सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ३७
आग्रह बँध जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी है, जब कि भाष्यमें साम्प्रदायिक अभिनिवेशका यह तत्त्व
दिखाई नहीं देता ।
प्रकृतमें इस विषयपर विचार करनेके पहले पण्डितजी ऐसा लिखनेका साहस क्यों करते हैं इस बात-
का विचार कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है ।
भगवान् महावीर स्वामीके मुक्तिलाभ करनेपर जो पाँच श्रुतकेवली हुए हैं उनमें अन्तिम भद्रबाहु थे ।
इनके समयमें उत्तर भारतमें बारह वर्षका दुर्भिक्ष पड़ा था। इससे संघसहित भद्रबाहु दक्षिणकी ओर विहार
कर गये थे । इस दुर्भिक्षका उल्लेख श्वेताम्बर परम्परा भी करती है और साधुसंघके समुद्रके समीप जाकर
बिखर जानेकी बात स्वीकार करतो है । उस समय भद्रबाहुके मुख्य शिष्य मौर्य चन्द्रगुप्त भी उनके साथ गये
थे और वहाँ पहुँचते-पहुँचते आयु क्षीण हो जानेसे भद्रबाहुने वहीं समाधि ले ली थी । किन्तु कुछ साधु
श्रावकोंके विशेष अनुरोधवश पटना ही रह गये थे और कालान्तरमें परिस्थितिवश उन्होंने वस्त्र स्वीकार कर
लिया था । जिससे जैन परम्परामें श्वेताम्बर संघकी उत्पत्ति मानी जाती है। जब बारह वर्षका दुर्भिक्ष समाप्त
हुआ तब साधु पुनः पटना लौट आये । श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार 'भद्रबाहु उस समय नेपालकी तराईमें
थे और बारह वर्षकी विशेष तपश्चर्या करनेमें लगे हुए थे । साधुसंघने भद्रबाहुको पटना बुलाया किन्तु वे
नहीं आये जिससे उन्हें संघबाह्य करनेकी धमकी दी गयी और किसी प्रकार उन्हें शिष्य समुदायको पढ़ानेके
लिए राजी कर लिया गया । स्थूलभद्रने अंगज्ञान उन्हींसे प्राप्त किया है।'¹ यदि श्वेताम्बर सम्प्रदायके इस
कथनको सत्य मानकर चलें तब भी श्वेताम्बर सम्प्रदायका अपनी परम्पराको स्थूलभद्रसे स्वीकार करना और
पटना वाचनामें भद्रबाहुका सम्मिलित न होना ये दो बातें ऐसी हैं जो उस समय जैनसंघमें हुए किसी बड़े भारी
विस्फोटका संकेत करती हैं । स्पष्ट है कि उस समयकी वाचनाको अखिल जैनसंघका प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं
था और कालान्तरमें जो अंगसाहित्य संकलित और लिपिबद्ध हुआ है वह सवस्त्रसाधुको जैन परम्परामें प्रतिष्ठित
करनेकी दृष्टिसे ही हुआ है । इस समय जो श्वेताम्बर अंग साहित्य उपलब्ध है वह लगभग भगवान् महावीरके
मोक्ष गमनके एक हजार वर्षके बादका ही संकलन है। सोचनेकी बात है कि जब भद्रबाहुके कालमें ही प्रथम
वाचना हुई थी तब उसे उसी समय पुस्तकारूढ़ करके उसकी रक्षा क्यों नहीं की गयी ? घटनाक्रमसे विदित
होता है कि उस समय श्वेताम्बर संघके भीतर हो तीव्र मतभेद¹ रहा होगा और एक दल यह कहता होगा कि
संघभेदकी स्थितिमें भी अंगसाहित्यमें परिवर्तन करना इष्ट नहीं है । बहुत सम्भव है कि यदि उस समय
श्वेताम्बर अंग साहित्य संकलित होकर पुस्तकारूढ़ किया जाता तो उसका वर्तमान में रूप ही कुछ दूसरा
होता ।
यद्यपि श्वेताम्बर अंगसाहित्यमें ऐसे भी उल्लेख दृष्टिगोचर होते हैं जो नग्नताके समर्थक हैं । किन्तु
इन उल्लेखोंको उसकी प्रामाणिकताकी कसौटी नहीं माना जा सकता । वस्तुतः ये परिस्थितिवश स्वीकार किये
गये हैं । प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी इस स्थितिसे अनभिज्ञ हों ऐसी बात नहीं है । वे जानते हुए भी किसी
कारणवश इस स्थितिको दृष्टिओझल करनेके यत्नमें हैं और यह घोषित करनेका प्रयत्न करते हैं कि श्वेताम्बर
अंगश्रुतमें अचेलकत्व समर्थक वाक्य ही भगवान् महावीरकी परम्पराके पूरे प्रतिनिधित्वके सूचक हैं ।²
यह सत्य है कि श्रमण परम्परामें अचेलकत्व और सचेलकत्व दोनोंको स्थान रहा है और यह भी सत्य
है कि अचेलकत्व उत्सर्ग धर्म और सचेलकत्व अपवाद धर्म माना गया है। हमें दिगम्बर परम्पराके साहित्यमें
भी ऐसे उल्लेख उपलब्ध होते हैं जिनसे इस तथ्यकी पुष्टि होती है । किन्तु वहाँ अचेलकत्वसे तात्पर्य मुनिधर्मसे
१. सचेल दलके भीतर तीव्र मतभेदकी बात प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी भी स्वीकार करते हैं । वे लिखते
हैं-'मथुराके बाद बलभीमें पुनः श्रुतसंस्कार हुआ जिसमें स्थविर या सचेल दलका रहा सहा मतभेद भी नाम
शेष हो गया । देखो तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृ० ३० । २. प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीके लेखों का भाव । देखो
तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृ० २९ ।