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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 558 में से

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पृष्ठ 50

४६ सर्वार्थसिद्धि
कालकृते च स्वतः । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें ये दो भेद तो बतलाये ही गये हैं। साथ ही वहाँ प्रशंसाकृत परत्वा-
परत्वका स्वतन्त्ररूपसे और ग्रहण किया है । वाचक उमास्वाति कहते हैं—परत्वापरत्वे त्रिविधे—प्रशंसाकृते
क्षेत्रकृते कालकृते इति ।
इतना ही नहीं । हम देखते हैं कि इस सम्बन्धमें तत्त्वार्थवार्तिककार तत्त्वार्थभाष्यका ही अनुसरण
करते हैं । उन्होंने कालके उपकारके प्रतिपादक सूत्रका व्याख्यान करते हुए परत्व और अपरत्वके इन तीन
भेदोंका उल्लेख इन शब्दोंमें किया है—
'क्षेत्रप्रशंसाकालनिमित्तात्परत्वापरत्वानवधारणमिति चेत् । न, कालोपकारप्रकरणात्¹ ।'
अतएव क्या इससे यह अनुमान करनेमें सहायता नहीं मिलती कि जिस प्रकार इस उदाहरणसे
तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने था इस कथनकी पुष्टि होती है उसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्य सर्वार्थसिद्धि
के बादकी रचना है इस कथनकी भी पुष्टि होती है ।
स्पष्ट है कि पौर्वापर्यकी दृष्टिसे विचार करनेपर तत्त्वार्थभाष्यका रचनाकाल सर्वार्थसिद्धिके रचे जानेके
बाद स्थिर होता है और सब स्थितियोंका विचार करनेपर यह ठीक भी प्रतीत होता है ।
सर्वार्थसिद्धिमें अन्य साहित्य के उद्धरण—सर्वार्थसिद्धि लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने जो
विपुल साहित्य उपस्थित था उसका अवलम्बन लेकर उन्होंने इस महान् टीका ग्रन्थकी श्रीवृद्धि की है ।
उसमें प्रमुख स्थान जिसे दिया जा सकता है वह है षट्खण्डागम ।
षट्खण्डागम—यह वह महान् निधि है जिसे द्वादशांग वाणीका सीधा वारसा मिला है । आचार्य
पुष्पदन्त और भूतबलीने आचार्य धरसेनके चरणोंमें बैठकर तथा उस कालमें शेष रहे द्वादशांग वाणीके एक-
देशका अभ्यास कर इस महान् ग्रन्थ की रचना की थी । इसके जीवस्थान, क्षुल्लकबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदना,
वर्गणा और महाबन्ध इन छह खण्डोंमें द्वादशांग वाणीका संकलन किया गया है, इसलिए इसे षट्खण्डागम
कहते हैं । सर्वार्थसिद्धिकारके सामने यह महान् ग्रन्थ उपस्थित था और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी
किया है यह बात तत्त्वार्थसूत्र अध्याय एक सूत्र आठकी सर्वार्थसिद्धि टीकाके देखनेसे स्पष्ट ज्ञात होती है ।
इसमें सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व इन आठ अनुयोगोंके द्वारा चौदह गुणस्थान
और चौदह मार्गणाओंके आश्रयसे जीव तत्त्वका जिस प्रकार विचार किया गया है वह अनायास ही पाठकों-
का ध्यान षट्खण्डागमके जीवस्थान खण्डकी ओर आकृष्ट करता है । जीवस्थान खण्डका दूसरा सूत्र है—
'एत्तो इमेसिं चोद्दसण्हं जीवसमासोणं मग्गणट्ठदाए तत्थ इमाणि चोद्दस चेव ठाणाणि णायव्वाणि
भवंति ।'
इसमें चौदह गुणस्थानोंके लिए 'जीवसमास' शब्दका प्रयोग हुआ है । सर्वार्थसिद्धिकारके सामने यह
सूत्र था । उन्होंने भी गुणस्थानके लिए 'जीवसमास' शब्दका उपयोग किया है । यथा—
'एतेषामेव जीवसमासानां निरूपणार्थं चतुर्दश मार्गणास्थानानि ज्ञेयानि ।'
आगे सर्वार्थसिद्धिमें जीवस्थानका किस प्रकार अनुसरण किया गया है इसका आगेकी तालिका द्वारा
स्पष्ट ज्ञान कीजिए—

जीवस्थान सत्प्ररूपणासर्वार्थसिद्धि सत्प्ररूपणा
संतपरूवणादाए दुविहो णिद्देसो—ओघेण आदे-तत्र सत्प्ररूपणा द्विविधा—सामान्येन विशेषेण च ।
सेण य ॥ ८ ॥
ओघेण अत्थि मिच्छादिट्ठी ॥ ९ ॥ सासणसम्मा-सामान्येन अस्ति मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्य-
दिट्ठी ॥ १० ॥........ग्दृष्टिरित्येवमादिः ।

१. अ० ५ सू० २२ तत्त्वार्थवार्तिक ।