सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ सर्वार्थसिद्धि
यहाँ हमने जीवस्थानके सत् और संख्या प्ररूपणाके कुछ सूत्रोंकी तुलना दी है। सब प्ररूपणाओंकी
यह तुलना बिम्बप्रतिबिम्बभावको लिये हुए हैं। स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिकारने 'सत्संख्या-' इत्यादि सूत्रकी
प्ररूपणा जीवस्थानके आठ अनुयोगद्वारोंको सामने रख कर की है। सर्वार्थसिद्धि लिखते समय पूज्यपाद
स्वामीके सामने केवल जीवस्थान ही उपस्थित नहीं था किन्तु जीवस्थानकी चूलिका व दूसरे खण्ड भी उनके
सामने रहे हैं। इसके लिए तत्त्वार्थसूत्रके प्रथम अध्यायके 'निर्देशस्वामित्व-' इत्यादि सूत्रकी सर्वार्थसिद्धि
टीका देखिए। इसमें सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके कारणोंका निर्देश जीवस्थान चूलिका अनुयोगद्वारके आधारसे
किया है। तथा उपशम आदि सम्यक्त्वोंके कालका निर्देश क्षुल्लकबन्धके आधारसे किया है।
आ० कुन्दकुन्दका साहित्य—जैनपरम्परामें श्रुतधर आचार्योंमें समयप्रभावक जितने आचार्य हुए हैं
उनमें आचार्य कुन्दकुन्दका नाम प्रमुखरूपसे लिया जाता है। कुछ तथ्योंके आधारपर कहा जाता है कि इन्हें
विदेह क्षेत्रमें स्थित सीमन्धर तीर्थंकरके साक्षात् दर्शन और उपदेश श्रवणका लाभ मिला था और इन्हें चारण-
ऋद्धि प्राप्त थी। इन्होंने जैनतत्त्वज्ञानकी स्पष्ट दिशाका प्रतिपादन कर समग्र जैनपरम्पराको प्रभावित किया है।
जैनतत्त्वज्ञान व्यक्तिस्वातन्त्र्यका समर्थक है और उसकी प्राप्तिका एकमात्र मार्ग स्वावलम्बन है इस तथ्यको
संसारके सामने जितने सुन्दर शब्दोंमें इन्होंने रखा है उसकी तुलना अन्य किसीसे नहीं की जा सकती है।
वे जैनपरम्परामें ऐसे प्रकाशमान् सूर्य थे जिनसे दशों दिशाएँ आलोकित हुई हैं। बोधप्राभृतमें एक गाथा आयी
है^१ जिसमें इन्होंने अपनेको श्रुतकेवली भद्रबाहुका गमक शिष्य घोषित किया है। समयप्राभृतका प्रारम्भ
करते हुए वे कहते हैं कि 'मैं श्रुतकेवलीके द्वारा कहे गये समयप्राभृतका कथन करता हूँ।' उनके ये वचन
आकस्मिक नहीं हो सकते। बहुत सम्भव है कि उन्हें भद्रबाहु श्रुतकेवलीके तत्त्वज्ञानका लाभ मिला हो; क्योंकि
इनके द्वारा निर्मित साहित्यमें जो विशेषता है वह आकस्मिक नहीं हो सकती। वस्त्र-पात्रके स्वीकार की
चर्चाने जैनपरम्पराके तत्त्वज्ञानको बहुत अधिक धूमिल किया है। एकमात्र इनके द्वारा रचित साहित्यकी
पूर्वपरम्परा ही ऐसी प्रकाशकिरण है जो इस अन्धकारका विच्छेद कर सन्मार्गका प्रकाश करती है। एक ओर
आत्मा और परनिरपेक्ष आत्मीय भावोंको छोड़कर अन्य सबको यहाँतक कि आत्मामें जायमान नैमित्तिक
भावोंको भी पर कहना और दूसरी ओर वस्त्र-पात्रके स्वीकारको व्यक्तिस्वातन्त्र्यका मार्ग बतलाना इसे तत्त्व-
ज्ञानकी कोरी विडम्बनाके सिवा और क्या कहा जा सकता है। हमारा तो दृढ़ विश्वास है कि प्रत्येक
व्यक्तिकी स्वतन्त्र सत्ताकी उद्घोषणा करनेवाला और ईश्वरवादके निषेध द्वारा निमित्तकी प्रधानताको अस्वी-
कार करनेवाला धर्म मोक्षमार्गमें निमित्तरूपसे वस्त्र-पात्रके स्वीकारका कभी भी प्रतिपादन नहीं कर सकता।
आचार्य कुन्दकुन्दने यदि किसी तथ्यको स्पष्ट किया है तो वह एकमात्र यहो हो सकता है। कुछ विद्वान् समझते
हैं कि उन्हें नाग्न्यका एकान्त आग्रह था और उनके बाद ही जैनपरम्परामें इसपर विशेष जोर दिया जाने लगा
था। किन्तु मालूम होता है कि वे इस उपालम्भ द्वारा जैनदर्शनकी दिशा ही बदल देना चाहते हैं। जैनदर्शनमें
वस्तुका विचार एकमात्र व्यक्तिस्वातन्त्र्यके आधारपर ही किया गया है अतएव उसकी प्राप्तिका मार्ग स्वाव-
लम्बनके सिवा और क्या हो सकता है। एक व्यक्ति द्वारा अन्य पदार्थोंका स्वीकार उसकी चंचलता और
कषायके कारण ही होता है। यह नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति वस्त्र और पात्रको भी स्वीकार करे और
वह परिग्रहहीन भी माना जाये। स्पष्ट है कि आचार्य कुन्दकुन्दने नाग्न्यकी घोषणा कर उसी मार्गका प्रतिपादन
किया है जिसे अनन्त तीर्थंकर अनादि कालसे दिखलाते आये हैं। ऐसे महान् आचार्यकी कृतिरूपसे इस समय
समयप्राभृत, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, नियमसार, द्वादश अनुप्रेक्षा और अष्टप्राभृत उपलब्ध होते हैं।
कहा जाता है कि मूलाचार (आचारांग) भी उन्हीं की अनुपम कृति है। किन्तु यह प्रश्न अभी विचाराधीन
है और इसपर ऐतिहासिक व साहित्यिक तथ्योंके आधारसे विशेष प्रकाश डालनेकी आवश्यकता है। आचार्य
कुन्दकुन्दके सामने तो इनका साहित्य था ही आचार्य पूज्यपादने भी इसका उपयोग किया है यह बात सर्वार्थ-
सिद्धिके आलोडनसे भलीभाँति विदित होती है। आचार्य पूज्यपादने ऐसी १० गाथाएँ उद्धृत की हैं जिनमेंसे
१. 'बारहअङ्गवियाणी चउदसपुव्वंगविडुलववच्छरणं । सुयणणि भद्दबाहू गमयगुरू भयवओ जयउ ।।'