सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
६४ सर्वार्थसिद्धि
इसका यह अर्थ नहीं कि अन्तरंग कारणोंके अनुसार जहाँ जितने परीषहोंका उल्लेख उन्होंने किया है वहाँ
उतने परीषहोंका सद्भाव वे नियमसे मानते ही हैं। उन्होंने परीषह प्रकरणके अन्तिम सूत्रमें परीषहोंका कार्यके
अनुसार भी अलगसे विधान किया है। वे कहते हैं कि यद्यपि कुल परीषह बाईस हैं तथापि एक जीवके एक
साथ एकसे लेकर उन्नीस तक परीषह हो सकते हैं। स्पष्ट है कि इस अन्तिम सूत्रके प्रकाशमें यह अर्थ नही
फलित किया जा सकता है कि जिस प्रकार तत्त्वार्थसूत्रकारने अधिकारी भेदसे कहाँ कितने परीषह होते हैं
इस बातका विधान किया है उसी प्रकार उन्हें सर्वत्र उनका कार्य भी इष्ट है। इसका तो केवल इतना ही
अर्थ है कि अन्तरंग कारणोंके अनुसार सर्वत्र परीषहोंकी सम्भावना स्वीकार कर लेने पर भी यदि उन
परीषहोंके जो अन्य बाह्य निमित्त हैं वे नहीं मिलते तो एक भी परीषह नहीं होते। तभी तो सूत्रकार १ परी-
षहसे लेकर १९ परीषह तक होने रूप विकल्पका कथन करते हैं। यथा किसी प्रमत्तसंयत साधुके सब कर्मोंका
उदय होनेसे सब परीषह सम्भव हैं पर उनके परषहोंके बाह्य निमित्त एक भी नहीं हैं तब उन्हें एक भी
परीषहका वेदन न होगा। यदि एक परीषहका बाह्य निमित्त है तो एक परीषहका वेदन होगा और अधिक
परीषहोंके बाह्य निमित्त उपस्थित हैं तो अधिक परीषहोंका वेदन होगा। तात्पर्य यह है कि केवल अन्तरंग
कारणोंके सद्भावसे परीषहोंका वेदन कार्य नहीं माना जा सकता। स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रकारकी दृष्टि केवल
अन्तरंग कारणोंके सद्भावमें उनके कार्यको स्वीकार करनेकी नहीं है। उन्होंने तो मात्र अन्तरंग कारणोंकी
दृष्टिसे सर्वत्र उनका उल्लेखमात्र किया है।
इस दृष्टिसे हमने श्वेताम्बर आगम साहित्यका आलोडन किया है। किन्तु वहाँ तत्त्वार्थसूत्रकारकी
दृष्टिसे सर्वथा भिन्न दृष्टि अपनायी गयी प्रतीत होती है। वहाँ जहाँ जितने परीषह सम्भव हैं उनमेंसे विरोधी
परीषहोंको छोड़कर सबके वेदनकी बात स्वीकार की गयी है। वहाँ यह स्वीकार ही नहीं किया गया है कि
कोई एकका वेदन करता है, कोई दो का और कोई अधिकसे अधिक इतनेका वेदन करता है। वहाँ तो एक
मात्र यही बतलाया गया है कि 'जो सात या आठ कर्मोंका बन्ध करते हैं उनके सब परोषह सम्भव हैं परन्तु
वे एक साथ वेदन मात्र बीसका करते हैं। जो छह कर्मका बन्ध करते हैं उनके चौदह परीषह सम्भव हैं
परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका करते हैं। जो वीतराग छद्मस्थ एक कर्मका बन्ध करते हैं उनके भी
चौदह परीषह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र बारहका ही करते हैं। जो एक कर्मका बन्ध करनेवाले
सयोगी जिन हैं उनके परीषह तो ग्यारह सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ वेदन मात्र नौका करते हैं। तथा जो
अबन्धक अयोगी जिन हैं उनके भी परीषह तो सयोगी जिनके समान ग्यारह ही सम्भव हैं परन्तु वे एक साथ
वेदन मात्र नौका करते हैं ।¹
इसलिए यहाँ भी तत्त्वार्थसूत्र और श्वेताम्बर आगम साहित्यके तुलनात्मक अध्ययनसे हम इसी
निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'एकादश जिने' सूत्रका विधान करते हुए भी तत्त्वार्थसूत्रकार जितने अधिक दिगम्बर
परम्पराके नजदीक हैं उतने श्वेताम्बर परम्पराके नजदीक नहीं।
यह है तत्त्वार्थसूत्रके कुछ सूत्रोंका परीक्षण जिससे भी हमें इस बातके निर्णय करनेमें सहायता मिलती
है कि तत्त्वार्थसूत्रकार वाचक उमास्वातिसे भिन्न होने चाहिए।
किन्तु दिगम्बर परम्परामें उमास्वाति या उमास्वामी नामके कोई आचार्य हुए हैं इस बातका सूचक
कोई प्राचीन उल्लेख नहीं मिलता। श्रवणवेलगोलाके शिलालेख या दूसरे जितने भी प्रमाण मिलते हैं वे सब
उन उल्लेखोंसे जो तत्त्वार्थसूत्रको आचार्य गृद्धपिच्छकी कृति प्रकट करते हैं, बादके हैं, अतएव इस मामलेमें
उनका उतना विश्वास नहीं किया जा सकता ।
सिद्धसेनीय टीका—पं० सुखलालजीने अपने तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावनामें सिद्धसेन गणि और हरि-
भद्रसूरिकी टीकासे एक दो उल्लेख उपस्थित कर² यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि तत्त्वार्थसूत्रकार
और उनके भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं किन्तु वे उल्लेख सन्देहास्पद हैं। उदाहरणार्थ सिद्धसेन गणिकी टीकामें
१. व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८ । २. देखो उनके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृष्ठ १७ की टिप्पणी १ ।
सातवें अध्यायके अन्तमें जो पुष्पिका उपलब्ध होती है उसमें आये हुए 'उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये'
पदको पण्डितजी भाष्यकार और सूत्रकार एक व्यक्ति हैं इस पक्षमें लगाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इस पदका
सीधा अर्थ है—उमास्वाति वाचक द्वारा बनाया हुआ सूत्रभाष्य । यहाँ उमास्वातिवाचकोपज्ञ पदका सम्बन्ध
सूत्रसे न होकर उसके भाष्यसे है। दूसरा प्रमाण पण्डितजीने ९वें अध्यायके २२वें सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकाको
उपस्थित किया है। किन्तु यह प्रमाण भी सन्देहास्पद है, क्योंकि सिद्धसेन गणिकी टीकाकी जो प्राचीन प्रतियाँ
उपलब्ध होती हैं उनमें 'स्वकृतसूत्रसन्निवेशमाश्रित्योक्तम्' पाठके स्थानमें 'कृतस्तत्र सूत्रसन्निवेशमाश्रित्यो-
क्तम्' पाठ भी उपलब्ध होता है¹। बहुत सम्भव है कि किसी लिपिकारने तत्त्वार्थसूत्रका वाचक उमास्वाति
कर्तृत्व दिखलानेके अभिप्रायसे 'कृतस्तत्र'का संशोधन कर 'स्वकृत' पाठ बनाया हो और बादमें यह पाठ
चल पड़ा हो ।
साधारणतः हमने स्वतन्त्र भावसे सिद्धसेन गणिकी टीकाका आलोडन किया है, इसलिए इस आधारसे
हम यह तो मान लेते हैं कि उसमें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जो तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इनको
एककर्तृक सिद्ध करते हैं। उनमेंसे प्रथम उल्लेख प्रथम अध्यायके 'आद्ये परोक्षम्' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीका है।
यहाँ पर सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थभाष्यके 'सूत्रक्रमप्रामाण्यात् प्रथमद्वितीये शास्ति' अंशकी व्याख्या करते हुए
कहते हैं ।
'ग्रन्थकार एव द्विधा आत्मानं विभज्य सूत्रकारभाष्यकारेणेवमाह—शास्तीति सूत्रकार इति शेषः ।'
अथवा पर्यायभेदात् पर्यायिणो भेद इत्यन्यः सूत्रकारपर्यायोऽन्यश्च भाष्यकारपर्याय इत्यतः सूत्रकारपर्यायः
शास्तीति ।'
इसमें बतलाया गया कि 'ग्रन्थकारने अपनेको सूत्रकार और भाष्यकार इस तरह दो भागोंमें विभक्त कर
'शास्ति' ऐसा कहा है। इसलिए यहाँपर 'शास्ति' क्रियाके साथ उसके कर्त्ताका बोध करानेके लिए 'सूत्रकारः'
पद जोड़ लेना चाहिए। अथवा पर्यायोके भेदसे पर्यायिको भिन्न मान लेना चाहिए। अतः एक ही ग्रन्थकारकी
सूत्रकार पर्याय भिन्न है और भाष्यकार पर्याय भिन्न है, अतः सूत्रकार पर्याय कहती है ऐसा सम्बन्ध कर
लेना चाहिए।
ऐसा ही एक दूसरा उल्लेख अध्याय दोके 'निरुपभोगमन्त्यम्' सूत्रकी सिद्धसेनीय टीकामें मिलता है।
इसमें सूत्रकारसे भाष्यकारको अभिन्न बतलाया गया है। उल्लेख इस प्रकार है—
'सूत्रकारादविभक्तोऽपि हिं भाष्यकारो विभागमदर्शयति व्युच्छित्ति- (पर्याय ) नयसमाश्रयणात् ।'
इस प्रकार यद्यपि इन उल्लेखोंसे यह विदित होता है कि सिद्धसेन गणि तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थ-
भाष्यकार इन दोनों व्यक्तियोंको एक मानते रहे हैं पर इतने मात्रसे यह नहीं माना जा सकता कि यह उनका
निश्चित मत था। उन्होंने अपनी टीकामें कुछ ऐसा भी अभिप्राय व्यक्त किया है जिसके आधारसे विचार
करने पर सूत्रकारसे भाष्यकार भिन्न सिद्ध होते हैं। इसके लिए अध्याय आठके 'मत्यादीनाम्' सूत्रकी टीका
देखना चाहिए ।
यहाँ पर सिद्धसेन गणिके सामने यह प्रश्न है कि जब अन्य आचार्य 'मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम्'
सूत्र मानते हैं तब सूत्रका वास्तविक रूप 'मत्यादीनाम्' माना जाय या अन्य आचार्य जिस प्रकार उसका पाठ
पढ़ते हैं वैसा माना जाय । इस शंकाका समाधान करते हुए पहले तो उन्होंने हेतुओंका आश्रय लिया है किन्तु
इतने मात्रसे स्वयं सन्तोष होता न देख वे कहते हैं कि यतः भाष्यकारने भी इस सूत्रका इसी प्रकार अर्थ
किया अतः 'मत्यादीनाम्' ही सूत्र होना चाहिए। उनका समस्त प्रसंगको व्यक्त करनेवाला टीकावचन इस
प्रकार है—
'अपरे तु प्रतिपदं पञ्चापि पठन्ति - मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानामिति । एवं चापार्थकः पाठो
१. देखो सिद्धसेनीय टीका अ० ९, सू० २२, पृ० २५३ की टिप्पणी ।
९
लक्ष्यते । ततोऽनन्तरसूत्रे पञ्चादिभेदा ज्ञानावरणादय इत्यवधृतमेव । निर्ज्ञाताश्च स्वरूपतः प्रथमाध्याये
व्याख्यातत्वात् । अतः आदिशब्द एव च युक्तः । भाष्यकारोऽप्येवमेव सूत्रार्थमावेदयते ।'
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य 'भाष्यकारो-' इत्यादि वचन है । इस वचनमें भाष्यकारका सम्बन्ध सीधा
'मत्यादीनाम्' सूत्रकी रचनाके साथ स्थापित न कर उसके अर्थके साथ स्थापित किया गया है । इससे सिद्ध
होता है कि यहाँपर सिद्धसेन गणि सूत्रकारको भाष्यकारसे भिन्न मान रहे हैं, अन्यथा वे किसी अपेक्षासे सूत्र-
कार और भाष्यकारमें अभिन्नता स्थापित कर ऐसी भाषाद्वारा समर्थन करते जिससे भाष्यकारसे अभिन्न सूत्र-
कारने ही 'मत्यादीनाम्' सूत्र रचा है इस बातका दृढ़ताके साथ समर्थन होता ।
जहाँ तक हमारा मत है इन पूर्वोक्त उल्लेखोंके आधारसे हम एक मात्र इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
कि मूल तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार अभिन्न व्यक्ति हैं इस विषयमें सिद्धसेन गणिकी स्थिति संशया-
पन्न रही है, क्योंकि कहीं वे तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थभाष्यकार इनको एक व्यक्ति मान लेते हैं और कहीं
दो । इस स्थितिको देखते हुए मालूम ऐसा देता है कि सिद्धसेन गणिके काल तक तत्त्वार्थभाष्यकार ही मूल
तत्त्वार्थसूत्रकार हैं यह मान्यता दृढ़मूल नहीं हो पायी थी । यही कारण है कि सिद्धसेन गणि किसी एक मतका
निश्चयपूर्वक प्रतिपादन करनेमें असमर्थ रहे ।
पण्डितजी—इस प्रकार सिद्धसेन गणिकी टीकाके आधारसे वाचक उमास्वाति तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता
हैं इस बातके अनिर्णीत हो जाने पर भी यहाँ हमें प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीके एतद्विषयक प्रमाणोंका अलगसे
परामर्श कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है । इस विषयमें उन्होंने जिन तीन प्रमाणोंको उपस्थित किया है
उनका हम पहले पृष्ठ ६२ में निर्देश कर आये हैं । उनमेंसे पहला प्रमाण उत्थानिकाकी २२वीं कारिका और
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति है । इन दोनों स्थलोंमेंसे उत्थानिका कारिकामें तत्त्वार्थाधिगम
नामक लघुग्रन्थके कहनेकी प्रतिज्ञा की गयी है और अन्तिम प्रशस्तिमें वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थाधिगम शास्त्र
रचा यह कहा गया है । पण्डितजी इस आधारसे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता वाचक
उमास्वाति ही हैं । किन्तु हम यह पहले ( पृष्ठ १७ में ) ही सिद्ध करके बतला आये हैं कि तत्त्वार्थाधिगम
यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न होकर तत्त्वार्थभाष्यका है । स्वयं वाचक उमास्वाति तत्त्वार्थाधिगमको सूत्र न कह-
कर उसे ग्रन्थ या शास्त्र¹ शब्द द्वारा सम्बोधित करते हैं और आगे तत्त्वार्थाधिगमके रचनेका प्रयोजन बतलाते
हुए २२वीं उत्थानिका कारिकामें कहते हैं कि जिन वचन महोदधि दुर्गमग्रन्थभाष्यपार² होनेसे उसका
समझना कठिन है । ऐतिहासिकोंसे यह छिपी हुई बात नहीं है कि यहाँ वाचक उमास्वातिने आगम ग्रन्थोंके
जिन भाष्योंका उल्लेख किया है वे विक्रमकी ७वीं शताब्दीकी रचना हैं³ । जब कि इनके भी पूर्व तत्त्वार्थसूत्र
पर सर्वार्थसिद्धि प्रभृति अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी थीं । ऐसी अवस्थामें २१वीं उत्थानिका कारिका और
अन्तिम प्रशस्तिके आधारसे वाचक उमास्वातिको मूल तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता सिद्ध करना तो कोई अर्थ
नहीं रखता ।
पण्डितजी की दूसरो युक्तिमें कहा गया है कि तत्त्वार्थभाष्यके आलोडनसे ऐसा लगता है कि
तत्त्वार्थभाष्यमें सूत्रका अर्थ करनेमें कहीं भी खीचातानी नहीं की गयी है आदि । यहाँ विचार इस बातका
करना है कि क्या तत्त्वार्थभाष्यकी वैसी स्थिति है जैसी कि पण्डितजी उसके विषयमें उद्घोषणा करते हैं । इस
दृष्टिसे हमने भी तत्त्वार्थभाष्यका आलोडन किया है किन्तु हमें उसमें ऐसे अनेक स्थल दिखाई देते हैं जिनके
कारण इस दृष्टिसे तत्त्वार्थभाष्यकी स्थिति सन्देहास्पद प्रतीत होती है । यथा—
१ तत्त्वार्थसूत्रमें सम्यग्दर्शनीसे सम्यग्दृष्टिको भिन्न नहीं माना गया है । वहाँ अध्याय ७ सूत्र २३ में
ऐसे सम्यग्दर्शनवालेको भी सम्यग्दृष्टि कहा गया है जिसके शंका आदि दोष सम्भव होते हैं । किन्तु इसके
१. देखो उत्थानिका कारिका २१ व अन्तिम प्रशस्ति तत्त्वार्थभाष्य । २. महतोऽतिमहाविषयस्य दुर्गमग्रन्थ-
भाष्यपारस्य । कः शक्तो प्रत्यासं जिनवचनमहोदधेः कर्तुम् ।। ३. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीके तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रस्तावना पृ० १२ ।
प्रस्तावना ६७
विपरीत तत्त्वार्थभाष्यमें सम्यग्दर्शनी और सम्यग्दृष्टि इन दोनों पदोंकी स्वतन्त्र व्याख्या करके सम्यग्दर्शनीसे
सम्यग्दृष्टिको भिन्न बतलाया गया है । वहाँ कहा गया है कि जिसके आभिनिबोधिक ज्ञान होता है वह सम्य-
ग्दर्शनी कहलाता है और जिसके केवलज्ञान होता है वह सम्यग्दृष्टि कहलाता है ।$^१$ स्पष्ट है कि यहाँ पर
तत्त्वार्थभाष्यकार तत्त्वार्थसूत्रका अनुसरण नहीं करते और सम्यग्दृष्टिपदकी तत्त्वार्थसूत्रके विरुद्ध अपनी दो
व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं । एक स्थल ( अ० १ सू० ८) में वे जिस बातको स्वीकार करते हैं दूसरे (अ०
७ सू० २३ ) में वे उसे छोड़ देते हैं ।
२. तत्त्वार्थसूत्रमें मति, स्मृति और संज्ञा आदि मतिज्ञानके पर्यायवाची नाम हैं । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकार
इन्हें पर्यायवाची नाम न मानकर 'मतिः स्मृतिः' इत्यादि सूत्रके आधारसे मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान आदिको
स्वतन्त्र ज्ञान मानते हैं$^२$ । सिद्धसेन गणिने भी तत्त्वार्थभाष्यके आधारसे इनको स्वतन्त्र ज्ञान मानकर उनकी
व्याख्या की है । यह कहना कि सामान्य मतिज्ञान व्यापक है और विशेष मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान आदि उसके
व्याप्य हैं कुछ सयुक्तिक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि मतिज्ञान वर्तमान अर्थको विषय करता है । इस तथ्यको जब
स्वयं तत्त्वार्थभाष्यकार स्वीकार करते हैं ऐसी अवस्थामें मति, स्मृति आदि नाम मतिज्ञानके पर्यायवाची ही
हो सकते हैं ज्ञानान्तर नहीं । तथा दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्पराके आगमोंमें इन्हें मतिज्ञानके पर्यायवाची
ही कहा है । स्पष्ट है कि यहाँ पर भी तत्त्वार्थभाष्यकारकी व्याख्या मूल सूत्रका अनुसरण नहीं करती ।
३. तत्त्वार्थभाष्यकारने अध्याय १० सूत्र 'क्षेत्रकालंगति' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए$^३$ शब्द,
समभिरूढ और एवंभूत इन तीनको मूल नय मान लिया है जब कि वे ही प्रथम अध्यायमें उस सूत्र पाठको
स्वीकार करते हैं जिसमें मूल नयोंमें केवल एक शब्दनय स्वीकार किया गया है । स्पष्टतः उनका १०वें
अध्यायमें शब्दादिक तीन नयोंको मूलरूपसे स्वीकार करना और प्रथम अध्यायमें एक शब्दनयको मूल मानना
परस्पर विरुद्ध है ।
४. श्वेताम्बर तत्त्वार्थसूत्र अध्याय २ सूत्र ५२ में 'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ स्वीकार किया गया है ।
तत्त्वार्थभाष्यकारने प्रारम्भमें इस पदको मानकर ही उसकी व्याख्या की है । किन्तु बादमें वे 'उत्तमपुरुष'
पदका त्याग कर देते हैं और मात्र 'चरमदेह' पदको स्वीकार कर उसका उपसंहार करते हैं । इससे विदित
होता है कि तत्त्वार्थभाष्यकारको इस सूत्रके कुछ हेरफेरके साथ दो पाठ मिले होंगे । जिनमेंसे एक पाठको
उन्होंने मुख्य मानकर उसका प्रथम व्याख्यान किया । किन्तु उसको स्वीकार करनेपर जो आपत्ति आती है
उसे देखकर उपसंहारके समय उन्होंने दूसरे पाठको स्वीकार कर लिया । स्पष्ट है कि इससे तत्त्वार्थभाष्यकार
ही तत्त्वार्थसूत्रकार हैं इस मान्यताको बड़ा धक्का लगता है ।
५. तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ४ सूत्र ४ में प्रत्येक देवनिकायके इन्द्रादिक १० भेद गिनाये हैं । किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकार इन दस भेदोंके उल्लेखके साथ अनीकाधिपति नामका ग्यारहवां भेद और स्वीकार करते
हैं । इसी प्रकार इसी अध्यायके २६वें सूत्रमें लौकान्तिक देवोंके सारस्वत आदिक नौ भेद गिनाये हैं किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकार अपने भाष्यमें यहाँ नौके स्थानमें आठ भेद ही स्वीकार करते हैं । वे कहते हैं--'एते
सारस्वतादयोऽष्टविधा देवा ब्रह्मलोकस्य पूर्वोत्तरादिषु, दिक्षु प्रदक्षिणं भवन्ति यथासंख्यम् ।'
वे ऐसे प्रमाण हैं जो पण्डितजी की पूर्वोक्त मान्यताके विरुद्ध जाते हैं । स्पष्ट है कि पण्डितजीकी उक्त
मान्यताके आधारसे भी तत्त्वार्थभाष्यकारको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता नहीं माना जा सकता ।$^४$
पं० सुखलालजीकी तीसरी मान्यता है कि प्रारम्भिक कारिकाओंमें और कुछ स्थानोंपर भाष्यमें
'वक्ष्यामि, वक्ष्यामः' आदि प्रथम पुरुषकी क्रियाओंका निर्देश है आदि इसलिए तत्त्वार्थसूत्रकार और तत्त्वार्थ-
१. देखो तत्त्वार्थसूत्र अ० १ सू० ८ का तत्त्वार्थभाष्य । २. देखो अध्याय १ सूत्र १३ का तत्त्वार्थभाष्य ।
३. शब्दादयश्च त्रयः । ४. श्री पं० लालबहादुरजी शास्त्रीने जैन सिद्धान्तभास्कर भाग १३ किरण १ में
'क्या भाष्य स्वोपज्ञ और उसके कर्ता यापनीय हैं' इस शीर्षकसे एक लेख मुद्रित कराया है । उससे भी इस
विषयपर सुन्दर प्रकाश पड़ता है ।
६८ सर्वार्थसिद्धि
भाष्यकार एक ही व्यक्ति हैं। किन्तु पण्डितजी की यह कोई पुष्ट दलील नहीं है। अक्सर टीकाकार मूलकारसे
तादात्म्य स्थापित कर इस प्रकारकी क्रियाओंका प्रयोग करते हैं। उदाहरणके लिए देखो अध्याय १ सूत्र १ की
सर्वार्थसिद्धि टीका$^{१}$, अध्याय ८ सूत्र १ की उत्थानिका तत्त्वार्थवार्तिक$^{२}$, अध्याय ८ सूत्र १ की उत्थानिका
हरिभद्रकी टीका$^{३}$ व अध्याय १० सूत्र १ की उत्थानिका सिद्धसेन गणिकी टीका। यहाँ सिद्धसेन गणि कहते
हैं 'सम्प्रति तत्फलं मोक्षः, तं वक्ष्यामः ।' स च केवलज्ञानोत्पत्तिमन्तरेण न जातुचिदभूद् भवति भविष्यति
अतः केवल्योत्पत्तिमेव तावद् वक्ष्यामः । इसलिए इस आधारसे भी तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वाति
तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता नहीं सिद्ध होते ।
श्वेताम्बर पट्टावलियाँ- श्वेताम्बर पट्टावलियोंके देखनेसे भी इस स्थितिकी पुष्टि होती है । इनमें
सबसे पुरानी कल्पसूत्र स्थविरावली और नन्दिसूत्रकी पट्टावलि है । किन्तु इनमें समय नहीं दिया है। समय
गणना बहुत पीछेकी पट्टावलियोंमें है। कहा जाता है कि नन्दिसूत्र पट्टावली वि० सं० ५१० में संकलित हुई
थी। इनमें उमास्वाति व उनके गुरुओंके नाम नहीं हैं।
पिछले कालकी रची गयी पट्टावलियोंमेंसे धर्मघोषसूरिकृत दुःषमाकाल श्रमणसंघ स्तव एक है । इसकी
रचना विक्रमकी तेरहवीं सदीमें हुई अनुमानित की जाती है । इसमें उमास्वातिक नाम हरिभद्र और जिन-
भद्रके बाद आता है पर हरिभद्रने उमास्वातिके तत्त्वार्थभाष्य पर टीका लिखी है। ये विक्रमकी ८वीं-९वीं
सदीके विद्वान् हैं अतएव आचार्योंकी क्रम-परम्पराकी दृष्टिसे इस पट्टावलीको विशेष प्रमाण नहीं माना जा
सकता । इसमें वि० सं० ७२० में वाचक उमास्वातिकी अवस्थिति स्वीकार की गयी है ।
धर्मसागर गणिकृत तपागच्छ पट्टावली वि० सं० १६४६ में लिखी गयी थी। इसमें जिनभद्रके बाद
विबुधप्रभ, जयानन्द और रविप्रभका उल्लेख करनेके बाद उमास्वार्तिका नाम निर्देश किया है और इनका
समय वि० सं० ७२० बतलाया है। यद्यपि इन्होंने आर्यमहागिरिके बहुल और बलिसह नामक दो शिष्योंमें-
से बलिसहके शिष्य उमास्वातिक उल्लेख कर इन प्रथम उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता होनेकी सम्भा-
वना की है। किन्तु उनकी यह सम्भावना भ्रमजन्य है। कारण कि नन्दिसूत्र पट्टावलीकी २६वीं गाथामें
'हारियगुत्तं साइं च वंदे ।' पद आता है। जिसमें हारितगोत्रीय स्वातिका उल्लेख है। मालूम पड़ता है धर्म-
सागर गणिने नामकी आंशिक समता देखकर द्वितीयके स्थानमें भ्रमसे इन्हें ही तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता होनेकी
आशंका की है। पं० सुखलालजीने भी इस आशंकाको भ्रममूलक बतलाया है।$^{४}$
विनयविजय गणिने अपना लोकप्रकाश वि० सं० १७०८ में पूरा किया था। वे उमास्वातिको युग-
प्रधान आचार्य बतलाते हैं और जिनभद्र तथा पुष्पमित्रके बीच उनकी अवस्थिति स्वीकार करते हैं। इन्होंने
अपनी पट्टावलिमें उमास्वातिके समयका निर्देश नहीं किया है ।
रविवर्धन गणि (वि० सं० १७३९ ) ने भी पट्टावलीसारोद्धारमें उमास्वात्तिका उल्लेख किया है।
इसमें समयका निर्देश करते हुए वास्तव्वकाल वीर नि० सं० ११९० (वि० सं० ७२०) स्वीकार किया है ।$^{५}$
श्वेताम्बर परम्पराकी ये पट्टावलियाँ हैं जिनमें उमास्वातिक निर्देश किया है। यद्यपि ये पट्टावलियाँ
अपेक्षाकृत अर्वाचीन हैं और इनमें कुछ मतभेद है तथापि इनको सर्वथा निराधार मानना उचित नहीं है।
इनमें निर्दिष्ट वस्तुके आधारसे निम्नलिखित तथ्य फलित होते हैं-
१. वाचक उमास्वाति युगप्रधान आचार्य थे। वे वि० सं० ७२० के आसपास हुए हैं। बहुत सम्भव
है कि इसी कारणसे नन्दिसूत्र पट्टावली और कल्पसूत्र स्थविरावलिमें इनकी परम्पराका किसी भी प्रकारका
उल्लेख नहीं किया है।
२. यद्यपि रविवर्धन गणिने जिनभद्र गणिके पूर्व वाचक उमास्वात्तिका उल्लेख किया है परन्तु
१. एतेषां स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देश्यामः । २. अवसरप्राप्तं बन्धं व्याख्यास्महे ।
३. बन्ध इति वर्तते । एतच्चोपरिष्टाद्दर्शयिष्यामः । ४. देखो उनका तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृष्ठ २। ५ ये चारों
पट्टावलियाँ मुनिदर्शनविजय द्वारा सम्पादित श्री पट्टावलीसमुच्चय प्रथम भागमें मुद्रित हुई हैं।
प्रस्तावना ६९
समयकी दृष्टिसे रविवर्धन गणिने उन्हें जिनभद्रगणिके बादका ही बतलाया है, अतः उक्त सब पट्टावलियोंमें
एकमत होकर स्वीकार किये गये वास्तव कालका विचार करते हुए अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें अधिक सम्भव
यही दिखाई देता है कि ये जिनभद्र गणिके बाद ही हुए हैं।
३. एक प्रशस्ति तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें भी उपलब्ध होती है जिसमें वाचक उमास्वातिने स्वयंको
तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रका रचयिता कहा है। किन्तु इसमें समयादिका कुछ निर्देश न होनेसे यह प्रशस्ति समय
सम्बन्धी पूर्वोक्त तथ्यकी पूरक ही प्रतीत होती है।
यह तो हम अनेक प्रमाणोंके आधारसे पहले ही स्वीकार कर आये हैं कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थ-
भाष्यकी रचना की और तत्त्वार्थभाष्यमें स्वीकृत तत्त्वार्थसूत्रके पाठको संस्कारित कर अन्तिम रूप दिया, इस-
लिए इस रूपमें इन तथ्योंको स्वीकार कर लेने पर भी वाचक उमास्वाति मूल तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता नहीं ठहरते,
और हमारा ऐसा मानना अनुचित भी नहीं है क्योंकि विक्रमकी आठवीं शताब्दीके पूर्व ६वीं शताब्दीके
प्रारम्भमें या इसके कुछ काल पूर्व तत्त्वार्थसूत्र पर सर्वार्थसिद्धि टीका लिखी जा चुकी थी तथा अनेक टीका-
टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं।
यद्यपि धर्मसागर गणी, बलिसहके शिष्य स्वातिने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की, ऐसी शंका करते हैं,
किन्तु यह उनका निश्चित मत नहीं है। केवल सम्भावना मात्र है। जैसा कि उनके इन शब्दोंसे प्रकट है।
यथा—'तस्य बलिसहस्य शिष्यः स्वातिः तत्त्वार्थादयो ग्रन्थास्तु तत्कृता एव सम्भाव्यन्ते ।' अतएव इसे
विशेष महत्त्व नहीं दिया जा सकता ।
यहाँ तक हमने पाँच मतोंकी समीक्षा की। मात्र एक प्रमुख मत शेष रहता है जिस पर यहाँ तीन
दृष्टियोंसे विचार करना है—नाम, परम्परा और समय ।
नाम—यह हम प्रारम्भमें ही उद्धरणोंके साथ लिख आये हैं कि आचार्य वीरसेन और आचार्य
विद्यानन्द तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताका नाम आचार्य गृद्धपिच्छ घोषित करते हैं और ये उल्लेख अपेक्षाकृत प्राचीन
हैं। किन्तु इन उल्लेखों को छोड़कर दिगम्बर परम्परामें अन्य जितने उल्लेख मिलते हैं उनमें गृद्धपिच्छको
उपपद या दूसरा नाम मान कर नानारूपता दिखाई देती है। इनमेंसे कुछ प्रमुख उल्लेखोंका निर्देश हम 'अन्य
मत' शीर्षकके अन्तर्गत कर आये हैं। इसी तरहका एक प्रमुख मत नन्दिसंघकी पट्टावलीका है। नन्दिसंघकी
दो पट्टावलियाँ उपलब्ध होती हैं—एक संस्कृत पट्टावली और दूसरी प्राकृत पट्टावली। इनमेंसे संस्कृत पट्टा-
वलिमें आचार्य उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता कहा गया है।
यहाँ देखना यह है कि तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताके नामके विषयमें इतना मतभेद होनेका कारण क्या है और
उनका ठीक नाम क्या है ?
पहले हम श्रवणवेलगोलमें पाये जानेवाले शिलालेख १०५ और १०८ के उद्धरण उपस्थित कर आये
हैं। वे शिलालेख क्रमशः शक सं० १३२० और १३५५ के अनुमानित किये गये हैं। शक सं० १०३७ और
१०८५ के भी दो शिलालेख वहाँ उपलब्ध होते हैं जो जैन शिलालेख संग्रह भाग १ में क्रमशः ४७ और ४०
नम्बर पर दर्ज हैं। ४७ नं० के शिलालेखमें कहा गया है—
'श्री गौतम गणधरके अन्वयमें नन्दिसंघके प्रमुख आचार्य पद्मनन्दी हुए जिनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द
था। फिर उनके अन्वयमें गृद्धपिच्छ अपर नामवाले उमास्वाति आचार्य हुए । इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे और
बलाकपिच्छके शिष्य गुणनन्दि थे ।'
नं० ४० के शिलालेखमें कहा गया है कि 'गौतम गणधरके बाद पांचवें श्रुतकेवली भद्रबाहु और
उनके शिष्य चन्द्रगुप्त हुए। इसके बाद उनके अन्वयमें पद्मनन्दी हुए। इनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द था।
फिर इनके अन्वयमें गृद्धपिच्छ उमास्वाति आचार्य हुए। इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे। इस प्रकार महान्
आचार्योंकी परम्परामें क्रमशः आचार्य समन्तभद्र हुए ।'
नं० १०५ और १०८ के शिलालेखोंमें, जिनका उल्लेख हम पहले कर आये हैं, लगभग यही बात
७० सर्वार्थसिद्धि
कही गयी है। अन्तर केवल इतना ही है कि इन दोनों शिलालेखोंमें गृद्धपिच्छ उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका
रचयिता कहा गया है और शिलालेख नं० ४७ व ४० में रचयिताके रूपमें उनका उल्लेख नहीं किया है।
यहाँ पर हम सर्वप्रथम दिगम्बर परम्पराके उक्त उल्लेखोंके आधारसे, तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी
जानेवाली प्रशस्तिके आधारसे और धर्मसागरगणि कृत तपागच्छ पट्टावलीके आधारसे परम्परा दे देना
चाहते हैं। यथा—
शिलालेख ( चन्द्रगिरि ) तत्त्वार्थभाष्य प्र० तपागच्छ पट्टावली
गौतम गणधर वाचकमुख्य शिवश्री जिनभद्रगणि
| | |
भद्रबाहु ( अन्वयमें ) घोषनन्दि क्षमण विबुधप्रभ
| | |
चन्द्रगुप्त ( शिष्य ) वाचक उमास्वाति जयानन्द
| |
पद्मनन्दि ( अन्वयमें ) रविप्रभ
| |
गृद्धपिच्छ उमास्वाति ( अन्वयमें ) उमास्वाति
|
बलाकापिच्छ शिष्य
इस प्रकार ये तीन परम्पराएँ हमारे सामने हैं। इनमेंसे तपागच्छ पट्टावलिके विषयमें तो इतना ही
कहना है कि धर्मसागर गणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यकी प्रशस्तिके रहते हुए जो उन्होंने तपागच्छके आचार्योंकी
परम्पराके साथ उमास्वातिको उल्लेख किया है सो इसका कारण केवल युगप्रधान आचार्यके रूपमें उमास्वातिको
उनके वास्तव्य कालके साथ स्वीकार करनामात्र है। जिनभद्र गणिके विषयमें भी यही बात है। ये दोनों
तपागच्छ परम्पराके आचार्य नहीं हैं और न ऐसा धर्मसागर गणि ही मानते हैं। यही कारण है कि उन्होंने
तपागच्छ परम्पराका स्वतन्त्र निर्देश करते हुए बीच में इनका युगप्रधान आचार्यके रूपमें उल्लेखमात्र किया है
इसलिए इसे और इसके साथ पायी जानेवाली थोड़ेसे मतभेदको लिये हुए अन्य प्रशस्तियोंको छोड़ कर हमारे
सामने मुख्य दो परम्पराएँ रहती हैं—एक श्रमणवेलगोलमें पाये जाने वाले शिलालेखोंकी परम्परा और दूसरी
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्तिकी परम्परा।
देखनेसे विदित होता है कि इन दोनों उल्लेखोंमें दोनोंकी न केवल गुरुपरम्परा भिन्न-भिन्न है अपितु
दोनोंके उपपद या नामान्तर भी भिन्न-भिन्न हैं। श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंकी परम्परा जब कि तत्त्वार्थसूत्र-
कारको गृद्धपिच्छ उमास्वाति¹ घोषित करती है ऐसी अवस्थामें तत्त्वार्थभाष्यकी प्रशस्ति उन्हें वाचक उमास्वाति
इस नामसे सम्बोधित करती है, इसलिए इन आधारोंसे हमारा तो यही विचार दृढ़ होता है कि गृद्धपिच्छ
उमास्वातिसे वाचक उमास्वाति भिन्न आचार्य होने चाहिए।
इस प्रकार इतने विवेचनसे इन दोनों आचार्योंके अलग-अलग सिद्ध हो जानेपर यहाँ यह देखना है
कि गृद्धपिच्छ उमास्वाति इस नाममें कहाँ तक तथ्य है, क्योंकि इस नामके विषयमें हमें कई तरहके उल्लेख
१. जिनेन्द्र कल्याणाम्युदयमें अन्वयावलिके वर्णनके प्रसंगसे एक श्लोक आता है जिसमें कुन्दकुन्द आचार्य
और उमास्वाति दोनोंको वाचक कहा गया है और धवला टीकाके अन्तिम भागके देखनेसे यह भी विदित
होता है कि दिगम्बर परम्परामें भी 'वाचक' उपपद व्यवहृत होता था। किन्तु जिनेन्द्र कल्याणाम्युदयका
प्रमाण अपेक्षाकृत बहुत अर्वाचीन है और केवल इस आधारसे तत्त्वार्थभाष्यके वाचक उमास्वातिको और
श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंके गृद्धपिच्छ उमास्वातिको एक नहीं माना जा सकता। देखो पं० सुखलालजी कृत
तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावनाके परिशिष्टमें उद्धृत पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारका पत्र।
प्रस्तावना ७१
मिलते हैं। कहीं इनको केवल गृद्धपिच्छ कहा गया है और कहीं गृद्धपिच्छ उपपदयुक्त उमास्वामी या उमा-
स्वाति कहा गया है। कहीं गृद्धपिच्छको उमास्वातिक्रा दूसरा नाम बतलाया गया है तो कहीं केवल उमास्वाति
नाम आता है। यद्यपि देखनेमें ये सब नाम अलग-अलग प्रतीत होते हैं। जैसे उमास्वातिसे उमास्वामी नाम
भिन्न है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि पहले इनमेंसे कोई एक नाम रहा होगा और बादमें ‘म’ के
स्थानमें ‘त’ या ‘त’ के स्थानमें ‘म’ लिखा जानेसे ये दोनों नाम चल पड़े होंगे। इसी प्रकार उमास्वाति या
उमास्वामी नामका कहीं गृद्धपिच्छ इस अपर नामके साथ उल्लेख मिलनेसे और कहीं इनमेंसे किसी एकका
उल्लेख मिलनेसे इस सम्बन्धमें भी यह कहा जा सकता है कि इस तरह पूरे या अधूरे नामके लिखनेकी
भी परम्परा रही है और हो सकता है कि उसी परम्पराके अनुसार विविध प्रकारसे इन नामोंका उल्लेख
किया जाने लगा होगा।
यहाँ हम इन तर्कोंकी सत्यता स्वीकार करते हैं। फिर भी देखना यह है कि एक आचार्य नन्दिसंघ
तथा कुन्दकुन्दकी परम्परामें हुए और दूसरे अन्य परम्परामें हुए और इनके समयमें काफी अन्तर है फिर भी
दोनोंका एक ही शास्त्रकी रचनासे सम्बन्ध और एक ही नाम यह स्थिति उत्पन्न हुई कैसे ? यह कहना तो
बनता नहीं कि श्वेताम्बर परम्परामें हुए वाचक उमास्वाति इस नामको देखकर गृद्धपिच्छने अपना उमास्वाति
यह नाम भी रखा होगा, क्योंकि पट्टावलियों व दूसरे प्रमाणोंको देखनेसे विदित होता है कि गृद्धपिच्छ आचार्य
कुन्दकुन्दके बाद हुए हैं। जब कि वाचक उमास्वात्तिका अस्तित्वकाल इसके बहुत बाद आता है। साथ ही
यह कहना भी नहीं बनता है कि गृद्धपिच्छ उमास्वाति इस नामको देखकर वाचक उमास्वातिने अपना
‘उमास्वाति’ यह नाम रखा होगा, क्योंकि तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें जो प्रशस्ति उपलब्ध होती है उसमें वाचक
उमास्वात्तिका ‘उमास्वाति’ नाम क्यों रखा गया इसका कारण दिया है। उसमें बतलाया गया है कि इनके
पिताका नाम १ ‘स्वाति’ था और सिद्धसेन गणिने इस प्रशस्तिकी व्याख्या करते हुए यह भी लिखा है कि इनकी
माताका नाम ‘उमा’ था २। इसलिए इनका उमास्वाति यह नाम पड़ा है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि
यह प्रशस्ति बाद में गढ़ी गयी होगी, क्योंकि तत्त्वार्थभाष्यके टीकाकार सिद्धसेन गणिने इसका उल्लेख ही
नहीं किया व्याख्यान भी किया है और ऐसा करके उन्होंने उसे तत्त्वार्थभाष्यका अंग प्रसिद्ध किया है। इस
विषयमें हम पं० सुखलालजीके इस मतसे सहमत हैं कि यह स्वयं तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिकी
ही कृति है। ३
प्रसंगसे यहाँ पर हम एक बात यह कह देना चाहते हैं कि अधिकतर विद्वान् जहाँ किसी प्रशस्ति,
पट्टावली या शिलालेख आदिसे अपना मत नहीं मिलता वहाँ उसे सर्वथा अप्रामाणिक या जाली घोषित करते
हैं। किन्तु उनकी यह प्रवृत्ति विचारपूर्ण नहीं कही जा सकती। कारण कि प्राचीन कालमें इतिहासके
संकलनके साधन प्रायः सीमित थे। अधिकतर इतिहासके संकलन करनेवालोंका कथकोंके ऊपर अवलम्बित
रहना पड़ता था और जिसे प्रामाणिक आधारोंसे जो ज्ञात होता था वह उसका अंकन करता था। इसलिए
यह तो सम्भव है कि किसी शिलालेख आदिमें कोई नाम, समय या घटना सही रूपमें निबद्ध हो गयी हो और
किसी शिलालेख आदिमें वह कुछ भ्रष्टरूपमें निबद्ध हुई हो। पर साम्प्रदायिक अभिनिवेशवश किये गये
उल्लेखोंको छोड़कर निबद्ध करनेवालेका उद्देश्य जानबूझ कर उसे भ्रष्टरूपसे निबद्ध करनेका नहीं रहता था
इतना सुनिश्चित है। प्रसिद्ध धवला टीकाके रचयिता आचार्य वीरसेनने इस सम्बन्धमें एक बहुत अच्छी
विचारसरणि उपस्थित की है। उन्हें भगवान् महावीरकी आयु ७२ वर्ष की थी एक यह मत प्राप्त हुआ और
भगवान् महावीरकी आयु ७१ वर्ष ३ माह २५ दिनकी थी एक यह मत प्राप्त हुआ, इसलिए उनके सामने
प्रश्न था कि इनमेंसे किसे प्रमाण माना जाय ? इसी प्रश्नके उत्तरस्वरूप वे जो कुछ लिखते हैं वह न केवल
हृदयग्राही है अपितु अनुकरणीय भी है। वे कहते हैं कि ‘इन दोनोंमेंसे कौन ठीक है और कौन ठीक नहीं
१. ‘कौभीषणिना स्वातितनयेन—’। २. वात्सीसुतेनेति गोत्रेण नाम्ना उमेति मातुराख्यानम् । ३. देखो पं० सुख-
लालजीकी तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृ० ४ ।
७२ सर्वार्थसिद्धि
है इस विषयमें एलाचार्यका शिष्य मैं वीरसेन अपना मुख नहीं खोलता, क्योंकि इन दोनोंमेंसे किसी एकको
मानने पर कोई बाधा नहीं उत्पन्न होती । किन्तु इन दोनोंमेंसे कोई एक मत ठीक होना चाहिए सो प्राप्त कर
उसका कथन करना चाहिए १ ।'
वे यहाँ यह तो कहते हैं कि उचित आधारोंपर जो ठीक प्रतीत हो उसे प्रमुखता दी जाय पर एकको
सर्वथा जाली और दूसरेको सर्वथा सत्य घोषित करनेका प्रयत्न करना ठीक नहीं है ।
इस प्रासंगिक कथनसे स्पष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रके विषयमें दिगम्बर परम्परामें जो शिलालेख व उद्धरण
आदि मिलते हैं वे भी साधार हैं और श्वेताम्बर परम्परामें जो उल्लेख मिलते हैं वे भी साधार हैं । इसलिए
किसी एकको प्रामाणिक और अन्यको अप्रामाणिक घोषित करना हमारा कार्य नहीं है किन्तु अन्य प्रमाणोंके
प्रकाशमें उनकी स्थिति स्पष्ट करना इतना ही हमारा कार्य है । और इस कार्यका निर्वाह करते हुए प्रस्तावना
में विविध स्थलों पर व्यक्त किये गये तथ्योंके आधारसे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि श्वेताम्बर परम्परामें
तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रके रचयिताका नाम तो वाचक उमास्वाति ही है किन्तु जिन्होंने प्रारम्भमें तत्त्वार्थसूत्रकी
रचना की और जो आचार्य कुन्दकुन्दकी परम्परामें हुए हैं उनका नाम गृद्धपिच्छ उमास्वाति, गृद्धपिच्छ उमा-
स्वामी, उमास्वाति या उमास्वामी यह कुछ भी न होकर मात्र गृद्धपिच्छाचार्य होना चाहिए ।
तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता गृद्धपिच्छ आचार्य हैं इस तथ्यको व्यक्त करनेवाले उल्लेख ९वीं शताब्दीके
हैं । तथा लगभग इसी कालमें श्वेताम्बर परम्परामें भी यह मान्यता प्रचलित हुई जान पड़ती है जैसा कि
सिद्धसेन गणिके शंकास्पद कुछ उल्लेखोंसें प्रतीत होता है, कि तत्त्वार्थभाष्यके रचयिता वाचक उमास्वाति ही
तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता हैं । अतः मालूम पड़ता है कि इन दोनों मान्यताओंने मिलकर एक नयी मान्यताको
जन्म दिया और उत्तरकालमें गृद्धपिच्छ और उमास्वाति ये स्वतन्त्र दो आचार्योंके दो नाम मिलकर एक नाम
बने और आगे चलकर गृद्धपिच्छ उमास्वाति इस नामसे तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताका उल्लेख किया जाने लगा ।
हमें श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंमें या अन्यत्र जो एक आचार्यके लिए इन नामोंका या गृद्धपिच्छको उपपद
मानकर उमास्वाति नामका व्यवहार होता हुआ दिखाई देता है उसका कारण यही है ।
तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताका नाम गृद्धपिच्छ आचार्य होना चाहिए और वाचक उमास्वाति इनसे भिन्न
हैं इस मतको संक्षेपमें इन तथ्यों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है—
१. तत्त्वार्थसूत्रकी रचनाके साथ आचार्य गृद्धपिच्छका नाम जुड़ना अकारण नहीं हो सकता ।
२. आचार्य वीरसेन और विद्यानन्दने तत्त्वार्थसूत्रके रचयिताका नाम गृद्धपिच्छाचार्य ही व्यक्त किया
है और ये उल्लेख अन्य प्रमाणोंसे प्राचीन हैं ।
३. श्वेताम्बर परम्परामें तत्त्वार्थभाष्यके रचयिता जो आचार्य हुए हैं उनका नाम वाचक उमास्वाति
है, गृद्धपिच्छ उमास्वाति नहीं । अतः गृद्धपिच्छ उमास्वाति यह नाम गृद्धपिच्छ और उमास्वाति इन दोनों
नामोंके मेलसे बना है ऐसा प्रतीत होता है ।
४. गृद्धपिच्छाचार्य कुन्दकुन्द आचार्यके अन्वयमें हुए हैं और वाचक उमास्वातिकी परम्परा दूसरी है,
इसलिए ये स्वतन्त्र दो आचार्य होने चाहिए, एक नहीं ।
५. गृद्धपिच्छाचार्य और वाचक उमास्वाति इन दोनोंके वास्तव कालमें भी बड़ा अन्तर है, इसलिए
भी ये एक नहीं हो सकते ।
परम्परा—तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता किस परम्पराके थे इस विषयमें नामविषयक उक्त निर्णयके आधारसे
ही बहुत कुछ विवाद समाप्त हो जाता है, क्योंकि जिन तथ्योंके प्रकाशमें उनका आचार्य गृद्धपिच्छ यह नाम
निश्चित होता है उन्हींके आधारसे वे एक मात्र दिगम्बर परम्पराके सिद्ध होते हैं । आचार्य कुन्दकुन्दके वे
साक्षात् शिष्य हों या न भी हों पर वे हुए हैं उन्हींकी वंशपरम्परामें यह बात पूर्वमें दी गयी वंशपरम्परा और
अन्य प्रमाणोंसे सिद्ध है । आचार्य कुन्दकुन्दके पञ्चास्तिकायमें यह गाथा आती है—
१. जयधवला पुस्तक १ पृ० ८१ ।
प्रस्तावना ७३
“दव्वं सल्लक्खणियं उत्पादव्वयध्रुवत्तसंजुत्तं ।
गुण पज्जयासयं वा जं तं मण्णंति सव्वण्हू ॥”
अब इस गाथाके प्रकाशमें तत्त्वार्थसूत्रके इन सूत्रोंको देखिए—
सद् द्रव्यलक्षणम् ॥५, २९॥ उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥५, ३०॥ गुणपर्ययवद् द्रव्यम् ॥५, ३८॥
इसके सिवाय तत्त्वार्थसूत्रमें और भी बहुतसे ऐसे वचन हैं जिनका आचार्य कुन्दकुन्दके वचनोंके साथ
शाब्दिक और वस्तुगत साम्य दिखाई देता है । तथा तत्त्वार्थसूत्रमें 'नान्य'¹ जैसे शब्दोंका व्यवहार हुआ है ।
इससे उसके कर्ता दिगम्बर परम्परा के हैं यही सिद्ध होता हैं।
समय—नामके समान आचार्य गृद्धपिच्छके समयका प्रश्न भी बहुत अधिक विचारणीय है । साधारणतः
जिन उल्लेखोंका इनके समयपर सीधा प्रकाश पड़ता है ऐसे दो उल्लेख हमारे सामने हैं । प्रथम नन्दिसंघकी
पट्टावलीका उल्लेख और दूसरा विद्वज्जनबोधकमें उद्धृत इनके समयकी सूचना देनेवाला उल्लेख ।
१. नन्दिसंघकी पट्टावली विक्रमके राज्याभिषेकसे प्रारम्भ होती है और यह इंडियन एंटीक्वेरीके
आधारसे जैनसिद्धान्तभास्कर किरण ४, पृ० ७८. में जिस रूपमें उद्धृत हुई है उसका प्रारम्भिक अंश इस
प्रकार है—
‘१ भद्रबाहु द्वितीय (४) २ गुप्तिगुप्त (२६) ३ माघनन्दि (३६) ४ जिनचन्द (४०) ५ कुन्दकुन्दाचार्य
(४९) ६ उमास्वामी (१०१) ७ लोहाचार्य (१४२) ८ यशःकीर्ति (१५३) ९ यशोनन्दी (२११) १० देव-
नन्दी (२५८) ११ जयनन्दी (३०८) १२ गुणनन्दी (३५८) १३ वज्रनन्दी (३६४) १४ कुमारनन्दी (३८६)
१५ लोकचन्द (४२७) १६ प्रभाचन्द्र (४५३) १७ नेमिचन्द्र (४७८) १८ भानुनन्दी (४८७) १९ सिंहनन्दी
(५०८) २० श्री वसुनन्दी (५२५) २१ वीरनन्दी (५३१) २२ रत्ननन्दी (५६१) २३ माणिक्यनन्दी (५८५)
२४ मेघचन्द्र (६०१) २५ शान्तीकीर्ति (६२७) २६ मेरुकीर्ति (६४२) ।’
गुप्तिगुप्त यह अर्हद्बलिका दूसरा नाम है। इन्होंने अन्य संघोंके साथ जिस नन्दिसंघकी स्थापना की
थीं उसके पहले पट्टधर आचार्य माघनन्दि थे । इस हिसाबसे उमास्वामी (गृद्धपिच्छ) नन्दिसंघके पट्टपर
बैठनेवाले चौथे आचार्य ठहरते हैं। यद्यपि पट्टावलीमें ये क्रमांक ६ पर सूचित किये गये हैं पर भद्रबाहु द्वितीय
और अर्हद्बलिको छोड़कर ही नन्दिसंघके आचार्योंकी गणना करनी चाहिए । इसलिए यहाँ हमने उमास्वामी
(गृद्धपिच्छ) का क्रमांक ४ सूचित किया है इस पट्टावलिके अनुसार ये वीर नि० सं० ५७१ में हुए थे ।
२. विद्वज्जनबोधकमें यह श्लोक उद्धृत मिलता है—
“वर्षसप्तशते चैव सप्तत्या च विस्मृतौ ।
उमास्वामिसुनिर्जातः कुन्दकुन्दस्तथैव च ॥”
इसका भाव है कि वीर नि० सं० ७७० में उमास्वामी मुनि हुए तथा उसी समय कुन्दकुन्द आचार्य हुए ।
अब हम अन्य प्रमाणोंको देखें—
१. इन्द्रनन्दिके श्रुतावतारमें पहले ६८३ वर्षकी श्रुतधर आचार्योंकी परम्परा दी है । और इसके बाद
अंगपूर्वके एकदेशधारी विनयधर, श्रीदत्त और अर्हद्दत्तका नामोल्लेख कर नन्दिसंघ आदि संघोंकी स्थापना
करनेवाले अर्हद्बलिका नाम आता है । और इसके बाद माघनन्दि, धरसेन, पुष्पदन्त और भूतबलिका उल्लेख
करनेके बाद आचार्य परम्परामें कुन्दकुन्दका नाम आता है। यह तो निश्चित है कि आचार्य गृद्धपिच्छ आचार्य
कुन्दकुन्दके बाद हुए हैं। इसलिए यदि इस हिसाबसे विचार किया जाय और श्रुतधर आचार्योंके ६८३ वर्षमें
१. देखो तत्त्वार्थसूत्र, अ० ९, सू० ९ । २. पाण्डवपुराणके कर्ता शुभचन्द्रने अपनी परम्परा दी है ।
उसमें भी १० आचार्यों तक यही क्रम स्वीकार किया गया है। और आगे भी एकाध नामको छोड़कर
आचार्योके नामोंमें समानता देखी जाती है । वे अपनेको नन्दिसंघका ही घोषित करते हैं। देखो जैनसिद्धान्त
भास्कर, भाग १, किरण ४, पृष्ठ ५१ ।
१०
आगेके आचार्योंका लगभग १०० वर्ष मान कर जोड़ा जाय तो वीर नि० सं० से ७८३ वर्षके आसपास
आचार्य गृद्धपिच्छ हुए यह कहा जा सकता है ।
२. श्रमणवेलगोलके शिलालेख नं० १०५ में भी¹ श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका निर्देश कर और
उसके बाद कुम्भ, विनीत, हलधर वसुदेव, अचल, मेरुधीर, सर्वज्ञ, सर्वगुप्त, महिधर, धनपाल, महावीर और
वीर इन नामोंका उल्लेख कर कुन्दकुन्द और तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छ उमास्वातिक नाम आता है। किन्तु
इसमें एक तो श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका काल निर्देश नहीं किया है। दूसरे श्रुतधर व दूसरे आचार्योंके
क्रमिक नामनिर्देशका भी ख्याल नहीं रखा है। अतः इस आधारसे आचार्य गृद्धपिच्छके समयके सम्बन्धमें कुछ
भी अनुमान नहीं किया जा सकता ।
३. श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका निर्देश धवला,² आदिपुराण, ³ नन्दिसंघकी प्राकृत पट्टावली⁴ और
त्रिलोकप्रज्ञप्ति⁵ आदिमें भी किया है। किन्तु वे ६८३ वर्षकी परम्पराका निर्देश करने तक ही सीमित हैं।
अतः इनके आधारसे किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है। इन आधारोंके बल पर यह भी तो नहीं कहा
जा सकता कि आचार्य गृद्धपिच्छके समयके सम्बन्धमें इन आचार्योंका क्या अभिमत है ? और हम इस सम्बन्धमें
इनके अभिमतको जाने बिना केवल इन्द्रनन्दि श्रुतावतारके आधारसे श्रुतधारियोंकी ६८३ वर्षकी परम्पराके
बाद आचार्य गृद्धपिच्छकी अवस्थितिको इन आचार्योंके मतसे माननेके लिए प्रस्तुत नहीं हैं ।
इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचनसे हमारे सामने मुख्य तीन मत आते हैं जिनसे हमें आचार्य गृद्धपिच्छके
समयकी सूचना मिलती है। प्रथम नन्दिसंघकी पट्टावलिके अनुसार उनका समय विक्रम (५७१-४७०)
१०१ ठहरता है। दूसरे विद्वज्जनबोधकमें उद्धृत श्लोकके अनुसार वह विक्रम (७७०-४७०) ३००
ठहरता है और तीसरे इन्द्रनन्दिके श्रुतावतारके अनुसार वह वि० सं० (७८३-४७०) ३१३ अनुमानित
किया जा सकता है ।
श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंमें आचार्य गृद्धपिच्छके शिष्यका नाम आचार्य वलाकपिच्छ⁶ आता है और
नन्दिसंघकी पट्टावलीमें बलाकपिच्छके स्थानमें लोहाचार्यका नाम आता है । किन्तु इसका तो यह समाधान हो
सकता है कि पट्टावलीमें उन आचार्योंके नामोंका उल्लेख है जो उनके बाद पट्ट पर आसीन हुए और शिला-
लेखोंमें इसका विचार न कर उनका नामोल्लेख किया है जो उनके प्रमुख शिष्य थे । और इस आधारसे यहाँ
तककी पट्टावलीको ठीक भी मान लिया जाय तब भी इनके समयके सम्बन्धमें पट्टावलीके कालका दूसरे
उल्लेखोंमें निर्दिष्ट कालके साथ जो इतना अन्तर दिखाई देता है उसका हल कैसे किया जाय यह विचारणीय
विषय हो जाता है ।
यहाँ हम अन्य पौर्वात्य व पाश्चात्त्य विद्वानोंके मतोंका विशेष ऊहापोह नहीं करेंगे, क्योंकि उन विद्वानों
ने अधिकतर तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इनको एककर्तृक मान कर अपने-अपने मतका निर्देश किया है।
किन्तु सुविचारित मतके रूपमें डॉ० ए० एन० उपाध्येके मतको अवश्य ही उपस्थित करना चाहेंगे। यद्यपि
ऊहापोहके बाद उन्होंने अपना यह मत आचार्य कुन्दकुन्दके समयके सम्बन्धमें निर्दिष्ट किया है किन्तु नन्दिसंघ-
पट्टावली व दूसरे प्रमाणोंके अनुसार आचार्य गृद्धपिच्छ आचार्य कुन्दकुन्दके शिष्य होनेके कारण उससे इनके
समयके ऊपर भी सर्वांगीण प्रकाश पड़ता है। वे सब मन्तव्यों और विद्वानोंके मतोंका ऊहापोह करनेके बाद
जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं वह यह है—
'इतनी लम्बी चर्चा करनेके बाद हम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि परम्पराके अनुसार इनका (आचार्य
कुन्दकुन्दका) अवस्थिति काल ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दीके मध्यसे लेकर ईसवी प्रथम शताब्दीके मध्यके भीतर
१. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित जैन शिलालेखसंग्रह भाग १, पृ० १९५ आदि । २. देखो धवला
पु० ९, पृ० १३० । ३. देखो आदिपुराण, पर्व २, श्लो० १३७ से । ४. देखो जैन सिद्धान्तभास्कर किरण ४,
पृ० ७१ । ५. देखो त्रिलोकप्रज्ञप्ति महाधिकार ४ गाथा १४९०,१४९१ । ६. देखो मा० ग्र० मा० से प्रकाशित
जैन शिलालेख संग्रह भाग १, शिलालेख नं० ४०,४२ और ५० आदि ।
प्रस्तावना ७५
आता है। षट्खण्डागम ईसवी द्वितीय शताब्दीके मध्यकालके पूर्व लिखा जा चुका था, इसलिए इस दृष्टिसे
उनका अवस्थिति काल ईसवी द्वितीय शताब्दीके मध्यके आसपास आता है। मर्कराके ताम्रपत्रके अनुसार
आचार्य कुन्दकुन्दकी अन्तिम सीमा ईसवी तृतीय शताब्दीके मध्यके पूर्व मानी जा सकती है। इसके साथ ही
साथ वे शायद शिवस्कन्द राजाके समकालीन तथा कुरलके लेखक थे। इससे यह प्रतीत होता है कि आचार्य
कुन्दकुन्द ऊपर बतलायी गयी प्रथम दो शताब्दियोंमें थे। मैं इन सबका विचारकर इस तथ्यपर पहुँचा हूँ कि
कुन्दकुन्द ईसवी प्रथम शताब्दीमें हुए हैं।¹
यह तथ्य है जो आचार्य कुन्दकुन्दके समयके सम्बन्धमें डॉ० ए० एन० उपाध्येने सूचित किया है।
नन्दिसंघकी पट्टावलीमें उल्लिखित समयको सीमा लगभग यही है, इसलिए इन सब आधारोंको ध्यानमें
रखकर यह कहा जा सकता है कि आचार्य गृद्धपिच्छका समय ईसवी प्रथम शताब्दीमें हुए आचार्य कुन्दकुन्दके
बाद होना चाहिए, क्योंकि पट्टावलियों व दूसरे शिलालेखोंमें आचार्य कुन्दकुन्दके बाद ही इनका नाम आता है
और सम्भव है इन दोनोंके मध्य गुरु-शिष्यका सम्बन्ध रहा है। नन्दिसंघकी पट्टावलिके अनुसार ये आचार्य
कुन्दकुन्दके उत्तराधिकारी हैं यह तो स्पष्ट ही है।
५. तत्त्वार्थसूत्रके निर्माणका हेतु—लोकमें यह कथा प्रसिद्ध है कि 'किसी एक भव्यने मोक्षमार्गोपयोगी
शास्त्रके निर्माणका विचार कर तदनुसार 'दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' सूत्र रचकर दीवाल पर लिख
दिया। इसके बाद रोजगारके निमित्त उसके बाहर चले जाने पर चर्याके निमित्त गृद्धपिच्छ आचार्य वहां आये
और उन्होंने दीवाल पर लिखे हुए सूत्रको अधूरा देखकर उसके प्रारम्भमें 'सम्यक्' पद जोड़ दिया। जब
वह भव्य बाहरसे लौटा और उसने सूत्रके प्रारम्भमें 'सम्यक्' पद जुड़ा हुआ देखा तो वह आश्चर्य करने
लगा। उसने घरके सदस्योंसे इसका कारण पूछा और ठीक कारण जानकर वह खोजता हुआ गृद्धपिच्छ
आचार्यके पास पहुँचा और उन पर अपने अभिप्रायको व्यक्त कर उनसे शास्त्रके रचनेकी प्रार्थना करने लगा।
तदनुसार आचार्य महाराजने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की।²
यहाँ देखना यह है कि यह कथा लोकमें प्रचलित कैसे हुई ? क्या इसकी प्रामाणिकताका कोई
विश्वस्त आधार है या यह कोरा भावुकतासे प्रेरित श्रद्धालुओंका उच्छवासमात्र है ? आगे इसी तथ्यका सांगो-
पांग विचार किया जाता है—
१. श्रुतसागर सूरिने तत्त्वार्थवृत्तिके प्रारम्भमें लिखा है कि किसी समय आचार्य उमास्वामी
(गृद्धपिच्छ) आश्रममें बैठे हुए थे। उस समय द्वैयाक नामक भव्यने वहाँ आकर उनसे प्रश्न किया—भगवन् !
आत्माके लिए हितकारी क्या है ? भव्यके ऐसा प्रश्न करनेपर आचार्यवर्यने मंगलपूर्वक उत्तर दिया—मोक्ष ।
यह सुनकर द्वैयाकने पुनः पूछा—उसका स्वरूप क्या है और उसकी प्राप्तिका उपाय क्या है ? उत्तरस्वरूप
आचार्यवर्यने मोक्षका स्वरूप बतला कर कहा कि यद्यपि मोक्षका स्वरूप इस प्रकार है तथापि प्रवादिजन इसे
अन्यथा प्रकारसे मानते हैं। इतना ही नहीं किन्तु इसके मार्गके विषयमें भी वे विवाद करते हैं। कोई चारित्र-
शून्य ज्ञानको मोक्षमार्ग मानते हैं, कोई श्रद्धानमात्रको मोक्षमार्ग मानते हैं और कोई ज्ञाननिरपेक्ष चारित्रको
मोक्षमार्ग मानते हैं। किन्तु जिस प्रकार औषधिके केवल ज्ञान, दर्शन या प्रयोगसे रोगकी निवृत्ति नहीं हो
सकती उसी प्रकार केवल दर्शन, केवल ज्ञान या केवल चारित्रसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती । भव्यने पूछा
तो फिर किस प्रकार उसकी प्राप्ति होती है ? इसीके उत्तरस्वरूप आचार्यवर्यने 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि
मोक्षमार्गः' यह सूत्र रचा है और परिणामस्वरूप तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है।
२ सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकमें भी यही उत्थानिका दी है। श्रुतसागर सूरिने यह उत्थानिका
सर्वार्थसिद्धिसे ही ली है। अन्तर केवल इतना है कि जिस भव्यने जाकर आचार्य गृद्धपिच्छसे प्रश्न किया है
१. प्रवचनसारकी प्रस्तावना पृ० २२ के आधारसे । २. इस कथाका आधार १३ शताब्दीमें हुए बालचन्द्र
मुनि रचित तत्त्वार्थसूत्रकी कन्नड़ी टीका ज्ञात होती है। इसमें श्रावकका नाम सिद्धय्य दिया है। देखो पं०
कैलाशचन्द्रजीके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृ० १६ ।
७६ सर्वार्थसिद्धि
उसे सर्वार्थसिद्धिमं 'कश्चिद् भव्यः' कहा गया है और श्रुतसागर सूरि उसके नामका उल्लेख करते हैं । कह
नहीं सकते उन्होंने उस भव्यका यह नाम किन स्रोतोंसे प्राप्त किया ।
तत्त्वार्थसूत्रकी इन प्रसिद्ध टीकाओंके उल्लेखोंसे लोककथाके इस भागका तो समर्थन होता है कि
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना किसी भव्यके निमित्तसे हुई । किन्तु यह ज्ञात नहीं होता कि पहले उस भव्यने 'दर्शन-
ज्ञानचारित्राणि' सूत्र रचा और बादमें उसमें सुधारकर भव्यकी प्रार्थना पर सूत्रकारने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना
की । इसलिए इन उल्लेखोंसे कथाके सर्वांशका समर्थन न होने पर भी किसी अंशतक वह साधार है यह
माननेमें कोई आपत्ति नहीं दिखाई देती ।
४. आचार्य पूज्यपाद
१. महत्ता- भारतीय परम्परामें जो लब्धप्रतिष्ठ तत्त्वद्रष्टा शास्त्रकार हुए हैं उनमें आचार्य पूज्यपाद
का नाम प्रमुखरूपसे लिया जाता है । इन्हें प्रतिभा और विद्वत्ता दोनोंका समान रूपसे वरदान प्राप्त था ।
जैन परम्परामें आचार्य समन्तभद्र और सन्मतिके कर्ता आचार्य सिद्धसेनके बाद साहित्यिक जगत्में यदि किसी
को उच्चस्थान पर बिठलाया जा सकता है तो वे आचार्य पूज्यपाद ही हो सकते हैं । इन्होंने अपने पीछे जो
साहित्य छोड़ा है उसका प्रभाव दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंमें समानरूपसे दिखाई देता है ।
यही कारण है कि उत्तरकालवर्ती प्रायः अधिकतर साहित्यकारों व इतिहास मर्मज्ञोंने इनकी महत्ता, विद्वत्ता
और बहुज्ञता स्वीकार करते हुए इनके चरणोंमें श्रद्धाके सुमन अर्पित किये हैं । आदिपुराणके कर्ता आचार्य
जिनसेन इन्हें कवियोंमें तीर्थंकर मानते हुए इनकी स्तुति में कहते हैं—
कवीनां तीर्थकृद्देवः किंतशं तत्र वर्ण्यते ।
विदुषां वाङ्मलध्वंसि तीर्थं यस्य वचोमयम् ॥१, ५२॥
जो कवियोंमें तीर्थंकरके समान थे और जिनका वचनरूपी तीर्थ विद्वानोंके वचनमलको धोनेवाला है
उन देव अर्थात् देवनन्दि आचार्यकी स्तुति करनेमें भला कौन समर्थ है ।
यह तो हम आगे चलकर बतलानेवाले हैं कि जिस प्रकार इन्होंने अपनी अनुपम कृतियों द्वारा मोक्ष-
मार्गका प्रकाश किया है उसी प्रकार इन्होंने शब्दशास्त्र पर भी विश्वको अपनी रचनाएँ भेंट की हैं । कहा तो
यहाँ तक जाता है कि शरीरशास्त्र जैसे लोकोपयोगी विषयको भी इन्होंने अपनी प्रतिभाका विषय बनाया था ।
तभी तो ज्ञानार्णवके कर्ता आचार्य शुभचन्द्र इनके उक्त गुणोंका ख्यापन करते हुए कहते हैं—
अपाकुर्वन्ति यद्वाचः कायवाक्चित्तसम्भवम् ।
कलङ्कमङ्गिनां सोऽयं देवनन्दी नमस्यते ॥१, १५॥
जिनकी शास्त्रपद्धति प्राणियोंके शरीर, वचन और चित्तके सभी प्रकारके मलको दूर करनेमें समर्थ है
उन देवनन्दी आचार्यको मैं प्रणाम करता हूँ ।
आचार्य गुणनन्दिने इनके व्याकरण सूत्रोंका आश्रय लेकर जैनेन्द्र प्रक्रियाकी रचना की है । वे इसका
मंगलाचरण करते हुए कहते हैं—
नमः श्रीपूज्यपादाय लक्षणं यदुपक्रमम् ।
यदेवात्र तदन्यत्र यन्नात्रास्ति न तत्क्वचित् ॥
जिन्होंने लक्षणशास्त्रकी रचना की, मैं उन आचार्य पूज्यपादको प्रणाम करता हूँ । उनके इस
लक्षणशास्त्रकी महत्ता इसीसे स्पष्ट है कि जो इसमें है वही अन्यत्र है और जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र
भी नहीं है ।
उनकी और उनके साहित्यकी यह स्तुति परम्परा यहीं समाप्त नहीं होती । धनंजय, वादिराज,
भट्टारक शुभचन्द्र और पद्मप्रभ आदि अनेक ऐसे आचार्य हुए हैं जो इस गुणगाथाकी परम्पराको जीवित
रखनेके लिए अपने पूर्ववर्ती आचार्योंके पदचिह्नों पर चले हैं । अभिप्राय यह है कि आचार्य पूज्यपाद
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प्रस्तावना ७७
साहित्य-जगत्में कभी न अस्त होनेवाले वे प्रकाशमान सूर्य थे जिसके आलोकसे दशों दिशाएँ सदा आलोकित
होती रहेंगी ।
ये हैं वे तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तुत वृत्ति सर्वार्थसिद्धिके रचयिता आचार्य पूज्यपाद जिनका सर्वांग परिचय
हमें यहाँ प्राप्त करना है। उसमें भी उनका पूरा नाम क्या है, वे किस संघके अधिपति थे। उनका जीवन
परिचय क्या है, उनकी रचनाएँ कौन-कौन हैं और उनका वास्तव काल व गुरु-शिष्य परम्परा क्या है
आदि विषय विचारणीय हैं जिनका यहाँ हम क्रमशः परिचय प्राप्त करनेका उपक्रम करेंगे। सर्वप्रथम
नामको ही लीजिए—
२. नाम—शिलालेखों तथा दूसरे प्रमाणोंसे विदित होता है कि इनका गुरुके द्वारा दिया हुआ
दीक्षानाम देवनन्दि था, बुद्धिकी प्रखरताके कारण इन्हें जिनेन्द्रबुद्धि कहते थे और देवोंके द्वारा इनके
चरण युगल पूजे गये थे इसलिए वे पूज्यपाद इस नामसे भी लोकमें प्रख्यात थे। इस अर्थको व्यक्त करनेवाले
उद्धरण ये हैं—
प्रागभ्यधायि गुरुणा किल देवनन्दी बुद्ध्या पुनर्विपुलया स जिनेन्द्रबुद्धिः ।
श्रीपूज्यपाद इति चैष बुधैः प्रचख्ये सत्पूजितः पदयुगे वनदेवताभिः ॥
श्रवणवेलगोला शि० नं० १०५, वि० सं० १३२०।
इनके पूज्यपाद और जिनेन्द्रबुद्धि इन नामोंकी सार्थकताको व्यक्त करनेवाले वहीं के नं० १०८ के एक
दूसरे शिलालेखको देखिए—
श्रीपूज्यपादोद्भूतधर्मराज्यस्ततः सुराधीशवरपूज्यपादः ।
यदीयवैदुष्यगुणान्निदानीं वदन्ति शास्त्राणि तदुद्भूतानि ॥
धृतविश्वबुद्धिरशमत्र योगिभिः कृतकृत्यमावमनुविभ्रदुच्चकैः ।
जिनवद् बभूव यदनङ्गचापहृत्स जिनेन्द्रबुद्धिरिति साधुवर्णितः ॥
ये दोनों श्लोक वि० सं० १३५५ के शिलालेखके हैं। इनमें कहा गया है कि आचार्य पूज्यपादने धर्म-
राज्यका उद्धार किया था, इससे आपके चरण इन्द्रों द्वारा पूजे गये थे। इनके पूज्यपाद इस नामसे सम्बोधित
किये जानेका यही कारण है। इनमें वैदुष्य आदि अनेक गुण थे जिनका स्थापन आज भी उनके द्वारा रचे गये
शास्त्र कर रहे हैं। ये जिन देवके समान विश्वबुद्धिके धारक थे, कृतकृत्य थे और कामदेवको जीतनेवाले थे,
इसलिए योगी जन इन्हें जिनेन्द्रबुद्धि इस नामसे सम्बोधित करते थे ।
इन शिलालेखों व अन्यत्र२ और भी ऐसे अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं जिनसे इनके इन तीन नामोंकी
सार्थकता सिद्ध होती है ।
आदिपुराणका एक उद्धरण हम पहले दे आये हैं। उसके तथा वादिराज सूरिके एक उल्लेखसे ३ विदित
होता है कि इनका एक नाम 'देव' भी था। मालूम पड़ता है कि इनका दीक्षानाम 'देवनन्दि' होनेसे उसके
संक्षिप्त रूप 'देव' इस पद द्वारा उक्त आचार्यों ने इनका नामोल्लेख किया है। अतएव यह कोई स्वतन्त्र नाम
न होकर 'देवनन्दि' इस नामका ही संक्षिप्त रूप प्रतीत होता है।
३. संघ—संघोंकी उत्पत्तिका इतिहास इन्द्रनन्दिने अपने श्रुतावतारमें दिया है। वे लिखते हैं कि जब
सौ योजनके मुनि मिलकर अष्टांगनिमित्तज्ञ और धारण-प्रसारण आदि विशुद्ध क्रियाके पालनेवाले आचार्य
अर्हद्बलि की देखरेखमें युगप्रतिक्रमण कर रहे थे उस समय युगके अन्तिम दिन युगप्रतिक्रमण करते हुए
आचार्य अर्हद्बलिने आये हुए मुनिसमाजसे पूछा कि क्या सभी यतिजन आ गये हैं ? इसपर यतिजनोंने उत्तर
१ श्रवणवेल्गोलके शक सं० १०८५ के शिलालेख ( जो इससे पूर्ववर्ती है ) से भी इस तथ्यका समर्थन
होता है। २. देखो श्रमणवेलगोलाका शिलालेख नं० ५० और नन्दिसंघ की पट्टावली । ३. पार्श्वनाथ चरित
सर्ग १, श्लोक १८ ।
७८ सर्वार्थसिद्धि
दिया कि अपने-अपने सकल संघके साथ हम आ गये हैं। तब यतिजनोंके इस उत्तरको सुनकर उन्होंने जान
लिया कि यह कलिकाल है। इसमें आगे यतिजन गणपक्षपातके भेदसे रहेंगे, उदास भावसे नहीं रहेंगे और
ऐसा विचार कर उन्होंने जो गुफासे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'नन्दि' संज्ञा दी और किन्हीं को 'वीर' संज्ञा
दी। जो अशोकवाटिकासे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'अपराजित' संज्ञा दी और किन्हीं को 'देव' संज्ञा दी।
जो पंचस्तूपके निवासी वहाँ आये थे उनमेंसे किन्हीं को 'सेन' संज्ञा दी और किन्हीं को 'भद्र' संज्ञा दी। जो
शाल्मली महाद्रुमसे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'गुणधर' संज्ञा दी और किन्हीं को 'गुप्त' संज्ञा दी और जो
खण्डकेसर द्रुमके मूलसे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'सिंह' संज्ञा दी और किन्हींको 'चन्द्र' संज्ञा दी।
इससे विदित होता है कि जो मूलसंघ पहले संघभेद व गण-गच्छके भेदसे रहित होकर एक रूपमें
चला आ रहा था वह यहाँ आकर अनेक भागोंमें विभक्त हो गया। यह तो नाना संघोंकी उत्पत्तिकी कथा
है। अब जिसे यहाँ पर नन्दिसंघ कहा गया है उसकी परम्पराको देखिए—
शुभचन्द्राचार्य अपने पाण्डवपुराणमें अपनी गुर्वावलीका १ उल्लेख करते हुए लिखते हैं—
श्रीमूसंघेऽजनि नन्दिसंघस्तस्मिन् बलात्कारगणोऽतिरम्यः ।
तत्राभवत्पूर्वपदांशवेदी श्रीमाघनन्दी नरदेववन्द्यः ॥ २ ॥
इसमें कहा गया है कि नन्दिसंघ बलात्कार गण मूलसंघके अन्तर्गत है। उसमें पूर्वोके एकदेश ज्ञाता
और मनुष्यों व देवोंसे पूजनीय माघनन्दी आचार्य हुए।
इतना कहनेके बाद इस गुर्वावलीमें माघनन्दीके बाद ४ जिनचन्द्र, ५ पद्मनन्दी (इनके मतसे
पद्मनन्दीके चार अन्य नाम थे—कुन्दकुन्द, वक्रग्रीव, एलाचार्य और गृद्धपिच्छ) ६ तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता उमा-
स्वाति, ७ लोहाचार्य, ८ यशःकीर्ति, ९ यशोनन्दी और १० देवनन्दीके नाम दिये हैं। ये सब नाम इसी क्रमसे
नन्दिसंघकी पट्टावलीमें भी मिलते हैं। आगे इस गुर्वावलीमें ११ गुणनन्दीके बाद १२ वज्रनन्दीका नाम
आता है। जब कि नन्दिसंघकी पट्टावलीमें ११ जयनन्दी और १२ गुणनन्दी इन दो नामोंके बाद १३ वज्र-
नन्दीका नाम आता है।
यद्यपि इससे आगेकी दोनोंकी आचार्य परम्परा करीब-करीब मिलती हुई है। परन्तु विशेष प्रयोजन
न होनेसे उसे हम यहाँ नहीं दे रहे हैं। प्रकृतमें इन आधारोंसे हमें इतना ही सूचित करना है कि आचार्य
पूज्यपाद मूलसंघके अन्तर्गत नन्दिसंघ बलात्कार गणके पट्टाधीश थे। तथा अन्य प्रमाणोंसे २ यह भी विदित
होता है कि इनका गच्छ 'सरस्वती' इस नामसे प्रख्यात था। हमारे प्रसिद्ध आचार्य कुन्दकुन्द और गृद्धपिच्छ
(उमास्वाति) इसी परम्पराके पूर्ववर्ती आचार्य थे यह भी इससे विदित होता है।
४. जीवन-परिचय—आचार्य पूज्यपाद कौन थे, उनके माता-पिताका नाम क्या था, वे किस कुलमें
जन्मे थे इन सब बातोंका परिचय श्रीमान् पं० नाथूरामजी प्रेमीने 'देवनन्दि और उनका जैनेन्द्र व्याकरण'
लेखमें दिया है ३ । उन्होंने यह परिचय कनडी भाषामें लिखे गये 'पूज्यपादचरिते' के आधारसे लिखा है।
इसके लेखक 'चन्द्रय्य' कवि थे। श्रीमान् पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारके लेखसे यह भी ४ विदित होता है कि
उनका यह जीवनचरित 'राजावलिकथे' में भी दिया हुआ है। किन्तु इन दोनोंमें कहाँ तक साम्य और वैषम्य
है यह इससे विदित नहीं होता। प्रेमीजीके शब्दोंमें कथा संक्षेपमें इस प्रकार है—
'कर्नाटक देशके 'कोले' नामक ग्रामके माधवभट्ट नामक ब्राह्मण और श्रीदेवी ब्राह्मणीसे पूज्यपादका
जन्म हुआ। ज्योतिषियोंने बालकको त्रिलोकपूज्य बतलाया। इस कारण उसका नाम पूज्यपाद रखा गया।
माधवभट्टने अपनी स्त्रीके कहनेसे जैनधर्म स्वीकार कर लिया। भट्टनीके सालेका नाम 'पाणिनि' था। उसे भी
उन्होंने जैन बननेको कहा। परन्तु प्रतिष्ठाके ख्यालसे वह जैन न होकर मुडीकुंड ग्राममें वैष्णव संन्यासी हो
१. देखो जैनसिद्धान्तभास्कर भाग १, किरण ४, पृ० ५१ । २. देखो जैनसिद्धान्त भास्कर, भाग १, किरण
४, पृ० ४३ में उद्धृत शुभचन्द्राचार्यकी पट्टावली। ३. देखो जैन साहित्य और इतिहास, पृ० १२३। ४. देखो
रत्नकरण्डककी भूमिका ।
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प्रस्तावना ७९.
गया । पूज्यपादकी कमलिनी नामक छोटी बहन हुई, वह गुणभट्टको ब्याही गयी और गुणभट्टको उससे नागार्जुन
नामक पुत्र हुआ ।
पूज्यपादने एक बगीचेमें एक सांपके मुंहमें फँसे हुए मेढकको देखा । इससे उन्हें वैराग्य हो गया और
वे जैन साधु बन गये ।
पाणिनि अपना व्याकरण रच रहे थे । वह पूरा न हो पाया था कि उन्होंने अपना मरणकाल निकट
आया जानकर पूज्यपादसे कहा कि इसे तुम पूरा कर दो । उन्होंने पूरा करना स्वीकार कर लिया ।
पाणिनि दुर्ध्यानवश मरकर सर्प हुए । एक बार उसने पूज्यपादको देखकर फूत्कार किया । इस पर
पूज्यपादने कहा, विश्वास रखो, मैं तुम्हारे व्याकरणको पूरा कर दूँगा । इसके बाद उन्होंने पाणिनि व्याकरण-
को पूरा कर दिया ।
इसके पहले वे जैनेन्द्र व्याकरण, अर्हत्प्रतिष्ठालक्षण और वैद्यक ज्योतिषके कई ग्रन्थ रच चुके थे ।
गुणभट्टके मर जानेसे नागार्जुन अतिशय दरिद्री हो गया । पूज्यपादने उसे पद्मावतीका एक मन्त्र दिया
और सिद्ध करनेकी विधि भी बतला दी । उसके प्रभावसे पद्मावतीने नागार्जुनके निकट प्रकट होकर उसे
सिद्धरसकी वनस्पति दी ।
इस सिद्धरससे नागार्जुन सोना बनाने लगा । उसके गर्वका परिहार करनेके लिए पूज्यपादने एक
मामूली वनस्पतिसे कई घड़े सिद्धरस बना दिया । नागार्जुन जब पर्वतोंको सुवर्णमय बनाने लगा तब धरणेन्द्र
पद्मावतीने उसे रोका और जिनालय बनानेको कहा । तदनुसार उसने एक जिनालय बनवाया और पार्श्वनाथ-
की प्रतिमा स्थापित की ।
पूज्यपाद पैरोंमें गगनगामी लेप लगाकर विदेहक्षेत्रको जाया करते थे । उस समय उनके शिष्य
वज्रनन्दीने अपने साथियोंसे झगड़ा करके द्रविड़ संघकी स्थापना की ।
नागार्जुन अनेक मन्त्र-तन्त्र तथा रसादि सिद्ध करके बहुत ही प्रसिद्ध हो गया । एक बार दो सुन्दरी
स्त्रियां आयीं जो गाने-नाचनेमें कुशल थीं । नागार्जुन उन पर मोहित हो गया । वे वहीं रहने लगीं और कुछ
समय बाद ही उसकी रसगुटिका लेकर चलती बनीं ।
पूज्यपाद मुनि बहुत समय तक योगाभ्यास करते रहे । फिर एक देवविमानमें बैठकर उन्होंने अनेक
तीर्थों की यात्रा की । मार्गमें एक जगह उनकी दृष्टि नष्ट हो गयी थी, सो उन्होंने एक शान्त्यष्टक बनाकर ज्यों
की त्यों कर ली । इसके बाद उन्होंने अपने ग्राममें आकर समाधिपूर्वक मरण किया ।'
श्री मोतीचन्द्र गौतमचन्द्र कोठारी फलटनवालोंने सर्वार्थसिद्धिके एक अन्यतम संस्करणका सम्पादन
किया है जो सोलापुरसे प्रकाशित हुई है । उसमें उन्होंने कुछ युक्तियां देकर इस कथाके व्याकरण सम्बन्धी
अंशको यथावत् सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है । किन्तु जैसा कि अन्य तथ्योंसे सिद्ध है कि पाणिनि व्याकरणके
कर्ता पाणिनि ऋषि पूज्यपादसे बहुत पहले हो गये हैं । इतना ही नहीं पाणिनि व्याकरण पर जो कात्यायनका
वातिक और पतंजलिका महाभाष्य प्रसिद्ध है वह भी पूज्यपादके कई शताब्दियों पहले लिखा जा चुका था ।
अतएव केवल इस कथाके आधार पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि आचार्य पूज्यपाद पाणिनिके समयमें
हुए हैं और उन्होंने उनके अधूरे व्याकरणको पूरा किया था। कथा में और भी ऐसी अनेक घटनाओं का
उल्लेख है जिन्हें अतिशयोक्तिपूर्ण कहा जा सकता है । किन्तु एक बात स्पष्ट है कि आचार्य पूज्यपाद पाणिनि
व्याकरण, उसके वार्तिक और महाभाष्यके मर्मज्ञ थे । इससे ऐसा मालूम पड़ता है कि ये ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न
हुए होंगे और अपने जीवनकालके प्रारम्भमें वे अन्य धर्मके माननेवाले रहे होंगे । अतः इस कथामें जो उनके
पिता, माता व कुल आदिका परिचय दिया है वह कदाचित् ठीक भी हो । जो कुछ भी हो, तत्काल इस
कथाके आधारसे हम इतना कह सकते हैं कि पूज्यपाद ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुए थे । उनके पिताका नाम
माधवभट्ट और माताका नाम श्रीदेवी था । वे 'कोले' नामक ग्रामके रहनेवाले थे और उनका जन्म नाम .
पूज्यपाद था । उन्होंने विवाह न कर बचपनमें ही जैनधर्म स्वीकार कर लिया था और आगे चलकर उन्होंने
सांपके मुंहमें मेंढक तड़पता हुआ देख मुनिदीक्षा ले ली थी । उन्होंने अपने जीवन कालमें गगनगामी लेपके
८७. सर्वार्थसिद्धि
प्रभावसे कई बार विदेहक्षेत्रकी यात्रा की थी। श्रवणवेलगोलके एक शिलालेखके आधारसे यह भी कहा जा
सकता है कि जिस जलसे उनके चरण धोये जाते थे उसके स्पर्शसे लोहा भी सोना बन जाता था¹। उनके
चरणस्पर्शसे पवित्र हुई धूलिमें पत्थरको सोना बनानेकी क्षमता थी इस बातका उल्लेख तो कथा लेखकने भी
किया है। एक बार तीर्थयात्रा करते समय उनकी दृष्टि तिमिराच्छन्नहो गयी थी । जिसे उन्होंने शान्त्यष्टकका
निर्माण कर दूर किया था। किन्तु इस घटनाका उनके ऊपर ऐसा प्रभाव पड़ा जिससे उन्होंने तीर्थयात्रासे
लौटकर समाधि ले ली थी।
स्वरचित साहित्य—आचार्य पूज्यपादने अपने जीवन कालमें सर्वार्थसिद्धि सहित जिस साहित्यका
निर्माण किया था उसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—
१. सर्वार्थसिद्धि—इसका विस्तृत परिचय हम पहले दे आये हैं।²
२. समाधितन्त्र—इसमें कुल मिलाकर १०५ श्लोक हैं। विषय अध्यात्म है। ग्रन्थका नाम समाधितन्त्र
है। इसकी सूचना स्वयं आचार्य पूज्यपादने इसके अन्तिम श्लोकमें दी है। एक तो श्रवणवेलगोलके शक सं०
१०८५ के शिलालेख ४० में इसका नाम समाधिशतक दिया है। दूसरे बनारससे मुद्रित होनेवाले प्रथम गुच्छक-
में भी टिप्पण सहित यह छपा है और उसके अन्तमें एक प्रशस्ति श्लोक उद्धृत है जिसमें श्लेषरूपसे इसका नाम
समाधिशतक सूचित किया गया है। मालूम पड़ता है कि इन्हीं कारणोंसे इसका दूसरा नाम समाधिशतक
प्रसिद्ध हुआ है।
यद्यपि यह ग्रन्थ आचार्य पूज्यपादकी स्वतन्त्र कृति है पर अन्तःपरीक्षणसे विदित होता है कि आचार्य
कुन्दकुन्द द्वारा निर्मित आगमको आत्मसात् कर उन्होंने इसकी रचना की है। उदाहरणस्वरूप नियमसारमें
यह गाथा आती है—
णियभावं ण वि मुंचह परभावं णेव गिण्हए केहं ।
जाणदि पस्सदि सव्वं सोहं इदि चिंतए णाणो ॥९७॥
अब इसकी तुलना समाधितन्त्रके इस श्लोकसे कीजिए—
यद्ग्राह्यं न गृह्णाति गृहीतं नापि मुञ्चति ।
जानाति सर्वथा सर्वं तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ॥३०॥
यदि सूक्ष्मतासे अवलोकन कर देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि प्रारम्भ ही इसका मोक्षप्राभृतको
सामने रख कर हुआ है और लगभग मोक्षप्राभृतके समग्र विषयको स्वीकार कर इसकी रचना की गयी है।
मोक्षप्राभृतकी प्रथम गाथा यह है—
णाणमयं अप्पाणं उवलद्ध जेण झडियकम्मेण ।
चेडूऊण य परदव्वं णमो णमो तस्स देवस्स ॥ १ ॥
अब इसके प्रकाशमें समाधितन्त्रका प्रथम मंगलश्लोक देखिए—
येनात्माऽबुध्यतात्मैव परत्वेनैव चापरम् ।
अक्षयानन्तबोधाय तस्मै सिद्धात्मने नमः ॥ १ ॥
अब मोक्षप्राभृतकी एक दूसरी गाथा लीजिए—
जं मया दिस्सदे रूपं तं ण जाणदि सव्वहा ।
जाणगो दिस्सदे ण तं तम्हा जंपेमि केण हुं ॥
इसी विषयको समाधितन्त्र में ठीक इन्हीं शब्दोंमें व्यक्त किया गया है—
यन्मया दृश्यते रूपं तन्न जानाति सर्वथा ।
जानन्न दृश्यते रूपं ततः केन ब्रवीम्यहम् ॥ १८ ॥
१. 'श्रीपूज्यपादमुनिरप्रतिमौषधर्द्धीद्धीयाद्विदेहजिनदर्शनपूतगात्रः । यत्पादधौतजलसंस्पर्शप्रभावान्कालायसं किल
तदा कनकीचकार ॥' शिलालेख १०८ ( शक सं० १३५५ ) । २. देखो प्रस्तावना पृ० २३ आदि ।
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प्रस्तावना ८१
इतना ही नहीं समाधितन्त्र लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने आचार्य कुन्दकुन्दका समयप्राभृत
व अन्य श्रुत भी उपस्थित था यह इसके अवलोकनसे स्पष्टतः विदित होता है। आचार्य कुन्दकुन्दने अभ्यन्तर
परिणामोंके बिना केवल बाह्यलिंग मोक्षमार्गमें उपयोगी नहीं है यह बतलाते हुए समयप्राभृतमें कहा है—
पासंडीलिंगाणि व गिहिलिंगाणि व बहुप्पयाराणि ।
घित्तुं वदंति मूढा लिंगमिणं मोक्खमग्गो त्ति ॥ ४०८ ॥
ण उ होदि मोक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा ।
लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि सेवंति ॥ ४०९ ॥
इसी तथ्यको आचार्य पूज्यपादने समाधितन्त्रमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
लिङ्गं देहाश्रितं दृष्टं देह एव आत्मनो भवः ।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये लिङ्गकृताग्रहाः ॥
जातिर्देहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भवः ।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः ॥
इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि जो साधक अपने आत्मकार्यमें उद्यत होना चाहते हैं उनके लिए यह
मोक्षमार्गके अनुसन्धानमें प्रदोपस्तम्भके समान है। इसमें आत्माके बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा ये
तीन भेद करके किस प्रकार यह जीव बहिरात्मपदके त्याग द्वारा अन्तरात्मा बनकर परमात्मपदको प्राप्त
करता है इसका सरल और हृदयग्राही कवितामें विवेचन किया गया है।
३. इष्टोपदेश—इसमें कुल मिलाकर ५१ श्लोक हैं । विषय स्वरूपसम्बोधन है। ग्रन्थका नाम इष्टो-
पदेश है यह स्वयं आचार्य पूज्यपादने इसके अन्तिम श्लोकमें व्यक्त किया है।
इसका निर्माण करते हुए आचार्य पूज्यपादके सामने एकमात्र यही दृष्टि रही है कि किसी प्रकार यह
संसारी आत्मा अपने स्वरूपको पहचाने और देह, इन्द्रिय तथा उनके कार्योंको अपना कार्य न मानकर आत्म-
कार्यमें सावधान होनेका प्रयत्न करे। समयप्राभृतका स्वाध्याय करते समय हमें इस भावके पद-पद पर दर्शन
होते हैं और इसलिए हम कह सकते हैं कि समयप्राभृत आदिके विषयको आत्मसात् करके ही इसका निर्माण
किया गया है। तुलनाके लिए देखिए—
एगो मे सासदो आदा णाणदंसणलक्खणो ।
सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ॥ समयप्राभृत
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।
बाह्याः संयोजगाः भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥ २७ ॥ इष्टोपदेश
रत्तो बंधति कम्मं मुंचदि कम्मं विरागसंपत्तो ।
एसो जिणोवएसो तम्हा कम्मेसु मा रज्ज ॥ समयप्राभृत
बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ॥ २६ ॥ इष्टोपदेश
रत्नकरण्डकमें एक श्लोक आता है जिसमें कहा गया है कि धर्मके प्रभावसे कूकर भी देव हो जाता
है और अधर्मके प्रभावसे देवको भी कूकर होते देर नहीं लगती । यथा—
श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्बिषात् ।
कापि नाम भवेद्दन्या संपद् धर्माच्छरीरिणाम् ॥ १, २९ ॥
इष्टोपदेशमें यही शब्द तो नहीं हैं पर इनका अनुसरण करते हुए आचार्यवर्य कहते हैं—
वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वतं नारकम् ।
छायापतस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥ ३ ॥
साधकके लिए आत्मसाधनामें इससे बड़ी सहायता मिलती है ।
११
८२
सर्वार्थसिद्धि
४. दशभक्ति—भक्तियाँ दशसे अधिक हैं। फिर भी वे मुख्यरूपसे दस मानी जाती हैं। श्रीमान् पं०
पन्नालालजी सोनीने सम्पादित कर 'क्रियाकलाप' नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया है। यह संग्रह ग्रन्थ है। इसके
प्रथम अध्यायके कुछ प्रकरणोंका संग्रह स्वयं पण्डितजीने किया है।¹ शेष संग्रह मालूम होता है प्राचीन है।
सम्भव है इसके संग्रहकार पण्डित प्रभाचन्द्र हों। इन्होंने ही इसके अनेक उपयोगी विषयों पर टीका लिखी
है। ये पण्डित थे और इनका नाम प्रभाचन्द्र था। इसकी सूचना नन्दीश्वर भक्तिके अन्तमें प्रकरण समाप्तिकी
पुष्पिका लिखते समय स्वयं इन्होंने दी है।² इसमें सब भक्तियों व दूसरे प्रकरणोंका संग्रह स्वयं इनका किया
हुआ है या क्रियाकलापको जो वर्तमान स्वरूप मिला है वह बादका काम है यह हम निश्चयपूर्वक नहीं कह
सकते³, क्योंकि एक तो न स्वयं सोनीजीने इसकी व्यवस्थित सूचना दी। सोनीजी यदि इसकी प्रस्तावनामें
यह बतलानेकी कृपा करते कि उन्होंने जितनी प्रतियोंके आधारसे इसका सम्पादन किया है, वे कहाँकी हैं
और उनका लेखन काल क्या है तो इस बातके निर्णय करनेमें बड़ी सहायता मिलती कि यह संग्रह कितना
पुराना है। दूसरे इसमें ऐसे कई उपयोगी विषयोंका संग्रह है किन्तु उन पर पण्डित प्रभाचन्द्रकी टीका न
होनेसे वे उनके सामने थे इस बातको स्वीकार करनेमें संकोच होता है। उदाहरणार्थ प्राकृतनिर्वाणभक्ति जो
लोकमें निर्वाणकाण्डके नामसे प्रसिद्ध है, इसमें संगृहीत है पर इस पर उनकी टीका नहीं है। जब कि वह
दूसरी भक्तियोंके मध्यमें स्थित है। सोनीजीने मुद्रित क्रियाकलापके सम्बन्धमें अपनी भूमिकामें स्थिति स्पष्ट तो
की है पर उससे पूरा प्रकाश नहीं पड़ता।
इसमें जितनी भक्तियां संगृहीत हैं उनमेंसे प्रथम परिच्छेदमें सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति,
योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात भक्तियाँ संगृहीत हैं। इनमेंसे नन्दीश्वर-
भक्ति केवल संस्कृतमें है, शेष सब भक्तियाँ संस्कृत और प्राकृत दोनोंमें हैं। मात्र प्राकृत निर्वाणभक्तिकी
संस्कृत टीका नहीं है। इसके आगे दूसरे प्रकरणमें और भी अनेक भक्तियां संगृहीत हैं और इन पर भी
पण्डित प्रभाचन्द्रकी संस्कृत टीका है। इतना अवश्य है कि उनमें जो लघु भक्तियां हैं उनपर टीका नहीं है।
इन भक्तियोंके सम्बन्धमें पण्डित प्रभाचन्द्र प्राकृत सिद्धिभक्तिके अन्तमें सूचना करते हैं कि सब संस्कृत
भक्तियां पूज्यपाद स्वामीकी बनायी हुई हैं और प्राकृत भक्तियां आचार्य कुन्दकुन्दकी बनायी हुई हैं। यथा—
'संस्कृताः सर्वा भक्तयः पादपूज्यस्वामिकृताः प्राकृतास्तु कुन्दकुन्दाचार्यकृताः ।' क्रियाकलाप
पृष्ठ १६७ ।
ये सब भक्तियां एक आचार्यकी कृति हैं या अनेककी यह तो निश्चयपूर्वक कहना कठिन है। जिन
पण्डित प्रभाचन्द्रने इनकी टीका लिखी है वे सम्भवतः पण्डितप्रवर आशाधरके बाद⁴ और वि० सं० १७२४ के
पहले⁵ कभी हुए हैं, अतएव इस आधारसे इतना ही कहा जा सकता है कि ये वि० सं० १४वीं शताब्दीके
पूर्व कभी लिखी गयी हैं। किन्तु इस कथनसे यह निश्चय नहीं होता कि पण्डित प्रभाचन्द्र इनमेंसे किन संस्कृत
और प्राकृत भक्तियोंको क्रमसे पादपूज्य स्वामी और कुन्दकुन्द आचार्यकी मानते रहे। उनके मतसे ये पादपूज्य
स्वामी कौन थे यह भी ज्ञात नहीं होता।
पं० पन्नालालजी सोनीने क्रियाकलापकी प्रस्तावनामें लिखा है कि 'सिद्धभक्ति, श्रुतिभक्ति, चारित्र-
भक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात संस्कृत भक्तियां पादपूज्य स्वामी
कृत हैं और प्राकृत सिद्धभक्ति, प्राकृत श्रुतभक्ति, प्राकृत चारित्रभक्ति, प्राकृत योगिभक्ति और प्राकृत आचार्य-
भक्ति ये पाँच भक्तियां कुन्दकुन्दाचार्य प्रणीत हैं।' किन्तु उन्होंने ऐसा माननेका जो कारण उपस्थित किया है
१. देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पृ० २। २. 'इति पण्डितप्रभाचन्द्रविरचितायां क्रियाकलापटीकायां भक्तिविव-
रणः प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः ।' ३. इतना अवश्य है कि इसके 'दैवसिकरात्रिकप्रतिक्रमण' नामक प्रकरणके
अन्तमें एक लेख उपलब्ध होता है जिसमें १७२४ सं० अंकित है। अतएव इससे पूर्वका यह संग्रह है यह कहा
जा सकता है। देखो क्रियाकलाप पृ० ६९। ४. पण्डित प्रभाचन्द्रने अनगारधर्मामृतके दो श्लोक अपनी
टीकामें उद्धृत किये हैं। देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पृ० १० । ५. देखो टिप्पणी ३ पृ० ८८ ।
प्रस्तावना ८३
वह समुचित नहीं कहा जा सकता। पण्डित प्रभाचन्द्रने तो केवल इतना ही कहा है कि सब संस्कृत भक्तियाँ
पादपूज्य स्वामी कृत हैं और सब प्राकृत भक्तियाँ कुन्दकुन्द आचार्य कृत हैं और यह भी उन्होंने प्राकृत सिद्ध-
भक्तिकी व्याख्या करते हुए उसके अन्तमें कहा है। परन्तु क्रियाकलापमें जिस क्रमसे इन भक्तियोंका संग्रह है
उसे देखते हुए प्राकृत सिद्धभक्तिका क्रमांक दूसरा है। सम्भव है कि सोनीजीने नन्दीश्वरभक्ति पर परिच्छेद-
की समाप्ति देखकर यह अनुमान किया हो। जो कुछ भी हो, पण्डित प्रभाचन्द्रके कालमें ये भक्तियां पादपूज्य
स्वामीकृत और कुन्दकुन्दाचार्यकृत मानी जाती थीं इतना स्पष्ट है। विद्वानोंका अनुमान है कि ये पादपूज्य
स्वामी आचार्य पूज्यपाद ही होने चाहिए, क्योंकि एक तो इस नामके अन्य कोई आचार्य नहीं हुए हैं। दूसरे
इन भक्तियोंका अप्रतिहत प्रवाह और गम्भीर शैली इस बातको सूचित करती है।१
इन सब भक्तियोंमें उनके नामानुसार विषयका विवेचन किया गया है। मुनिजन तथा व्रती गृहस्थ
दैवसिक आदि प्रतिक्रमणके समय निश्चित क्रमसे इनका प्रयोग करते आ रहे हैं जो आंशिकरूपसे वर्तमान
कालमें भी चालू है।
५. जैनेन्द्र व्याकरण—आचार्य पूज्यपादकी अन्यतम मौलिक कृति उनका जैनेन्द्र व्याकरण है। इसका
जैनेन्द्र यह नाम क्यों पड़ा ? क्या स्वयं आचार्य पूज्यपादको यह नाम इष्ट था इसका निर्णय करना तो कठिन
है। परन्तु प्राचीन कालसे यह इसी नामसे सम्बोधित होता आ रहा है यह मुग्धबोधके कर्ता पं० बोपदेवके
इस उल्लेखसे स्पष्ट है—
'इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशलीशाकटायनाः ।
पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टौ च शाब्दिकाः ॥' धातुपाठ
यह पांच अध्यायोंमें विभक्त है और सूत्र संख्या लगभग ३००० है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता संज्ञा-
लाघव है। पाणिनीय व्याकरणमें जिन संज्ञाओंके लिए कई अक्षरोंके संकेत कल्पित किये गये हैं उनके लिए
इसमें लाघवसे काम लिया गया है। तुलनाके लिए देखिए—
पाणिनीय व्याकरण जैनेन्द्र व्याकरण
ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत प्र, दी, प
सवर्ण स्व
अनुनासिक ङ
गुण एप्
वृद्धि ऐप्
निष्ठा त
प्रातिपदिक मृतृ
लोप ख
संज्ञालाघव और रचना विशेषके कारण इसमें सूत्रलाघवके भी दर्शन पद-पद पर होते हैं। यथा—
पाणिनीय व्याकरण जैनेन्द्र व्याकरण
झरो झरि सवर्णे झरो झरि स्वे
हलो यमां यमि लोपः हलो यमां यमि खम्
तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् सस्थानक्रियं स्वम्
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः आकालोऽच् प्रदीपः
इसका प्रथम सूत्र है 'सिद्धिरनेकान्तात ।' इसकी व्याख्या करते हुए सोमदेवसूरिने शब्दार्णवचन्द्रिकामें
जो कुछ कहा है उसका भाव यह है—'शब्दोंकी सिद्धि और ज्ञप्ति अनेकान्तका आश्रय लेनेसे होती है, क्योंकि
शब्द अस्तित्व-नास्तित्व, नित्यत्व-अनित्यत्व और विशेषण-विशेष्यधर्मको लिये हुए होते हैं। इस सूत्रका अधि-
१. देखो जैन साहित्य और इतिहास पृ० १२१ ।