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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

प्रस्तावना ७३
“दव्वं सल्लक्खणियं उत्पादव्वयध्रुवत्तसंजुत्तं ।
गुण पज्जयासयं वा जं तं मण्णंति सव्वण्हू ॥”
अब इस गाथाके प्रकाशमें तत्त्वार्थसूत्रके इन सूत्रोंको देखिए—
सद् द्रव्यलक्षणम् ॥५, २९॥ उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥५, ३०॥ गुणपर्ययवद् द्रव्यम् ॥५, ३८॥
इसके सिवाय तत्त्वार्थसूत्रमें और भी बहुतसे ऐसे वचन हैं जिनका आचार्य कुन्दकुन्दके वचनोंके साथ
शाब्दिक और वस्तुगत साम्य दिखाई देता है । तथा तत्त्वार्थसूत्रमें 'नान्य'¹ जैसे शब्दोंका व्यवहार हुआ है ।
इससे उसके कर्ता दिगम्बर परम्परा के हैं यही सिद्ध होता हैं।
समय—नामके समान आचार्य गृद्धपिच्छके समयका प्रश्न भी बहुत अधिक विचारणीय है । साधारणतः
जिन उल्लेखोंका इनके समयपर सीधा प्रकाश पड़ता है ऐसे दो उल्लेख हमारे सामने हैं । प्रथम नन्दिसंघकी
पट्टावलीका उल्लेख और दूसरा विद्वज्जनबोधकमें उद्धृत इनके समयकी सूचना देनेवाला उल्लेख ।
१. नन्दिसंघकी पट्टावली विक्रमके राज्याभिषेकसे प्रारम्भ होती है और यह इंडियन एंटीक्वेरीके
आधारसे जैनसिद्धान्तभास्कर किरण ४, पृ० ७८. में जिस रूपमें उद्धृत हुई है उसका प्रारम्भिक अंश इस
प्रकार है—
‘१ भद्रबाहु द्वितीय (४) २ गुप्तिगुप्त (२६) ३ माघनन्दि (३६) ४ जिनचन्द (४०) ५ कुन्दकुन्दाचार्य
(४९) ६ उमास्वामी (१०१) ७ लोहाचार्य (१४२) ८ यशःकीर्ति (१५३) ९ यशोनन्दी (२११) १० देव-
नन्दी (२५८) ११ जयनन्दी (३०८) १२ गुणनन्दी (३५८) १३ वज्रनन्दी (३६४) १४ कुमारनन्दी (३८६)
१५ लोकचन्द (४२७) १६ प्रभाचन्द्र (४५३) १७ नेमिचन्द्र (४७८) १८ भानुनन्दी (४८७) १९ सिंहनन्दी
(५०८) २० श्री वसुनन्दी (५२५) २१ वीरनन्दी (५३१) २२ रत्ननन्दी (५६१) २३ माणिक्यनन्दी (५८५)
२४ मेघचन्द्र (६०१) २५ शान्तीकीर्ति (६२७) २६ मेरुकीर्ति (६४२) ।’
गुप्तिगुप्त यह अर्हद्बलिका दूसरा नाम है। इन्होंने अन्य संघोंके साथ जिस नन्दिसंघकी स्थापना की
थीं उसके पहले पट्टधर आचार्य माघनन्दि थे । इस हिसाबसे उमास्वामी (गृद्धपिच्छ) नन्दिसंघके पट्टपर
बैठनेवाले चौथे आचार्य ठहरते हैं। यद्यपि पट्टावलीमें ये क्रमांक ६ पर सूचित किये गये हैं पर भद्रबाहु द्वितीय
और अर्हद्बलिको छोड़कर ही नन्दिसंघके आचार्योंकी गणना करनी चाहिए । इसलिए यहाँ हमने उमास्वामी
(गृद्धपिच्छ) का क्रमांक ४ सूचित किया है इस पट्टावलिके अनुसार ये वीर नि० सं० ५७१ में हुए थे ।
२. विद्वज्जनबोधकमें यह श्लोक उद्धृत मिलता है—
“वर्षसप्तशते चैव सप्तत्या च विस्मृतौ ।
उमास्वामिसुनिर्जातः कुन्दकुन्दस्तथैव च ॥”
इसका भाव है कि वीर नि० सं० ७७० में उमास्वामी मुनि हुए तथा उसी समय कुन्दकुन्द आचार्य हुए ।
अब हम अन्य प्रमाणोंको देखें—
१. इन्द्रनन्दिके श्रुतावतारमें पहले ६८३ वर्षकी श्रुतधर आचार्योंकी परम्परा दी है । और इसके बाद
अंगपूर्वके एकदेशधारी विनयधर, श्रीदत्त और अर्हद्दत्तका नामोल्लेख कर नन्दिसंघ आदि संघोंकी स्थापना
करनेवाले अर्हद्बलिका नाम आता है । और इसके बाद माघनन्दि, धरसेन, पुष्पदन्त और भूतबलिका उल्लेख
करनेके बाद आचार्य परम्परामें कुन्दकुन्दका नाम आता है। यह तो निश्चित है कि आचार्य गृद्धपिच्छ आचार्य
कुन्दकुन्दके बाद हुए हैं। इसलिए यदि इस हिसाबसे विचार किया जाय और श्रुतधर आचार्योंके ६८३ वर्षमें
१. देखो तत्त्वार्थसूत्र, अ० ९, सू० ९ । २. पाण्डवपुराणके कर्ता शुभचन्द्रने अपनी परम्परा दी है ।
उसमें भी १० आचार्यों तक यही क्रम स्वीकार किया गया है। और आगे भी एकाध नामको छोड़कर
आचार्योके नामोंमें समानता देखी जाती है । वे अपनेको नन्दिसंघका ही घोषित करते हैं। देखो जैनसिद्धान्त
भास्कर, भाग १, किरण ४, पृष्ठ ५१ ।
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