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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 558 में से

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पृष्ठ 45

प्रस्तावना ४१
बतलाया है कि इस श्लोकमें मोक्षमार्गके बिना हितका उपदेश होना दुर्लभ है, इसलिए मोक्षमार्गका उपदेश
करते हैं। अब इन दोनों उत्थानिकाओंके प्रकाशमें तत्त्वार्थवार्तिक की उत्थानिकाको पढ़िए। देखनेसे विदित
होगा कि इसमें क्रमसे सर्वार्थसिद्धि¹ और तत्त्वार्थभाष्य² इन दोनोंकी उत्थानिकाओंका स्पष्टतः निर्देश किया
है। यही नहीं इसमें तत्त्वार्थभाष्यको उत्थानिकाका निर्देश 'अपरे' पदसे प्रारम्भ किया है। स्पष्ट है कि तत्त्वार्थ-
वार्तिककार सर्वार्थसिद्धिकी उत्थानिकाको दिगम्बर परम्परासम्मत मानते रहे और तत्त्वार्थभाष्यकी उत्थानिका-
को अन्यकी । यह उत्थानिकाकी बात हुई।
आगे सूत्रपाठको देखिए—तत्त्वार्थभाष्यकारने तीसरे अध्यायके प्रथम सूत्रमें 'पृथुतरा:' पाठ अधिक
स्वीकार किया है। श्वेताम्बर आगम साहित्यमें इस अर्थको व्यक्त करनेके लिए 'छत्ताइछत्ता' पाठ उपलब्ध
होता है। तत्त्वार्थभाष्यकारने भी इस पदकी व्याख्या करते हुए 'छत्रातिच्छत्रसंस्थिता:' पद द्वारा उसका
स्पष्टीकरण किया है। यह पाठ सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें नहीं है। तत्त्वार्थवार्तिककारकी न केवल इसपर
दृष्टि पड़ती है अपितु इसे वे आड़े हाथों लेते हैं और यह बतलानेका प्रयत्न करते हैं कि सूत्रमें 'पृथुतरा:'
पाठ असङ्गत है ।
साधारणतः सर्वार्थसिद्धि मान्य सूत्रपाठसे तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें काफी परिवर्तन हुआ है पर
तत्त्वार्थवार्तिककार उन सब सूत्रपाठोंकी चर्चा नहीं करते। वे प्रायः तत्त्वार्थभाष्यके ऐसे ही सूत्रपाठका
विरोध व्यक्त करते हैं जिसे स्वीकार करने पर स्पष्टतः आगम विरोध दिखाई देता है। चौथे अध्यायमें 'शेषाः
स्पर्श-' इत्यादि सूत्र आता है। तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार इस सूत्रके अन्तमें 'द्वयोर्द्वयोः' इतना पाठ अधिक
उपलब्ध होता है। भट्ट अकलंकदेवकी सूक्ष्मदृष्टि इस पाठ पर जाती है और वे आर्षसे विरोध बतला कर इस
अधिक पाठको स्वीकार करना मान्य नहीं करते। इसी प्रकार पाँचवें अध्यायमें 'बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च'
सूत्र आता है। किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें इसका परिवर्तित रूप इस प्रकार उपलब्ध होता है—'बन्धे समाधिकौ
पारिणामिकौ ।'
यह स्पष्ट है कि आगममें बन्धकी जो व्यवस्था निर्दिष्ट की गयी है उसके साथ इस सूत्रमें आये हुए 'सम'
शब्दका मेल नहीं बैठता । तत्त्वार्थवार्तिककारकी दृष्टिसे यह बात भी छिपी नहीं रहती, इसलिए आगमसे
विरोध होनेके कारण वे स्पष्ट शब्दोंमें इसकी अप्रामाणिकता घोषित करते हैं। यही दशा तत्त्वार्थभाष्यमें आये
हुए पाँचवें अध्यायके अन्तिम तीन सूत्रोंकी होती है। वे सूत्र हैं—
'अनादिरादिमांश्च ॥४२॥ रूपिष्वादिमान् ॥४३॥ योगोपयोगौ जीवेषु ॥४४॥'
इन सूत्रोंमें परिणामके अनादि और सादि ये दो भेद करके पुद्गल और जीवके परिणामको सादि कहा
है। साथ ही ४२वें सूत्रके भाष्यमें धर्म, अधर्म, आकाश और जीवके परिणामको अनादि कहा है। इस पर
तत्त्वार्थवार्तिकमें आपत्ति करते हुए कहा है—अत्रान्ये धर्माधर्मकालाकाशेषु अनादिः परिणामः आदिमान् जीव-
पुद्गलेषु वदन्ति तदयुक्तम् ।'
अर्थात् अन्य लोग धर्म, अधर्म, काल और आकाशमें परिणामको अनादि कहते हैं तथा जीव और
पुद्गलोंमें उसे सादि कहते हैं किन्तु उनका ऐसा कहना अयुक्त है।
इसी प्रकार अध्याय १ सूत्र १५ व २१; अध्याय २ सूत्र ७, २० व ३३; अध्याय ४ सूत्र ८; अध्याय
५ सूत्र २-३, अध्याय ६ सूत्र १८ और अध्याय ८ सू० ६ के तत्त्वार्थवार्तिकके देखनेसे भी विदित होता है कि
अकलंकदेवके सामने तत्त्वार्थभाष्य अवश्य था ।
यद्यपि इस विषयमें कुछ मतभेद है। डॉ० जगदीशचन्द्रजीने अनेकान्त वर्ष ३ किरण ४ में इस आशय-
का एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने बतलाया है कि अकलंकदेवके सामने उमास्वाति का तत्त्वार्थभाष्य उप-
१. तत्त्वार्थवार्तिक उत्थानिका पृ० १ । २. तत्त्वार्थवार्तिक उत्थानिका पृ० ३ ।
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