सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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उसे सर्वार्थसिद्धिमं 'कश्चिद् भव्यः' कहा गया है और श्रुतसागर सूरि उसके नामका उल्लेख करते हैं । कह
नहीं सकते उन्होंने उस भव्यका यह नाम किन स्रोतोंसे प्राप्त किया ।
तत्त्वार्थसूत्रकी इन प्रसिद्ध टीकाओंके उल्लेखोंसे लोककथाके इस भागका तो समर्थन होता है कि
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना किसी भव्यके निमित्तसे हुई । किन्तु यह ज्ञात नहीं होता कि पहले उस भव्यने 'दर्शन-
ज्ञानचारित्राणि' सूत्र रचा और बादमें उसमें सुधारकर भव्यकी प्रार्थना पर सूत्रकारने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना
की । इसलिए इन उल्लेखोंसे कथाके सर्वांशका समर्थन न होने पर भी किसी अंशतक वह साधार है यह
माननेमें कोई आपत्ति नहीं दिखाई देती ।
४. आचार्य पूज्यपाद
१. महत्ता- भारतीय परम्परामें जो लब्धप्रतिष्ठ तत्त्वद्रष्टा शास्त्रकार हुए हैं उनमें आचार्य पूज्यपाद
का नाम प्रमुखरूपसे लिया जाता है । इन्हें प्रतिभा और विद्वत्ता दोनोंका समान रूपसे वरदान प्राप्त था ।
जैन परम्परामें आचार्य समन्तभद्र और सन्मतिके कर्ता आचार्य सिद्धसेनके बाद साहित्यिक जगत्में यदि किसी
को उच्चस्थान पर बिठलाया जा सकता है तो वे आचार्य पूज्यपाद ही हो सकते हैं । इन्होंने अपने पीछे जो
साहित्य छोड़ा है उसका प्रभाव दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंमें समानरूपसे दिखाई देता है ।
यही कारण है कि उत्तरकालवर्ती प्रायः अधिकतर साहित्यकारों व इतिहास मर्मज्ञोंने इनकी महत्ता, विद्वत्ता
और बहुज्ञता स्वीकार करते हुए इनके चरणोंमें श्रद्धाके सुमन अर्पित किये हैं । आदिपुराणके कर्ता आचार्य
जिनसेन इन्हें कवियोंमें तीर्थंकर मानते हुए इनकी स्तुति में कहते हैं—
कवीनां तीर्थकृद्देवः किंतशं तत्र वर्ण्यते ।
विदुषां वाङ्मलध्वंसि तीर्थं यस्य वचोमयम् ॥१, ५२॥
जो कवियोंमें तीर्थंकरके समान थे और जिनका वचनरूपी तीर्थ विद्वानोंके वचनमलको धोनेवाला है
उन देव अर्थात् देवनन्दि आचार्यकी स्तुति करनेमें भला कौन समर्थ है ।
यह तो हम आगे चलकर बतलानेवाले हैं कि जिस प्रकार इन्होंने अपनी अनुपम कृतियों द्वारा मोक्ष-
मार्गका प्रकाश किया है उसी प्रकार इन्होंने शब्दशास्त्र पर भी विश्वको अपनी रचनाएँ भेंट की हैं । कहा तो
यहाँ तक जाता है कि शरीरशास्त्र जैसे लोकोपयोगी विषयको भी इन्होंने अपनी प्रतिभाका विषय बनाया था ।
तभी तो ज्ञानार्णवके कर्ता आचार्य शुभचन्द्र इनके उक्त गुणोंका ख्यापन करते हुए कहते हैं—
अपाकुर्वन्ति यद्वाचः कायवाक्चित्तसम्भवम् ।
कलङ्कमङ्गिनां सोऽयं देवनन्दी नमस्यते ॥१, १५॥
जिनकी शास्त्रपद्धति प्राणियोंके शरीर, वचन और चित्तके सभी प्रकारके मलको दूर करनेमें समर्थ है
उन देवनन्दी आचार्यको मैं प्रणाम करता हूँ ।
आचार्य गुणनन्दिने इनके व्याकरण सूत्रोंका आश्रय लेकर जैनेन्द्र प्रक्रियाकी रचना की है । वे इसका
मंगलाचरण करते हुए कहते हैं—
नमः श्रीपूज्यपादाय लक्षणं यदुपक्रमम् ।
यदेवात्र तदन्यत्र यन्नात्रास्ति न तत्क्वचित् ॥
जिन्होंने लक्षणशास्त्रकी रचना की, मैं उन आचार्य पूज्यपादको प्रणाम करता हूँ । उनके इस
लक्षणशास्त्रकी महत्ता इसीसे स्पष्ट है कि जो इसमें है वही अन्यत्र है और जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र
भी नहीं है ।
उनकी और उनके साहित्यकी यह स्तुति परम्परा यहीं समाप्त नहीं होती । धनंजय, वादिराज,
भट्टारक शुभचन्द्र और पद्मप्रभ आदि अनेक ऐसे आचार्य हुए हैं जो इस गुणगाथाकी परम्पराको जीवित
रखनेके लिए अपने पूर्ववर्ती आचार्योंके पदचिह्नों पर चले हैं । अभिप्राय यह है कि आचार्य पूज्यपाद
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri