सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ सर्वार्थसिद्धि
तत्त्वार्थभाष्य और राजवार्तिक थे अपितु तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी नयी पुरानी और भी अनेक टीकाएँ उनके
सामने रही हैं। यह अनुमान प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीका भी है जिसका निर्देश हम पहले कर आये हैं।
सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवार्तिक और सिद्धसेनगणिकी टीकाके ये वे उल्लेख हैं जिनसे हमें तत्त्वार्थसूत्र
विषयक अन्य अनेक छोटी-बड़ी टीकाओं के अस्तित्वका आभास मिलता है। तत्काल विचारणीय यह है कि
ये सब टीका ग्रन्थ किस आधारसे लिखे गये होंगे। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकमें जिनका उल्लेख है वे
तो स्वतन्त्र होंगे यह स्पष्ट ही है। मात्र विचार उनका करना है जिनका उल्लेख सिद्धसेनगणिने किया है। यह
तो हम स्पष्ट देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके कारण भाष्यानुसारी सूत्रपाठका स्वरूप और अर्थ एक तरहसे सुनि-
श्चित है। जो लिपिकारोंकी असावधानी से थोड़े बहुत दोष उत्पन्न होते हैं वे तत्त्वार्थभाष्यमें भी देखे जाते हैं १।
किन्तु इन दोषोंके कारण तत्त्वार्थभाष्य सम्मत सूत्रपाठमें तत्त्वार्थभाष्यकी उपस्थितिमें पाठान्तर या अर्थान्तरकी
कल्पना करना सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्थामें इन टीका ग्रन्थोंको भी सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिकमें उल्लि-
खित टीका ग्रन्थोंके समान स्वतन्त्र ही मानना पड़ता है। सिद्धसेनगणिने मतभेदोंको दरसाते हुए अन्य मतोंका
जिस रूपमें उल्लेख किया है उससे भी तथ्यकी पुष्टि होती है। ये सब टीकाग्रन्थ कब और किन आचार्योंकी
कृति हैं यह तो हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते हैं। बहुत सम्भव है कि वे सब या उनमेंसे कुछ तत्त्वार्थ-
भाष्यके भी पहले लिखे गये हों और उनके लेखक श्वेताम्बर आचार्य रहे हों। यदि यह अनुमान सही हैं,
जिसके कि सही होनेकी अधिक सम्भावना है, तो यही कहना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्य उस कालकी रचना
है जबकि मूल तत्त्वार्थसूत्रपर अनेक टीका टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं और जिनमेंसे एक सर्वार्थ-
सिद्धि भी है।
२. सूत्रोल्लेख—साधारणतः किसी विषयको स्पष्ट करने, उसकी सूचना देने या अगले सूत्रकी
उत्थानिका बाँधनेके लिए टीकाकार आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते हैं। यह परिपाटी सर्वार्थसिद्धि
और तत्त्वार्थभाष्यमें भी विस्तारपूर्वक अपनायी गयी है। किन्तु आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते समय
इन टीका ग्रन्थोंमें उन्हीं सूत्रपाठोंका उल्लेख किया जाता है जो उन्हें सम्मत होते हैं। उदाहरणार्थ-सर्वार्थ-
सिद्धिकारने अध्याय एकके इक्कीस नम्बरका सूत्र 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इस रूपमें स्वीकार किया
हैं, अतएव वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिका लिखते समय इस सूत्रका इसी रूपमें उल्लेख करते हैं।
इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्यकारने इस सूत्रको 'भवप्रत्ययोऽवधिर्नारकडेवानाम्' इस रूपमें स्वीकार किया है इस-
लिए वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिकामें इसे इसी रूपमें उद्धृत करते हैं। साधारणतः ये टीकाकार
कहीं पूरे सूत्रको उद्धृत करते हैं और कहीं उसके एक अंशको। पर जितने अंशको उद्धृत करते हैं वह
अपनेमें पूरा होता है। ऐसा व्यत्यय कहीं भी नहीं दिखाई देता कि किसी एक अंशको उद्धृत करते हुए भी
वे उसमेंसे समसित प्रारम्भ के किसी पदको छोड़ देते हों।
ऐसी अवस्थामें हम तो यही अनुमान करते थे कि इन दोनों टीका ग्रन्थोंमें ऐसा उद्धरण शायद ही
मिलेगा जिस से इनकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न किया जा सके। इस दृष्टिसे हमने सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थ-
भाष्यका बारीकीसे पर्यालोचन किया है। किन्तु हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्यमें एक
स्थलपर ऐसा स्खलन अवश्य हुआ है, जो इसकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न करता है। यह स्खलन अध्याय १
सूत्र २० का भाष्य लिखते समय हुआ है।
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयका प्रतिपादन करनेवाला सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्र इस प्रकार है-
'मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।'
यही सूत्र तत्त्वार्थभाष्यमें इस रूपमें उपलब्ध होता है-
'मतिश्रुतयोर्निबन्धः सर्वद्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।'
१. देखो अध्याय ६ सूत्र ३ व ४ का तत्त्वार्थभाष्य ।