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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 558 में से

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पृष्ठ 43

प्रस्तावना ३९
जहाँ साम्प्रदायिक अभिनिवेशमें आकर उक्त बातोंका विधान किया जाने लगा था वहाँ दूसरी ओर तात्त्विक-
दृष्टिसे उसका निषेध करना और दर्शनमोहनीयके बन्धका कारण बतलाना अनिवार्य हो गया था। सर्वार्थसिद्धि-
कारने यह कार्य किया है और दृढ़ताके साथ किया है। वस्तुतः उस कालमें तात्त्विक पक्षकी रक्षाका भार
उनपर था और उन्होंने उसका सुन्दरतापूर्वक निर्वाह भी किया है।
ऐसी अवस्थामें हमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यका विचार अन्य प्रमाणोंके आधारसे
करना चाहिए। शैलीभेद, अर्थविकास और साम्प्रदायिकताके आधारसे इसका निर्णय करना गौण है। अतः
आइए, अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें इस तत्त्वका निर्णय किया जाय।
इस समय तत्त्वार्थभाष्यपर मुख्यतया प्रथम दो टीकाएँ उपलब्ध होती हैं-प्रथम हरिभद्रकी टीका¹
और दूसरी सिद्धसेनगणिकी टीका। आचार्य हरिभद्र और सिद्धसेनगणि समकालीन या कुछ आगे पीछेके होते
हुए भी भट्ट अकलंक देवके बादमें हुए हैं। इतना ही नहीं सिद्धसेनगणिने तो भट्ट अकलंक देवकी कृतियोंका
भरपूर उपयोग भी किया है यह उनकी टीकाके देखनेसे भी विदित होता है। किन्तु प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी
इस मतसे सहमत होते हुए भी दूर चले जाते हैं। वे तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० ९६ में लिखते हैं—
'किसी-किसी स्थलपर एक ही सूत्रके भाष्यका विवरण करते हुए वे पाँच-छह मतान्तर निर्दिष्ट करते
हैं, इससे ऐसा अनुमान करनेका कारण मिलता है कि जब सिद्धसेनने वृत्ति रची तब उनके सामने कमसे कम
तत्त्वार्थ सूत्रपर रची हुई पाँच टीकाएँ होनी चाहिए; जो सर्वार्थसिद्धि आदि प्रसिद्ध दिगम्बरीय तीन व्याख्याओंसे
पृथक् होंगी ऐसा मालूम पड़ता है; क्योंकि राजवार्तिक और श्लोकवार्तिककी रचनाके पहले ही सिद्धसेनीय
वृत्तिका रचा जाना बहुत सम्भव है; कदाचित् उनसे पहले यह रची गयी हों तो भी इसकी रचनाके बीचमें
इतना तो कमसे कम अन्तर है ही कि सिद्धसेनको राजवार्तिक और श्लोकवार्तिकका परिचय मिलनेका
प्रसंग ही न आया।'
यहाँ हमें सर्वप्रथम पण्डितजीके इस वक्तव्यकी आलोचना करनी है और इसके वाद देखना है कि
क्या सिद्धसेनगणिकी टीका राजवार्तिकका आलोडन किये बिना लिखी गयी थी।
पण्डितजीने सर्वप्रथम सिद्धसेनगणिकी अध्याय पाँच सूत्र तीनकी टीकाके आधारसे तत्त्वार्थसूत्र पर
लिखी गयी पाँच-छह स्वतन्त्र टीकाओंका अनुमान किया है. इस आधारसे हम इसे ठीक मान लेते हैं। तथापि
इससे यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है कि सिद्धसेनगणिने तत्त्वार्थवार्तिकका आलोडन किये बिना ही
अपनी टीका लिखी थी। इससे तो केवल इतना ही पता लगता हैं कि उनके सामने और भी कई टीकाएँ थीं
जो 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' सूत्रके कई पाठ प्रस्तुत करती थीं। यह स्वतन्त्र विषय है और इसपर स्वतन्त्र-
रूपसे ही विचार होना चाहिए कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी टीका लिखते समय तत्त्वार्थ-
वार्तिक था या नहीं और तत्काल हमें प्रसंगोचित इसी बातका विचार करना है।
इसमें सन्देह नहीं कि सिद्धसेनगणि बहुश्रुत विद्वान् थे। उन्होंने अपनी टीकामें तत्त्वार्थसूत्रके अनेक
पाठान्तरों, मत-मतान्तरों, ग्रन्थों, आचार्यों और प्रमाणोंका उल्लेख किया है, जिनसे अनेक ऐतिहासिक तथ्यों-
पर प्रकाश पड़ता है। इस प्रसंगसे वे भट्ट अकलंक देवके सिद्धिविनिश्चय और तत्त्वार्थवार्तिकको भी नहीं भूले
हैं। अध्याय १ सूत्र ३ की टीकामें सिद्धिविनिश्चयका उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं—
'एवं कार्यकारणसंबन्धः समवायपरिणामनिमित्तनिर्वर्तकादिरूपः सिद्धिविनिश्चयसृष्टिपरीक्षातो
योजनीयो विशेषाथिना दूषणद्वारेणेति ।'
भट्ट अकलंक देवके उपलब्ध साहित्यमें सिद्धिविनिश्चय अन्यतम दर्शनप्रभावक ग्रन्थ है और उसमें सृष्टि-
परीक्षा प्रकरण भी उपलब्ध होता है। इससे निश्चित होता है कि यह उल्लेख इसी सिद्धिविनिश्चयका है।
हमने तत्त्वार्थवार्तिकके साथ भी सिद्धसेनगणिकी उक्त टीकाका तुलनात्मक अध्ययन किया है। इससे
१. हरिभद्रकी टीका तीन लेखकोंने पूरी की है ऐसा प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी तत्त्वार्थसूत्रकी
भूमिका पृ० ९५ में सूचित करते हैं और टीकाके देखनेसे यह मत समीचीन प्रतीत होता है।