सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ७९.
गया । पूज्यपादकी कमलिनी नामक छोटी बहन हुई, वह गुणभट्टको ब्याही गयी और गुणभट्टको उससे नागार्जुन
नामक पुत्र हुआ ।
पूज्यपादने एक बगीचेमें एक सांपके मुंहमें फँसे हुए मेढकको देखा । इससे उन्हें वैराग्य हो गया और
वे जैन साधु बन गये ।
पाणिनि अपना व्याकरण रच रहे थे । वह पूरा न हो पाया था कि उन्होंने अपना मरणकाल निकट
आया जानकर पूज्यपादसे कहा कि इसे तुम पूरा कर दो । उन्होंने पूरा करना स्वीकार कर लिया ।
पाणिनि दुर्ध्यानवश मरकर सर्प हुए । एक बार उसने पूज्यपादको देखकर फूत्कार किया । इस पर
पूज्यपादने कहा, विश्वास रखो, मैं तुम्हारे व्याकरणको पूरा कर दूँगा । इसके बाद उन्होंने पाणिनि व्याकरण-
को पूरा कर दिया ।
इसके पहले वे जैनेन्द्र व्याकरण, अर्हत्प्रतिष्ठालक्षण और वैद्यक ज्योतिषके कई ग्रन्थ रच चुके थे ।
गुणभट्टके मर जानेसे नागार्जुन अतिशय दरिद्री हो गया । पूज्यपादने उसे पद्मावतीका एक मन्त्र दिया
और सिद्ध करनेकी विधि भी बतला दी । उसके प्रभावसे पद्मावतीने नागार्जुनके निकट प्रकट होकर उसे
सिद्धरसकी वनस्पति दी ।
इस सिद्धरससे नागार्जुन सोना बनाने लगा । उसके गर्वका परिहार करनेके लिए पूज्यपादने एक
मामूली वनस्पतिसे कई घड़े सिद्धरस बना दिया । नागार्जुन जब पर्वतोंको सुवर्णमय बनाने लगा तब धरणेन्द्र
पद्मावतीने उसे रोका और जिनालय बनानेको कहा । तदनुसार उसने एक जिनालय बनवाया और पार्श्वनाथ-
की प्रतिमा स्थापित की ।
पूज्यपाद पैरोंमें गगनगामी लेप लगाकर विदेहक्षेत्रको जाया करते थे । उस समय उनके शिष्य
वज्रनन्दीने अपने साथियोंसे झगड़ा करके द्रविड़ संघकी स्थापना की ।
नागार्जुन अनेक मन्त्र-तन्त्र तथा रसादि सिद्ध करके बहुत ही प्रसिद्ध हो गया । एक बार दो सुन्दरी
स्त्रियां आयीं जो गाने-नाचनेमें कुशल थीं । नागार्जुन उन पर मोहित हो गया । वे वहीं रहने लगीं और कुछ
समय बाद ही उसकी रसगुटिका लेकर चलती बनीं ।
पूज्यपाद मुनि बहुत समय तक योगाभ्यास करते रहे । फिर एक देवविमानमें बैठकर उन्होंने अनेक
तीर्थों की यात्रा की । मार्गमें एक जगह उनकी दृष्टि नष्ट हो गयी थी, सो उन्होंने एक शान्त्यष्टक बनाकर ज्यों
की त्यों कर ली । इसके बाद उन्होंने अपने ग्राममें आकर समाधिपूर्वक मरण किया ।'
श्री मोतीचन्द्र गौतमचन्द्र कोठारी फलटनवालोंने सर्वार्थसिद्धिके एक अन्यतम संस्करणका सम्पादन
किया है जो सोलापुरसे प्रकाशित हुई है । उसमें उन्होंने कुछ युक्तियां देकर इस कथाके व्याकरण सम्बन्धी
अंशको यथावत् सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है । किन्तु जैसा कि अन्य तथ्योंसे सिद्ध है कि पाणिनि व्याकरणके
कर्ता पाणिनि ऋषि पूज्यपादसे बहुत पहले हो गये हैं । इतना ही नहीं पाणिनि व्याकरण पर जो कात्यायनका
वातिक और पतंजलिका महाभाष्य प्रसिद्ध है वह भी पूज्यपादके कई शताब्दियों पहले लिखा जा चुका था ।
अतएव केवल इस कथाके आधार पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि आचार्य पूज्यपाद पाणिनिके समयमें
हुए हैं और उन्होंने उनके अधूरे व्याकरणको पूरा किया था। कथा में और भी ऐसी अनेक घटनाओं का
उल्लेख है जिन्हें अतिशयोक्तिपूर्ण कहा जा सकता है । किन्तु एक बात स्पष्ट है कि आचार्य पूज्यपाद पाणिनि
व्याकरण, उसके वार्तिक और महाभाष्यके मर्मज्ञ थे । इससे ऐसा मालूम पड़ता है कि ये ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न
हुए होंगे और अपने जीवनकालके प्रारम्भमें वे अन्य धर्मके माननेवाले रहे होंगे । अतः इस कथामें जो उनके
पिता, माता व कुल आदिका परिचय दिया है वह कदाचित् ठीक भी हो । जो कुछ भी हो, तत्काल इस
कथाके आधारसे हम इतना कह सकते हैं कि पूज्यपाद ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुए थे । उनके पिताका नाम
माधवभट्ट और माताका नाम श्रीदेवी था । वे 'कोले' नामक ग्रामके रहनेवाले थे और उनका जन्म नाम .
पूज्यपाद था । उन्होंने विवाह न कर बचपनमें ही जैनधर्म स्वीकार कर लिया था और आगे चलकर उन्होंने
सांपके मुंहमें मेंढक तड़पता हुआ देख मुनिदीक्षा ले ली थी । उन्होंने अपने जीवन कालमें गगनगामी लेपके