सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ७५
आता है। षट्खण्डागम ईसवी द्वितीय शताब्दीके मध्यकालके पूर्व लिखा जा चुका था, इसलिए इस दृष्टिसे
उनका अवस्थिति काल ईसवी द्वितीय शताब्दीके मध्यके आसपास आता है। मर्कराके ताम्रपत्रके अनुसार
आचार्य कुन्दकुन्दकी अन्तिम सीमा ईसवी तृतीय शताब्दीके मध्यके पूर्व मानी जा सकती है। इसके साथ ही
साथ वे शायद शिवस्कन्द राजाके समकालीन तथा कुरलके लेखक थे। इससे यह प्रतीत होता है कि आचार्य
कुन्दकुन्द ऊपर बतलायी गयी प्रथम दो शताब्दियोंमें थे। मैं इन सबका विचारकर इस तथ्यपर पहुँचा हूँ कि
कुन्दकुन्द ईसवी प्रथम शताब्दीमें हुए हैं।¹
यह तथ्य है जो आचार्य कुन्दकुन्दके समयके सम्बन्धमें डॉ० ए० एन० उपाध्येने सूचित किया है।
नन्दिसंघकी पट्टावलीमें उल्लिखित समयको सीमा लगभग यही है, इसलिए इन सब आधारोंको ध्यानमें
रखकर यह कहा जा सकता है कि आचार्य गृद्धपिच्छका समय ईसवी प्रथम शताब्दीमें हुए आचार्य कुन्दकुन्दके
बाद होना चाहिए, क्योंकि पट्टावलियों व दूसरे शिलालेखोंमें आचार्य कुन्दकुन्दके बाद ही इनका नाम आता है
और सम्भव है इन दोनोंके मध्य गुरु-शिष्यका सम्बन्ध रहा है। नन्दिसंघकी पट्टावलिके अनुसार ये आचार्य
कुन्दकुन्दके उत्तराधिकारी हैं यह तो स्पष्ट ही है।
५. तत्त्वार्थसूत्रके निर्माणका हेतु—लोकमें यह कथा प्रसिद्ध है कि 'किसी एक भव्यने मोक्षमार्गोपयोगी
शास्त्रके निर्माणका विचार कर तदनुसार 'दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' सूत्र रचकर दीवाल पर लिख
दिया। इसके बाद रोजगारके निमित्त उसके बाहर चले जाने पर चर्याके निमित्त गृद्धपिच्छ आचार्य वहां आये
और उन्होंने दीवाल पर लिखे हुए सूत्रको अधूरा देखकर उसके प्रारम्भमें 'सम्यक्' पद जोड़ दिया। जब
वह भव्य बाहरसे लौटा और उसने सूत्रके प्रारम्भमें 'सम्यक्' पद जुड़ा हुआ देखा तो वह आश्चर्य करने
लगा। उसने घरके सदस्योंसे इसका कारण पूछा और ठीक कारण जानकर वह खोजता हुआ गृद्धपिच्छ
आचार्यके पास पहुँचा और उन पर अपने अभिप्रायको व्यक्त कर उनसे शास्त्रके रचनेकी प्रार्थना करने लगा।
तदनुसार आचार्य महाराजने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की।²
यहाँ देखना यह है कि यह कथा लोकमें प्रचलित कैसे हुई ? क्या इसकी प्रामाणिकताका कोई
विश्वस्त आधार है या यह कोरा भावुकतासे प्रेरित श्रद्धालुओंका उच्छवासमात्र है ? आगे इसी तथ्यका सांगो-
पांग विचार किया जाता है—
१. श्रुतसागर सूरिने तत्त्वार्थवृत्तिके प्रारम्भमें लिखा है कि किसी समय आचार्य उमास्वामी
(गृद्धपिच्छ) आश्रममें बैठे हुए थे। उस समय द्वैयाक नामक भव्यने वहाँ आकर उनसे प्रश्न किया—भगवन् !
आत्माके लिए हितकारी क्या है ? भव्यके ऐसा प्रश्न करनेपर आचार्यवर्यने मंगलपूर्वक उत्तर दिया—मोक्ष ।
यह सुनकर द्वैयाकने पुनः पूछा—उसका स्वरूप क्या है और उसकी प्राप्तिका उपाय क्या है ? उत्तरस्वरूप
आचार्यवर्यने मोक्षका स्वरूप बतला कर कहा कि यद्यपि मोक्षका स्वरूप इस प्रकार है तथापि प्रवादिजन इसे
अन्यथा प्रकारसे मानते हैं। इतना ही नहीं किन्तु इसके मार्गके विषयमें भी वे विवाद करते हैं। कोई चारित्र-
शून्य ज्ञानको मोक्षमार्ग मानते हैं, कोई श्रद्धानमात्रको मोक्षमार्ग मानते हैं और कोई ज्ञाननिरपेक्ष चारित्रको
मोक्षमार्ग मानते हैं। किन्तु जिस प्रकार औषधिके केवल ज्ञान, दर्शन या प्रयोगसे रोगकी निवृत्ति नहीं हो
सकती उसी प्रकार केवल दर्शन, केवल ज्ञान या केवल चारित्रसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती । भव्यने पूछा
तो फिर किस प्रकार उसकी प्राप्ति होती है ? इसीके उत्तरस्वरूप आचार्यवर्यने 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि
मोक्षमार्गः' यह सूत्र रचा है और परिणामस्वरूप तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है।
२ सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकमें भी यही उत्थानिका दी है। श्रुतसागर सूरिने यह उत्थानिका
सर्वार्थसिद्धिसे ही ली है। अन्तर केवल इतना है कि जिस भव्यने जाकर आचार्य गृद्धपिच्छसे प्रश्न किया है
१. प्रवचनसारकी प्रस्तावना पृ० २२ के आधारसे । २. इस कथाका आधार १३ शताब्दीमें हुए बालचन्द्र
मुनि रचित तत्त्वार्थसूत्रकी कन्नड़ी टीका ज्ञात होती है। इसमें श्रावकका नाम सिद्धय्य दिया है। देखो पं०
कैलाशचन्द्रजीके तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृ० १६ ।