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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 558 में से

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पृष्ठ 49

तत्त्वार्थभाष्यमें सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठकी अपेक्षा 'द्रव्य' पदके विशेषणरूपसे 'सर्व' पद अधिक
स्वीकार किया गया है। किन्तु जब वे ही तत्त्वार्थभाष्यकार इस सूत्रके उत्तरार्धको अध्याय १ सूत्र २० के
भाष्यमें उद्धृत करते हैं तब उसका रूप सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ ले लेता है। यथा -
'अत्राह - मतिश्रुतयोस्तुल्यविषयत्वं वक्ष्यति - 'द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु' इति'
कदाचित् कहा जाय कि इस उल्लेखमेंसे लिपिकारकी असावधानीवश 'सर्व' पद छूट गया होगा किन्तु
यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि अपनी टीकामें सिद्धसेनगणि और हरिभद्रने भी तत्त्वार्थभाष्यके इस अंशको
इसी रूपमें स्वीकार किया है। प्रश्न यह है कि जब तत्त्वार्थभाष्यकारने उक्त सूत्रका उत्तरार्ध 'सर्वद्रव्ये-
ष्वसर्वपर्यायेषु' स्वीकार किया तब अन्यत्र उसे उद्धृत करते समय वे उसके 'सर्व' पदको क्यों छोड़ गये ।
पदका विस्मरण हो जानेसे ऐसा हुआ होगा यह बात बिना कारणके कुछ नपी-तुली प्रतीत नहीं होती ।
यह तो हम मान लेते हैं कि प्रमादवश या जान-बूझकर उन्होंने ऐसा नहीं किया होगा फिर भी यदि विस्मरण
होनेसे ही यह व्यत्यय माना जाये तो इसका कोई कारण अवश्य होना चाहिए। हमारा तो खयाल है कि
तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय उनके सामने सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ अवश्य रहा है और हमने क्या पाठ
स्वीकार किया है इसका विशेष विचार किये बिना उन्होंने अनायास उसके सामने होनेसे सर्वार्थसिद्धामान्य
सूत्रपाठका अंश यहाँ उद्धृत कर दिया है। यह भी हो सकता है कि अध्याय १ सूत्र २० का भाष्य लिखते
समय तक वे यह निश्चय न कर सके हों कि क्या इसमें 'सर्व' पदको 'द्रव्य' पदका विशेषण बनाना आवश्यक
होगा या जो पुराना सूत्रपाठ है उसे अपने मूलरूपमें ही रहने दिया जाय और सम्भव है कि ऐसा कुछ निश्चय
न कर सकनेके कारण यहाँ उन्होंने पुराने पाठको ही उद्धृत कर दिया हो। हम यह तो मानते हैं कि
तत्त्वार्थभाष्य प्रारम्भ करनेके पहले ही वे तत्त्वार्थसूत्रका स्वरूप निश्चित कर चुके थे फिर भी किसी खास
सूत्रके विषयमें शंकास्पद बने रहना और तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय उसमें परिवर्तन करना सम्भव है। जो
कुछ भी हो इस उल्लेखसे इतना निश्चय करनेके लिए तो बल मिलता ही है कि तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय
वाचक उमास्वातिके सामने सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ अवश्य होना चाहिए।
३. अर्थ विकास - इसी प्रकार इन दोनोंके बिम्बप्रतिबिम्बभाव और कहीं-कहीं वस्तुके विवेचनमें
तत्त्वार्थभाष्यमें अर्थ विकासके स्पष्ट दर्शन होनेसे भी उक्त कथनकी पुष्टि होती है। उदाहरणार्थ - दसवें
अध्यायमें 'धर्मास्तिकायाभावात्' सूत्र आता है। इसके पहले यह बतला आये हैं कि मुक्त जीव अमुक-अमुक
कारणसे ऊपर लोकके अन्त तक जाता है। प्रश्न होता है कि वह इसके आगे क्यों नहीं जाता हैं और इसीके
उत्तरस्वरूप इस सूत्रकी रचना हुई है। किन्तु यदि टीकाको छोड़ कर केवल सूत्रोंका पाठ किया जाय तो यहाँ
जाकर रुकना पड़ता है और मनमें यह शंका बनी ही रहती है कि धर्मास्तिकाय न होनेसे आचार्य क्या
बतलाना चाहते हैं। सूत्रपाठकी यह स्थिति वाचक उमास्वातिके ध्यानमें आयी और उन्होंने इस स्थितिको साफ
करनेकी दृष्टिसे ही उसे सूत्र न मानकर भाष्यका अंग बनाया है। यह क्रिया स्पष्टतः बादमें की गयी जान
पड़ती है। इसी प्रकार इसी अध्यायके सर्वार्थसिद्धामान्य दूसरे सूत्रको लीजिए। इसके पहले मोहनीय आदि
कर्मोंके अभावसे केवलज्ञानकी उत्पत्तिका विधान किया गया है। किन्तु इनका अभाव क्यों होता है इसका
समुचित उत्तर उस सूत्रसे नहीं मिलता और न ही सर्वार्थसिद्धिकार इस प्रश्नको स्पर्श करते हैं। किन्तु
वाचक उमास्वातिको यह त्रुटि खटकती है। फलस्वरूप वे सर्वार्थसिद्धामान्य 'बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां
कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः' इस सूत्रके पूर्वार्धको स्वतन्त्र और उत्तरार्धको स्वतन्त्र सूत्र मानकर इस कमीकी
पूर्ति करते हैं। सर्वार्थसिद्धिमें जब कि इसका सम्बन्ध केवल 'कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षः' पदके साथ जोड़ा गया है
वहाँ वाचक उमास्वाति इसे पूर्वसूत्र और उत्तरसूत्र दोनोंके लिए बतलाते हैं।
ऐसी ही एक बात, जो विशेष ध्यान देने योग्य है, पाँचवें अध्यायके कालके उपकारके प्रतिपादक सूत्रके
प्रसंगसे आती है। प्रकरण परत्व और अपरत्वका है। ये दोनों कितने प्रकारके होते हैं इसका निर्देश सर्वार्थसिद्धि
और तत्त्वार्थभाष्य दोनोंमें किया है। सर्वार्थसिद्धिमें इनके प्रकार बतलाते हुए कहा है- परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते