प्रमीयते ॥ १५ ॥
व्याख्या—यत्र स्मेति । यत्र = आश्रमे, कैश्चित् = कतिपयतपस्विभिः, ब्रह्म =
परमेश्वरः, मीयतेस्म = मननं क्रियतेस्म (√माङ् (शब्दे ) लटि, कर्मणि यक्, भूत-
कालिकार्थे लट् योगे 'स्म'), कैश्चित् = बहुभिर्मुनिभिः, न मीयतेस्म = न हिंसितः (अत्र
'मीञ् हिंसायाम्' कर्मणि लट् ), काले = अवसरे, सोमः = सोमलतारसः, निमीयते =
भारनिरूपणं क्रियते, अकाले = अनवसरे, न कोऽपि, प्रमीयतेस्म = म्रियतेस्म ॥ १५ ॥
हिन्दी—इस आश्रम में किसी ने ब्रह्म का चिन्तन किया, तो कुछ ने हिंसा का
परित्याग किया, वहाँ समय पर ही सोमरस चुलाया गया और असमय तो किसी की
मौत हुई ही नहीं ॥ १५ ॥
निरपेक्षाः शरीरेषु धर्मे यत्र स्वबुद्धयः ।
संहृष्टा इव यत्नेन तापसास्तेपिरे तपः ॥ १६ ॥
अन्वयः—यत्र शरीरेषु निरपेक्षाः तापसाः स्वबुद्धयः धर्मे यत्नेन संहृष्टाः इव
तपः तेपिरे ॥ १६ ॥
व्याख्या—निरपेक्षारिति । यत्र = यस्मिन् स्थाने, शरीरेषु = देहेषु, निरपेक्षाः—
निर्गता अपेक्षा येषां ते = अनासक्ताः, तापसाः = तपस्विनः, स्वबुद्धयः = निजमतयः,
धर्मे = धार्मिकानुष्ठाने, यत्नेन = उपायेन, संहृष्टाः = सन्तुष्टाः, इव = यथा, तपः =
साधनाम्, तेपिरे = तप्तवन्तः । अत्र 'इव'शब्दस्य प्रयोगः सम्भावनायामस्ति, अतो-
ऽत्रोत्प्रेक्षाऽलङ्कारः ॥ १६ ॥
हिन्दी—अपने प्रयास से आप संतुष्ट, अपनी बुद्धि के अनुसार अपने धर्म में
स्थिर, देहजनित चिन्ता से मुक्त होकर उन तापसों ने तपस्या की ॥ १६ ॥
श्राम्यन्तो मुनयो यत्र स्वर्गायोद्युक्तचेतसः ।
तपोरागेण धर्मस्य विलोपमिव चक्रिरे ॥ १७ ॥
८ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
अन्वयः—यत्र स्वर्गाय उद्युक्तचेतसः श्राम्यन्तः मुनयः तपोरागेण धर्मस्य
विलोपमिव चक्रिरे ॥ १७ ॥
व्याख्या—श्राम्यन्त इति । यत्र = यस्मिन् तपोवने, स्वर्गाय = अमरलोकाय,
उद्युक्तचेतसः—उद्युक्तं चेतः येषां ते=उत्सुकमनाः, श्राम्यन्तः=श्रान्तः सन्तः, मुनयः=
तपस्विनः, तपोरागेण—तपसः अनुरागस्तेन = तपस्यानुरागेण, धर्मस्य=अभ्युदय-
निःश्रेयससाधको गुणकर्मसमूहः, विलोपम्=नाशम्, इव=यथा, चक्रिरे=चक्रतुः ।
मुनिभिः धर्मस्य लोपकरणे सम्भावनाऽस्ति तेनाऽत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः ॥ १७ ॥
हिन्दी—स्वर्ग-प्राप्ति की कामना से मन लगाकर मुनियों ने तप के प्रति अपनी
आस्था प्रकट करते हुए मानों अपने लौकिक कर्त्तव्य को भी भुला दिया ॥ १७ ॥
अथ तेजस्विसदनं तपःक्षेत्रं तमाश्रमम् ।
केचिदिक्ष्वाकवो जग्मू राजपुत्रा विवत्सवः ॥ १८ ॥
अन्वयः—अथ तेजस्विसदनं तपःक्षेत्रं तम् आश्रमं केचित् विवत्सवः इक्ष्वाकवः
राजपुत्राः जग्मुः ॥ १८ ॥
व्याख्या—अथ=अनन्तरम्, तेजस्विसदनम्—तेजस्विनी सदनम्=वर्चस्विभवनम्,
तपःक्षेत्रम्=साधनाकेन्द्रम्; तम्=पूर्वोक्तम्, आश्रमम्=आस्थानम्, केचित्=कति-
पयाः, विवत्सवः=वासं कर्तुमिच्छवः, इक्ष्वाकवः=इक्ष्वाकुवंशिनः, राजपुत्राः=
( नृपतनयः, जग्मुः = अगच्छन् ॥ १८ ॥ न्
हिन्दी—कुछ ही दिनों के बाद उस पवित्र आश्रम में, जो उस तपोभूमि का एक
प्रभावशाली क्षेत्र था, इक्ष्वाकुवंश के कई राजकुमारों ने प्रवेश किया ॥ १८ ॥
सुवर्णस्तम्भवर्ष्माणः सिंहोरस्का महाभुजाः ।
पात्रं शब्दस्य महतः श्रियां च विनयस्य च ॥ १९ ॥
अन्वयः—सुवर्णस्तम्भवर्ष्माणः सिंहोरस्काः महाभुजाः महतः शब्दस्य श्रियां
विनयस्य च पात्रम् ( आसीत् ) ॥ १९ ॥
व्याख्या—सुवर्णस्तम्भवर्ष्माणः—सुवर्णस्य=कनकस्य, स्तम्भः=स्थाणुः, इव=
यथा, वर्ष्म=देहम्, येषां ते=कनकयूपशरीराणि, 'शरीरं वर्ष्मं विग्रहः' इत्यमरः; (वृष् +
मनिन्=वर्ष्मं) सिंहोरस्काः—सिंहस्य=मृगाधिपस्य, उरः=वक्षःस्थलम्, इव=यथा,
उरः येषां ते सिंहोरस्काः (ऋत् + असुन्, उत्वं रपरश्चेति; अत्र 'उरःप्रभृतिभ्यः कपि'त्य-
नेन कन् ), महाभुजाः—महत्यः=बृहत्यः, भुजाः=बाहवः, येषां ते=विपुलबाहवः, महतः
=विशालस्य, शब्दस्य=ख्यातेः 'शास्त्रे शब्दस्तु वाचकः' इत्यमरः; श्रियाम्=लक्ष्मी-
नाम्, 'लक्ष्मीः पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिप्रिया' इत्यमरः; विनयस्य=शालीनतायाः,
च=पुनः, पात्रम्=आश्रयः आसीत् । 'सुवर्णस्तम्भवर्ष्माणः' अस्मिन् सामासिकशब्दे
तथा 'सिंहोरस्काः' इत्यत्राऽपि च लुप्तोपमाऽलङ्कारः । वाक्यार्थोपकारकत्वे सति
कपिलवस्तुवर्णनम् ] प्रथमः सर्गः ९
आनन्दविशेषजनकत्वेनात्र सादृश्यत्वमुपमानत्वं बोध्यम्, तथा च अलङ्कारत्वे सति
उपमानतावच्छेदकधर्मविशिष्टसादृश्यत्वेन लुप्तोपमाऽत्र बोध्यम् ॥ १९ ॥
हिन्दी—सोने के खंभे की तरह सुडौल एवं आकर्षक उनके शरीर थे, लम्बी बांहें
तथा सिंह की तरह चौड़ी छातियां थीं। वे महान् ख्याति, श्री और विनय की प्रति-
मूर्त्ति थे ॥ १९ ॥
अर्हरूपा ह्यनर्हस्य महात्मानश्चलात्मनः ।
प्राज्ञाः प्रज्ञाविमुक्तस्य भ्रातृव्यस्य यवीयसः ॥ २० ॥
अन्वयः—अनर्हस्य चलात्मनः प्रज्ञाविमुक्तस्य यवीयसः भ्रातृव्यस्य अर्हरूपाः
महात्मानः प्राज्ञाः आसन् ॥ २० ॥
व्याख्या—अनर्हस्य = अयोग्यस्य, बौद्ध-साधुभ्योऽपि 'अर्हं'शब्दस्य प्रयोगो भवति,
चलात्मनः—चलः = चपलः, आत्मा = स्वः, येषां ते=अस्थिरजीवाः, प्रज्ञाविमुक्तस्य—
प्रज्ञया = ज्ञानेन, विमुक्तः = रहितस्तस्य=ज्ञानरहितस्य, यवीयसः=कनिष्ठस्य, भ्रातृव्यस्य
—भ्रातुः = सोदरस्य, पुत्रः = सुतः भ्रातृव्यः ( भ्रातृ + ण्यत्, किञ्चात्र भ्रातृव्यशब्दस्य
प्रयोगो वैमात्रेयार्थक एवाऽस्ति ), अर्हरूपाः = योग्याः, महात्मानः = स्थिरप्रज्ञाः,
प्राज्ञाः = धीमन्तः ( आसन् ) ॥ २० ॥
हिन्दी—ये सुयोग्य, महात्मा तथा बुद्धिमान् थे और इनके छोटे सौतेले भाई
अयोग्य, चंचल एवं मूर्ख थे ॥ २० ॥
मातृशुल्कादुपगतां ते श्रियं न विषेहिरे ।
ररक्षुश्च पितुः सत्यं यस्माच्छिश्रियिरे वनम् ॥ २१ ॥
अन्वयः—ते मातृशुल्कात् उपगतां श्रियं विषेहिरे यस्मात् पितुः सत्यं ररक्षुः वनं
च शिश्रियिरे ॥ २१ ॥
व्याख्या—ते = नृपसुताः, मातृशुल्कात् = जननीकरात्, मातृपक्षात् कररूपे प्राप्तव्य-
धनाय प्रयुक्तोऽयं शब्दः, उपगताम् = पुरःस्थिताम्, श्रियम् = लक्ष्मीम्, विषेहिरे =
त्यक्तवन्तः, यस्मात् = कारणात्, पितुः = जनकस्य, सत्यम् = प्रतिज्ञाम्, ररक्षुः = रक्षित-
वन्तः, वनम् = अरण्यम्, च = पुनः, शिश्रियिरे = सेवितवन्तः ॥ २१ ॥
हिन्दी—मातृपक्ष से शुल्करूप में प्राप्त धन का परित्याग कर पिता के सत्य की
रक्षा करते हुए उन्होंने वन का आश्रय ग्रहण किया ॥ २१ ॥
तेषां मुनिरुपाध्यायो गौतमः कपिलोऽभवत् ।
गुरुगोत्रादतः कौत्सास्ते भवन्ति स्म गौतमाः ॥ २२ ॥
अन्वयः—तेषाम् उपाध्यायः मुनिः कपिलः गौतमः अभवत् अतः ते कौत्साः गुरु-
गोत्रात् गौतमाः भवन्ति स्म ॥ २२ ॥
१० सौन्दरनन्द महाकाव्यम्
व्याख्या—अत्र तेषां गुरोः वर्णनमस्ति । तेषाम् = नृपसुतानाम्, उपाध्यायः =
गुरुः, उपेत्य अधीयते अस्मात् इति ( उप + अधि + √ इ + घञ् ); तद्यथा—
'एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः ।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ।।'—मनुस्मृतिः २।१४१
मुनिः=तत्त्वज्ञः, कपिलः =मुनिविशेषः, गौतमः = एतदाख्यो मुनिविशेषः, अभवत्
= बभूव, अतः = अस्मात् कारणात्, ते = सर्वे, कौत्साः = इक्ष्वाकवः, गुरुगोत्रात्—
गुरोः गोत्रात् = गुरुवंशतः, गौतमाः = गौतमनामकाः, भवन्ति स्म = बभूवतुः ।। २२ ।।
हिन्दी—इनके गुरु कपिल मुनि, जो गौतम नाम से विख्यात थे, उन्हीं के नाम पर
इनका भी नाम गौतम हुआ ।। २२ ।।
एकपित्रोर्यथा भ्रात्रोः पृथग्गुरुपरिग्रहात् ।
राम एवाभवद् गार्ग्यो वासुभद्रोऽपि गौतमः ।। २३ ।।
अन्वयः—यथा पृथग्गुरुपरिग्रहात् एकपित्रोः अपि भ्रात्रोः रामः एव गार्ग्यः अभवत्
वासुभद्रः गौतमः ( अभवत् ) ।। २३ ।।
व्याख्या—यथा = येन प्रकारेण, पृथग्गुरुपरिग्रहात् =गुरोः=आचार्यस्य, परिग्रहात्
= ग्रहणकरणात्, पृथक् = भिन्न इति पृथग्गुरुपरिग्रहात् = व्यक्तिशः गुरुकरणात्,
एकपित्रोः=एकः एव पिता ययोः = एकजनकयोः, अपि = चेत्, भ्रात्रोः = सहोदरयोः,
रामः = एतदाख्यः, एवेति निश्चयः, गार्ग्यः = गार्ग्याभिधानः, अभवत् = बभूव, वासु-
भद्रः = एतन्नामकः, गौतमः अभवत् ।। २३ ।।
हिन्दी—जैसे अलग-अलग गुरु के शिष्य होने से एक ही पिता के पुत्र दो भाई,
राम गार्ग्य और वासुभद्र गौतम हुए ।। २३ ।।
शाकवृक्षप्रतिच्छन्नं वासं यस्माच्च चक्रिरे ।
तस्मादिक्ष्वाकुवंश्यास्ते भुवि शाक्या इति स्मृताः ।। २४ ।।
अन्वयः—यस्मात् इक्ष्वाकुवंश्याः शाकवृक्षप्रतिच्छन्नम् वासं चक्रिरे तस्मात् ते
भुवि शाक्याः इति स्मृताः ।। २४ ।।
व्याख्या—यस्मात् = येन कारणेन, इक्ष्वाकुवंश्याः = इक्ष्वाकुकुलोत्पन्नाः, शाकवृक्ष-
प्रतिच्छन्नम्—शाकाश्च ते वृक्षास्तैः प्रतिच्छन्नम् = शाकविटपिव्याप्तम्, वासम् =
निवासम्, चक्रिरे = चक्रुः, तस्मात् = तस्मात् कारणात्, ते = इक्ष्वाकवः, भुवि = धरि-
त्र्याम्, शाक्याः = शाक्यनामकाः, इति = इत्थम्, स्मृताः = कथिताः ।। २४ ।।
हिन्दी—उन इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारों ने जिस स्थान पर निवास किया था, वह
शाक वन से आच्छादित था । अतः ये लोग आगे चलकर शाक्य कहलाये ।। २४ ।।
स तेषां गौतमश्चक्रे स्ववंशसदृशीः क्रियाः ।
मुनिरूध्वं कुमारस्य सगरस्येव भार्गवः ।। २५ ।।
कपिलवस्तुवर्णनम् ] प्रथमः सर्गः ११
अन्वयः—सः गौतमः मुनिः ऊर्ध्वं कुमारस्य सगरस्य भार्गवः इव तेषां स्ववंश-
सदृशीः क्रियाः चक्रे ॥ २५ ॥
व्याख्या—सः = असौ, गौतमः = एतन्नामकः, मुनिः = साधकः, ऊर्ध्वम् = पश्चात्,
कुमारस्य = शिशोः, सगरस्य = एतदाख्यस्य राज्ञः, भार्गवः = शुक्राचार्यः, इव = यथा,
तेषां = पूर्वोक्तानां राजपुत्राणाम्, स्ववंशसदृशीः = निजकुलानुसारिण्यः, क्रियाः = संस्काराः,
चक्रे = चकार ॥ २५ ॥
हिन्दी—आचार्य शुक्र ने आगे चलकर जिस तरह राजा सगर का संस्कार किया,
उसी तरह गौतम ने अपने वंश के अनुरूप इन राजकुमारों का संस्कार किया ॥ २५ ॥
कण्वः शाकुन्तलस्येव भरतस्य तरस्विनः ।
वाल्मीकिरिव धीमांश्च धीमतोर्मैथिलेययोः ॥ २६ ॥
अन्वयः—कण्वः शाकुन्तलस्य तरस्विनः भरतस्य इव धीमान् वाल्मीकिः च
धीमतोः मैथिलेययोः इव ॥ २६ ॥
व्याख्या—कण्वः = एकः कुलपतिः, यस्य आश्रमे शकुन्तला तस्य पालितपुत्री इव
आसीत् । शाकुन्तलस्य—शकुन्तलायाः अपत्यं पुमान् (शकुन्तला + अण्) = शकुन्तला-
पुत्रस्य, तरस्विनः = बलवतः, भरतस्य = शकुन्तलापुत्रस्य, इव = यथा, धीमान्—धीः=
बुद्धिः, अस्येति ( धी + मतुप् ) । वाल्मीकिः = महर्षिवाल्मीकिः, रामायणस्य रचयिता-
ऽऽदिकविरस्ति, च = पुनः, धीमतोः = बुद्धिमतोः, मैथिलेययोः—मिथिलायां भवा
मैथिली = सीता, मैथिल्याः अपत्यम् मैथिलेयः, तयोः मैथिलेययोः = सीतासुतयोः,
इव = यथा, गौतमो मुनिः तेषां संस्कारं चकारेति तात्पर्यः ॥ २६ ॥
हिन्दी—इनका संस्कार उसी तरह सम्पन्न हुआ, जैसा ऋषि कण्व ने शकुन्तला
के वीरपुत्र भरत का तथा श्रीमान् वाल्मीकि ने सीता के मेधावी पुत्रों का किया
था ॥ २६ ॥
तद्वनं मुनिना तेन तैश्च क्षत्रियपुङ्गवैः ।
शान्तां गुप्तां च युगपद् ब्रह्मक्षत्रश्रियं दधे ॥ २७ ॥
अन्वयः—तद् वनं तेन मुनिना तैः क्षत्रियपुङ्गवैः च शान्तां गुप्तां च ब्रह्म-
क्षत्रश्रियं युगपद् दधे ॥ २७ ॥
व्याख्या—तत् = पूर्वोक्तम्, वनम् = काननम्, तेन = पूर्वोक्तेन, मुनिना = गौतमेन,
तैः = पूर्वंकथितैः, क्षत्रियपुङ्गवैः = क्षत्रियेषु पुङ्गवास्तैः = राजन्योत्तमैः, शान्तां =
स्वस्थचेताम्, निरुद्वेगाञ्च, गुप्तां = रक्षणयुक्ताम्, च = पुनः, ब्रह्मक्षत्रश्रियम्—ब्रह्म च =
ब्राह्मणञ्च, क्षत्रञ्च = क्षत्रियञ्च, ब्राह्मणक्षत्रियम्, तयोः श्रीः = कान्तिः, ताम्, युगपद् =
सहैव, दधे = (√धा+लिट्) धृतवान् ॥ २७ ॥
हिन्दी—उस वन ने एक साथ जहाँ इन मुनियों के कारण शान्तिमयी ब्राह्मणों
की विभूति धारण किया, वहीं इन कुमारों के कारण रक्षामयी क्षात्रश्री को धारण
किया ॥ २७ ॥
१२ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
अथोदकलशं गृह्य तेषां वृद्धिचिकीर्षया ।
मुनिः स वियदुत्पत्य तानुवाच नृपात्मजान् ॥ २८ ॥
अन्वयः—अथ सः मुनिः तेषां वृद्धिचिकीर्षया उदकलशं गृह्य वियद् उत्पत्य
तान् नृपात्मजान् उवाच ॥ २८ ॥
व्याख्या—अथ =अनन्तरम्, सः=असौ, मुनिः=ज्ञानीगौतमः, तेषां =राज-
पुत्राणाम्, वृद्धिचिकीर्षया=उन्नतिकर्तुमिच्छया, कर्तुमिच्छा चिकीर्षा (कृञ्+सन्
+टाप्), उदकलशम्—उदकस्य=जलस्य, कलशम्=घटम्, गृह्य=गृहीत्वा, वियद्=
आकाशम्, उत्पत्य = उड्डीय, तान् = पूर्वोक्तान्, नृपात्मजान् = राजपुत्रान्, उवाच =
कथयामास ॥ २८ ॥
हिन्दी—इसके बाद इन राजकुमारों के अभ्युदय की कामना से उन मुनियों ने
जल-कलश लेकर आकाश की ओर प्रस्थान किया तथा राजपुत्रों से कहा ॥ २८ ॥
या पतेत् कलशादस्मादक्षय्यसलिलान्महीम् ।
धारा तामनतिक्रम्य मामन्वेत यथाक्रमम् ॥ २९ ॥
अन्वयः—अस्मात् अक्षय्यसलिलात् कलशात् या धारा महीं पतेत् ताम् अनति-
क्रम्य यथाक्रमं माम् अन्वेत ॥ २९ ॥
व्याख्या—अस्मात् =मद्गृहीतात्, अक्षय्यसलिलात्—क्षेत्तुं शक्यं क्षय्यम्, न
क्षय्यम् अक्षय्यम्, अक्षय्यं सलिलं यस्मिन् सः, तस्मात् =अविनाशीजलात्, कलशात् =
घटात्, या=पूर्वोक्ता, धारा=वेगवान् वर्षः, महीम्=अवनीम्, पतेत्=गिरेत्, ताम्
=पूर्वोक्तसलिलधाराम्, अनतिक्रम्य—न अतिक्रम्येति अनतिक्रम्य (अन्+अति+
क्रम्+क्त्वा—ल्यप् ) = अनुल्लङ्घ्य, यथाक्रमम् = क्रमेण सह, माम् = मुनिम्,
अन्वेत = अनुसरण कुर्वन्तु ॥ २९ ॥
हिन्दी—कभी न चुकने वाली इस घड़े की जलधारा, जो धरती पर गिरती है,
उसे बिना लांघे धीरे-धीरे मेरे पीछे आओ ॥ २९ ॥
ततः परममित्युक्त्वा शिरोभिः प्रणिपत्य च ।
रथानारुरुहुः सर्वे शीघ्रवाहानलङ्कृतान् ॥ ३० ॥
अन्वयः—ततः परमम् इत्युक्त्वा शिरोभिः प्रणिपत्य च सर्वे शीघ्रवाहान् अल-
ङ्कृतान् रथान् आरुरुहुः ॥ ३० ॥
व्याख्या—ततः =तत्पश्चात्, परमम्=अतिशोभनम्, इति =एवम्, उक्त्वा =
कथयित्वा, शिरोभिः = मस्तकैः, प्रणिपत्य =प्रणामं कृत्वा, सः=असौ, सर्वे=सकलाः,
शीघ्रवाहान्—शीघ्रवाहिनः = द्रुतगामिनः, वाहाः = वहनकर्त्तारः घोटकाः, येषु तान्,
अलङ्कृतान् = परिष्कृतान्, रथान् = स्यन्दनान्, आरुरुहुः = आरूढवन्तः (आङ् +
रुह् + लिट् + झि ) ) ॥ ३० ॥
हिन्दी—इसके बाद 'बहुत अच्छा' यह कहकर सिर झुकाकर मुनि को प्रणाम
किया, फिर द्रुतगामी घोड़ों वाले अत्यन्त शोभा सम्पन्न रथों पर सवार हो गये ॥३०॥
सुरभीकृतम् The line goes DOWN from line 19 into line 20, between+and+? Wait! Look at that: it's a insertion! The reader wanted to insert something? No, wait, look at the text: ( सुरभि + च्वि + Wait, is that a printed character? Let's look at the ink: the ink ofसुरभि + च्वि + is black print. Then there is:√ च्वि + √ कृञ् + क्त? Wait, why would it be √ च्वि? Wait, look at √in√ च्वि: Could it be printed? No matter whether it's printed or handwritten, let's look at what's readable: If someone reads this page, what do they see? व्याख्या—... सुरभीकृतम् ( सुरभि + च्वि + च्वि + कृञ् + क्त ), इदम् = एतत्,or with√: Wait, if it's ( सुरभि + च्वि + कृञ् + क्त ), that's the correct Sanskrit grammatical form: सुरभि + च्वि + कृञ् + क्त! Wait, why is there an extra thing? It looks like a misprint: सुरभि
१४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
हिन्दी—जलधारा से घिरी तथा तुम्हारे रथ के चक्कों से चिन्हित इस धरती
पर मेरे स्वर्गारोहण के बाद तुम सब एक नगर बसा लेना ॥ ३३ ॥
ततः कदाचित् ते वीरास्तस्मिन् प्रतिगते मुनौ ।
बभ्रमुर्यौवनोद्दामा गजा इव निरङ्कुशाः ॥ ३४ ॥
अन्वयः—ततः तस्मिन् मुनौ प्रतिगते कदाचित् ते वीराः यौवनोद्दामाः निरङ्कुशाः
गजाः इव बभ्रमुः ॥ ३४ ॥
व्याख्या—ततः = तत्पश्चात्, तस्मिन् = पूर्वोक्ते, मुनौ = ऋषौ, प्रतिगते = स्वर्ग-
ङ्गते, कदाचित् = एकदा, ते = राजकुमाराः, वीराः = पुरुषार्थशीलाः, यौवनोद्दामाः—
यौवनेन = तारुण्येन, उद्दामाः = उच्छृङ्खलाः, निरङ्कुशाः = नियन्त्रणरहिताः, गजाः =
करिणः, इव = यथा, बभ्रमुः = इतस्ततो भ्रमितवन्तः ॥ ३४ ॥
हिन्दी—मुनि के स्वर्गीय होने पर ये वीर राजकुमार इधर-उधर यौवन मद में
निरङ्कुश गजराज की तरह घूमने लगे ॥ ३४ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणा हस्तविष्ठितकार्मुकाः ।
शराध्मातमहातूर्णा व्यायताबद्धवाससः ॥ ३५ ॥
अन्वयः—बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः हस्तविष्ठितकार्मुकाः शराध्मातमहातूर्णाः व्याय-
ताबद्धवाससः ॥ ३५ ॥
व्याख्या—बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः—गोधा एव अङ्गुलित्राणानि गोधाङ्गुलित्राणानि,
बद्धानि गोधाङ्गुलित्राणानि यैस्ते=धृतचर्माङ्गुलित्राणाः, हस्तविष्ठितकार्मुकः—हस्तेषु=
करेषु, विष्ठितानि = धृतानि, कार्मुकानि = धनूंषि, यैस्ते = हस्ते धृतशरासनाः, शरा-
ध्मातमहातूर्णाः—शरैः = बाणैः, आध्माताः ( आ+ध्मा+क्त ) =विकसिताः,
महातूर्णाः = निषङ्गाः, येषां ते = बाणपूरितनिषङ्गाः, व्यायताबद्धवाससः—व्यायतानि
=विशालानि, आबद्धानि =आवेष्टितानि, वासांसि=वस्त्राणि, येषां ते वीराः इतस्ततः
भ्रमन्ति ॥ ३५ ॥
हिन्दी—चमड़े के दस्ताने पहनकर, हाथों में धनुष-बाण लिए, पीठ पर तीरों से
भरे तरकस लटकाये; अपने लम्बे चोंगे का फेटा कसे (वे वीर इधर-उधर घूमने
लगे ) ॥ ३५ ॥
जिज्ञासमाना नागेषु कौशलं श्वापदेषु च ।
अनुचक्रुर्वनस्थस्य दौष्यन्तेर्देवकर्मणः ॥ ३६ ॥
अन्वयः—नागेषु श्वापदेषु च कौशलं जिज्ञासमानाः वनस्थस्य देवकर्मणः
दौष्यन्तेः अनुचक्रुः ॥ ३६ ॥
व्याख्या—नागेषु = गजेषु, श्वापदेषु = वन्यपशुषु, च=पुनः, कौशलम्=नैपुण्यम्,
जिज्ञासमानाः = परीक्ष्यमाणाः, वनस्थस्य = आरण्यकस्य, देवकर्मणः—देवस्य—देव-
कपिलवस्तुवर्णनम् ], प्रथमः सर्गः १५
तायाः, कर्म = कृत्यम्, यस्य सः, तस्य = दिव्यकर्मणः, दौष्यन्तेः = दुष्यन्ततनयभरतस्य,
अनुचक्रुः = अनुकरणं कृतवन्तः ॥ ३६ ॥
हिन्दी—वनैले हाथियों को खोजते हुए, वन्य पशुओं पर अपनी अस्त्रकला का
परीक्षण करते हुए, उन्होंने देवकर्मा दुष्यन्त-पुत्र भरत का अनुकरण किया ॥ ३६ ॥
तान् दृष्ट्वा प्रकृतिं यातान् वृद्धान् व्याघ्रशिशूनिव ।
तापसास्तद्वनं हित्वा हिमवन्तं सिषेविरे ॥ ३७ ॥
अन्वयः—वृद्धान् व्याघ्रशिशून् इव तान् प्रकृतिं यातान् दृष्ट्वा तापसाः तद्वनं
हित्वा हिमवन्तं सिषेविरे ॥ ३७ ॥
व्याख्या—वृद्धान् = वृद्धिङ्गतान्, व्याघ्रस्य = मृगान्तकस्य, शिशून् = शावकान्,
इव = यथा, तान् = कुमारान्, प्रकृतिम् = स्वाभाविकस्थितिम्, यातान् = गतान्,
दृष्ट्वा = अवलोक्य, तापसाः = मुनयः, तत् = पूर्वोक्तम्, वनम् = अरण्यम्, हित्वा =
परित्यज्य, हिमवन्तम् = नगाधिराजम्, सिषेविरे = सेवितवन्तः ॥ ३७ ॥
हिन्दी—जवान होकर वे राजकुमार बाघ के बच्चों की तरह अपनी स्वाभाविक
स्थिति में पहुँच गये । यह देखकर उस वन के मुनि अपने आश्रम को छोड़कर हिमा-
लय पर चले गये ॥ ३७ ॥
ततस्तदाश्रमस्थानं शून्यं तैः शून्यचेतसः ।
पश्यन्तो मन्युना तप्ता व्याला इव निशश्वसुः ॥ ३८ ॥
अन्वयः—ततः तदाश्रमस्थानं तैः शून्यं पश्यन्तः शून्यचेतसः मन्युना तप्ताः व्याला
इव निशश्वसुः ॥ ३८ ॥
व्याख्या—ततः = तदनन्तरम्, तत् = पूर्वोक्तम्, आश्रमाणाम् = तपोवनानाम्,
स्थानम् = भूमिम्, तैः = तपस्विभिः, शून्यम् = रहितम्, पश्यन्तः = अवलोकयन्तः,
शून्यचेतसः = विगतमानसाः, मन्युना = क्रोधेन, तप्ताः = प्रज्वलिताः, व्यालाः = सर्पाः,
इव = यथा, निशश्वसुः = निःश्वसितवन्तः ॥ ३८ ॥
हिन्दी—तब वापस शून्य उन आश्रमों को देखकर वे उदास हो गये और क्रोध
से जलते हुए साँपों की तरह लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगे ॥ ३८ ॥
अथ ते पुण्यकर्माणः प्रत्युपस्थितवृद्धयः ।
तत्र तज्ज्ञैरुपाख्यातानवापुर्महतो निधीन् ॥ ३९ ॥
अन्वयः—अथ तत्र पुण्यकर्माणः प्रत्युपस्थितवृद्धयः ते तज्ज्ञैः उपाख्यातान् महतो
निधीन् अवापुः ॥ ३९ ॥
व्याख्या—अथ = अनन्तरम्, तत्र = तस्मिन् स्थाने, पुण्यकर्माणः—पुण्यं = सुकृतम्,
कर्म = कृत्यं, येषां ते पुण्यकर्माणः = पुण्यशालिनः, प्रत्युपस्थितवृद्धयः—प्रत्युपस्थिताः =
सम्प्राप्ताः, वृद्धयः = उन्नतयः, येषां ते सम्प्राप्तसमृद्धयः, ते = कुमाराः, तज्ज्ञैः—तज्ज्ञाना-