सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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३६ सर्वार्थसिद्धि
आगे भी यह सादृश्य अन्त तक देखनेको मिलता है । यथा—
सर्वार्थसिद्धि | तत्त्वार्थभाष्य
तत्त्वार्थश्च वक्ष्यमाणो जीवादिः १,२ । | तत्त्वानि जीवादीनि वक्ष्यन्ते । १,२ ।
प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याद्यभिव्यक्तिलक्षणं | तदेवं प्रशमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्ति-
प्रथमम् । १,२ । | लक्षणं तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमिति । १,२ ।
तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । अथ | तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । तत्र
किं तत्त्वमित्यत इदमाह— उत्थानिका १,४ । | किं तत्त्वमिति । अत्रोच्यते— उत्थानिका १,४ ।
तद्यथा—नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो | तद्यथा—नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो
भावजीव इति चतुर्धा जीवशब्दार्थो न्यस्यते १,५ । | भावजीव इति । १,५ ।
प्रस्तावना ३७
आग्रह बँध जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी है, जब कि भाष्यमें साम्प्रदायिक अभिनिवेशका यह तत्त्व
दिखाई नहीं देता ।
प्रकृतमें इस विषयपर विचार करनेके पहले पण्डितजी ऐसा लिखनेका साहस क्यों करते हैं इस बात-
का विचार कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है ।
भगवान् महावीर स्वामीके मुक्तिलाभ करनेपर जो पाँच श्रुतकेवली हुए हैं उनमें अन्तिम भद्रबाहु थे ।
इनके समयमें उत्तर भारतमें बारह वर्षका दुर्भिक्ष पड़ा था। इससे संघसहित भद्रबाहु दक्षिणकी ओर विहार
कर गये थे । इस दुर्भिक्षका उल्लेख श्वेताम्बर परम्परा भी करती है और साधुसंघके समुद्रके समीप जाकर
बिखर जानेकी बात स्वीकार करतो है । उस समय भद्रबाहुके मुख्य शिष्य मौर्य चन्द्रगुप्त भी उनके साथ गये
थे और वहाँ पहुँचते-पहुँचते आयु क्षीण हो जानेसे भद्रबाहुने वहीं समाधि ले ली थी । किन्तु कुछ साधु
श्रावकोंके विशेष अनुरोधवश पटना ही रह गये थे और कालान्तरमें परिस्थितिवश उन्होंने वस्त्र स्वीकार कर
लिया था । जिससे जैन परम्परामें श्वेताम्बर संघकी उत्पत्ति मानी जाती है। जब बारह वर्षका दुर्भिक्ष समाप्त
हुआ तब साधु पुनः पटना लौट आये । श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार 'भद्रबाहु उस समय नेपालकी तराईमें
थे और बारह वर्षकी विशेष तपश्चर्या करनेमें लगे हुए थे । साधुसंघने भद्रबाहुको पटना बुलाया किन्तु वे
नहीं आये जिससे उन्हें संघबाह्य करनेकी धमकी दी गयी और किसी प्रकार उन्हें शिष्य समुदायको पढ़ानेके
लिए राजी कर लिया गया । स्थूलभद्रने अंगज्ञान उन्हींसे प्राप्त किया है।'¹ यदि श्वेताम्बर सम्प्रदायके इस
कथनको सत्य मानकर चलें तब भी श्वेताम्बर सम्प्रदायका अपनी परम्पराको स्थूलभद्रसे स्वीकार करना और
पटना वाचनामें भद्रबाहुका सम्मिलित न होना ये दो बातें ऐसी हैं जो उस समय जैनसंघमें हुए किसी बड़े भारी
विस्फोटका संकेत करती हैं । स्पष्ट है कि उस समयकी वाचनाको अखिल जैनसंघका प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं
था और कालान्तरमें जो अंगसाहित्य संकलित और लिपिबद्ध हुआ है वह सवस्त्रसाधुको जैन परम्परामें प्रतिष्ठित
करनेकी दृष्टिसे ही हुआ है । इस समय जो श्वेताम्बर अंग साहित्य उपलब्ध है वह लगभग भगवान् महावीरके
मोक्ष गमनके एक हजार वर्षके बादका ही संकलन है। सोचनेकी बात है कि जब भद्रबाहुके कालमें ही प्रथम
वाचना हुई थी तब उसे उसी समय पुस्तकारूढ़ करके उसकी रक्षा क्यों नहीं की गयी ? घटनाक्रमसे विदित
होता है कि उस समय श्वेताम्बर संघके भीतर हो तीव्र मतभेद¹ रहा होगा और एक दल यह कहता होगा कि
संघभेदकी स्थितिमें भी अंगसाहित्यमें परिवर्तन करना इष्ट नहीं है । बहुत सम्भव है कि यदि उस समय
श्वेताम्बर अंग साहित्य संकलित होकर पुस्तकारूढ़ किया जाता तो उसका वर्तमान में रूप ही कुछ दूसरा
होता ।
यद्यपि श्वेताम्बर अंगसाहित्यमें ऐसे भी उल्लेख दृष्टिगोचर होते हैं जो नग्नताके समर्थक हैं । किन्तु
इन उल्लेखोंको उसकी प्रामाणिकताकी कसौटी नहीं माना जा सकता । वस्तुतः ये परिस्थितिवश स्वीकार किये
गये हैं । प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी इस स्थितिसे अनभिज्ञ हों ऐसी बात नहीं है । वे जानते हुए भी किसी
कारणवश इस स्थितिको दृष्टिओझल करनेके यत्नमें हैं और यह घोषित करनेका प्रयत्न करते हैं कि श्वेताम्बर
अंगश्रुतमें अचेलकत्व समर्थक वाक्य ही भगवान् महावीरकी परम्पराके पूरे प्रतिनिधित्वके सूचक हैं ।²
यह सत्य है कि श्रमण परम्परामें अचेलकत्व और सचेलकत्व दोनोंको स्थान रहा है और यह भी सत्य
है कि अचेलकत्व उत्सर्ग धर्म और सचेलकत्व अपवाद धर्म माना गया है। हमें दिगम्बर परम्पराके साहित्यमें
भी ऐसे उल्लेख उपलब्ध होते हैं जिनसे इस तथ्यकी पुष्टि होती है । किन्तु वहाँ अचेलकत्वसे तात्पर्य मुनिधर्मसे
१. सचेल दलके भीतर तीव्र मतभेदकी बात प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी भी स्वीकार करते हैं । वे लिखते
हैं-'मथुराके बाद बलभीमें पुनः श्रुतसंस्कार हुआ जिसमें स्थविर या सचेल दलका रहा सहा मतभेद भी नाम
शेष हो गया । देखो तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृ० ३० । २. प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीके लेखों का भाव । देखो
तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृ० २९ ।
३८ सर्वार्थसिद्धि
है और सचेलकत्वसे तात्पर्य गृहस्थधर्म या श्रावकधर्मसे है। श्रावकधर्म मुनिधर्मका अपवादमार्ग है। जहाँ
गृहस्थ सब प्रकारकी हिंसा, असत्य, स्तेय और अब्रह्मका परिहार कर मुनि होता है वहाँ उसे सब प्रकारके
परिग्रहका परिहार करना भी आवश्यक होता है। श्वेताम्बर अंगश्रुत और प्रकीर्णक साहित्यमें वस्त्र और
पात्रके स्वीकार करनेको भी संयमका साधन माना गया है किन्तु संयमका साधन वह हो सकता है जो शरीर
की सुविधाके लिए आवश्यक न होकर मात्र प्राणिपीड़ा परिहारके लिए स्वीकार किया जाता है। किन्तु वस्त्र
और पात्र प्राणिपीड़ा परिहारके लिए स्वीकार किये जाते हैं यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि
इन साधनोंसे उक्त कार्य दृष्टिगोचर नहीं होता। दूसरे इन्हें उक्त कार्यका अनिवार्य अंग मानकर चलने पर
नग्नता और पाणिपात्रत्वका विधान करना नहीं बन सकता है। किन्तु हम देखते हैं कि श्वेताम्बर आगममें
अचेलत्व और पाणिपात्रत्वका भी विधान है अतः वस्त्र और पात्र उन्हींके मतसे संयमके उपकरण नहीं हो
सकते। एक चरचा उत्सर्ग और अपवादलिंगकी की जाती है। यह कहा जाता है कि नग्नता और पाणिपात्रत्व
उत्सर्ग लिंग है किन्तु इसका अपवाद भी होना चाहिए और अपवादरूपमें ही वस्त्र और पात्र स्वीकार किये
जाते हैं। हम मानते हैं कि प्रत्येक उत्सर्गका अपवाद होता है और यह व्यवस्था श्रमण परम्पराने भी स्वीकार
की है। तभी तो वह मुनिधर्म और गृहस्थधर्म इन दो भेदों का निर्देश करती है। मुनिधर्म उत्सर्ग लिंग है और
गृहस्थधर्म उसका अपवाद है। इसलिए वस्त्र और पात्रका स्वीकार मुनि आचारका अंग नहीं बन सकता है।
भले ही दुर्भिक्षके समय ऐसी परिस्थिति रही है जिससे उस समय उत्तर भारतमें जो साधु रह गये थे उन्हें
वस्त्र और पात्र स्वीकार करने पड़े थे। इतना ही नहीं उन्हें कारणवश दण्ड भी स्वीकार करना पड़ा था।
किन्तु इन्हें साधुका चिह्न मान लेना मुनि मार्गके विरुद्ध है। यह हम पहले ही बतला आये हैं कि जो कमजोरी-
वश वस्त्रादिकको स्वीकार करते हैं वे श्रावक होते हैं। उनके परिणाम मुनिधर्मके अनुकूल नहीं हो सकते।
इस स्थितिके होते हुए भी आग्रहवश श्वेताम्बर अंगश्रुतमें वस्त्र, पात्रादिको साधुके अंग मानकर उनके
जिनकल्प और स्थविरकल्प ये दो भेद कर दिये गये हैं। इस कारण प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीको भी उसकी
पुष्टिके लिए बाध्य होना पड़ा है। अन्यथा उन्हें जिन तथ्योंके निर्देशमें साम्प्रदायिकताकी गन्ध आती है उन्हें वे
न केवल तात्त्विक दृष्टिसे स्वीकार करते अपितु वे परिस्थितिवश श्रमण परम्परामें हुई एक बहुत बड़ी गलतीका
परिहारकर आगेका पथ प्रशस्त करनेमें सहायक होते।
यह हम पहले संकेत कर आये हैं कि पण्डितजीने सर्वार्थसिद्धिमेंसे ऐसी चार बातें चुनी हैं जिनका
निर्देश वे साम्प्रदायिक कोटिका मानते हैं। सर्वार्थसिद्धिमें निर्णायक रूपसे काल तत्त्वका विधान किया गया है
जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें मतविशेषके रूपमें उसका उल्लेख है। सर्वार्थसिद्धि केवलिकवलाहार और स्त्री मुक्तिका
निषेधकर नग्न्यको स्वीकार करती है जब कि तत्त्वार्थभाष्य परीषहोंके प्रसंगसे नग्न्यको स्वीकार कर वस्त्र,
पात्र और स्त्री तीर्थंकरका भी विधान करता है। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी यह स्थिति है जिस कारण
पण्डितजीने सर्वार्थसिद्धिके विषयमें अपना उक्त प्रकारका मत बनाया है और इस आधारसे तत्त्वार्थभाष्यको
सर्वार्थसिद्धिसे प्राचीन सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। इस विषयमें पण्डितजीका अभिमत है कि 'साम्प्रदायिक
अभिनिवेश बढ़ जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी थी जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें ऐसे अभिनिवेशका सर्वथा
अभाव है।'
यह तो हम पहले ही बतला आये हैं कि जैन परम्परामें साधुओंने वस्त्र और पात्र किस परिस्थितिमें
स्वीकार किये थे और यह भी उल्लेख कर आये हैं कि श्वेताम्बर अंगश्रुतकी रचना पाँचवीं शताब्दीके बाद
हुई है। अतएव यह भी सुनिश्चित है कि तत्त्वार्थभाष्य उसके बाद ही किसी समय लिखा गया होगा, क्योंकि
पण्डितजीके ही शब्दोंमें 'उन्होंने (तत्त्वार्थभाष्यकारने) तत्त्वार्थकी रचनाके आधाररूप जिस अंग अनंगश्रुतका
अवलम्बन किया था वह पूर्णतया स्थविरपक्षको मान्य था।' इस अभिप्रायसे उक्त कथनकी पुष्टि होती है।
साधारणतः यह मतभेद श्वेताम्बरोय अंगश्रुतके पुस्तकारूढ़ हो जानेके बाद ही उग्ररूपमें प्रकट होने
लगा था; क्योंकि जैनपरम्पराके कहे जानेवाले अंगश्रुत जैसे महत्त्वपूर्ण साहित्यमें सवस्त्र मुक्ति और स्त्रीमुक्ति
जैसे विषयका समावेश होना पुरानी परम्पराको ही नष्ट-भ्रष्ट करनेवाली घटना थी। इस कालमें एक ओर
प्रस्तावना ३९
जहाँ साम्प्रदायिक अभिनिवेशमें आकर उक्त बातोंका विधान किया जाने लगा था वहाँ दूसरी ओर तात्त्विक-
दृष्टिसे उसका निषेध करना और दर्शनमोहनीयके बन्धका कारण बतलाना अनिवार्य हो गया था। सर्वार्थसिद्धि-
कारने यह कार्य किया है और दृढ़ताके साथ किया है। वस्तुतः उस कालमें तात्त्विक पक्षकी रक्षाका भार
उनपर था और उन्होंने उसका सुन्दरतापूर्वक निर्वाह भी किया है।
ऐसी अवस्थामें हमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यका विचार अन्य प्रमाणोंके आधारसे
करना चाहिए। शैलीभेद, अर्थविकास और साम्प्रदायिकताके आधारसे इसका निर्णय करना गौण है। अतः
आइए, अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें इस तत्त्वका निर्णय किया जाय।
इस समय तत्त्वार्थभाष्यपर मुख्यतया प्रथम दो टीकाएँ उपलब्ध होती हैं-प्रथम हरिभद्रकी टीका¹
और दूसरी सिद्धसेनगणिकी टीका। आचार्य हरिभद्र और सिद्धसेनगणि समकालीन या कुछ आगे पीछेके होते
हुए भी भट्ट अकलंक देवके बादमें हुए हैं। इतना ही नहीं सिद्धसेनगणिने तो भट्ट अकलंक देवकी कृतियोंका
भरपूर उपयोग भी किया है यह उनकी टीकाके देखनेसे भी विदित होता है। किन्तु प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी
इस मतसे सहमत होते हुए भी दूर चले जाते हैं। वे तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० ९६ में लिखते हैं—
'किसी-किसी स्थलपर एक ही सूत्रके भाष्यका विवरण करते हुए वे पाँच-छह मतान्तर निर्दिष्ट करते
हैं, इससे ऐसा अनुमान करनेका कारण मिलता है कि जब सिद्धसेनने वृत्ति रची तब उनके सामने कमसे कम
तत्त्वार्थ सूत्रपर रची हुई पाँच टीकाएँ होनी चाहिए; जो सर्वार्थसिद्धि आदि प्रसिद्ध दिगम्बरीय तीन व्याख्याओंसे
पृथक् होंगी ऐसा मालूम पड़ता है; क्योंकि राजवार्तिक और श्लोकवार्तिककी रचनाके पहले ही सिद्धसेनीय
वृत्तिका रचा जाना बहुत सम्भव है; कदाचित् उनसे पहले यह रची गयी हों तो भी इसकी रचनाके बीचमें
इतना तो कमसे कम अन्तर है ही कि सिद्धसेनको राजवार्तिक और श्लोकवार्तिकका परिचय मिलनेका
प्रसंग ही न आया।'
यहाँ हमें सर्वप्रथम पण्डितजीके इस वक्तव्यकी आलोचना करनी है और इसके वाद देखना है कि
क्या सिद्धसेनगणिकी टीका राजवार्तिकका आलोडन किये बिना लिखी गयी थी।
पण्डितजीने सर्वप्रथम सिद्धसेनगणिकी अध्याय पाँच सूत्र तीनकी टीकाके आधारसे तत्त्वार्थसूत्र पर
लिखी गयी पाँच-छह स्वतन्त्र टीकाओंका अनुमान किया है. इस आधारसे हम इसे ठीक मान लेते हैं। तथापि
इससे यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है कि सिद्धसेनगणिने तत्त्वार्थवार्तिकका आलोडन किये बिना ही
अपनी टीका लिखी थी। इससे तो केवल इतना ही पता लगता हैं कि उनके सामने और भी कई टीकाएँ थीं
जो 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' सूत्रके कई पाठ प्रस्तुत करती थीं। यह स्वतन्त्र विषय है और इसपर स्वतन्त्र-
रूपसे ही विचार होना चाहिए कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी टीका लिखते समय तत्त्वार्थ-
वार्तिक था या नहीं और तत्काल हमें प्रसंगोचित इसी बातका विचार करना है।
इसमें सन्देह नहीं कि सिद्धसेनगणि बहुश्रुत विद्वान् थे। उन्होंने अपनी टीकामें तत्त्वार्थसूत्रके अनेक
पाठान्तरों, मत-मतान्तरों, ग्रन्थों, आचार्यों और प्रमाणोंका उल्लेख किया है, जिनसे अनेक ऐतिहासिक तथ्यों-
पर प्रकाश पड़ता है। इस प्रसंगसे वे भट्ट अकलंक देवके सिद्धिविनिश्चय और तत्त्वार्थवार्तिकको भी नहीं भूले
हैं। अध्याय १ सूत्र ३ की टीकामें सिद्धिविनिश्चयका उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं—
'एवं कार्यकारणसंबन्धः समवायपरिणामनिमित्तनिर्वर्तकादिरूपः सिद्धिविनिश्चयसृष्टिपरीक्षातो
योजनीयो विशेषाथिना दूषणद्वारेणेति ।'
भट्ट अकलंक देवके उपलब्ध साहित्यमें सिद्धिविनिश्चय अन्यतम दर्शनप्रभावक ग्रन्थ है और उसमें सृष्टि-
परीक्षा प्रकरण भी उपलब्ध होता है। इससे निश्चित होता है कि यह उल्लेख इसी सिद्धिविनिश्चयका है।
हमने तत्त्वार्थवार्तिकके साथ भी सिद्धसेनगणिकी उक्त टीकाका तुलनात्मक अध्ययन किया है। इससे
१. हरिभद्रकी टीका तीन लेखकोंने पूरी की है ऐसा प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी तत्त्वार्थसूत्रकी
भूमिका पृ० ९५ में सूचित करते हैं और टीकाके देखनेसे यह मत समीचीन प्रतीत होता है।
४० सर्वार्थसिद्धि
हम इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी प्रसिद्ध टीका लिखते समय
तत्त्वार्थवार्तिक अवश्य था । तुलनाके लिए देखिए—
'अर्थवशाद् विभक्तिपरिणामो भवति । तद्यथा— उच्चानि देवदत्तस्य गृहाण्यामन्त्रयस्वैनम् । देवदत्त-
मिति गम्यते ।
—तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ७ ।
'अर्थवशाच्च विभक्तिपरिणामः उच्चैर्गृहाणि देवदत्तस्यामन्त्रयस्वैनमिति ।'
—सि० टी० उत्थानिका श्लोक ६ की टीका ।
इसी प्रकार समानता सूचक और भी वाक्य उपलब्ध होते हैं—जिनका निर्देश पं० परमानन्दजी
शास्त्रीने अनेकान्त वर्ष ३ किरण ११ में 'सिद्धसेनके सामने सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिक' लेखमें किया है ।
इन समानता सूचक वाक्योंके अतिरिक्त सिद्धसेनगणिकी टीकामें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जिनके
आधारसे उसकी स्थिति तत्त्वार्थवार्तिकके बाद स्थिर होनेमें विशेष सहायता मिलती है । यथा—तत्त्वार्थ-
वार्तिकमें नरकायुके कारणोंकी व्याख्या करते हुए यह वाक्य आता है—
'बह्वारम्भाः परिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः'
इसी बातको सिद्धसेनगणि मतभेदके साथ इन शब्दोंमें व्यक्त करते हैं—
'अपरे ब्रुवते—बह्वारम्भाः परिग्रहा यस्यासौ बह्वारम्भपरिग्रहः ।
इस पदकी व्याख्या सर्वार्थसिद्धिमें भी उपलब्ध होती है । इसलिए इसपरसे यह कहा जा सकता है
कि सिद्धसेनगणिने यह मतभेद सर्वार्थसिद्धिको लक्ष्यमें रखकर व्यक्त किया होगा । किन्तु सर्वार्थसिद्धिमें उक्त
पदके किये गये विग्रहसे पूर्वोक्त विग्रहमें मौलिक अन्तर है। सर्वार्थसिद्धिमें यह विग्रह इस प्रकार उपलब्ध
होता है—
'बहव आरम्भपरिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः ।
किन्तु सिद्धसेनगणिकी टीका इस विषयमें तत्त्वार्थवार्तिकका अनुसरण करती है सर्वार्थसिद्धिका
नहीं । अतएव इसपरसे यह माननेके लिए बाध्य होना पड़ता है कि सिद्धसेनगणिको यहाँपर 'अपरे' पदसे
तत्त्वार्थवार्तिककार अभिप्रेत रहे हैं ।
सिद्धसेनगणिकी टीकामें ऐसे और भी पाठ² या मतभेदके उल्लेख उपलब्ध होते हैं जो तत्त्वार्थवार्तिक-
की ओर संकेत करते हैं ।
इससे इस बातके स्पष्ट होते हुए भी कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी टीका लिखते
समय तत्त्वार्थवार्तिक उपस्थित था, यहाँ तत्त्वार्थभाष्यकी उत्तरावधि निश्चित करनी है और इसके लिए हमें
तत्त्वार्थभाष्यके साथ तत्त्वार्थवार्तिकका तुलनात्मक विचार करना है ।
प्रायः यह तो सभी मनीषियोंने स्वीकार किया है कि तत्त्वार्थवार्तिक सर्वार्थसिद्धिको पचा कर लिखा
गया है और इस बातके भी स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिकके पहलेकी रचना होनी
चाहिए । इसके लिए हमें अन्यत्र प्रमाण खोजनेकी आवश्यकता नहीं है किन्तु स्वयं तत्त्वार्थवार्तिक इसका साक्षी
है । सर्वप्रथम तत्त्वार्थवार्तिककी उत्थानिकाको ही लीजिए । तत्त्वार्थसूत्रकी रचना किस निमित्तसे हुई है इस
विषयमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें व्याख्याभेद है । सर्वार्थसिद्धिमें स्वीकार किया गया है कि कोई भव्य
मुनियोंकी सभामें बैठे हुए आचार्यवर्यसे प्रश्न³ करता है कि भगवन् ! आत्माका हित क्या है ? आचार्यवर्य
उत्तर देते हैं कि 'मोक्ष' । वह पुनः प्रश्न करता है कि इसकी प्राप्तिका उपाय क्या है और इसीके उत्तर स्वरूप
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें यह उत्थानिका दूसरे प्रकारसे निर्दिष्ट की गयी है ।¹ वहीं
१. इसके लिए प्रथम सूत्रकी उत्थानिका व अध्याय ६ सूत्र १६, १७, १८ आदि देखिए । २. देखो सर्वार्थ-
सिद्धि पृ० १ । ३. देखो तत्त्वार्थभाष्य उत्थानिका श्लोक ३१ ।
प्रस्तावना ४१
बतलाया है कि इस श्लोकमें मोक्षमार्गके बिना हितका उपदेश होना दुर्लभ है, इसलिए मोक्षमार्गका उपदेश
करते हैं। अब इन दोनों उत्थानिकाओंके प्रकाशमें तत्त्वार्थवार्तिक की उत्थानिकाको पढ़िए। देखनेसे विदित
होगा कि इसमें क्रमसे सर्वार्थसिद्धि¹ और तत्त्वार्थभाष्य² इन दोनोंकी उत्थानिकाओंका स्पष्टतः निर्देश किया
है। यही नहीं इसमें तत्त्वार्थभाष्यको उत्थानिकाका निर्देश 'अपरे' पदसे प्रारम्भ किया है। स्पष्ट है कि तत्त्वार्थ-
वार्तिककार सर्वार्थसिद्धिकी उत्थानिकाको दिगम्बर परम्परासम्मत मानते रहे और तत्त्वार्थभाष्यकी उत्थानिका-
को अन्यकी । यह उत्थानिकाकी बात हुई।
आगे सूत्रपाठको देखिए—तत्त्वार्थभाष्यकारने तीसरे अध्यायके प्रथम सूत्रमें 'पृथुतरा:' पाठ अधिक
स्वीकार किया है। श्वेताम्बर आगम साहित्यमें इस अर्थको व्यक्त करनेके लिए 'छत्ताइछत्ता' पाठ उपलब्ध
होता है। तत्त्वार्थभाष्यकारने भी इस पदकी व्याख्या करते हुए 'छत्रातिच्छत्रसंस्थिता:' पद द्वारा उसका
स्पष्टीकरण किया है। यह पाठ सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें नहीं है। तत्त्वार्थवार्तिककारकी न केवल इसपर
दृष्टि पड़ती है अपितु इसे वे आड़े हाथों लेते हैं और यह बतलानेका प्रयत्न करते हैं कि सूत्रमें 'पृथुतरा:'
पाठ असङ्गत है ।
साधारणतः सर्वार्थसिद्धि मान्य सूत्रपाठसे तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें काफी परिवर्तन हुआ है पर
तत्त्वार्थवार्तिककार उन सब सूत्रपाठोंकी चर्चा नहीं करते। वे प्रायः तत्त्वार्थभाष्यके ऐसे ही सूत्रपाठका
विरोध व्यक्त करते हैं जिसे स्वीकार करने पर स्पष्टतः आगम विरोध दिखाई देता है। चौथे अध्यायमें 'शेषाः
स्पर्श-' इत्यादि सूत्र आता है। तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार इस सूत्रके अन्तमें 'द्वयोर्द्वयोः' इतना पाठ अधिक
उपलब्ध होता है। भट्ट अकलंकदेवकी सूक्ष्मदृष्टि इस पाठ पर जाती है और वे आर्षसे विरोध बतला कर इस
अधिक पाठको स्वीकार करना मान्य नहीं करते। इसी प्रकार पाँचवें अध्यायमें 'बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च'
सूत्र आता है। किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें इसका परिवर्तित रूप इस प्रकार उपलब्ध होता है—'बन्धे समाधिकौ
पारिणामिकौ ।'
यह स्पष्ट है कि आगममें बन्धकी जो व्यवस्था निर्दिष्ट की गयी है उसके साथ इस सूत्रमें आये हुए 'सम'
शब्दका मेल नहीं बैठता । तत्त्वार्थवार्तिककारकी दृष्टिसे यह बात भी छिपी नहीं रहती, इसलिए आगमसे
विरोध होनेके कारण वे स्पष्ट शब्दोंमें इसकी अप्रामाणिकता घोषित करते हैं। यही दशा तत्त्वार्थभाष्यमें आये
हुए पाँचवें अध्यायके अन्तिम तीन सूत्रोंकी होती है। वे सूत्र हैं—
'अनादिरादिमांश्च ॥४२॥ रूपिष्वादिमान् ॥४३॥ योगोपयोगौ जीवेषु ॥४४॥'
इन सूत्रोंमें परिणामके अनादि और सादि ये दो भेद करके पुद्गल और जीवके परिणामको सादि कहा
है। साथ ही ४२वें सूत्रके भाष्यमें धर्म, अधर्म, आकाश और जीवके परिणामको अनादि कहा है। इस पर
तत्त्वार्थवार्तिकमें आपत्ति करते हुए कहा है—अत्रान्ये धर्माधर्मकालाकाशेषु अनादिः परिणामः आदिमान् जीव-
पुद्गलेषु वदन्ति तदयुक्तम् ।'
अर्थात् अन्य लोग धर्म, अधर्म, काल और आकाशमें परिणामको अनादि कहते हैं तथा जीव और
पुद्गलोंमें उसे सादि कहते हैं किन्तु उनका ऐसा कहना अयुक्त है।
इसी प्रकार अध्याय १ सूत्र १५ व २१; अध्याय २ सूत्र ७, २० व ३३; अध्याय ४ सूत्र ८; अध्याय
५ सूत्र २-३, अध्याय ६ सूत्र १८ और अध्याय ८ सू० ६ के तत्त्वार्थवार्तिकके देखनेसे भी विदित होता है कि
अकलंकदेवके सामने तत्त्वार्थभाष्य अवश्य था ।
यद्यपि इस विषयमें कुछ मतभेद है। डॉ० जगदीशचन्द्रजीने अनेकान्त वर्ष ३ किरण ४ में इस आशय-
का एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने बतलाया है कि अकलंकदेवके सामने उमास्वाति का तत्त्वार्थभाष्य उप-
१. तत्त्वार्थवार्तिक उत्थानिका पृ० १ । २. तत्त्वार्थवार्तिक उत्थानिका पृ० ३ ।
६
४२ सर्वार्थसिद्धि
स्थित था। किन्तु उनके इस मतको श्री पं० जुगलकिशोरजी मुख्तार स्वीकार नहीं करते।१ श्री पं० कैलाश-
चन्द्रजी शास्त्रीका भी यही मत है।२
हमारा विचार है कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थभाष्यमें जो सूत्रपाठ स्वीकार किया है वह तत्त्वार्थ-
भाष्य लिखनेके पूर्व अवस्थित था इस विषयका पोषक कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। आचार्य पूज्यपादने और
सिद्धसेनगणिने अपनी टीकाओंमें जगह-जगह सूत्रपाठ सम्बन्धी जिस मतभेदकी३ चर्चा की है उसका सम्बन्ध
भी तत्त्वार्थभाष्य मान्य सूत्रपाठसे नहीं है। ऐसी अवस्थामें यह मानना कि भट्ट अकलंकदेवके सामने वाचक
उमास्वातिका तत्त्वार्थभाष्य नहीं था, हमें शिथिल प्रतीत होता है। तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयीं दिगम्बर और
श्वेताम्बर समस्त टीकाओंके अवलोकनसे केवल हम इतना निश्चय कर सकते हैं कि जिस महान् आचार्यने
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र पर कोई भाष्य या वृत्ति ग्रन्थ नहीं लिखा था। तत्त्वार्थसूत्रमें
सूत्र विषयक जो विविध मतभेद दिखाई देते हैं वे इसके प्रमाण हैं। यह बात स्पष्ट है कि आचार्य पूज्यपादके
काल तक वे मतभेद बहुत ही स्वल्पमात्रामें रहे हैं। किन्तु मूल सूत्रपाठ सर्वार्थसिद्धि द्वारा दिगम्बर परम्परा मान्य
हो जाने से दूसरी ओर इसकी बलवती प्रतिक्रिया हुई और मूल सूत्रपाठको तिलांजलि दे दी गयी। परिणाम
स्वरूप सूत्रपाठके स्वरूपके विषयमें न केवल मतभेद बढ़ने लगा अपि तु स्वतन्त्र सूत्रपाठके स्थिर करनेका भी
भाव जागृत हुआ। इन सारे घटना क्रम व तथ्योंके आधारसे हमारा तो यही विचार पुष्ट होता है कि स्वयं
वाचक उमास्वातिने अपने तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठको अन्तिम रूप दिया होगा और आगे यह पाठभेद सम्बन्धी
मतभेद उग्र रूप धारण न करे इसलिए उन्होंने ही उसपर अपना प्रसिद्ध तत्त्वार्थाधिगमभाष्य लिखा होगा।
यह ठीक है कि वाचक उमास्वातिके पहले अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने मूल तत्त्वार्थसूत्रमें काट-छांट चालू कर दी
थी४ और वाचक उमास्वातिको उसका वारसा मिला है। मूल यदि पं० जुगुलकिशोरजी मुख्तार इसी अभिप्रायको
ध्यानमें रखकर इस मतका प्रस्थापन करते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ वाचक उमास्वातिके भी पूर्व उप-
स्थित था तो यह कथन कुछ अंशमें सम्भव हो सकता है पर इससे तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थभाष्य
उपस्थित था इस मतपर रंचमात्र भी आंच नहीं आती, क्योंकि तत्त्वार्थवार्तिकमें केवल तत्त्वार्थभाष्य मान्य
सूत्रविषयक मतभेदोंका ही उल्लेख नहीं है अपितु कुछ ऐसे मतोंका भी उल्लेख है जिनका सीधा सम्बन्ध
तत्त्वार्थभाष्यसे है।
इस प्रकार इन प्रमाणोंके प्रकाशमें यह मान लेनेपर भी कि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिकके पहले
कभी लिखा गया है, फिर भी वह कब लिखा गया है यह विचारणीय हो जाता है। इसका हमें कई दृष्टियोंसे
पर्यालोचन करना है। पर्यालोचनके विषय ये हैं—१. अन्य टीकाओंके उल्लेख, २. सूत्रोल्लेख, और ३. अर्थ
विकास।
१. अन्य टीकाओंके उल्लेख—अभी तक प्रचलित परम्पराके अनुसार साधारणतः यह माना जाता है
कि दिगम्बर परम्परामान्य सूत्रपाठकी प्रथम टीका सर्वार्थसिद्धि है और श्वेताम्बर परम्परामान्य तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रथम टीका तत्त्वार्थभाष्य है। तत्त्वार्थभाष्यके विषयमें तो कुछ विद्वान् यह भी मानते हैं कि वह तत्त्वार्थसूत्र-
कारकी ही मूल कृति है५ और इस आधारसे वे यह निष्कर्ष फलित करते हैं कि आचार्य पूज्यपादने मूल
सूत्रपाठमें सुधार करके सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठकी रचना की है जो आज दिगम्बर परम्परामें प्रचलित है।
किन्तु इन टीकाग्रन्थों और अन्य प्रमाणोंसे जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे यह विषय बहुत कुछ विचारणीय
हो जाता है। पहले हम सर्वार्थसिद्धिमें दो पाठभेदोंका उल्लेख कर आये हैं। उनमेंसे दूसरा पाठभेद यदि सूत्र-
पोथीके आधारसे ही मान लिया जाये तो भी प्रथम पाठभेदको देखते हुए यह अनुमान करना सहज हो जाता
१. देखो अनेकान्त वर्ष ३ किरण ४, ११ व १२ । २. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना
पृ० ९ आदि । ३. देखो सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १६ व अ० २ सू० ५३ तथा सिद्धसेनकी टीका अ० १
सू० व अ० ५ सू० ३ आदि । ४. देखो चालू प्रस्तावनाका ‘सूत्रपाठोंमें मतभेद’ प्रकरण । ५. देखो
पं० सुखलालजी की तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना।
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प्रस्तावना ४३
है कि सर्वार्थसिद्धिकारके सामने कोई छोटा-मोटा टीका ग्रन्थ अवश्य था। अन्यथा वे पाठविषयक मतभेदको
स्पष्ट करते हुए यह न कहते- 'त एवं वर्णयन्ति' इत्यादि ।
तत्त्वार्थवार्तिकमें अध्याय पाँच सूत्र चारका विवरण लिखते समय यह प्रश्न उठाया गया है कि 'वृत्तिमें
पाँच¹ ही द्रव्य कहे हैं, इस लिए छह द्रव्योंका उपदेश घटित नहीं होता।' आगे इसका समाधान करते हुए
तत्त्वार्थवार्तिककार कहते हैं कि 'वृत्तिकारका आप अभिप्राय नहीं समझे। आगे काल द्रव्यका निर्देश किया
जानेवाला है उसकी अपेक्षा न कर यहाँ वृत्तिकारने पाँच द्रव्य कहे हैं।'
इसी प्रकार एक प्रश्न इस अध्यायके ३७वें सूत्रका विवरण लिखते समय भी उठाया गया है। वहाँ
कहा गया है कि 'गुण यह संज्ञा अन्य सम्प्रदायके ग्रन्थोंमें उल्लिखित है आर्हंत मतमें तो केवल द्रव्य और
पर्यायका ही निर्देश किया है। अतः तत्त्व दो ही सिद्ध होते हैं और इनके आश्रयसे द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक
ये नय भी दो ही बनते हैं। यदि गुण नामका कोई पदार्थ है तो उसको विषय करनेवाला एक तीसरा नय
अवश्य होना चाहिए। यतः तीसरा नय नहीं है अतः गुण नामका कोई तीसरा पदार्थ सिद्ध नहीं होता है और
इसीलिए 'गुणपर्ययवद्द्रव्यम्' यह सूत्र भी घटित नहीं होता।' आगे इसका समाधान करते हुए कहा गया
है कि 'यह बात नहीं है, क्योंकि अर्हत्प्रवचनहृदय आदि ग्रन्थोंमें गुणका उपदेश दिया गया है। और इसके आगे
'उक्तं हि अर्हत्प्रवचने द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' यह वाक्य आया है।
तत्त्वार्थवार्तिकके ये दो उल्लेख हैं जिनसे अन्य वृत्ति तथा ग्रन्थान्तरकी सूचना मिलती है। प्रथम उल्लेखसे
हम जानते हैं कि तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी कोई एक वृत्ति थी जिसमें 'नित्यावस्थि-
तान्यरूपणि' सूत्रका विवरण लिखते समय पाँच द्रव्योंका विधान किया गया था और जिसका सामंजस्य
तत्त्वार्थवार्तिककारने यहाँ बिठलाया है। तथा दूसरे उल्लेखसे इस बातका अनुमान किया जा सकता है कि
तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने एक दूसरा अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन नामका स्वतन्त्र ग्रन्थ अवश्य था जो
न केवल सूत्रशैलीमें लिखा गया था अपितु उसमें 'द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' यह सूत्र भी मौजूद था और
सम्भवतः उसे तत्त्वार्थवार्तिककार अति प्राचीन भी मानते रहे तभी तो प्रकृतमें गुणके समर्थनमें उन्होंने उसका
उल्लेख किया है।
यह अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन क्या है यह प्रश्न बहुत गम्भीर है। इसका उल्लेख तत्त्वार्थ-
भाष्यकार वाचक उमास्वातिने भी किया है। वे लिखते हैं कि मैं ²'अर्हद्वचनके एकदेशके संग्रहरूप और बहुत
अर्थवाले तत्त्वार्थाधिगम नामके लघुग्रन्थका शिष्योंकी हितबुद्धिसे कथन करता हूँ। इसी प्रकार अमृतचन्द्र
आचार्यने भी समयप्राभृतकी टीकामें³ समयप्राभृतको अर्हत्प्रवचनका अवयव कहा है। इन दोनों स्थलोंपर
साधारणतः अर्हद्वचन या अर्हत्प्रवचनसे द्वादशांगका बोध होता है। किन्तु जब भट्ट अकलंक देव अर्हत्प्रवचन-
हृदय या अर्हत्प्रवचन नामके स्वतन्त्र ग्रन्थका उल्लेख करते हैं। इतना ही नहीं वे उसके एक वचनको उद्धृत
भी करते हैं जो तत्त्वार्थसूत्रके सूत्रसे बिलकुल मिलता जुलता है तब यह प्रश्न अवश्य होता है कि क्या ऐसा
कोई महान् ग्रंथ रहा है जिसमें समग्र जैनसिद्धान्तका रहस्य अन्तर्निहित था और जिसका उल्लेख करना सबके
लिए अनिवार्य था। जो कुछ भी हो एक बात स्पष्ट है कि तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थकी उपलब्ध
टीकाओंके अतिरिक्त कोई अन्य वृत्ति अवश्य रही है जो सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यसे भिन्न थी और बहुत
सम्भव है कि उसी वृत्तिका उल्लेख उन्होंने तत्त्वार्थवार्तिकमें किया है।
इसी प्रसंगसे हमने सिद्धसेनगणिकी टीकाका भी आलोडन किया है। इस सम्बन्धमें हम पहले ही
कह आये हैं कि सिद्धसेन गणिकी टीका अनेक सूत्र विषयक मत मतान्तरों और उल्लेखोंको लिये हुए है।
उसका बारीकीसे पर्यालोचन करनेपर यह भी विदित होता है कि उनके सामने न केवल सर्वार्थसिद्धि,
१. वृत्तौ पञ्चत्ववचनात् षड्द्रव्योपदेशव्याघात इति चेत्, न, अभिप्रायपरिज्ञानात् । २. 'तत्त्वार्थाधिगमाख्यं
बह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् । वक्ष्यामि शिष्यहितमिममहंद्रचनैकदेशस्य ।।२२.।' ३. 'प्राभृताह्वयस्यार्हत्प्रवचना-
वयवस्य' गा. १. टीका।
४४ सर्वार्थसिद्धि
तत्त्वार्थभाष्य और राजवार्तिक थे अपितु तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी नयी पुरानी और भी अनेक टीकाएँ उनके
सामने रही हैं। यह अनुमान प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीका भी है जिसका निर्देश हम पहले कर आये हैं।
सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवार्तिक और सिद्धसेनगणिकी टीकाके ये वे उल्लेख हैं जिनसे हमें तत्त्वार्थसूत्र
विषयक अन्य अनेक छोटी-बड़ी टीकाओं के अस्तित्वका आभास मिलता है। तत्काल विचारणीय यह है कि
ये सब टीका ग्रन्थ किस आधारसे लिखे गये होंगे। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकमें जिनका उल्लेख है वे
तो स्वतन्त्र होंगे यह स्पष्ट ही है। मात्र विचार उनका करना है जिनका उल्लेख सिद्धसेनगणिने किया है। यह
तो हम स्पष्ट देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके कारण भाष्यानुसारी सूत्रपाठका स्वरूप और अर्थ एक तरहसे सुनि-
श्चित है। जो लिपिकारोंकी असावधानी से थोड़े बहुत दोष उत्पन्न होते हैं वे तत्त्वार्थभाष्यमें भी देखे जाते हैं १।
किन्तु इन दोषोंके कारण तत्त्वार्थभाष्य सम्मत सूत्रपाठमें तत्त्वार्थभाष्यकी उपस्थितिमें पाठान्तर या अर्थान्तरकी
कल्पना करना सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्थामें इन टीका ग्रन्थोंको भी सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिकमें उल्लि-
खित टीका ग्रन्थोंके समान स्वतन्त्र ही मानना पड़ता है। सिद्धसेनगणिने मतभेदोंको दरसाते हुए अन्य मतोंका
जिस रूपमें उल्लेख किया है उससे भी तथ्यकी पुष्टि होती है। ये सब टीकाग्रन्थ कब और किन आचार्योंकी
कृति हैं यह तो हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते हैं। बहुत सम्भव है कि वे सब या उनमेंसे कुछ तत्त्वार्थ-
भाष्यके भी पहले लिखे गये हों और उनके लेखक श्वेताम्बर आचार्य रहे हों। यदि यह अनुमान सही हैं,
जिसके कि सही होनेकी अधिक सम्भावना है, तो यही कहना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्य उस कालकी रचना
है जबकि मूल तत्त्वार्थसूत्रपर अनेक टीका टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं और जिनमेंसे एक सर्वार्थ-
सिद्धि भी है।
२. सूत्रोल्लेख—साधारणतः किसी विषयको स्पष्ट करने, उसकी सूचना देने या अगले सूत्रकी
उत्थानिका बाँधनेके लिए टीकाकार आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते हैं। यह परिपाटी सर्वार्थसिद्धि
और तत्त्वार्थभाष्यमें भी विस्तारपूर्वक अपनायी गयी है। किन्तु आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते समय
इन टीका ग्रन्थोंमें उन्हीं सूत्रपाठोंका उल्लेख किया जाता है जो उन्हें सम्मत होते हैं। उदाहरणार्थ-सर्वार्थ-
सिद्धिकारने अध्याय एकके इक्कीस नम्बरका सूत्र 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इस रूपमें स्वीकार किया
हैं, अतएव वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिका लिखते समय इस सूत्रका इसी रूपमें उल्लेख करते हैं।
इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्यकारने इस सूत्रको 'भवप्रत्ययोऽवधिर्नारकडेवानाम्' इस रूपमें स्वीकार किया है इस-
लिए वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिकामें इसे इसी रूपमें उद्धृत करते हैं। साधारणतः ये टीकाकार
कहीं पूरे सूत्रको उद्धृत करते हैं और कहीं उसके एक अंशको। पर जितने अंशको उद्धृत करते हैं वह
अपनेमें पूरा होता है। ऐसा व्यत्यय कहीं भी नहीं दिखाई देता कि किसी एक अंशको उद्धृत करते हुए भी
वे उसमेंसे समसित प्रारम्भ के किसी पदको छोड़ देते हों।
ऐसी अवस्थामें हम तो यही अनुमान करते थे कि इन दोनों टीका ग्रन्थोंमें ऐसा उद्धरण शायद ही
मिलेगा जिस से इनकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न किया जा सके। इस दृष्टिसे हमने सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थ-
भाष्यका बारीकीसे पर्यालोचन किया है। किन्तु हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्यमें एक
स्थलपर ऐसा स्खलन अवश्य हुआ है, जो इसकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न करता है। यह स्खलन अध्याय १
सूत्र २० का भाष्य लिखते समय हुआ है।
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयका प्रतिपादन करनेवाला सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्र इस प्रकार है-
'मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।'
यही सूत्र तत्त्वार्थभाष्यमें इस रूपमें उपलब्ध होता है-
'मतिश्रुतयोर्निबन्धः सर्वद्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।'
१. देखो अध्याय ६ सूत्र ३ व ४ का तत्त्वार्थभाष्य ।
तत्त्वार्थभाष्यमें सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठकी अपेक्षा 'द्रव्य' पदके विशेषणरूपसे 'सर्व' पद अधिक
स्वीकार किया गया है। किन्तु जब वे ही तत्त्वार्थभाष्यकार इस सूत्रके उत्तरार्धको अध्याय १ सूत्र २० के
भाष्यमें उद्धृत करते हैं तब उसका रूप सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ ले लेता है। यथा -
'अत्राह - मतिश्रुतयोस्तुल्यविषयत्वं वक्ष्यति - 'द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु' इति'
कदाचित् कहा जाय कि इस उल्लेखमेंसे लिपिकारकी असावधानीवश 'सर्व' पद छूट गया होगा किन्तु
यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि अपनी टीकामें सिद्धसेनगणि और हरिभद्रने भी तत्त्वार्थभाष्यके इस अंशको
इसी रूपमें स्वीकार किया है। प्रश्न यह है कि जब तत्त्वार्थभाष्यकारने उक्त सूत्रका उत्तरार्ध 'सर्वद्रव्ये-
ष्वसर्वपर्यायेषु' स्वीकार किया तब अन्यत्र उसे उद्धृत करते समय वे उसके 'सर्व' पदको क्यों छोड़ गये ।
पदका विस्मरण हो जानेसे ऐसा हुआ होगा यह बात बिना कारणके कुछ नपी-तुली प्रतीत नहीं होती ।
यह तो हम मान लेते हैं कि प्रमादवश या जान-बूझकर उन्होंने ऐसा नहीं किया होगा फिर भी यदि विस्मरण
होनेसे ही यह व्यत्यय माना जाये तो इसका कोई कारण अवश्य होना चाहिए। हमारा तो खयाल है कि
तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय उनके सामने सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ अवश्य रहा है और हमने क्या पाठ
स्वीकार किया है इसका विशेष विचार किये बिना उन्होंने अनायास उसके सामने होनेसे सर्वार्थसिद्धामान्य
सूत्रपाठका अंश यहाँ उद्धृत कर दिया है। यह भी हो सकता है कि अध्याय १ सूत्र २० का भाष्य लिखते
समय तक वे यह निश्चय न कर सके हों कि क्या इसमें 'सर्व' पदको 'द्रव्य' पदका विशेषण बनाना आवश्यक
होगा या जो पुराना सूत्रपाठ है उसे अपने मूलरूपमें ही रहने दिया जाय और सम्भव है कि ऐसा कुछ निश्चय
न कर सकनेके कारण यहाँ उन्होंने पुराने पाठको ही उद्धृत कर दिया हो। हम यह तो मानते हैं कि
तत्त्वार्थभाष्य प्रारम्भ करनेके पहले ही वे तत्त्वार्थसूत्रका स्वरूप निश्चित कर चुके थे फिर भी किसी खास
सूत्रके विषयमें शंकास्पद बने रहना और तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय उसमें परिवर्तन करना सम्भव है। जो
कुछ भी हो इस उल्लेखसे इतना निश्चय करनेके लिए तो बल मिलता ही है कि तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय
वाचक उमास्वातिके सामने सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ अवश्य होना चाहिए।
३. अर्थ विकास - इसी प्रकार इन दोनोंके बिम्बप्रतिबिम्बभाव और कहीं-कहीं वस्तुके विवेचनमें
तत्त्वार्थभाष्यमें अर्थ विकासके स्पष्ट दर्शन होनेसे भी उक्त कथनकी पुष्टि होती है। उदाहरणार्थ - दसवें
अध्यायमें 'धर्मास्तिकायाभावात्' सूत्र आता है। इसके पहले यह बतला आये हैं कि मुक्त जीव अमुक-अमुक
कारणसे ऊपर लोकके अन्त तक जाता है। प्रश्न होता है कि वह इसके आगे क्यों नहीं जाता हैं और इसीके
उत्तरस्वरूप इस सूत्रकी रचना हुई है। किन्तु यदि टीकाको छोड़ कर केवल सूत्रोंका पाठ किया जाय तो यहाँ
जाकर रुकना पड़ता है और मनमें यह शंका बनी ही रहती है कि धर्मास्तिकाय न होनेसे आचार्य क्या
बतलाना चाहते हैं। सूत्रपाठकी यह स्थिति वाचक उमास्वातिके ध्यानमें आयी और उन्होंने इस स्थितिको साफ
करनेकी दृष्टिसे ही उसे सूत्र न मानकर भाष्यका अंग बनाया है। यह क्रिया स्पष्टतः बादमें की गयी जान
पड़ती है। इसी प्रकार इसी अध्यायके सर्वार्थसिद्धामान्य दूसरे सूत्रको लीजिए। इसके पहले मोहनीय आदि
कर्मोंके अभावसे केवलज्ञानकी उत्पत्तिका विधान किया गया है। किन्तु इनका अभाव क्यों होता है इसका
समुचित उत्तर उस सूत्रसे नहीं मिलता और न ही सर्वार्थसिद्धिकार इस प्रश्नको स्पर्श करते हैं। किन्तु
वाचक उमास्वातिको यह त्रुटि खटकती है। फलस्वरूप वे सर्वार्थसिद्धामान्य 'बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां
कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः' इस सूत्रके पूर्वार्धको स्वतन्त्र और उत्तरार्धको स्वतन्त्र सूत्र मानकर इस कमीकी
पूर्ति करते हैं। सर्वार्थसिद्धिमें जब कि इसका सम्बन्ध केवल 'कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षः' पदके साथ जोड़ा गया है
वहाँ वाचक उमास्वाति इसे पूर्वसूत्र और उत्तरसूत्र दोनोंके लिए बतलाते हैं।
ऐसी ही एक बात, जो विशेष ध्यान देने योग्य है, पाँचवें अध्यायके कालके उपकारके प्रतिपादक सूत्रके
प्रसंगसे आती है। प्रकरण परत्व और अपरत्वका है। ये दोनों कितने प्रकारके होते हैं इसका निर्देश सर्वार्थसिद्धि
और तत्त्वार्थभाष्य दोनोंमें किया है। सर्वार्थसिद्धिमें इनके प्रकार बतलाते हुए कहा है- परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते
४६ सर्वार्थसिद्धि
कालकृते च स्वतः । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें ये दो भेद तो बतलाये ही गये हैं। साथ ही वहाँ प्रशंसाकृत परत्वा-
परत्वका स्वतन्त्ररूपसे और ग्रहण किया है । वाचक उमास्वाति कहते हैं—परत्वापरत्वे त्रिविधे—प्रशंसाकृते
क्षेत्रकृते कालकृते इति ।
इतना ही नहीं । हम देखते हैं कि इस सम्बन्धमें तत्त्वार्थवार्तिककार तत्त्वार्थभाष्यका ही अनुसरण
करते हैं । उन्होंने कालके उपकारके प्रतिपादक सूत्रका व्याख्यान करते हुए परत्व और अपरत्वके इन तीन
भेदोंका उल्लेख इन शब्दोंमें किया है—
'क्षेत्रप्रशंसाकालनिमित्तात्परत्वापरत्वानवधारणमिति चेत् । न, कालोपकारप्रकरणात्¹ ।'
अतएव क्या इससे यह अनुमान करनेमें सहायता नहीं मिलती कि जिस प्रकार इस उदाहरणसे
तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने था इस कथनकी पुष्टि होती है उसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्य सर्वार्थसिद्धि
के बादकी रचना है इस कथनकी भी पुष्टि होती है ।
स्पष्ट है कि पौर्वापर्यकी दृष्टिसे विचार करनेपर तत्त्वार्थभाष्यका रचनाकाल सर्वार्थसिद्धिके रचे जानेके
बाद स्थिर होता है और सब स्थितियोंका विचार करनेपर यह ठीक भी प्रतीत होता है ।
सर्वार्थसिद्धिमें अन्य साहित्य के उद्धरण—सर्वार्थसिद्धि लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने जो
विपुल साहित्य उपस्थित था उसका अवलम्बन लेकर उन्होंने इस महान् टीका ग्रन्थकी श्रीवृद्धि की है ।
उसमें प्रमुख स्थान जिसे दिया जा सकता है वह है षट्खण्डागम ।
षट्खण्डागम—यह वह महान् निधि है जिसे द्वादशांग वाणीका सीधा वारसा मिला है । आचार्य
पुष्पदन्त और भूतबलीने आचार्य धरसेनके चरणोंमें बैठकर तथा उस कालमें शेष रहे द्वादशांग वाणीके एक-
देशका अभ्यास कर इस महान् ग्रन्थ की रचना की थी । इसके जीवस्थान, क्षुल्लकबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदना,
वर्गणा और महाबन्ध इन छह खण्डोंमें द्वादशांग वाणीका संकलन किया गया है, इसलिए इसे षट्खण्डागम
कहते हैं । सर्वार्थसिद्धिकारके सामने यह महान् ग्रन्थ उपस्थित था और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी
किया है यह बात तत्त्वार्थसूत्र अध्याय एक सूत्र आठकी सर्वार्थसिद्धि टीकाके देखनेसे स्पष्ट ज्ञात होती है ।
इसमें सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व इन आठ अनुयोगोंके द्वारा चौदह गुणस्थान
और चौदह मार्गणाओंके आश्रयसे जीव तत्त्वका जिस प्रकार विचार किया गया है वह अनायास ही पाठकों-
का ध्यान षट्खण्डागमके जीवस्थान खण्डकी ओर आकृष्ट करता है । जीवस्थान खण्डका दूसरा सूत्र है—
'एत्तो इमेसिं चोद्दसण्हं जीवसमासोणं मग्गणट्ठदाए तत्थ इमाणि चोद्दस चेव ठाणाणि णायव्वाणि
भवंति ।'
इसमें चौदह गुणस्थानोंके लिए 'जीवसमास' शब्दका प्रयोग हुआ है । सर्वार्थसिद्धिकारके सामने यह
सूत्र था । उन्होंने भी गुणस्थानके लिए 'जीवसमास' शब्दका उपयोग किया है । यथा—
'एतेषामेव जीवसमासानां निरूपणार्थं चतुर्दश मार्गणास्थानानि ज्ञेयानि ।'
आगे सर्वार्थसिद्धिमें जीवस्थानका किस प्रकार अनुसरण किया गया है इसका आगेकी तालिका द्वारा
स्पष्ट ज्ञान कीजिए—
| जीवस्थान सत्प्ररूपणा | सर्वार्थसिद्धि सत्प्ररूपणा |
|---|---|
| संतपरूवणादाए दुविहो णिद्देसो—ओघेण आदे- | तत्र सत्प्ररूपणा द्विविधा—सामान्येन विशेषेण च । |
| सेण य ॥ ८ ॥ | |
| ओघेण अत्थि मिच्छादिट्ठी ॥ ९ ॥ सासणसम्मा- | सामान्येन अस्ति मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्य- |
| दिट्ठी ॥ १० ॥........ | ग्दृष्टिरित्येवमादिः । |
१. अ० ५ सू० २२ तत्त्वार्थवार्तिक ।
प्रस्तावना ४७
जीवस्थान सत्प्ररूपणा
आदेसेण गदियाणुवादेण अत्थि णिरयगदी तिरि-
क्खगदी मणुसगदी देवगदी सिद्धगदी चेदि ॥ २४ ॥
णेरइया चउत्ठाणेसु अत्थि मिच्छादिट्ठी सासणसम्माइट्ठी
सम्मामिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी त्ति ॥ २५ ॥ ति-
रिक्खा पंचसु ठाणेसु अत्थि मिच्छादिट्ठी.......संजदा-
संजदा त्ति ॥२६॥ मणुस्सा चोद्दससु गुणट्ठाणेसु अत्थि
मिच्छादिट्ठी........अजोगिकेवलि त्ति ॥२७॥ देवा चउसु
ठाणेसु अत्थि मिच्छादिट्ठी....असंजदसम्माइट्ठि त्ति ॥२८॥
इंदियाणुवादेण अत्थि एइंदिया बीइंदिया तीइंदिया
चदुरिंदिया पंचिंदिया अणिंदिया चेदि ॥ ३३ ॥ एई-
दिया बीइंदिया तीइंदिया चउरिंदिया असण्णिपंचिंदिया
एक्कम्हि चेव मिच्छादिट्ठिट्ठाणे ॥ ३६ ॥ पंचिंदिया अस-
ण्णिपंचिंदियप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ॥ ३७ ॥
कायाणुवादेण अत्थि पुढविकाइया आउकाइया
तेउकाइया वाउकाइया वणप्फइकाइया तसकाइया
अकाइया चेदि ॥३९॥ पुढविकाइया....वणप्फइकाइया
एक्कम्हि चेव मिच्छादिट्ठिट्ठाणे ॥ ४३ ॥ तसकाइया
बीइंदियप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ॥ ४४ ॥
सर्वार्थसिद्धि सत्प्ररूपणा
विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु
आद्यानि चत्वारि गुणस्थानानि सन्ति । तिर्यग्गतौ
तान्येव संयतासंयतस्थानाधिकानि सन्ति । मनुष्यगतौ
चतुर्दशापि सन्ति । देवगतौ नारकवत् ।
इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियादिषु चतुरिन्द्रियपर्यन्तेषु
एकमेव मिथ्यादृष्टिस्थानम् । पंचेन्द्रियेषु चतुर्दशापि
सन्ति ।
कायानुवादेन पृथिवीकायादिवनस्पतिकायकान्तेषु
एकमेव मिथ्यादृष्टिस्थानम् । त्रसकायेषु चतुर्दशापि
सन्ति ।
आगम परम्परामें इस विषयमें दो सम्प्रदाय हैं कि सासादनसम्यग्दृष्टि मर कर एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न होते
हैं। कषायप्राभृत इसी मतका समर्थन करता है। किन्तु षट्खण्डागमके अभिप्रायानुसार जो सासादनसम्यग्दृष्टि
मर कर एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न होते हैं उनका एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें नियमसे मिथ्यादृष्टि गुण-
स्थान हो जाता है। यही कारण है कि जीवस्थान सत्प्ररूपणाके सूत्रोंमें एकेन्द्रियोंके एक मिथ्यादृष्टि गुण-स्थानका
निर्देश किया गया है। उक्त तुलनासे स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिकारने भी एकमात्र इसी मतका अनुसरण किया है।
जीवस्थान संख्याप्ररूपणा
ओघेण मिच्छादिट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया ।
अणंता ॥२॥ सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा
त्ति दव्वपमाणेण केवडिया । पलिदोवमस्स असंखे-
ज्जदिभागो ।........॥ ६ ॥ पमत्तसंजदा दव्वपमाणेण
केवडिया । कोडिपुधत्तं ॥ ७ ॥ अप्पमत्तसंजदा दव्व-
पमाणेण केवडिया । संखेज्जा ॥ ८ ॥ चदुण्हमुवसामगा
दव्वपमाणेण केवडिया । पवेसेण एक्को वा दो तिण्णि
वा, उक्कस्सेण चउवण्णं ॥ ९ ॥ अद्धं पडुच्च संखेज्जा
॥ १० ॥ चउण्हं खवा अजोगिकेवली दव्वपमाणेण
केवडिया । पवेसेण एक्को वा दो वा तिण्णि वा,
उक्कस्सेण अट्ठोत्तरसदं ॥ ११ ॥ अद्धं पडुच्च संखेज्जा
॥ १२ ॥ सजोगिकेवली दव्वपमाणेण केवडिया । पवे-
सेण एक्को वा दो वा तिण्णि वा, उक्कस्सेण अट्ठुत्त-
रसदं ॥ १३ ॥ अद्धं पडुच्च सयसहस्सपुधत्तं ॥ १४ ॥
सर्वार्थसिद्धि संख्याप्ररूपणा
सामान्येन तावत् जीवा मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः।
सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्मिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्य-
ग्दृष्टयः संयतासंयताश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः।
प्रमत्तसंयताः कोटिपृथक्त्वसंख्याः। ...अप्रमत्तसंयताः
संख्येयाः ॥ चत्वार उपशमकाः प्रवेशेन एको वा द्वौ वा
त्रयो वा । उत्कर्षेण चतुःपञ्चाशतः । स्वकालेन समु-
दिताः संख्येयाः ॥ चत्वारः क्षपका अयोगिकेवलिनश्च
प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशत-
संख्याः । स्वकालेन समुदिताः संख्येयाः । सयोगकेव-
लिनः प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणा-
ष्टोत्तरशतसंख्याः । स्वकालेन समुदिताः शतसहस्र-
पृथक्त्वसंख्याः ।
४६ सर्वार्थसिद्धि
यहाँ हमने जीवस्थानके सत् और संख्या प्ररूपणाके कुछ सूत्रोंकी तुलना दी है। सब प्ररूपणाओंकी
यह तुलना बिम्बप्रतिबिम्बभावको लिये हुए हैं। स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिकारने 'सत्संख्या-' इत्यादि सूत्रकी
प्ररूपणा जीवस्थानके आठ अनुयोगद्वारोंको सामने रख कर की है। सर्वार्थसिद्धि लिखते समय पूज्यपाद
स्वामीके सामने केवल जीवस्थान ही उपस्थित नहीं था किन्तु जीवस्थानकी चूलिका व दूसरे खण्ड भी उनके
सामने रहे हैं। इसके लिए तत्त्वार्थसूत्रके प्रथम अध्यायके 'निर्देशस्वामित्व-' इत्यादि सूत्रकी सर्वार्थसिद्धि
टीका देखिए। इसमें सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके कारणोंका निर्देश जीवस्थान चूलिका अनुयोगद्वारके आधारसे
किया है। तथा उपशम आदि सम्यक्त्वोंके कालका निर्देश क्षुल्लकबन्धके आधारसे किया है।
आ० कुन्दकुन्दका साहित्य—जैनपरम्परामें श्रुतधर आचार्योंमें समयप्रभावक जितने आचार्य हुए हैं
उनमें आचार्य कुन्दकुन्दका नाम प्रमुखरूपसे लिया जाता है। कुछ तथ्योंके आधारपर कहा जाता है कि इन्हें
विदेह क्षेत्रमें स्थित सीमन्धर तीर्थंकरके साक्षात् दर्शन और उपदेश श्रवणका लाभ मिला था और इन्हें चारण-
ऋद्धि प्राप्त थी। इन्होंने जैनतत्त्वज्ञानकी स्पष्ट दिशाका प्रतिपादन कर समग्र जैनपरम्पराको प्रभावित किया है।
जैनतत्त्वज्ञान व्यक्तिस्वातन्त्र्यका समर्थक है और उसकी प्राप्तिका एकमात्र मार्ग स्वावलम्बन है इस तथ्यको
संसारके सामने जितने सुन्दर शब्दोंमें इन्होंने रखा है उसकी तुलना अन्य किसीसे नहीं की जा सकती है।
वे जैनपरम्परामें ऐसे प्रकाशमान् सूर्य थे जिनसे दशों दिशाएँ आलोकित हुई हैं। बोधप्राभृतमें एक गाथा आयी
है^१ जिसमें इन्होंने अपनेको श्रुतकेवली भद्रबाहुका गमक शिष्य घोषित किया है। समयप्राभृतका प्रारम्भ
करते हुए वे कहते हैं कि 'मैं श्रुतकेवलीके द्वारा कहे गये समयप्राभृतका कथन करता हूँ।' उनके ये वचन
आकस्मिक नहीं हो सकते। बहुत सम्भव है कि उन्हें भद्रबाहु श्रुतकेवलीके तत्त्वज्ञानका लाभ मिला हो; क्योंकि
इनके द्वारा निर्मित साहित्यमें जो विशेषता है वह आकस्मिक नहीं हो सकती। वस्त्र-पात्रके स्वीकार की
चर्चाने जैनपरम्पराके तत्त्वज्ञानको बहुत अधिक धूमिल किया है। एकमात्र इनके द्वारा रचित साहित्यकी
पूर्वपरम्परा ही ऐसी प्रकाशकिरण है जो इस अन्धकारका विच्छेद कर सन्मार्गका प्रकाश करती है। एक ओर
आत्मा और परनिरपेक्ष आत्मीय भावोंको छोड़कर अन्य सबको यहाँतक कि आत्मामें जायमान नैमित्तिक
भावोंको भी पर कहना और दूसरी ओर वस्त्र-पात्रके स्वीकारको व्यक्तिस्वातन्त्र्यका मार्ग बतलाना इसे तत्त्व-
ज्ञानकी कोरी विडम्बनाके सिवा और क्या कहा जा सकता है। हमारा तो दृढ़ विश्वास है कि प्रत्येक
व्यक्तिकी स्वतन्त्र सत्ताकी उद्घोषणा करनेवाला और ईश्वरवादके निषेध द्वारा निमित्तकी प्रधानताको अस्वी-
कार करनेवाला धर्म मोक्षमार्गमें निमित्तरूपसे वस्त्र-पात्रके स्वीकारका कभी भी प्रतिपादन नहीं कर सकता।
आचार्य कुन्दकुन्दने यदि किसी तथ्यको स्पष्ट किया है तो वह एकमात्र यहो हो सकता है। कुछ विद्वान् समझते
हैं कि उन्हें नाग्न्यका एकान्त आग्रह था और उनके बाद ही जैनपरम्परामें इसपर विशेष जोर दिया जाने लगा
था। किन्तु मालूम होता है कि वे इस उपालम्भ द्वारा जैनदर्शनकी दिशा ही बदल देना चाहते हैं। जैनदर्शनमें
वस्तुका विचार एकमात्र व्यक्तिस्वातन्त्र्यके आधारपर ही किया गया है अतएव उसकी प्राप्तिका मार्ग स्वाव-
लम्बनके सिवा और क्या हो सकता है। एक व्यक्ति द्वारा अन्य पदार्थोंका स्वीकार उसकी चंचलता और
कषायके कारण ही होता है। यह नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति वस्त्र और पात्रको भी स्वीकार करे और
वह परिग्रहहीन भी माना जाये। स्पष्ट है कि आचार्य कुन्दकुन्दने नाग्न्यकी घोषणा कर उसी मार्गका प्रतिपादन
किया है जिसे अनन्त तीर्थंकर अनादि कालसे दिखलाते आये हैं। ऐसे महान् आचार्यकी कृतिरूपसे इस समय
समयप्राभृत, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, द्वादश अनुप्रेक्षा और अष्टप्राभृत उपलब्ध होते हैं।
कहा जाता है कि मूलाचार (आचारांग) भी उन्हीं की अनुपम कृति है। किन्तु यह प्रश्न अभी विचाराधीन
है और इसपर ऐतिहासिक व साहित्यिक तथ्योंके आधारसे विशेष प्रकाश डालनेकी आवश्यकता है। आचार्य
कुन्दकुन्दके सामने तो इनका साहित्य था ही आचार्य पूज्यपादने भी इसका उपयोग किया है यह बात सर्वार्थ-
सिद्धिके आलोडनसे भलीभाँति विदित होती है। आचार्य पूज्यपादने ऐसी १० गाथाएँ उद्धृत की हैं जिनमेंसे
१. 'बारहअङ्गवियाणी चउदसपुव्वंगविडुलववच्छरणं । सुयणणि भद्दबाहू गमयगुरू भयवओ जयउ ।।'
प्रस्तावना
४९
एक गाथा पंचास्तिकायमें, एक गाथा नियमसारमें, तीन गाथाएँ प्रवचनसारमें और पाँच गाथाएँ द्वादश
अनुप्रेक्षामें उपलब्ध होती हैं। ये गाथाएँ उन ग्रन्थोंके किस प्रकरणकी हैं यह हमने उन-उन स्थलोंपर टिप्पणमें
दिखलाया ही है।
मूलाचार—दिगम्बर परम्परामें स्वीकृत मूलाचार मुनि आचारका प्रतिपादक सर्वप्रथम ग्रन्थ है। अभी
तक इसके कर्ता आचार्य वट्टकेर माने जाते हैं। हमारे सहाध्यायी पं० हीरालालजी शास्त्रीने 'वट्टकेर
आचार्य'का अर्थ 'वर्तक एलाचार्य' करके इसके कर्तारूपसे आचार्य कुन्दकुन्दको अनुमानित किया है। उनके
इस विषयके २-३ लेख इसी वर्षके अनेकान्तमें प्रकाशित हुए हैं जो मननीय हैं और विचारकी नयी दिशा प्रस्तुत
करते हैं। वीरसेन स्वामीने धवला टीकामें इसका 'आचारांग' नामसे उल्लेख कर इसकी एक गाथा उद्धृत
की है। यहाँ आचार्य, पूज्यपादने भी इसकी दो गाथाएँ सर्वार्थसिद्धिमें दी हैं।
पंचसंग्रह—दिगम्बर परम्परामें पंचसंग्रहका बहुत बड़ा स्थान है। इसके सम्बन्धमें हमने श्वेताम्बर
ग्रन्थसप्ततिकाकी भूमिकामें प्रकाश डालते हुए यह सम्भावना प्रकट की है कि इसका संकलन श्वेताम्बर पंच-
संग्रहके कर्ता चन्द्रर्षिमहत्तरके पहले हो चुका था१। इसकी दो गाथाएँ आचार्य पूज्यपादने सर्वार्थसिद्धिमें भी
उद्धृत की हैं। इससे विदित होता है कि बहुत सम्भव है कि दिगम्बर परम्परामान्य प्राकृत पंचसंग्रहका
संकलन आचार्य पूज्यपादके पूर्व हुआ हो। अभी तक यह ग्रन्थ उपलब्ध होकर भी प्रकाशमें नहीं आ सका है।
आचार्य अमितगतिने इसीके आधारसे संस्कृत पंचसंग्रहका संकलन किया है।
पाणिनीयव्याकरण—आचार्य पूज्यपादने स्वयं जैनेन्द्र व्याकरण लिखा है और उसपर न्यासके लेखक
वे स्वयं हैं यह भी प्रसिद्धि है। इसलिए यह शंका होती है कि सर्वार्थसिद्धिमें उन्होंने स्वनिर्मित जैनेन्द्रके सूत्रों-
का ही उल्लेख किया होगा। सर्वार्थसिद्धिके सम्पादनके समय यह प्रश्न हमारे सामने था और इस दृष्टिसे हमने
सर्वार्थसिद्धिको देखा भी। किन्तु इसमें व्याकरणके जो सूत्रोल्लेख उपलब्ध होते हैं उनको देखते हुए हम इस
निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस विषयमें उनका ऐसा कोई आग्रह नहीं था कि केवल स्वनिर्मित जैनेन्द्रके ही सूत्र
उद्धृत किये जायें। यों तो सर्वार्थसिद्धिमें सूत्रोल्लेखोंका बहुत ही कम प्रसंग आया है, पर दो तीन स्थलोंपर
जिस रूपमें वे उल्लिखित किये गये हैं उनके स्वरूपको देखनेसे विदित होता है कि इस काममें पाणिनीय और
जैनेन्द्र दोनों व्याकरणोंका उपयोग हुआ है। यथा—
सर्वप्रथम हम अध्याय ४ सूत्र १९ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें दो सूत्रोंका उल्लेख देखते हैं। उनमेंसे
प्रथम है 'तदस्मिन्नस्तीति ।' और दूसरा है 'तस्य निवासः ।' इनमेंसे प्रथम सूत्र पाणिनीय व्याकरणमें
'तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि । ४, २, ६७ ।' इस रूपमें और जैनेन्द्रव्याकरणमें 'तदस्मिन्नस्तीति देशः खौ ।
४, १, १४ ।' इस रूपमें उपलब्ध होता है, इसलिए इस परसे यह कहना कठिन है कि यहांपर आचार्य पूज्य-
पादने पाणिनीयके सूत्रका आश्रय लिया है या जैनेन्द्रके सूत्रका। दूसरा सूत्र पाणिनीय व्याकरणमें 'तस्य
निवासः ४, २ ६९।' इसी रूपमें और जैनेन्द्रव्याकरणमें 'तस्य निवासादूरभवौ । ३, २, १९ ।' इस रूपमें
उपलब्ध होता है। स्पष्ट है कि यहाँ आचार्य पूज्यपादने पाणिनीय व्याकरणके सूत्रका उल्लेख किया है।
अध्याय ५ सूत्र १ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें 'विशेषणं विशेष्येणेति' सूत्र उल्लिखित है। जैनेन्द्रव्याक-
रणमें यह इसी रूपमें क्रमांक १, ३, ५२ पर अंकित है और इसके स्थानपर पाणिनीय व्याकरणका सूत्र है
'विशेषणं विशेष्येण बहुलम् ।' स्पष्ट है कि यहाँपर आचार्य पूज्यपादने स्वनिर्मित व्याकरणके सूत्रका ही
उल्लेख किया है।
यह तो सूत्र चर्चा हुई। अब एक अन्य प्रमाणको देखिए—अध्याय ५ सूत्र ४ की टीकामें आचार्य
पूज्यपादने 'नेर्ध्रुवे त्यः' यह पद उल्लिखित किया है। किन्तु जैनेन्द्रव्याकरणमें नित्य शब्दको सिद्ध करनेवाला
न तो कोई सूत्र है और न ही 'त्य' प्रत्ययका निर्देश है। वहाँ 'त्य' प्रत्ययके स्थानमें 'य' प्रत्यय है। इससे
१. देखो, आत्मानन्द जैन पुस्तक प्रचारक मण्डल आगरासे प्रकाशित सप्ततिकाकी भूमिका, पृष्ठ २३ से
२६ तक।
७
५० सर्वार्थसिद्धि
विदित होता है कि यह वाक्य आचार्य पूज्यपादने कात्यायनके वार्तिक 'त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्' । ४, २,
१०४ ।' को ध्यानमें रखकर कहा है। आचार्य अभयनन्दिने अपनी वृत्तिमें अवश्य ही 'नेर्ध्रुवम् इति वक्तव्यम् ।'
यह वार्तिक बनाया है । किन्तु वह बादकी रचना है ।
इन तथ्योंके प्रकाशमें यह स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य पूज्यपादने अपनी सर्वार्थसिद्धि टीकामें जैनेन्द्र-
व्याकरणके समान पाणिनीय व्याकरणका भी उपयोग किया है और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जैनेन्द्रव्याकरण
की रचना होनेके अनन्तर ही उन्होंने सर्वार्थसिद्धि • टीका लिखी थी । अध्याय १० सूत्र ४ की सर्वार्थसिद्धि
टीकामें आचार्य पूज्यपादने पंचमी विभक्तिके लिए 'का' संज्ञाका प्रयोग किया है। आचार्य पूज्यपादने अपने
जैनेन्द्रव्याकरणमें 'विभक्ती' शब्दके व्यंजन अक्षरोंमें 'आ' और स्वरोंमें 'प्' जोड़कर क्रमसे विभक्तियोंको वा,
इप्, भा, अप्, का, ता, ईप् ये सात संज्ञाएँ निश्चित की हैं। इस हिसाबसे 'का' यह पंचमी विभक्तिका संकेत
है। यह भी एक ऐसा प्रमाण है जो इस बातको सूचित करता है कि सर्वार्थसिद्धि लिखे जानेके पहले जैनेन्द्र-
व्याकरणकी रचना हो गयी थी ।
कात्यायनवार्तिक—पाणिनीयके व्याकरण सूत्रोंपर कात्यायन महर्षिने वार्तिक लिखे हैं। अध्याय ७
सूत्र १६ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें आचार्य पूज्यपाद ने शास्त्र कहकर उनके 'अश्ववृषमयोगैर्मुनेच्छायाम् ।'
इस वार्तिकको उद्धृत किया है। यह पाणिनिके ७, १, ५१ पर कात्यायनका पहला वार्तिक है ।
पातंजल महाभाष्य — वैदिक परम्परामें पतंजलि ऋषि एक महान् विद्वान् हो गये हैं। इस समय
पाणिनीय व्याकरणपर जो पातंजल महाभाष्य उपलब्ध होता है वह इन्हीं की अमर कृति है। योगदर्शनके
लेखक भी यही हैं। यह इससे स्पष्ट है—
'योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ।
योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ।'
जिन्होंने योगके द्वारा चित्तके मलको, व्याकरण के द्वारा वचनोंके मलको और वैद्यकद्वारा शरीरके
मलको दूर किया है उन मुनियोंमें श्रेष्ठ पतंजलि ऋषिके समक्ष मैं नतमस्तक होता हूँ ।
पतंजलि ऋषिके अवस्थिति कालके विषयमें मतभेद है। तथापि ये विक्रमपूर्व द्वितीय शताब्दीसे पहले
नहीं हुए हैं इतना निश्चित है। इस समय हमारे सामने पातंजल महाभाष्य और सर्वार्थसिद्धि उपस्थित हैं।
इन दोनोंका तुलनात्मक अध्ययन करनेसे विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादके साहित्यपर और खासकर
सर्वार्थसिद्धिपर पातंजल महाभाष्य की गहरी छाप पड़ी है। दोनोंका अवलोकन करनेसे विदित होता है कि
सर्वार्थसिद्धिके ऐसे अनेक स्थल हैं जो पातंजल महाभाष्यके आश्रयसे सजाये गये हैं। इस बातको स्पष्ट करनेके
लिए आगेकी तुलनापर दृष्टि डालिए—
| पातंजल महाभाष्य | सर्वार्थसिद्धि |
|---|---|
| अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वेति । | अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा । |
| बहवो हि शब्दाः, एकार्था भवन्ति । तद्यथा इन्द्रः, | सत्यपि प्रकृतिभेदे रूढिबललाभात् पर्यायशब्द- |
| शक्रः, पुरुहूतः, पुरन्दरः । | त्वम् । यथा—इन्द्रः, शक्रः, पुरन्दर इति । |
| अनुदरा कन्येति | यथा, अनुदरा कन्या इति । |
| अस्त्येव संख्यावाची । तद्यथा, एको द्वौ बहव | संख्यावाची यथा—एको द्वौ बहव इति । |
| इति । | |
| बहुरोदनो बहुः सूप इति । | बहुरोदनो बहुः सूप इति । |
| सिद्धे विधिरारभ्यमाणो ज्ञापकार्थो भवति । | सिद्धे विधिरारभ्यमाणे नियमार्थः । |
| हि मन्यै रथेन यास्यसीति | एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यति यातस्ते |
| पितेति । |
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प्रस्तावना ५१
पातञ्जल महाभाष्य | सर्वार्थसिद्धि
भाविकृत्यमासीत् । पुत्रो जनिष्यमाण आसीत् । | विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो जनिता । भाविकृत्य-
| मासीदिति ।
अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः । अर्थं संप्रत्याययिष्या- | अथवा अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः तत्रैकस्यार्थस्यैकेन
मीति शब्दः प्रयुज्यते तत्रैकेनोक्तत्वात्तस्यार्थस्य द्विती- | गतार्थत्वात्पर्यायशब्दप्रयोगोनर्थकः ।
यस्य च तृतीयस्य च प्रयोगेण न भवितव्यं उक्तार्था- |
नामप्रयोगः । |
एकश्च तन्तुस्त्वक्त्राणेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च | भवति हि कश्चित्प्रत्येकं तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः ।
कम्बलः समर्थः । एकश्च बल्वजो बन्धनेऽसमर्थस्त- |
त्समुदायश्च रज्जुः समर्था भवति । |
इमानीन्द्रियाणि कदाचित्स्वातन्त्र्येण विवक्षितानि | स्वातन्त्र्यविवक्षा च दृश्यते । इदं मे अक्षि सुष्ठु
भवन्ति । तद्यथा इदं मे अक्षि सुष्ठु पश्यति, अयं मे | पश्यति । अयं मे कर्णः सुष्ठु शृणोति ।
कर्णः सुष्ठु शृणोतीति । |
कदाचित् पारतन्त्र्ये विवक्षितानि भवन्ति— | लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्यविवक्षा दृश्यते ।
अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु | अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु शृणो-
शृणोमि । | मीति ।
द्रुतायां तपरकरणे मध्यमविलम्बितयोरुपसंख्यानं | द्रुतायां तपरकरणे मध्यमविलम्बितयोरुपसंख्यानम् ।
कालभेदात् । |
अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः । | अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः ।
हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे भिक्षादिषु दर्शनात् । | निमित्तमात्रेऽपि हेतुकर्तृव्यपदेशो दृष्टः । यथा
हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे द्रष्टव्यः । यावद् ब्रूयान्निमित्तं | कारीषोऽग्निरध्यापयति ।
कारणमिति तावद्धेतुरिति । किं प्रयोजनम् । भिक्षादिषु |
दर्शनात् । भिक्षादिष्वपि णिज् दृश्यते भिक्षा वासयन्ति |
कारीषोऽग्निरध्यापयति इति । |
स बुद्ध्या निवर्तते । य एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी | ''''स बुद्ध्या सम्प्राप्य निवर्तते । एवमिहापि य
भवति स पश्यति । | एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी स पश्यति ।
तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते । एकी- | तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते । एकी-
भूतमिति गम्यते । | भूतमिति गम्यते ।
कल्प्यो हि वाक्यशेषो वाक्यं च वक्तर्यधीनं हि । | कल्प्यो हि वाक्यशेषो वाक्यं च वक्तर्यधीनम् ।
रत्नकरण्डक—यह दिगम्बर परम्पराका एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसमें धर्मके स्वरूपका व्याख्यान कर
व धर्मको सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्वरूप बतला कर पाँच अध्यायोंमें इन तीनों रत्नोंका
क्रमसे विवेचन किया गया है इसलिए इसको रत्नकरण्डक कहते हैं। किन्तु सम्यक् चारित्रका प्रतिपादन करते
समय सकल चारित्रका उल्लेखमात्र करके इसमें मुख्यतया विकलचारित्र (श्रावकाचार) का ही विस्तारके
साथ निरूपण किया गया है, इसलिए इसे रत्नकरण्डकश्रावकाचार भी कहते हैं। साधारणतः इसके कर्तृके
सम्बन्धमें प्रसिद्धि है कि यह दिगम्बर परम्पराके प्रसिद्ध आचार्य समन्तभद्र स्वामीकी अमर कृति है। अभी
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५२ सर्वार्थसिद्धि
तक जितने प्राचीन उल्लेख मिलते हैं उनसे इसी तथ्यकी पुष्टि होती है¹ । स्वयं प्रभाचन्द्र आचार्य जिन्होंने कि
इस पर विस्तृत संस्कृत टीका लिखी है, इसे स्वामी समन्तभद्रकी ही कृति मानते हैं। जैसा कि इसके प्रत्येक
अध्यायके अन्तमें पायी जानेवाली पुष्पिकासे विदित होता है² । ऐसी अवस्थामें आचार्य पूज्यपादके सामने
सर्वार्थसिद्धि लिखते समय रत्नकरण्डक अवश्य होना चाहिए। आगे हम इन दोनों ग्रन्थोंके कुछ ऐसे उल्लेख
उपस्थित करते हैं जिससे इस विषयके अनुमान करनेमें सहायता मिलती है। उल्लेख इस प्रकार हैं:—
१ रत्नकरण्डकमें व्रतका स्वरूप इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
‘अमिसन्धिक्कृता विरतिर्विषयाद्योगाद् व्रतं भवति ॥३,१०॥’
इसी बातको सर्वार्थसिद्धिमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
व्रतमभिसन्धिक्कृतो नियमः । ७-१।
रत्नकरण्डकमें अनर्थदण्डके ये पांच नाम दिये हैं—पापोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति और
प्रमादचर्या । सर्वार्थसिद्धिमें भी ये ही पांच नाम परिलक्षित होते हैं। इतना ही नहीं इनके कुछ लक्षणोंके
विषयमें भी अपूर्व शब्दसाम्य दृष्टिगोचर होता है। यथा—
‘तिर्यक्क्लेशवाणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसंगप्रसवः स्मर्त्तव्यः पाप उपदेशः ॥’ रत्न० ३ ।।
‘तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः ।’ सर्वा० ७, २१ ।
‘क्षितिसलिलदहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् ।
सरणं सारणमपि च प्रमादचर्यां प्रभाषन्ते ॥’ रत्न ३, ३४ ।
‘प्रयोजनमन्तरेण वृक्षादिच्छेदनभूमिकुट्टनसलिलसेचनाद्यवद्यकर्म प्रमादाचरितम् ।’ सर्वा० २१ ।
इन दोनों ग्रन्थोंमें भोगोपभोगव्रत या उपभोगपरिभोगव्रतके निरूपणमें जो अर्थ और शब्दसाम्य दृष्टि-
गोचर होता है वह तो और भी विलक्षण है। दोनोंमें भोग और उपभोगके प्रकार दिखलाकर त्रसघात,
बहुघात और अनिष्टके त्यागका उपदेश दिया गया है। मात्र रत्नकरण्डकमें इनके सिवा अनुपसेव्यके त्यागका
निर्देश विशेषरूपसे किया गया है। रत्नकरण्डकके उल्लेख इस प्रकार हैं—
‘त्रसहतिपरिहरणार्थं क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृतये ।
मद्यं च वर्जनीयं जिनचरणौ शरणमुपयातैः ॥’ ३, ३८ ॥
‘अल्पफलबहुविघातान्मूलकमाद्राणि शृङ्गवेराणि ।
नवनीतनिम्बकुसुमं कैतकमित्येवमवहेयम् ॥ ३, ३९ ॥
यदनिष्टं तद् व्रतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् ॥३, ४० ॥’
इसी विषयको सर्वार्थसिद्धिमें देखिए—
‘मधु मांसं मद्यं च सदा परिहर्त्तव्यं त्रसघातानिवृत्तचेतसा । केतक्यर्जुनपुष्पादीनि शृङ्गवेरमूलकादीनि
बहुजन्तुयोनिस्यानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि परिहर्त्तव्यानि बहुघाताल्पफलत्वात् । यानवाहनाभरणादिष्वे-
तावदेवेष्टमतोऽन्यदनिष्टमित्यनिष्टान्निवर्त्तनं कर्तव्यम्•••••••• ।’ ७, २२ ।
इतने विलक्षण साम्यके होते हुए भी इन दोनों ग्रन्थोंमें कुछ विशेषता है। प्रथम विशेषता तो यह है
कि रत्नकरण्डकमें ‘प्रोषध’ शब्दका अर्थ ‘सत्कृद्भुक्ति’ किया है और सर्वार्थसिद्धि में ‘पर्व’ । तथा दूसरी
विशेषता यह है कि रत्नकरण्डकमें आठ मूलगुणोंका स्वतन्त्र रूपसे उल्लेख किया है जब कि सर्वार्थसिद्धिमें
इनकी यत्किंचित् भी चर्चा नहीं की है। इसलिए शंका होती है कि यदि सर्वार्थसिद्धि रत्नकरण्डकके बादकी
१. देखो पं० जुगलकिशोरजी द्वारा सम्पादित और श्रीमाणिकचन्द्र ग्रन्थमाला बम्बईसे प्रकाशित रत्नकरण्ड
श्रावकाचारकी प्रस्तावना, पृ० ५ से पृ० १५ तक । २. इति प्रभाचन्द्र विरचितायां समन्तभद्रस्वामिविरचितो-
पासकाध्ययनटीकायां प्रथमः परिच्छेदः ।
रचना मानी जाय तो उसमें यह अन्तर नहीं दिखाई देना चाहिए । 'प्रोषध' शब्दके अर्थको हम छोड़ सकते
हैं, तब भी आठ मूलगुणोंके निर्देश और अनिर्देशका प्रश्न बहुत ही महत्त्व रखता है । पाठक जितने भी
प्राचीनकालकी ओर जायेंगे देखेंगे कि पूर्वकालमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख श्रावकके कर्तव्योंमें अलगसे नहीं
किया जाता था । सर्वप्रथम यह उल्लेख रत्नकरण्डकमें ही दिखलाई देता है ।
श्रीमान् डॉ० हीरालालजी रत्नकरण्डकको श्री स्वामी समन्तभद्रकी कृति माननेमें सन्देह करते हैं ।
उनका यह विचार बननेका मुख्य कारण यह है कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें देवागमके कर्ता
स्वामी समन्तभद्रका उल्लेख करनेके बाद पहले 'देव' पद द्वारा जैनेन्द्र व्याकरणके कर्ता आचार्य पूज्यपादका
उल्लेख किया है और इसके बाद रत्नकरण्डकके कर्ताका स्मरण करते हुए उन्हें 'योगीन्द्र' नामसे सम्बोधित किया
है । डॉ० साहब का ख्याल है कि ये 'योगीन्द्र' स्वामी समन्तभद्रसे भिन्न होने चाहिए जो कि आचार्य पूज्य-
पादके बादके प्रतीत होते हैं । यही कारण है कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें आचार्य पूज्यपादके
बाद आचार्य योगीन्द्रका स्मरण किया है और उन्हें रत्नकरण्डकका निर्माता कहा है । इसकी पुष्टिमें उन्होंने
और भी कई प्रमाण दिये हैं, पर उनमें मुख्य प्रमाण यही है ।
श्रीमान् पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारने माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित होनेवाले सटीक रत्नकरण्ड-
श्रावकाचारकी प्रस्तावनामें रत्नकरण्डककी अन्तःपरीक्षा करके यह सम्भावना प्रकट की है कि जिस रूपमें
इस समय वह उपलब्ध होता है वह उसका मूलरूप नहीं है । लिपिकारों और टिप्पणकारोंकी असावधानी वश
कई प्रक्षिप्त श्लोक मूलके अंग बन गये हैं² । हमारा अनुमान है कि अष्ट मूलगुणोंका प्रतिपादक यह श्लोक भी
इसी प्रकार मूलका अंग बना है । यद्यपि मुख्तार साहब. आठ मूलगुणोंके प्रतिपादक श्लोकको प्रक्षिप्त नहीं
मानते । उन्होंने इसका कोई खास कारण तो नहीं दिया । केवल उपसंहार करते हुए इतना ही कहा है कि
'इसके न रहनेसे अथवा यों कहिए कि श्रावकाचार विषयक ग्रन्थमें श्रावकोंके मूलगुणोंका उल्लेख न होनेसे,
ग्रन्थमें एक प्रकारकी भारी त्रुटि रह जाती जिसकी स्वामी समन्तभद्र जैसे अनुभवी ग्रन्थकारोंसे कभी आशा
नहीं की जा सकती थी³ ।'
हम यह तो मानते हैं कि केवल वादिराज सूरिके उल्लेखके आधारसे यह तो नहीं माना जा सकता
कि रत्नकरण्डक स्वामी समन्तभद्रकी कृति नहीं है, क्योंकि उन्होंने आचार्योंका उल्लेख सर्वथा कालक्रमके
आधारसे नहीं किया हैं । यथा—वे अध्याय १ श्लोक २० में अकलंकका उल्लेख करनेके बाद २२वें श्लोकमें
सम्मतितर्कके कर्ताका स्मरण करते हैं । यह भी सम्भव है कि किसी लिपिकारकी असावधानीवश रत्नकरण्डक
का उल्लेख करनेवाला पार्श्वनाथचरितका 'त्यागी स एव योगीन्द्रः' श्लोक 'अचिन्त्यमहिमा देवः' इस
श्लोकके बाद लिपिबद्ध हो गया हो । मुद्रित प्रतिमें ये श्लोक इस रूपमें पाये जाते हैं ।
स्वामिनश्चरितं तस्य कस्य नो विस्मयावहम् ।
देवागमेन सर्वज्ञो येनाद्यापि प्रदर्श्यते ॥१, १७॥
अचिन्त्यमहिमा देवः सोऽभिवन्द्यो हितैषिणा ।
शब्दाश्च येन सिद्धयन्ति साधुत्वं प्रतिलम्भिताः ॥१, १८॥
त्यागी स एव योगीन्द्रो येनाक्षय्यसुखावहः ।
अर्थिने भव्यसार्थाय दिष्टो रत्नकरण्डकः ॥१, १९॥
किन्तु इनमेंसे १९ संख्यांकवाले श्लोकको १७ संख्यांकवाले श्लोकके बाद पढ़ने पर 'त्यागी स एव
योगीन्द्रो' इस पद द्वारा स्वामी समन्तभद्रका ही बोध होता हैं और सम्भव है कि वादिराज सूरिने रत्नकरण्डक
का कर्तृत्व प्रकट करनेके अभिप्रायसे पुनः यह श्लोक कहा हो । किन्तु दूसरे प्रमाणोंके प्रकाशमें इसे सम्भावना
द्वारा रत्नकरण्डकको स्वामी . समन्तभद्रकर्तृक मान लेनेपर भी उसमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख अवश्य ही
१. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित पार्श्वनाथचरित, सर्ग १, श्लोक १७, १८ और १९ । २. देखो,
प्रस्तावना पृष्ठ १५ से पृष्ठ ५३ तक । ३. देखो प्रस्तावना पृ० ३२ ।
विचारणीय हो जाता है। इस विषयमें हमारा तो खयाल है कि जिस कालमें श्रावकके पाक्षिक, नैष्ठिक और
साधक ये तीन भेद किये गये और इस आधारसे श्रावकाचार के प्रतिपादन करनेका प्रारम्भ हुआ उसी कालसे
आठ मूलगुणोंका वर्गीकरण हो कर उन्हें श्रावकाचारोंमें स्थान मिला है। रत्नकरण्डकमें कुछ ऐसे बीज हैं
जिनसे उसका संकलन दूसरे श्रावकाचारोंमें हुए विकास क्रमके बहुत पहलेका माना जा सकता है। अतएव
सम्भव है कि रत्नकरण्डकमें आठ मूलगुणोंका उल्लेख प्रक्षिप्त हो। रत्नकरण्डकमें जिस स्थानपर यह आठ
मूलगुणोंका प्रतिपादक श्लोक संकलित है उसे देखते हुए तो यह सम्भावना और भी अधिक बढ़ जाती है।
इसके पहले स्वामी समन्तभद्र अतीचारोंके साथ पाँच अणुव्रतोंका कथन कर आये हैं और आगे वे सात शील-
व्रतोंका अतीचारोंके साथ कथन करनेवाले हैं। इनके बीचमें यह श्लोक आया है जो अप्रासंगिक है।
युक्त्यनुशासन—स्वामी समन्तभद्रकी रत्नकरण्डके समान अन्यतम अमर कृति उनका युक्त्यनुशासन
है। इसमें वीर जिनकी स्तुति करते हुए युक्तिपूर्वक उनके शासनकी स्थापना की गयी है। इसके एक स्थलपर
वे कहते हैं कि जो शीर्षोपहार आदिके द्वारा देवकी आराधना कर सुख चाहते हैं और सिद्धि मानते हैं उनके
आप गुरु नहीं हो। श्लोक इस प्रकार है—
'शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखैर्देवान् किलाराध्य सुखाभिगृद्धाः।
सिद्धयन्ति दोषापचयानपेक्षा युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥'
अब इसके प्रकाशमें सर्वार्थसिद्धिके इस स्थलको पढ़िए—
तेन तीर्थाभिषेकर्दाक्षाशीर्षोपहारदेवताराधनादयो निवर्तिता भवन्ति। अ० ९, सू० २ की टीका।
इस तुलनासे विदित होता है कि आचार्य पूज्यपादके समक्ष युक्त्यनुशासनका उक्त वचन उपस्थित था।
द्वात्रिंशत्का—आचार्य पूज्यपादके पूर्व और स्वामी समन्तभद्रके बाद विक्रमकी पाँचवीं छठीवीं शताब्दीके
मध्यमें¹ सिद्धसेन दिवाकर एक बहुत बड़े आचार्य हो गये हैं जिनका उल्लेख दिगम्बर आचार्योंने बड़े आदरके
साथ किया है²। इनके द्वारा रचित सन्मतितर्क ग्रन्थ प्रसिद्ध है। अनेक द्वात्रिंशत्काओंके रचयिता भी यही
माने जाते हैं³। आचार्य पूज्यपादने अध्याय ७ सूत्र १३ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें 'वियोजयति चासुभिः' यह
पद उद्धृत किया है जो इनकी सिद्धद्वात्रिंशत्कासे लिया गया जान पड़ता है।
इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धिमें कुछ ऐसी गाथाएँ, पद्य और वाक्य उद्धृत हैं जिनमेंसे कुछके स्रोतका हम
अभी तक ठीक तरहसे निर्णय नहीं कर सके हैं और कुछ ऐसे हैं जो सर्वार्थसिद्धिके बादमें संकलित हुए या
रचे गये ग्रन्थोंमें उपलब्ध होते हैं। यहाँ हमने उन्हीं ग्रन्थोंका परिचय दिया है जो निश्चयतः आचार्य पूज्यपाद
के सामने रहे होंगे।
मंगलाचरण—सर्वार्थसिद्धिके प्रारम्भमें यह मंगल श्लोक आता है—
'मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥'
यहाँ विचार इस बातका करना है कि यह मंगल श्लोक तत्त्वार्थसूत्रका अंग है या सर्वार्थसिद्धिका ।
कुछ विद्वानोंका मत इसे तत्त्वार्थसूत्रका अंग माननेके पक्षमें है। वे इसके समर्थनमें इन हेतुओंको उपस्थित
करते हैं—
एक तो तत्त्वार्थसूत्रकी हस्तलिखित अधिकतर जो प्राचीन प्रतियां उपलब्ध होती हैं उनके प्रारम्भमें
यह मंगल श्लोक उपलब्ध होता है और दूसरे आचार्य विद्यानन्दने अपनी आप्तपरीक्षामें इसे सूत्रकारका कहकर
इसका उल्लेख किया है। यथा—
'किं पुनस्तत्परमेष्ठिनो गुणस्तोत्रं शास्त्रादौ सूत्रकाराः प्राहुरिति निगद्यते ।'
१. देखो भारतीय विद्या भाग ३, पृष्ठ ११। २. देखो जिनसेनका महापुराण । ३. देखो पुरातन जैन वाक्य-
सूची, प्रस्तावना पृ० १३२ ।
प्रस्तावना ५५
आचार्य विद्यानन्द इतना ही कहकर नहीं रह गये । वे आप्तपरीक्षा का उपसंहार करते हुए पुनः
कहते हैं—
'श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्रादद्भुतसलिलनिधेरुद्रत्नोद्भवस्य,
प्रोत्थानारम्भकाले सकलमलभिदे शास्त्रकारैः कृतं यत् ।
स्तोत्रं तीर्थोपमानं प्रथितपृथुपथं स्वामिमीमांसितं तत्,
विद्यानन्दैः स्वशक्त्या कथमपि कथितं सत्यवाक्यार्थसिद्धयै ॥१२३॥'
प्रकृष्ट रत्नोंके उद्भवके स्थानभूत श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्ररूपी अद्भुत समुद्रकी रचनाके आरम्भ कालमें
महान् मोक्षपथको प्रसिद्ध करनेवाले और तीर्थोपमस्वरूप जिस स्तोत्रको शास्त्रकारोंने समस्त कर्ममलके भेदन
करनेके अभिप्रायसे रचा है और जिसकी स्वामीने मीमांसा की है उसी स्तोत्रका सत्य वाक्यार्थकी सिद्धिके
लिए विद्यानन्दने अपनी शक्तिके अनुसार किसी प्रकार निरूपण किया है ।
इसी बातको उन्होंने इन शब्दोंमें पुनः दुहराया है—
'इति तत्त्वार्थशास्त्रादौ मुनीन्द्रस्तोत्रगोचरा ।
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