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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 558 में से

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पृष्ठ 87

प्रस्तावना ८३
वह समुचित नहीं कहा जा सकता। पण्डित प्रभाचन्द्रने तो केवल इतना ही कहा है कि सब संस्कृत भक्तियाँ
पादपूज्य स्वामी कृत हैं और सब प्राकृत भक्तियाँ कुन्दकुन्द आचार्य कृत हैं और यह भी उन्होंने प्राकृत सिद्ध-
भक्तिकी व्याख्या करते हुए उसके अन्तमें कहा है। परन्तु क्रियाकलापमें जिस क्रमसे इन भक्तियोंका संग्रह है
उसे देखते हुए प्राकृत सिद्धभक्तिका क्रमांक दूसरा है। सम्भव है कि सोनीजीने नन्दीश्वरभक्ति पर परिच्छेद-
की समाप्ति देखकर यह अनुमान किया हो। जो कुछ भी हो, पण्डित प्रभाचन्द्रके कालमें ये भक्तियां पादपूज्य
स्वामीकृत और कुन्दकुन्दाचार्यकृत मानी जाती थीं इतना स्पष्ट है। विद्वानोंका अनुमान है कि ये पादपूज्य
स्वामी आचार्य पूज्यपाद ही होने चाहिए, क्योंकि एक तो इस नामके अन्य कोई आचार्य नहीं हुए हैं। दूसरे
इन भक्तियोंका अप्रतिहत प्रवाह और गम्भीर शैली इस बातको सूचित करती है।१
इन सब भक्तियोंमें उनके नामानुसार विषयका विवेचन किया गया है। मुनिजन तथा व्रती गृहस्थ
दैवसिक आदि प्रतिक्रमणके समय निश्चित क्रमसे इनका प्रयोग करते आ रहे हैं जो आंशिकरूपसे वर्तमान
कालमें भी चालू है।
५. जैनेन्द्र व्याकरण—आचार्य पूज्यपादकी अन्यतम मौलिक कृति उनका जैनेन्द्र व्याकरण है। इसका
जैनेन्द्र यह नाम क्यों पड़ा ? क्या स्वयं आचार्य पूज्यपादको यह नाम इष्ट था इसका निर्णय करना तो कठिन
है। परन्तु प्राचीन कालसे यह इसी नामसे सम्बोधित होता आ रहा है यह मुग्धबोधके कर्ता पं० बोपदेवके
इस उल्लेखसे स्पष्ट है—
'इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशलीशाकटायनाः ।
पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टौ च शाब्दिकाः ॥' धातुपाठ
यह पांच अध्यायोंमें विभक्त है और सूत्र संख्या लगभग ३००० है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता संज्ञा-
लाघव है। पाणिनीय व्याकरणमें जिन संज्ञाओंके लिए कई अक्षरोंके संकेत कल्पित किये गये हैं उनके लिए
इसमें लाघवसे काम लिया गया है। तुलनाके लिए देखिए—
पाणिनीय व्याकरण जैनेन्द्र व्याकरण
ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत प्र, दी, प
सवर्ण स्व
अनुनासिक ङ
गुण एप्
वृद्धि ऐप्
निष्ठा त
प्रातिपदिक मृतृ
लोप ख
संज्ञालाघव और रचना विशेषके कारण इसमें सूत्रलाघवके भी दर्शन पद-पद पर होते हैं। यथा—
पाणिनीय व्याकरण जैनेन्द्र व्याकरण
झरो झरि सवर्णे झरो झरि स्वे
हलो यमां यमि लोपः हलो यमां यमि खम्
तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् सस्थानक्रियं स्वम्
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः आकालोऽच् प्रदीपः
इसका प्रथम सूत्र है 'सिद्धिरनेकान्तात ।' इसकी व्याख्या करते हुए सोमदेवसूरिने शब्दार्णवचन्द्रिकामें
जो कुछ कहा है उसका भाव यह है—'शब्दोंकी सिद्धि और ज्ञप्ति अनेकान्तका आश्रय लेनेसे होती है, क्योंकि
शब्द अस्तित्व-नास्तित्व, नित्यत्व-अनित्यत्व और विशेषण-विशेष्यधर्मको लिये हुए होते हैं। इस सूत्रका अधि-
१. देखो जैन साहित्य और इतिहास पृ० १२१ ।