सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ८१
इतना ही नहीं समाधितन्त्र लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने आचार्य कुन्दकुन्दका समयप्राभृत
व अन्य श्रुत भी उपस्थित था यह इसके अवलोकनसे स्पष्टतः विदित होता है। आचार्य कुन्दकुन्दने अभ्यन्तर
परिणामोंके बिना केवल बाह्यलिंग मोक्षमार्गमें उपयोगी नहीं है यह बतलाते हुए समयप्राभृतमें कहा है—
पासंडीलिंगाणि व गिहिलिंगाणि व बहुप्पयाराणि ।
घित्तुं वदंति मूढा लिंगमिणं मोक्खमग्गो त्ति ॥ ४०८ ॥
ण उ होदि मोक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा ।
लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि सेवंति ॥ ४०९ ॥
इसी तथ्यको आचार्य पूज्यपादने समाधितन्त्रमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
लिङ्गं देहाश्रितं दृष्टं देह एव आत्मनो भवः ।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये लिङ्गकृताग्रहाः ॥
जातिर्देहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भवः ।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः ॥
इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि जो साधक अपने आत्मकार्यमें उद्यत होना चाहते हैं उनके लिए यह
मोक्षमार्गके अनुसन्धानमें प्रदोपस्तम्भके समान है। इसमें आत्माके बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा ये
तीन भेद करके किस प्रकार यह जीव बहिरात्मपदके त्याग द्वारा अन्तरात्मा बनकर परमात्मपदको प्राप्त
करता है इसका सरल और हृदयग्राही कवितामें विवेचन किया गया है।
३. इष्टोपदेश—इसमें कुल मिलाकर ५१ श्लोक हैं । विषय स्वरूपसम्बोधन है। ग्रन्थका नाम इष्टो-
पदेश है यह स्वयं आचार्य पूज्यपादने इसके अन्तिम श्लोकमें व्यक्त किया है।
इसका निर्माण करते हुए आचार्य पूज्यपादके सामने एकमात्र यही दृष्टि रही है कि किसी प्रकार यह
संसारी आत्मा अपने स्वरूपको पहचाने और देह, इन्द्रिय तथा उनके कार्योंको अपना कार्य न मानकर आत्म-
कार्यमें सावधान होनेका प्रयत्न करे। समयप्राभृतका स्वाध्याय करते समय हमें इस भावके पद-पद पर दर्शन
होते हैं और इसलिए हम कह सकते हैं कि समयप्राभृत आदिके विषयको आत्मसात् करके ही इसका निर्माण
किया गया है। तुलनाके लिए देखिए—
एगो मे सासदो आदा णाणदंसणलक्खणो ।
सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ॥ समयप्राभृत
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।
बाह्याः संयोजगाः भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥ २७ ॥ इष्टोपदेश
रत्तो बंधति कम्मं मुंचदि कम्मं विरागसंपत्तो ।
एसो जिणोवएसो तम्हा कम्मेसु मा रज्ज ॥ समयप्राभृत
बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ॥ २६ ॥ इष्टोपदेश
रत्नकरण्डकमें एक श्लोक आता है जिसमें कहा गया है कि धर्मके प्रभावसे कूकर भी देव हो जाता
है और अधर्मके प्रभावसे देवको भी कूकर होते देर नहीं लगती । यथा—
श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्बिषात् ।
कापि नाम भवेद्दन्या संपद् धर्माच्छरीरिणाम् ॥ १, २९ ॥
इष्टोपदेशमें यही शब्द तो नहीं हैं पर इनका अनुसरण करते हुए आचार्यवर्य कहते हैं—
वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वतं नारकम् ।
छायापतस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥ ३ ॥
साधकके लिए आत्मसाधनामें इससे बड़ी सहायता मिलती है ।
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