सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ सर्वार्थसिद्धि
है और सचेलकत्वसे तात्पर्य गृहस्थधर्म या श्रावकधर्मसे है। श्रावकधर्म मुनिधर्मका अपवादमार्ग है। जहाँ
गृहस्थ सब प्रकारकी हिंसा, असत्य, स्तेय और अब्रह्मका परिहार कर मुनि होता है वहाँ उसे सब प्रकारके
परिग्रहका परिहार करना भी आवश्यक होता है। श्वेताम्बर अंगश्रुत और प्रकीर्णक साहित्यमें वस्त्र और
पात्रके स्वीकार करनेको भी संयमका साधन माना गया है किन्तु संयमका साधन वह हो सकता है जो शरीर
की सुविधाके लिए आवश्यक न होकर मात्र प्राणिपीड़ा परिहारके लिए स्वीकार किया जाता है। किन्तु वस्त्र
और पात्र प्राणिपीड़ा परिहारके लिए स्वीकार किये जाते हैं यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि
इन साधनोंसे उक्त कार्य दृष्टिगोचर नहीं होता। दूसरे इन्हें उक्त कार्यका अनिवार्य अंग मानकर चलने पर
नग्नता और पाणिपात्रत्वका विधान करना नहीं बन सकता है। किन्तु हम देखते हैं कि श्वेताम्बर आगममें
अचेलत्व और पाणिपात्रत्वका भी विधान है अतः वस्त्र और पात्र उन्हींके मतसे संयमके उपकरण नहीं हो
सकते। एक चरचा उत्सर्ग और अपवादलिंगकी की जाती है। यह कहा जाता है कि नग्नता और पाणिपात्रत्व
उत्सर्ग लिंग है किन्तु इसका अपवाद भी होना चाहिए और अपवादरूपमें ही वस्त्र और पात्र स्वीकार किये
जाते हैं। हम मानते हैं कि प्रत्येक उत्सर्गका अपवाद होता है और यह व्यवस्था श्रमण परम्पराने भी स्वीकार
की है। तभी तो वह मुनिधर्म और गृहस्थधर्म इन दो भेदों का निर्देश करती है। मुनिधर्म उत्सर्ग लिंग है और
गृहस्थधर्म उसका अपवाद है। इसलिए वस्त्र और पात्रका स्वीकार मुनि आचारका अंग नहीं बन सकता है।
भले ही दुर्भिक्षके समय ऐसी परिस्थिति रही है जिससे उस समय उत्तर भारतमें जो साधु रह गये थे उन्हें
वस्त्र और पात्र स्वीकार करने पड़े थे। इतना ही नहीं उन्हें कारणवश दण्ड भी स्वीकार करना पड़ा था।
किन्तु इन्हें साधुका चिह्न मान लेना मुनि मार्गके विरुद्ध है। यह हम पहले ही बतला आये हैं कि जो कमजोरी-
वश वस्त्रादिकको स्वीकार करते हैं वे श्रावक होते हैं। उनके परिणाम मुनिधर्मके अनुकूल नहीं हो सकते।
इस स्थितिके होते हुए भी आग्रहवश श्वेताम्बर अंगश्रुतमें वस्त्र, पात्रादिको साधुके अंग मानकर उनके
जिनकल्प और स्थविरकल्प ये दो भेद कर दिये गये हैं। इस कारण प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीको भी उसकी
पुष्टिके लिए बाध्य होना पड़ा है। अन्यथा उन्हें जिन तथ्योंके निर्देशमें साम्प्रदायिकताकी गन्ध आती है उन्हें वे
न केवल तात्त्विक दृष्टिसे स्वीकार करते अपितु वे परिस्थितिवश श्रमण परम्परामें हुई एक बहुत बड़ी गलतीका
परिहारकर आगेका पथ प्रशस्त करनेमें सहायक होते।
यह हम पहले संकेत कर आये हैं कि पण्डितजीने सर्वार्थसिद्धिमेंसे ऐसी चार बातें चुनी हैं जिनका
निर्देश वे साम्प्रदायिक कोटिका मानते हैं। सर्वार्थसिद्धिमें निर्णायक रूपसे काल तत्त्वका विधान किया गया है
जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें मतविशेषके रूपमें उसका उल्लेख है। सर्वार्थसिद्धि केवलिकवलाहार और स्त्री मुक्तिका
निषेधकर नग्न्यको स्वीकार करती है जब कि तत्त्वार्थभाष्य परीषहोंके प्रसंगसे नग्न्यको स्वीकार कर वस्त्र,
पात्र और स्त्री तीर्थंकरका भी विधान करता है। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी यह स्थिति है जिस कारण
पण्डितजीने सर्वार्थसिद्धिके विषयमें अपना उक्त प्रकारका मत बनाया है और इस आधारसे तत्त्वार्थभाष्यको
सर्वार्थसिद्धिसे प्राचीन सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। इस विषयमें पण्डितजीका अभिमत है कि 'साम्प्रदायिक
अभिनिवेश बढ़ जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी थी जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें ऐसे अभिनिवेशका सर्वथा
अभाव है।'
यह तो हम पहले ही बतला आये हैं कि जैन परम्परामें साधुओंने वस्त्र और पात्र किस परिस्थितिमें
स्वीकार किये थे और यह भी उल्लेख कर आये हैं कि श्वेताम्बर अंगश्रुतकी रचना पाँचवीं शताब्दीके बाद
हुई है। अतएव यह भी सुनिश्चित है कि तत्त्वार्थभाष्य उसके बाद ही किसी समय लिखा गया होगा, क्योंकि
पण्डितजीके ही शब्दोंमें 'उन्होंने (तत्त्वार्थभाष्यकारने) तत्त्वार्थकी रचनाके आधाररूप जिस अंग अनंगश्रुतका
अवलम्बन किया था वह पूर्णतया स्थविरपक्षको मान्य था।' इस अभिप्रायसे उक्त कथनकी पुष्टि होती है।
साधारणतः यह मतभेद श्वेताम्बरोय अंगश्रुतके पुस्तकारूढ़ हो जानेके बाद ही उग्ररूपमें प्रकट होने
लगा था; क्योंकि जैनपरम्पराके कहे जानेवाले अंगश्रुत जैसे महत्त्वपूर्ण साहित्यमें सवस्त्र मुक्ति और स्त्रीमुक्ति
जैसे विषयका समावेश होना पुरानी परम्पराको ही नष्ट-भ्रष्ट करनेवाली घटना थी। इस कालमें एक ओर