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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 558 में से

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पृष्ठ 44

४० सर्वार्थसिद्धि
हम इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी प्रसिद्ध टीका लिखते समय
तत्त्वार्थवार्तिक अवश्य था । तुलनाके लिए देखिए—
'अर्थवशाद् विभक्तिपरिणामो भवति । तद्यथा— उच्चानि देवदत्तस्य गृहाण्यामन्त्रयस्वैनम् । देवदत्त-
मिति गम्यते ।
—तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ७ ।
'अर्थवशाच्च विभक्तिपरिणामः उच्चैर्गृहाणि देवदत्तस्यामन्त्रयस्वैनमिति ।'
—सि० टी० उत्थानिका श्लोक ६ की टीका ।
इसी प्रकार समानता सूचक और भी वाक्य उपलब्ध होते हैं—जिनका निर्देश पं० परमानन्दजी
शास्त्रीने अनेकान्त वर्ष ३ किरण ११ में 'सिद्धसेनके सामने सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिक' लेखमें किया है ।
इन समानता सूचक वाक्योंके अतिरिक्त सिद्धसेनगणिकी टीकामें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जिनके
आधारसे उसकी स्थिति तत्त्वार्थवार्तिकके बाद स्थिर होनेमें विशेष सहायता मिलती है । यथा—तत्त्वार्थ-
वार्तिकमें नरकायुके कारणोंकी व्याख्या करते हुए यह वाक्य आता है—
'बह्वारम्भाः परिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः'
इसी बातको सिद्धसेनगणि मतभेदके साथ इन शब्दोंमें व्यक्त करते हैं—
'अपरे ब्रुवते—बह्वारम्भाः परिग्रहा यस्यासौ बह्वारम्भपरिग्रहः ।
इस पदकी व्याख्या सर्वार्थसिद्धिमें भी उपलब्ध होती है । इसलिए इसपरसे यह कहा जा सकता है
कि सिद्धसेनगणिने यह मतभेद सर्वार्थसिद्धिको लक्ष्यमें रखकर व्यक्त किया होगा । किन्तु सर्वार्थसिद्धिमें उक्त
पदके किये गये विग्रहसे पूर्वोक्त विग्रहमें मौलिक अन्तर है। सर्वार्थसिद्धिमें यह विग्रह इस प्रकार उपलब्ध
होता है—
'बहव आरम्भपरिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः ।
किन्तु सिद्धसेनगणिकी टीका इस विषयमें तत्त्वार्थवार्तिकका अनुसरण करती है सर्वार्थसिद्धिका
नहीं । अतएव इसपरसे यह माननेके लिए बाध्य होना पड़ता है कि सिद्धसेनगणिको यहाँपर 'अपरे' पदसे
तत्त्वार्थवार्तिककार अभिप्रेत रहे हैं ।
सिद्धसेनगणिकी टीकामें ऐसे और भी पाठ² या मतभेदके उल्लेख उपलब्ध होते हैं जो तत्त्वार्थवार्तिक-
की ओर संकेत करते हैं ।
इससे इस बातके स्पष्ट होते हुए भी कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी टीका लिखते
समय तत्त्वार्थवार्तिक उपस्थित था, यहाँ तत्त्वार्थभाष्यकी उत्तरावधि निश्चित करनी है और इसके लिए हमें
तत्त्वार्थभाष्यके साथ तत्त्वार्थवार्तिकका तुलनात्मक विचार करना है ।
प्रायः यह तो सभी मनीषियोंने स्वीकार किया है कि तत्त्वार्थवार्तिक सर्वार्थसिद्धिको पचा कर लिखा
गया है और इस बातके भी स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिकके पहलेकी रचना होनी
चाहिए । इसके लिए हमें अन्यत्र प्रमाण खोजनेकी आवश्यकता नहीं है किन्तु स्वयं तत्त्वार्थवार्तिक इसका साक्षी
है । सर्वप्रथम तत्त्वार्थवार्तिककी उत्थानिकाको ही लीजिए । तत्त्वार्थसूत्रकी रचना किस निमित्तसे हुई है इस
विषयमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें व्याख्याभेद है । सर्वार्थसिद्धिमें स्वीकार किया गया है कि कोई भव्य
मुनियोंकी सभामें बैठे हुए आचार्यवर्यसे प्रश्न³ करता है कि भगवन् ! आत्माका हित क्या है ? आचार्यवर्य
उत्तर देते हैं कि 'मोक्ष' । वह पुनः प्रश्न करता है कि इसकी प्राप्तिका उपाय क्या है और इसीके उत्तर स्वरूप
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें यह उत्थानिका दूसरे प्रकारसे निर्दिष्ट की गयी है ।¹ वहीं
१. इसके लिए प्रथम सूत्रकी उत्थानिका व अध्याय ६ सूत्र १६, १७, १८ आदि देखिए । २. देखो सर्वार्थ-
सिद्धि पृ० १ । ३. देखो तत्त्वार्थभाष्य उत्थानिका श्लोक ३१ ।