सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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सर्वार्थसिद्धि
४. दशभक्ति—भक्तियाँ दशसे अधिक हैं। फिर भी वे मुख्यरूपसे दस मानी जाती हैं। श्रीमान् पं०
पन्नालालजी सोनीने सम्पादित कर 'क्रियाकलाप' नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया है। यह संग्रह ग्रन्थ है। इसके
प्रथम अध्यायके कुछ प्रकरणोंका संग्रह स्वयं पण्डितजीने किया है।¹ शेष संग्रह मालूम होता है प्राचीन है।
सम्भव है इसके संग्रहकार पण्डित प्रभाचन्द्र हों। इन्होंने ही इसके अनेक उपयोगी विषयों पर टीका लिखी
है। ये पण्डित थे और इनका नाम प्रभाचन्द्र था। इसकी सूचना नन्दीश्वर भक्तिके अन्तमें प्रकरण समाप्तिकी
पुष्पिका लिखते समय स्वयं इन्होंने दी है।² इसमें सब भक्तियों व दूसरे प्रकरणोंका संग्रह स्वयं इनका किया
हुआ है या क्रियाकलापको जो वर्तमान स्वरूप मिला है वह बादका काम है यह हम निश्चयपूर्वक नहीं कह
सकते³, क्योंकि एक तो न स्वयं सोनीजीने इसकी व्यवस्थित सूचना दी। सोनीजी यदि इसकी प्रस्तावनामें
यह बतलानेकी कृपा करते कि उन्होंने जितनी प्रतियोंके आधारसे इसका सम्पादन किया है, वे कहाँकी हैं
और उनका लेखन काल क्या है तो इस बातके निर्णय करनेमें बड़ी सहायता मिलती कि यह संग्रह कितना
पुराना है। दूसरे इसमें ऐसे कई उपयोगी विषयोंका संग्रह है किन्तु उन पर पण्डित प्रभाचन्द्रकी टीका न
होनेसे वे उनके सामने थे इस बातको स्वीकार करनेमें संकोच होता है। उदाहरणार्थ प्राकृतनिर्वाणभक्ति जो
लोकमें निर्वाणकाण्डके नामसे प्रसिद्ध है, इसमें संगृहीत है पर इस पर उनकी टीका नहीं है। जब कि वह
दूसरी भक्तियोंके मध्यमें स्थित है। सोनीजीने मुद्रित क्रियाकलापके सम्बन्धमें अपनी भूमिकामें स्थिति स्पष्ट तो
की है पर उससे पूरा प्रकाश नहीं पड़ता।
इसमें जितनी भक्तियां संगृहीत हैं उनमेंसे प्रथम परिच्छेदमें सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति,
योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात भक्तियाँ संगृहीत हैं। इनमेंसे नन्दीश्वर-
भक्ति केवल संस्कृतमें है, शेष सब भक्तियाँ संस्कृत और प्राकृत दोनोंमें हैं। मात्र प्राकृत निर्वाणभक्तिकी
संस्कृत टीका नहीं है। इसके आगे दूसरे प्रकरणमें और भी अनेक भक्तियां संगृहीत हैं और इन पर भी
पण्डित प्रभाचन्द्रकी संस्कृत टीका है। इतना अवश्य है कि उनमें जो लघु भक्तियां हैं उनपर टीका नहीं है।
इन भक्तियोंके सम्बन्धमें पण्डित प्रभाचन्द्र प्राकृत सिद्धिभक्तिके अन्तमें सूचना करते हैं कि सब संस्कृत
भक्तियां पूज्यपाद स्वामीकी बनायी हुई हैं और प्राकृत भक्तियां आचार्य कुन्दकुन्दकी बनायी हुई हैं। यथा—
'संस्कृताः सर्वा भक्तयः पादपूज्यस्वामिकृताः प्राकृतास्तु कुन्दकुन्दाचार्यकृताः ।' क्रियाकलाप
पृष्ठ १६७ ।
ये सब भक्तियां एक आचार्यकी कृति हैं या अनेककी यह तो निश्चयपूर्वक कहना कठिन है। जिन
पण्डित प्रभाचन्द्रने इनकी टीका लिखी है वे सम्भवतः पण्डितप्रवर आशाधरके बाद⁴ और वि० सं० १७२४ के
पहले⁵ कभी हुए हैं, अतएव इस आधारसे इतना ही कहा जा सकता है कि ये वि० सं० १४वीं शताब्दीके
पूर्व कभी लिखी गयी हैं। किन्तु इस कथनसे यह निश्चय नहीं होता कि पण्डित प्रभाचन्द्र इनमेंसे किन संस्कृत
और प्राकृत भक्तियोंको क्रमसे पादपूज्य स्वामी और कुन्दकुन्द आचार्यकी मानते रहे। उनके मतसे ये पादपूज्य
स्वामी कौन थे यह भी ज्ञात नहीं होता।
पं० पन्नालालजी सोनीने क्रियाकलापकी प्रस्तावनामें लिखा है कि 'सिद्धभक्ति, श्रुतिभक्ति, चारित्र-
भक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात संस्कृत भक्तियां पादपूज्य स्वामी
कृत हैं और प्राकृत सिद्धभक्ति, प्राकृत श्रुतभक्ति, प्राकृत चारित्रभक्ति, प्राकृत योगिभक्ति और प्राकृत आचार्य-
भक्ति ये पाँच भक्तियां कुन्दकुन्दाचार्य प्रणीत हैं।' किन्तु उन्होंने ऐसा माननेका जो कारण उपस्थित किया है
१. देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पृ० २। २. 'इति पण्डितप्रभाचन्द्रविरचितायां क्रियाकलापटीकायां भक्तिविव-
रणः प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः ।' ३. इतना अवश्य है कि इसके 'दैवसिकरात्रिकप्रतिक्रमण' नामक प्रकरणके
अन्तमें एक लेख उपलब्ध होता है जिसमें १७२४ सं० अंकित है। अतएव इससे पूर्वका यह संग्रह है यह कहा
जा सकता है। देखो क्रियाकलाप पृ० ६९। ४. पण्डित प्रभाचन्द्रने अनगारधर्मामृतके दो श्लोक अपनी
टीकामें उद्धृत किये हैं। देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पृ० १० । ५. देखो टिप्पणी ३ पृ० ८८ ।