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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 558 में से

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पृष्ठ 47

प्रस्तावना ४३
है कि सर्वार्थसिद्धिकारके सामने कोई छोटा-मोटा टीका ग्रन्थ अवश्य था। अन्यथा वे पाठविषयक मतभेदको
स्पष्ट करते हुए यह न कहते- 'त एवं वर्णयन्ति' इत्यादि ।
तत्त्वार्थवार्तिकमें अध्याय पाँच सूत्र चारका विवरण लिखते समय यह प्रश्न उठाया गया है कि 'वृत्तिमें
पाँच¹ ही द्रव्य कहे हैं, इस लिए छह द्रव्योंका उपदेश घटित नहीं होता।' आगे इसका समाधान करते हुए
तत्त्वार्थवार्तिककार कहते हैं कि 'वृत्तिकारका आप अभिप्राय नहीं समझे। आगे काल द्रव्यका निर्देश किया
जानेवाला है उसकी अपेक्षा न कर यहाँ वृत्तिकारने पाँच द्रव्य कहे हैं।'
इसी प्रकार एक प्रश्न इस अध्यायके ३७वें सूत्रका विवरण लिखते समय भी उठाया गया है। वहाँ
कहा गया है कि 'गुण यह संज्ञा अन्य सम्प्रदायके ग्रन्थोंमें उल्लिखित है आर्हंत मतमें तो केवल द्रव्य और
पर्यायका ही निर्देश किया है। अतः तत्त्व दो ही सिद्ध होते हैं और इनके आश्रयसे द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक
ये नय भी दो ही बनते हैं। यदि गुण नामका कोई पदार्थ है तो उसको विषय करनेवाला एक तीसरा नय
अवश्य होना चाहिए। यतः तीसरा नय नहीं है अतः गुण नामका कोई तीसरा पदार्थ सिद्ध नहीं होता है और
इसीलिए 'गुणपर्ययवद्द्रव्यम्' यह सूत्र भी घटित नहीं होता।' आगे इसका समाधान करते हुए कहा गया
है कि 'यह बात नहीं है, क्योंकि अर्हत्प्रवचनहृदय आदि ग्रन्थोंमें गुणका उपदेश दिया गया है। और इसके आगे
'उक्तं हि अर्हत्प्रवचने द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' यह वाक्य आया है।
तत्त्वार्थवार्तिकके ये दो उल्लेख हैं जिनसे अन्य वृत्ति तथा ग्रन्थान्तरकी सूचना मिलती है। प्रथम उल्लेखसे
हम जानते हैं कि तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी कोई एक वृत्ति थी जिसमें 'नित्यावस्थि-
तान्यरूपणि' सूत्रका विवरण लिखते समय पाँच द्रव्योंका विधान किया गया था और जिसका सामंजस्य
तत्त्वार्थवार्तिककारने यहाँ बिठलाया है। तथा दूसरे उल्लेखसे इस बातका अनुमान किया जा सकता है कि
तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने एक दूसरा अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन नामका स्वतन्त्र ग्रन्थ अवश्य था जो
न केवल सूत्रशैलीमें लिखा गया था अपितु उसमें 'द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' यह सूत्र भी मौजूद था और
सम्भवतः उसे तत्त्वार्थवार्तिककार अति प्राचीन भी मानते रहे तभी तो प्रकृतमें गुणके समर्थनमें उन्होंने उसका
उल्लेख किया है।
यह अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन क्या है यह प्रश्न बहुत गम्भीर है। इसका उल्लेख तत्त्वार्थ-
भाष्यकार वाचक उमास्वातिने भी किया है। वे लिखते हैं कि मैं ²'अर्हद्वचनके एकदेशके संग्रहरूप और बहुत
अर्थवाले तत्त्वार्थाधिगम नामके लघुग्रन्थका शिष्योंकी हितबुद्धिसे कथन करता हूँ। इसी प्रकार अमृतचन्द्र
आचार्यने भी समयप्राभृतकी टीकामें³ समयप्राभृतको अर्हत्प्रवचनका अवयव कहा है। इन दोनों स्थलोंपर
साधारणतः अर्हद्वचन या अर्हत्प्रवचनसे द्वादशांगका बोध होता है। किन्तु जब भट्ट अकलंक देव अर्हत्प्रवचन-
हृदय या अर्हत्प्रवचन नामके स्वतन्त्र ग्रन्थका उल्लेख करते हैं। इतना ही नहीं वे उसके एक वचनको उद्धृत
भी करते हैं जो तत्त्वार्थसूत्रके सूत्रसे बिलकुल मिलता जुलता है तब यह प्रश्न अवश्य होता है कि क्या ऐसा
कोई महान् ग्रंथ रहा है जिसमें समग्र जैनसिद्धान्तका रहस्य अन्तर्निहित था और जिसका उल्लेख करना सबके
लिए अनिवार्य था। जो कुछ भी हो एक बात स्पष्ट है कि तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थकी उपलब्ध
टीकाओंके अतिरिक्त कोई अन्य वृत्ति अवश्य रही है जो सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यसे भिन्न थी और बहुत
सम्भव है कि उसी वृत्तिका उल्लेख उन्होंने तत्त्वार्थवार्तिकमें किया है।
इसी प्रसंगसे हमने सिद्धसेनगणिकी टीकाका भी आलोडन किया है। इस सम्बन्धमें हम पहले ही
कह आये हैं कि सिद्धसेन गणिकी टीका अनेक सूत्र विषयक मत मतान्तरों और उल्लेखोंको लिये हुए है।
उसका बारीकीसे पर्यालोचन करनेपर यह भी विदित होता है कि उनके सामने न केवल सर्वार्थसिद्धि,
१. वृत्तौ पञ्चत्ववचनात् षड्द्रव्योपदेशव्याघात इति चेत्, न, अभिप्रायपरिज्ञानात् । २. 'तत्त्वार्थाधिगमाख्यं
बह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् । वक्ष्यामि शिष्यहितमिममहंद्रचनैकदेशस्य ।।२२.।' ३. 'प्राभृताह्वयस्यार्हत्प्रवचना-
वयवस्य' गा. १. टीका।