सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ सर्वार्थसिद्धि
दिया कि अपने-अपने सकल संघके साथ हम आ गये हैं। तब यतिजनोंके इस उत्तरको सुनकर उन्होंने जान
लिया कि यह कलिकाल है। इसमें आगे यतिजन गणपक्षपातके भेदसे रहेंगे, उदास भावसे नहीं रहेंगे और
ऐसा विचार कर उन्होंने जो गुफासे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'नन्दि' संज्ञा दी और किन्हीं को 'वीर' संज्ञा
दी। जो अशोकवाटिकासे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'अपराजित' संज्ञा दी और किन्हीं को 'देव' संज्ञा दी।
जो पंचस्तूपके निवासी वहाँ आये थे उनमेंसे किन्हीं को 'सेन' संज्ञा दी और किन्हीं को 'भद्र' संज्ञा दी। जो
शाल्मली महाद्रुमसे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'गुणधर' संज्ञा दी और किन्हीं को 'गुप्त' संज्ञा दी और जो
खण्डकेसर द्रुमके मूलसे आये थे उनमेंसे किन्हींको 'सिंह' संज्ञा दी और किन्हींको 'चन्द्र' संज्ञा दी।
इससे विदित होता है कि जो मूलसंघ पहले संघभेद व गण-गच्छके भेदसे रहित होकर एक रूपमें
चला आ रहा था वह यहाँ आकर अनेक भागोंमें विभक्त हो गया। यह तो नाना संघोंकी उत्पत्तिकी कथा
है। अब जिसे यहाँ पर नन्दिसंघ कहा गया है उसकी परम्पराको देखिए—
शुभचन्द्राचार्य अपने पाण्डवपुराणमें अपनी गुर्वावलीका १ उल्लेख करते हुए लिखते हैं—
श्रीमूसंघेऽजनि नन्दिसंघस्तस्मिन् बलात्कारगणोऽतिरम्यः ।
तत्राभवत्पूर्वपदांशवेदी श्रीमाघनन्दी नरदेववन्द्यः ॥ २ ॥
इसमें कहा गया है कि नन्दिसंघ बलात्कार गण मूलसंघके अन्तर्गत है। उसमें पूर्वोके एकदेश ज्ञाता
और मनुष्यों व देवोंसे पूजनीय माघनन्दी आचार्य हुए।
इतना कहनेके बाद इस गुर्वावलीमें माघनन्दीके बाद ४ जिनचन्द्र, ५ पद्मनन्दी (इनके मतसे
पद्मनन्दीके चार अन्य नाम थे—कुन्दकुन्द, वक्रग्रीव, एलाचार्य और गृद्धपिच्छ) ६ तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता उमा-
स्वाति, ७ लोहाचार्य, ८ यशःकीर्ति, ९ यशोनन्दी और १० देवनन्दीके नाम दिये हैं। ये सब नाम इसी क्रमसे
नन्दिसंघकी पट्टावलीमें भी मिलते हैं। आगे इस गुर्वावलीमें ११ गुणनन्दीके बाद १२ वज्रनन्दीका नाम
आता है। जब कि नन्दिसंघकी पट्टावलीमें ११ जयनन्दी और १२ गुणनन्दी इन दो नामोंके बाद १३ वज्र-
नन्दीका नाम आता है।
यद्यपि इससे आगेकी दोनोंकी आचार्य परम्परा करीब-करीब मिलती हुई है। परन्तु विशेष प्रयोजन
न होनेसे उसे हम यहाँ नहीं दे रहे हैं। प्रकृतमें इन आधारोंसे हमें इतना ही सूचित करना है कि आचार्य
पूज्यपाद मूलसंघके अन्तर्गत नन्दिसंघ बलात्कार गणके पट्टाधीश थे। तथा अन्य प्रमाणोंसे २ यह भी विदित
होता है कि इनका गच्छ 'सरस्वती' इस नामसे प्रख्यात था। हमारे प्रसिद्ध आचार्य कुन्दकुन्द और गृद्धपिच्छ
(उमास्वाति) इसी परम्पराके पूर्ववर्ती आचार्य थे यह भी इससे विदित होता है।
४. जीवन-परिचय—आचार्य पूज्यपाद कौन थे, उनके माता-पिताका नाम क्या था, वे किस कुलमें
जन्मे थे इन सब बातोंका परिचय श्रीमान् पं० नाथूरामजी प्रेमीने 'देवनन्दि और उनका जैनेन्द्र व्याकरण'
लेखमें दिया है ३ । उन्होंने यह परिचय कनडी भाषामें लिखे गये 'पूज्यपादचरिते' के आधारसे लिखा है।
इसके लेखक 'चन्द्रय्य' कवि थे। श्रीमान् पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारके लेखसे यह भी ४ विदित होता है कि
उनका यह जीवनचरित 'राजावलिकथे' में भी दिया हुआ है। किन्तु इन दोनोंमें कहाँ तक साम्य और वैषम्य
है यह इससे विदित नहीं होता। प्रेमीजीके शब्दोंमें कथा संक्षेपमें इस प्रकार है—
'कर्नाटक देशके 'कोले' नामक ग्रामके माधवभट्ट नामक ब्राह्मण और श्रीदेवी ब्राह्मणीसे पूज्यपादका
जन्म हुआ। ज्योतिषियोंने बालकको त्रिलोकपूज्य बतलाया। इस कारण उसका नाम पूज्यपाद रखा गया।
माधवभट्टने अपनी स्त्रीके कहनेसे जैनधर्म स्वीकार कर लिया। भट्टनीके सालेका नाम 'पाणिनि' था। उसे भी
उन्होंने जैन बननेको कहा। परन्तु प्रतिष्ठाके ख्यालसे वह जैन न होकर मुडीकुंड ग्राममें वैष्णव संन्यासी हो
१. देखो जैनसिद्धान्तभास्कर भाग १, किरण ४, पृ० ५१ । २. देखो जैनसिद्धान्त भास्कर, भाग १, किरण
४, पृ० ४३ में उद्धृत शुभचन्द्राचार्यकी पट्टावली। ३. देखो जैन साहित्य और इतिहास, पृ० १२३। ४. देखो
रत्नकरण्डककी भूमिका ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri