सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७. सर्वार्थसिद्धि
प्रभावसे कई बार विदेहक्षेत्रकी यात्रा की थी। श्रवणवेलगोलके एक शिलालेखके आधारसे यह भी कहा जा
सकता है कि जिस जलसे उनके चरण धोये जाते थे उसके स्पर्शसे लोहा भी सोना बन जाता था¹। उनके
चरणस्पर्शसे पवित्र हुई धूलिमें पत्थरको सोना बनानेकी क्षमता थी इस बातका उल्लेख तो कथा लेखकने भी
किया है। एक बार तीर्थयात्रा करते समय उनकी दृष्टि तिमिराच्छन्नहो गयी थी । जिसे उन्होंने शान्त्यष्टकका
निर्माण कर दूर किया था। किन्तु इस घटनाका उनके ऊपर ऐसा प्रभाव पड़ा जिससे उन्होंने तीर्थयात्रासे
लौटकर समाधि ले ली थी।
स्वरचित साहित्य—आचार्य पूज्यपादने अपने जीवन कालमें सर्वार्थसिद्धि सहित जिस साहित्यका
निर्माण किया था उसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—
१. सर्वार्थसिद्धि—इसका विस्तृत परिचय हम पहले दे आये हैं।²
२. समाधितन्त्र—इसमें कुल मिलाकर १०५ श्लोक हैं। विषय अध्यात्म है। ग्रन्थका नाम समाधितन्त्र
है। इसकी सूचना स्वयं आचार्य पूज्यपादने इसके अन्तिम श्लोकमें दी है। एक तो श्रवणवेलगोलके शक सं०
१०८५ के शिलालेख ४० में इसका नाम समाधिशतक दिया है। दूसरे बनारससे मुद्रित होनेवाले प्रथम गुच्छक-
में भी टिप्पण सहित यह छपा है और उसके अन्तमें एक प्रशस्ति श्लोक उद्धृत है जिसमें श्लेषरूपसे इसका नाम
समाधिशतक सूचित किया गया है। मालूम पड़ता है कि इन्हीं कारणोंसे इसका दूसरा नाम समाधिशतक
प्रसिद्ध हुआ है।
यद्यपि यह ग्रन्थ आचार्य पूज्यपादकी स्वतन्त्र कृति है पर अन्तःपरीक्षणसे विदित होता है कि आचार्य
कुन्दकुन्द द्वारा निर्मित आगमको आत्मसात् कर उन्होंने इसकी रचना की है। उदाहरणस्वरूप नियमसारमें
यह गाथा आती है—
णियभावं ण वि मुंचह परभावं णेव गिण्हए केहं ।
जाणदि पस्सदि सव्वं सोहं इदि चिंतए णाणो ॥९७॥
अब इसकी तुलना समाधितन्त्रके इस श्लोकसे कीजिए—
यद्ग्राह्यं न गृह्णाति गृहीतं नापि मुञ्चति ।
जानाति सर्वथा सर्वं तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ॥३०॥
यदि सूक्ष्मतासे अवलोकन कर देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि प्रारम्भ ही इसका मोक्षप्राभृतको
सामने रख कर हुआ है और लगभग मोक्षप्राभृतके समग्र विषयको स्वीकार कर इसकी रचना की गयी है।
मोक्षप्राभृतकी प्रथम गाथा यह है—
णाणमयं अप्पाणं उवलद्ध जेण झडियकम्मेण ।
चेडूऊण य परदव्वं णमो णमो तस्स देवस्स ॥ १ ॥
अब इसके प्रकाशमें समाधितन्त्रका प्रथम मंगलश्लोक देखिए—
येनात्माऽबुध्यतात्मैव परत्वेनैव चापरम् ।
अक्षयानन्तबोधाय तस्मै सिद्धात्मने नमः ॥ १ ॥
अब मोक्षप्राभृतकी एक दूसरी गाथा लीजिए—
जं मया दिस्सदे रूपं तं ण जाणदि सव्वहा ।
जाणगो दिस्सदे ण तं तम्हा जंपेमि केण हुं ॥
इसी विषयको समाधितन्त्र में ठीक इन्हीं शब्दोंमें व्यक्त किया गया है—
यन्मया दृश्यते रूपं तन्न जानाति सर्वथा ।
जानन्न दृश्यते रूपं ततः केन ब्रवीम्यहम् ॥ १८ ॥
१. 'श्रीपूज्यपादमुनिरप्रतिमौषधर्द्धीद्धीयाद्विदेहजिनदर्शनपूतगात्रः । यत्पादधौतजलसंस्पर्शप्रभावान्कालायसं किल
तदा कनकीचकार ॥' शिलालेख १०८ ( शक सं० १३५५ ) । २. देखो प्रस्तावना पृ० २३ आदि ।
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