सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआगेके आचार्योंका लगभग १०० वर्ष मान कर जोड़ा जाय तो वीर नि० सं० से ७८३ वर्षके आसपास
आचार्य गृद्धपिच्छ हुए यह कहा जा सकता है ।
२. श्रमणवेलगोलके शिलालेख नं० १०५ में भी¹ श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका निर्देश कर और
उसके बाद कुम्भ, विनीत, हलधर वसुदेव, अचल, मेरुधीर, सर्वज्ञ, सर्वगुप्त, महिधर, धनपाल, महावीर और
वीर इन नामोंका उल्लेख कर कुन्दकुन्द और तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छ उमास्वातिक नाम आता है। किन्तु
इसमें एक तो श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका काल निर्देश नहीं किया है। दूसरे श्रुतधर व दूसरे आचार्योंके
क्रमिक नामनिर्देशका भी ख्याल नहीं रखा है। अतः इस आधारसे आचार्य गृद्धपिच्छके समयके सम्बन्धमें कुछ
भी अनुमान नहीं किया जा सकता ।
३. श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका निर्देश धवला,² आदिपुराण, ³ नन्दिसंघकी प्राकृत पट्टावली⁴ और
त्रिलोकप्रज्ञप्ति⁵ आदिमें भी किया है। किन्तु वे ६८३ वर्षकी परम्पराका निर्देश करने तक ही सीमित हैं।
अतः इनके आधारसे किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है। इन आधारोंके बल पर यह भी तो नहीं कहा
जा सकता कि आचार्य गृद्धपिच्छके समयके सम्बन्धमें इन आचार्योंका क्या अभिमत है ? और हम इस सम्बन्धमें
इनके अभिमतको जाने बिना केवल इन्द्रनन्दि श्रुतावतारके आधारसे श्रुतधारियोंकी ६८३ वर्षकी परम्पराके
बाद आचार्य गृद्धपिच्छकी अवस्थितिको इन आचार्योंके मतसे माननेके लिए प्रस्तुत नहीं हैं ।
इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचनसे हमारे सामने मुख्य तीन मत आते हैं जिनसे हमें आचार्य गृद्धपिच्छके
समयकी सूचना मिलती है। प्रथम नन्दिसंघकी पट्टावलिके अनुसार उनका समय विक्रम (५७१-४७०)
१०१ ठहरता है। दूसरे विद्वज्जनबोधकमें उद्धृत श्लोकके अनुसार वह विक्रम (७७०-४७०) ३००
ठहरता है और तीसरे इन्द्रनन्दिके श्रुतावतारके अनुसार वह वि० सं० (७८३-४७०) ३१३ अनुमानित
किया जा सकता है ।
श्रमणवेलगोलके शिलालेखोंमें आचार्य गृद्धपिच्छके शिष्यका नाम आचार्य वलाकपिच्छ⁶ आता है और
नन्दिसंघकी पट्टावलीमें बलाकपिच्छके स्थानमें लोहाचार्यका नाम आता है । किन्तु इसका तो यह समाधान हो
सकता है कि पट्टावलीमें उन आचार्योंके नामोंका उल्लेख है जो उनके बाद पट्ट पर आसीन हुए और शिला-
लेखोंमें इसका विचार न कर उनका नामोल्लेख किया है जो उनके प्रमुख शिष्य थे । और इस आधारसे यहाँ
तककी पट्टावलीको ठीक भी मान लिया जाय तब भी इनके समयके सम्बन्धमें पट्टावलीके कालका दूसरे
उल्लेखोंमें निर्दिष्ट कालके साथ जो इतना अन्तर दिखाई देता है उसका हल कैसे किया जाय यह विचारणीय
विषय हो जाता है ।
यहाँ हम अन्य पौर्वात्य व पाश्चात्त्य विद्वानोंके मतोंका विशेष ऊहापोह नहीं करेंगे, क्योंकि उन विद्वानों
ने अधिकतर तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य इनको एककर्तृक मान कर अपने-अपने मतका निर्देश किया है।
किन्तु सुविचारित मतके रूपमें डॉ० ए० एन० उपाध्येके मतको अवश्य ही उपस्थित करना चाहेंगे। यद्यपि
ऊहापोहके बाद उन्होंने अपना यह मत आचार्य कुन्दकुन्दके समयके सम्बन्धमें निर्दिष्ट किया है किन्तु नन्दिसंघ-
पट्टावली व दूसरे प्रमाणोंके अनुसार आचार्य गृद्धपिच्छ आचार्य कुन्दकुन्दके शिष्य होनेके कारण उससे इनके
समयके ऊपर भी सर्वांगीण प्रकाश पड़ता है। वे सब मन्तव्यों और विद्वानोंके मतोंका ऊहापोह करनेके बाद
जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं वह यह है—
'इतनी लम्बी चर्चा करनेके बाद हम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि परम्पराके अनुसार इनका (आचार्य
कुन्दकुन्दका) अवस्थिति काल ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दीके मध्यसे लेकर ईसवी प्रथम शताब्दीके मध्यके भीतर
१. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित जैन शिलालेखसंग्रह भाग १, पृ० १९५ आदि । २. देखो धवला
पु० ९, पृ० १३० । ३. देखो आदिपुराण, पर्व २, श्लो० १३७ से । ४. देखो जैन सिद्धान्तभास्कर किरण ४,
पृ० ७१ । ५. देखो त्रिलोकप्रज्ञप्ति महाधिकार ४ गाथा १४९०,१४९१ । ६. देखो मा० ग्र० मा० से प्रकाशित
जैन शिलालेख संग्रह भाग १, शिलालेख नं० ४०,४२ और ५० आदि ।