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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 558 में से

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पृष्ठ 75

प्रस्तावना ७१
मिलते हैं। कहीं इनको केवल गृद्धपिच्छ कहा गया है और कहीं गृद्धपिच्छ उपपदयुक्त उमास्वामी या उमा-
स्वाति कहा गया है। कहीं गृद्धपिच्छको उमास्वातिक्रा दूसरा नाम बतलाया गया है तो कहीं केवल उमास्वाति
नाम आता है। यद्यपि देखनेमें ये सब नाम अलग-अलग प्रतीत होते हैं। जैसे उमास्वातिसे उमास्वामी नाम
भिन्न है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि पहले इनमेंसे कोई एक नाम रहा होगा और बादमें ‘म’ के
स्थानमें ‘त’ या ‘त’ के स्थानमें ‘म’ लिखा जानेसे ये दोनों नाम चल पड़े होंगे। इसी प्रकार उमास्वाति या
उमास्वामी नामका कहीं गृद्धपिच्छ इस अपर नामके साथ उल्लेख मिलनेसे और कहीं इनमेंसे किसी एकका
उल्लेख मिलनेसे इस सम्बन्धमें भी यह कहा जा सकता है कि इस तरह पूरे या अधूरे नामके लिखनेकी
भी परम्परा रही है और हो सकता है कि उसी परम्पराके अनुसार विविध प्रकारसे इन नामोंका उल्लेख
किया जाने लगा होगा।
यहाँ हम इन तर्कोंकी सत्यता स्वीकार करते हैं। फिर भी देखना यह है कि एक आचार्य नन्दिसंघ
तथा कुन्दकुन्दकी परम्परामें हुए और दूसरे अन्य परम्परामें हुए और इनके समयमें काफी अन्तर है फिर भी
दोनोंका एक ही शास्त्रकी रचनासे सम्बन्ध और एक ही नाम यह स्थिति उत्पन्न हुई कैसे ? यह कहना तो
बनता नहीं कि श्वेताम्बर परम्परामें हुए वाचक उमास्वाति इस नामको देखकर गृद्धपिच्छने अपना उमास्वाति
यह नाम भी रखा होगा, क्योंकि पट्टावलियों व दूसरे प्रमाणोंको देखनेसे विदित होता है कि गृद्धपिच्छ आचार्य
कुन्दकुन्दके बाद हुए हैं। जब कि वाचक उमास्वात्तिका अस्तित्वकाल इसके बहुत बाद आता है। साथ ही
यह कहना भी नहीं बनता है कि गृद्धपिच्छ उमास्वाति इस नामको देखकर वाचक उमास्वातिने अपना
‘उमास्वाति’ यह नाम रखा होगा, क्योंकि तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें जो प्रशस्ति उपलब्ध होती है उसमें वाचक
उमास्वात्तिका ‘उमास्वाति’ नाम क्यों रखा गया इसका कारण दिया है। उसमें बतलाया गया है कि इनके
पिताका नाम १ ‘स्वाति’ था और सिद्धसेन गणिने इस प्रशस्तिकी व्याख्या करते हुए यह भी लिखा है कि इनकी
माताका नाम ‘उमा’ था २। इसलिए इनका उमास्वाति यह नाम पड़ा है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि
यह प्रशस्ति बाद में गढ़ी गयी होगी, क्योंकि तत्त्वार्थभाष्यके टीकाकार सिद्धसेन गणिने इसका उल्लेख ही
नहीं किया व्याख्यान भी किया है और ऐसा करके उन्होंने उसे तत्त्वार्थभाष्यका अंग प्रसिद्ध किया है। इस
विषयमें हम पं० सुखलालजीके इस मतसे सहमत हैं कि यह स्वयं तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिकी
ही कृति है। ३
प्रसंगसे यहाँ पर हम एक बात यह कह देना चाहते हैं कि अधिकतर विद्वान् जहाँ किसी प्रशस्ति,
पट्टावली या शिलालेख आदिसे अपना मत नहीं मिलता वहाँ उसे सर्वथा अप्रामाणिक या जाली घोषित करते
हैं। किन्तु उनकी यह प्रवृत्ति विचारपूर्ण नहीं कही जा सकती। कारण कि प्राचीन कालमें इतिहासके
संकलनके साधन प्रायः सीमित थे। अधिकतर इतिहासके संकलन करनेवालोंका कथकोंके ऊपर अवलम्बित
रहना पड़ता था और जिसे प्रामाणिक आधारोंसे जो ज्ञात होता था वह उसका अंकन करता था। इसलिए
यह तो सम्भव है कि किसी शिलालेख आदिमें कोई नाम, समय या घटना सही रूपमें निबद्ध हो गयी हो और
किसी शिलालेख आदिमें वह कुछ भ्रष्टरूपमें निबद्ध हुई हो। पर साम्प्रदायिक अभिनिवेशवश किये गये
उल्लेखोंको छोड़कर निबद्ध करनेवालेका उद्देश्य जानबूझ कर उसे भ्रष्टरूपसे निबद्ध करनेका नहीं रहता था
इतना सुनिश्चित है। प्रसिद्ध धवला टीकाके रचयिता आचार्य वीरसेनने इस सम्बन्धमें एक बहुत अच्छी
विचारसरणि उपस्थित की है। उन्हें भगवान् महावीरकी आयु ७२ वर्ष की थी एक यह मत प्राप्त हुआ और
भगवान् महावीरकी आयु ७१ वर्ष ३ माह २५ दिनकी थी एक यह मत प्राप्त हुआ, इसलिए उनके सामने
प्रश्न था कि इनमेंसे किसे प्रमाण माना जाय ? इसी प्रश्नके उत्तरस्वरूप वे जो कुछ लिखते हैं वह न केवल
हृदयग्राही है अपितु अनुकरणीय भी है। वे कहते हैं कि ‘इन दोनोंमेंसे कौन ठीक है और कौन ठीक नहीं
१. ‘कौभीषणिना स्वातितनयेन—’। २. वात्सीसुतेनेति गोत्रेण नाम्ना उमेति मातुराख्यानम् । ३. देखो पं० सुख-
लालजीकी तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना पृ० ४ ।