सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना
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एक गाथा पंचास्तिकायमें, एक गाथा नियमसारमें, तीन गाथाएँ प्रवचनसारमें और पाँच गाथाएँ द्वादश
अनुप्रेक्षामें उपलब्ध होती हैं। ये गाथाएँ उन ग्रन्थोंके किस प्रकरणकी हैं यह हमने उन-उन स्थलोंपर टिप्पणमें
दिखलाया ही है।
मूलाचार—दिगम्बर परम्परामें स्वीकृत मूलाचार मुनि आचारका प्रतिपादक सर्वप्रथम ग्रन्थ है। अभी
तक इसके कर्ता आचार्य वट्टकेर माने जाते हैं। हमारे सहाध्यायी पं० हीरालालजी शास्त्रीने 'वट्टकेर
आचार्य'का अर्थ 'वर्तक एलाचार्य' करके इसके कर्तारूपसे आचार्य कुन्दकुन्दको अनुमानित किया है। उनके
इस विषयके २-३ लेख इसी वर्षके अनेकान्तमें प्रकाशित हुए हैं जो मननीय हैं और विचारकी नयी दिशा प्रस्तुत
करते हैं। वीरसेन स्वामीने धवला टीकामें इसका 'आचारांग' नामसे उल्लेख कर इसकी एक गाथा उद्धृत
की है। यहाँ आचार्य, पूज्यपादने भी इसकी दो गाथाएँ सर्वार्थसिद्धिमें दी हैं।
पंचसंग्रह—दिगम्बर परम्परामें पंचसंग्रहका बहुत बड़ा स्थान है। इसके सम्बन्धमें हमने श्वेताम्बर
ग्रन्थसप्ततिकाकी भूमिकामें प्रकाश डालते हुए यह सम्भावना प्रकट की है कि इसका संकलन श्वेताम्बर पंच-
संग्रहके कर्ता चन्द्रर्षिमहत्तरके पहले हो चुका था१। इसकी दो गाथाएँ आचार्य पूज्यपादने सर्वार्थसिद्धिमें भी
उद्धृत की हैं। इससे विदित होता है कि बहुत सम्भव है कि दिगम्बर परम्परामान्य प्राकृत पंचसंग्रहका
संकलन आचार्य पूज्यपादके पूर्व हुआ हो। अभी तक यह ग्रन्थ उपलब्ध होकर भी प्रकाशमें नहीं आ सका है।
आचार्य अमितगतिने इसीके आधारसे संस्कृत पंचसंग्रहका संकलन किया है।
पाणिनीयव्याकरण—आचार्य पूज्यपादने स्वयं जैनेन्द्र व्याकरण लिखा है और उसपर न्यासके लेखक
वे स्वयं हैं यह भी प्रसिद्धि है। इसलिए यह शंका होती है कि सर्वार्थसिद्धिमें उन्होंने स्वनिर्मित जैनेन्द्रके सूत्रों-
का ही उल्लेख किया होगा। सर्वार्थसिद्धिके सम्पादनके समय यह प्रश्न हमारे सामने था और इस दृष्टिसे हमने
सर्वार्थसिद्धिको देखा भी। किन्तु इसमें व्याकरणके जो सूत्रोल्लेख उपलब्ध होते हैं उनको देखते हुए हम इस
निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस विषयमें उनका ऐसा कोई आग्रह नहीं था कि केवल स्वनिर्मित जैनेन्द्रके ही सूत्र
उद्धृत किये जायें। यों तो सर्वार्थसिद्धिमें सूत्रोल्लेखोंका बहुत ही कम प्रसंग आया है, पर दो तीन स्थलोंपर
जिस रूपमें वे उल्लिखित किये गये हैं उनके स्वरूपको देखनेसे विदित होता है कि इस काममें पाणिनीय और
जैनेन्द्र दोनों व्याकरणोंका उपयोग हुआ है। यथा—
सर्वप्रथम हम अध्याय ४ सूत्र १९ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें दो सूत्रोंका उल्लेख देखते हैं। उनमेंसे
प्रथम है 'तदस्मिन्नस्तीति ।' और दूसरा है 'तस्य निवासः ।' इनमेंसे प्रथम सूत्र पाणिनीय व्याकरणमें
'तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि । ४, २, ६७ ।' इस रूपमें और जैनेन्द्रव्याकरणमें 'तदस्मिन्नस्तीति देशः खौ ।
४, १, १४ ।' इस रूपमें उपलब्ध होता है, इसलिए इस परसे यह कहना कठिन है कि यहांपर आचार्य पूज्य-
पादने पाणिनीयके सूत्रका आश्रय लिया है या जैनेन्द्रके सूत्रका। दूसरा सूत्र पाणिनीय व्याकरणमें 'तस्य
निवासः ४, २ ६९।' इसी रूपमें और जैनेन्द्रव्याकरणमें 'तस्य निवासादूरभवौ । ३, २, १९ ।' इस रूपमें
उपलब्ध होता है। स्पष्ट है कि यहाँ आचार्य पूज्यपादने पाणिनीय व्याकरणके सूत्रका उल्लेख किया है।
अध्याय ५ सूत्र १ की सर्वार्थसिद्धि टीकामें 'विशेषणं विशेष्येणेति' सूत्र उल्लिखित है। जैनेन्द्रव्याक-
रणमें यह इसी रूपमें क्रमांक १, ३, ५२ पर अंकित है और इसके स्थानपर पाणिनीय व्याकरणका सूत्र है
'विशेषणं विशेष्येण बहुलम् ।' स्पष्ट है कि यहाँपर आचार्य पूज्यपादने स्वनिर्मित व्याकरणके सूत्रका ही
उल्लेख किया है।
यह तो सूत्र चर्चा हुई। अब एक अन्य प्रमाणको देखिए—अध्याय ५ सूत्र ४ की टीकामें आचार्य
पूज्यपादने 'नेर्ध्रुवे त्यः' यह पद उल्लिखित किया है। किन्तु जैनेन्द्रव्याकरणमें नित्य शब्दको सिद्ध करनेवाला
न तो कोई सूत्र है और न ही 'त्य' प्रत्ययका निर्देश है। वहाँ 'त्य' प्रत्ययके स्थानमें 'य' प्रत्यय है। इससे
१. देखो, आत्मानन्द जैन पुस्तक प्रचारक मण्डल आगरासे प्रकाशित सप्ततिकाकी भूमिका, पृष्ठ २३ से
२६ तक।
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