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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 558 में से

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पृष्ठ 74

७० सर्वार्थसिद्धि
कही गयी है। अन्तर केवल इतना ही है कि इन दोनों शिलालेखोंमें गृद्धपिच्छ उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका
रचयिता कहा गया है और शिलालेख नं० ४७ व ४० में रचयिताके रूपमें उनका उल्लेख नहीं किया है।
यहाँ पर हम सर्वप्रथम दिगम्बर परम्पराके उक्त उल्लेखोंके आधारसे, तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी
जानेवाली प्रशस्तिके आधारसे और धर्मसागरगणि कृत तपागच्छ पट्टावलीके आधारसे परम्परा दे देना
चाहते हैं। यथा—
शिलालेख ( चन्द्रगिरि ) तत्त्वार्थभाष्य प्र० तपागच्छ पट्टावली
गौतम गणधर वाचकमुख्य शिवश्री जिनभद्रगणि
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भद्रबाहु ( अन्वयमें ) घोषनन्दि क्षमण विबुधप्रभ
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चन्द्रगुप्त ( शिष्य ) वाचक उमास्वाति जयानन्द
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पद्मनन्दि ( अन्वयमें ) रविप्रभ
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गृद्धपिच्छ उमास्वाति ( अन्वयमें ) उमास्वाति
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बलाकापिच्छ शिष्य
इस प्रकार ये तीन परम्पराएँ हमारे सामने हैं। इनमेंसे तपागच्छ पट्टावलिके विषयमें तो इतना ही
कहना है कि धर्मसागर गणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यकी प्रशस्तिके रहते हुए जो उन्होंने तपागच्छके आचार्योंकी
परम्पराके साथ उमास्वातिको उल्लेख किया है सो इसका कारण केवल युगप्रधान आचार्यके रूपमें उमास्वातिको
उनके वास्तव्य कालके साथ स्वीकार करनामात्र है। जिनभद्र गणिके विषयमें भी यही बात है। ये दोनों
तपागच्छ परम्पराके आचार्य नहीं हैं और न ऐसा धर्मसागर गणि ही मानते हैं। यही कारण है कि उन्होंने
तपागच्छ परम्पराका स्वतन्त्र निर्देश करते हुए बीच में इनका युगप्रधान आचार्यके रूपमें उल्लेखमात्र किया है
इसलिए इसे और इसके साथ पायी जानेवाली थोड़ेसे मतभेदको लिये हुए अन्य प्रशस्तियोंको छोड़ कर हमारे
सामने मुख्य दो परम्पराएँ रहती हैं—एक श्रमणवेलगोलमें पाये जाने वाले शिलालेखोंकी परम्परा और दूसरी
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्तिकी परम्परा।
देखनेसे विदित होता है कि इन दोनों उल्लेखोंमें दोनोंकी न केवल गुरुपरम्परा भिन्न-भिन्न है अपितु
दोनोंके उपपद या नामान्तर भी भिन्न-भिन्न हैं। श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंकी परम्परा जब कि तत्त्वार्थसूत्र-
कारको गृद्धपिच्छ उमास्वाति¹ घोषित करती है ऐसी अवस्थामें तत्त्वार्थभाष्यकी प्रशस्ति उन्हें वाचक उमास्वाति
इस नामसे सम्बोधित करती है, इसलिए इन आधारोंसे हमारा तो यही विचार दृढ़ होता है कि गृद्धपिच्छ
उमास्वातिसे वाचक उमास्वाति भिन्न आचार्य होने चाहिए।
इस प्रकार इतने विवेचनसे इन दोनों आचार्योंके अलग-अलग सिद्ध हो जानेपर यहाँ यह देखना है
कि गृद्धपिच्छ उमास्वाति इस नाममें कहाँ तक तथ्य है, क्योंकि इस नामके विषयमें हमें कई तरहके उल्लेख
१. जिनेन्द्र कल्याणाम्युदयमें अन्वयावलिके वर्णनके प्रसंगसे एक श्लोक आता है जिसमें कुन्दकुन्द आचार्य
और उमास्वाति दोनोंको वाचक कहा गया है और धवला टीकाके अन्तिम भागके देखनेसे यह भी विदित
होता है कि दिगम्बर परम्परामें भी 'वाचक' उपपद व्यवहृत होता था। किन्तु जिनेन्द्र कल्याणाम्युदयका
प्रमाण अपेक्षाकृत बहुत अर्वाचीन है और केवल इस आधारसे तत्त्वार्थभाष्यके वाचक उमास्वातिको और
श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंके गृद्धपिच्छ उमास्वातिको एक नहीं माना जा सकता। देखो पं० सुखलालजी कृत
तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावनाके परिशिष्टमें उद्धृत पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारका पत्र।