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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 558 में से

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४२ सर्वार्थसिद्धि
स्थित था। किन्तु उनके इस मतको श्री पं० जुगलकिशोरजी मुख्तार स्वीकार नहीं करते।१ श्री पं० कैलाश-
चन्द्रजी शास्त्रीका भी यही मत है।२
हमारा विचार है कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थभाष्यमें जो सूत्रपाठ स्वीकार किया है वह तत्त्वार्थ-
भाष्य लिखनेके पूर्व अवस्थित था इस विषयका पोषक कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। आचार्य पूज्यपादने और
सिद्धसेनगणिने अपनी टीकाओंमें जगह-जगह सूत्रपाठ सम्बन्धी जिस मतभेदकी३ चर्चा की है उसका सम्बन्ध
भी तत्त्वार्थभाष्य मान्य सूत्रपाठसे नहीं है। ऐसी अवस्थामें यह मानना कि भट्ट अकलंकदेवके सामने वाचक
उमास्वातिका तत्त्वार्थभाष्य नहीं था, हमें शिथिल प्रतीत होता है। तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयीं दिगम्बर और
श्वेताम्बर समस्त टीकाओंके अवलोकनसे केवल हम इतना निश्चय कर सकते हैं कि जिस महान् आचार्यने
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र पर कोई भाष्य या वृत्ति ग्रन्थ नहीं लिखा था। तत्त्वार्थसूत्रमें
सूत्र विषयक जो विविध मतभेद दिखाई देते हैं वे इसके प्रमाण हैं। यह बात स्पष्ट है कि आचार्य पूज्यपादके
काल तक वे मतभेद बहुत ही स्वल्पमात्रामें रहे हैं। किन्तु मूल सूत्रपाठ सर्वार्थसिद्धि द्वारा दिगम्बर परम्परा मान्य
हो जाने से दूसरी ओर इसकी बलवती प्रतिक्रिया हुई और मूल सूत्रपाठको तिलांजलि दे दी गयी। परिणाम
स्वरूप सूत्रपाठके स्वरूपके विषयमें न केवल मतभेद बढ़ने लगा अपि तु स्वतन्त्र सूत्रपाठके स्थिर करनेका भी
भाव जागृत हुआ। इन सारे घटना क्रम व तथ्योंके आधारसे हमारा तो यही विचार पुष्ट होता है कि स्वयं
वाचक उमास्वातिने अपने तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठको अन्तिम रूप दिया होगा और आगे यह पाठभेद सम्बन्धी
मतभेद उग्र रूप धारण न करे इसलिए उन्होंने ही उसपर अपना प्रसिद्ध तत्त्वार्थाधिगमभाष्य लिखा होगा।
यह ठीक है कि वाचक उमास्वातिके पहले अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने मूल तत्त्वार्थसूत्रमें काट-छांट चालू कर दी
थी४ और वाचक उमास्वातिको उसका वारसा मिला है। मूल यदि पं० जुगुलकिशोरजी मुख्तार इसी अभिप्रायको
ध्यानमें रखकर इस मतका प्रस्थापन करते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ वाचक उमास्वातिके भी पूर्व उप-
स्थित था तो यह कथन कुछ अंशमें सम्भव हो सकता है पर इससे तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थभाष्य
उपस्थित था इस मतपर रंचमात्र भी आंच नहीं आती, क्योंकि तत्त्वार्थवार्तिकमें केवल तत्त्वार्थभाष्य मान्य
सूत्रविषयक मतभेदोंका ही उल्लेख नहीं है अपितु कुछ ऐसे मतोंका भी उल्लेख है जिनका सीधा सम्बन्ध
तत्त्वार्थभाष्यसे है।
इस प्रकार इन प्रमाणोंके प्रकाशमें यह मान लेनेपर भी कि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिकके पहले
कभी लिखा गया है, फिर भी वह कब लिखा गया है यह विचारणीय हो जाता है। इसका हमें कई दृष्टियोंसे
पर्यालोचन करना है। पर्यालोचनके विषय ये हैं—१. अन्य टीकाओंके उल्लेख, २. सूत्रोल्लेख, और ३. अर्थ
विकास।
१. अन्य टीकाओंके उल्लेख—अभी तक प्रचलित परम्पराके अनुसार साधारणतः यह माना जाता है
कि दिगम्बर परम्परामान्य सूत्रपाठकी प्रथम टीका सर्वार्थसिद्धि है और श्वेताम्बर परम्परामान्य तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रथम टीका तत्त्वार्थभाष्य है। तत्त्वार्थभाष्यके विषयमें तो कुछ विद्वान् यह भी मानते हैं कि वह तत्त्वार्थसूत्र-
कारकी ही मूल कृति है५ और इस आधारसे वे यह निष्कर्ष फलित करते हैं कि आचार्य पूज्यपादने मूल
सूत्रपाठमें सुधार करके सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठकी रचना की है जो आज दिगम्बर परम्परामें प्रचलित है।
किन्तु इन टीकाग्रन्थों और अन्य प्रमाणोंसे जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे यह विषय बहुत कुछ विचारणीय
हो जाता है। पहले हम सर्वार्थसिद्धिमें दो पाठभेदोंका उल्लेख कर आये हैं। उनमेंसे दूसरा पाठभेद यदि सूत्र-
पोथीके आधारसे ही मान लिया जाये तो भी प्रथम पाठभेदको देखते हुए यह अनुमान करना सहज हो जाता
१. देखो अनेकान्त वर्ष ३ किरण ४, ११ व १२ । २. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना
पृ० ९ आदि । ३. देखो सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १६ व अ० २ सू० ५३ तथा सिद्धसेनकी टीका अ० १
सू० व अ० ५ सू० ३ आदि । ४. देखो चालू प्रस्तावनाका ‘सूत्रपाठोंमें मतभेद’ प्रकरण । ५. देखो
पं० सुखलालजी की तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri