सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ७७
साहित्य-जगत्में कभी न अस्त होनेवाले वे प्रकाशमान सूर्य थे जिसके आलोकसे दशों दिशाएँ सदा आलोकित
होती रहेंगी ।
ये हैं वे तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तुत वृत्ति सर्वार्थसिद्धिके रचयिता आचार्य पूज्यपाद जिनका सर्वांग परिचय
हमें यहाँ प्राप्त करना है। उसमें भी उनका पूरा नाम क्या है, वे किस संघके अधिपति थे। उनका जीवन
परिचय क्या है, उनकी रचनाएँ कौन-कौन हैं और उनका वास्तव काल व गुरु-शिष्य परम्परा क्या है
आदि विषय विचारणीय हैं जिनका यहाँ हम क्रमशः परिचय प्राप्त करनेका उपक्रम करेंगे। सर्वप्रथम
नामको ही लीजिए—
२. नाम—शिलालेखों तथा दूसरे प्रमाणोंसे विदित होता है कि इनका गुरुके द्वारा दिया हुआ
दीक्षानाम देवनन्दि था, बुद्धिकी प्रखरताके कारण इन्हें जिनेन्द्रबुद्धि कहते थे और देवोंके द्वारा इनके
चरण युगल पूजे गये थे इसलिए वे पूज्यपाद इस नामसे भी लोकमें प्रख्यात थे। इस अर्थको व्यक्त करनेवाले
उद्धरण ये हैं—
प्रागभ्यधायि गुरुणा किल देवनन्दी बुद्ध्या पुनर्विपुलया स जिनेन्द्रबुद्धिः ।
श्रीपूज्यपाद इति चैष बुधैः प्रचख्ये सत्पूजितः पदयुगे वनदेवताभिः ॥
श्रवणवेलगोला शि० नं० १०५, वि० सं० १३२०।
इनके पूज्यपाद और जिनेन्द्रबुद्धि इन नामोंकी सार्थकताको व्यक्त करनेवाले वहीं के नं० १०८ के एक
दूसरे शिलालेखको देखिए—
श्रीपूज्यपादोद्भूतधर्मराज्यस्ततः सुराधीशवरपूज्यपादः ।
यदीयवैदुष्यगुणान्निदानीं वदन्ति शास्त्राणि तदुद्भूतानि ॥
धृतविश्वबुद्धिरशमत्र योगिभिः कृतकृत्यमावमनुविभ्रदुच्चकैः ।
जिनवद् बभूव यदनङ्गचापहृत्स जिनेन्द्रबुद्धिरिति साधुवर्णितः ॥
ये दोनों श्लोक वि० सं० १३५५ के शिलालेखके हैं। इनमें कहा गया है कि आचार्य पूज्यपादने धर्म-
राज्यका उद्धार किया था, इससे आपके चरण इन्द्रों द्वारा पूजे गये थे। इनके पूज्यपाद इस नामसे सम्बोधित
किये जानेका यही कारण है। इनमें वैदुष्य आदि अनेक गुण थे जिनका स्थापन आज भी उनके द्वारा रचे गये
शास्त्र कर रहे हैं। ये जिन देवके समान विश्वबुद्धिके धारक थे, कृतकृत्य थे और कामदेवको जीतनेवाले थे,
इसलिए योगी जन इन्हें जिनेन्द्रबुद्धि इस नामसे सम्बोधित करते थे ।
इन शिलालेखों व अन्यत्र२ और भी ऐसे अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं जिनसे इनके इन तीन नामोंकी
सार्थकता सिद्ध होती है ।
आदिपुराणका एक उद्धरण हम पहले दे आये हैं। उसके तथा वादिराज सूरिके एक उल्लेखसे ३ विदित
होता है कि इनका एक नाम 'देव' भी था। मालूम पड़ता है कि इनका दीक्षानाम 'देवनन्दि' होनेसे उसके
संक्षिप्त रूप 'देव' इस पद द्वारा उक्त आचार्यों ने इनका नामोल्लेख किया है। अतएव यह कोई स्वतन्त्र नाम
न होकर 'देवनन्दि' इस नामका ही संक्षिप्त रूप प्रतीत होता है।
३. संघ—संघोंकी उत्पत्तिका इतिहास इन्द्रनन्दिने अपने श्रुतावतारमें दिया है। वे लिखते हैं कि जब
सौ योजनके मुनि मिलकर अष्टांगनिमित्तज्ञ और धारण-प्रसारण आदि विशुद्ध क्रियाके पालनेवाले आचार्य
अर्हद्बलि की देखरेखमें युगप्रतिक्रमण कर रहे थे उस समय युगके अन्तिम दिन युगप्रतिक्रमण करते हुए
आचार्य अर्हद्बलिने आये हुए मुनिसमाजसे पूछा कि क्या सभी यतिजन आ गये हैं ? इसपर यतिजनोंने उत्तर
१ श्रवणवेल्गोलके शक सं० १०८५ के शिलालेख ( जो इससे पूर्ववर्ती है ) से भी इस तथ्यका समर्थन
होता है। २. देखो श्रमणवेलगोलाका शिलालेख नं० ५० और नन्दिसंघ की पट्टावली । ३. पार्श्वनाथ चरित
सर्ग १, श्लोक १८ ।