सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
– ८।३ § ७३६ ] अष्टमोऽध्यायः २८७
स्यासंयमः । आयुषो भवधारणम् । नाम्नो नारकादिनामकरणम् । गोत्रस्योच्चैर्नीचैःस्थानसंशब्द-
नम् । अन्तरायस्य दानादिविघ्नकरणम् । तदेवंलक्षणं कार्यं प्रक्रियते प्रभवत्यस्या इति प्रकृतिः ।
तत्स्वभावादप्रच्युतिः स्थितिः । यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां माधुर्यस्वभावादप्रच्युतिः
स्थितिः । तथा ज्ञानावरणादीनामर्थावगमादिस्वभावादप्रच्युतिः स्थितिः । तद्रसविशेषोऽनुभवः ।
यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमन्दादिभावेन रसविशेषः । तथा कर्मपुद्गलानां स्वगत-
सामर्थ्यविशेषोऽनुभवः । इयत्तावधारणं प्रदेशः । कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कन्धानां परमाणुपरिच्छेदे-
नावधारणं प्रदेशः । ‘विधि’-शब्दः प्रकारवचनः । त एते प्रकृत्यादयश्चत्वारस्तस्य बन्धस्य प्रकाराः।
तत्र योगनिमित्तौ प्रकृतिप्रदेशौ । कषायनिमित्तौ स्थित्यनुभवौ । तत्प्रकर्षाप्रकर्षभेदात्तद्बन्धविचित्र-
भावः । तथा चोक्तम्—
“जोगा' पयडि-पएसा ठिदिअणुभागा कसायदो कुणदि ।
अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधट्ठिदिकारणं णत्थि ॥”
संवेदन कराना साता और असाता वेदनीयकी प्रकृति है। तत्त्वार्थका श्रद्धान न होने देना
दर्शनमोहकी प्रकृति है। असंयमभाव चारित्रमोहकी प्रकृति है। भवधारण आयु कर्मकी प्रकृति
है। नारक आदि नामकरण नामकर्मकी प्रकृति है। उच्च और नीच स्थानका संशब्दन गोत्र
कर्मकी प्रकृति है तथा दानादिमें विघ्न करना अन्तराय कर्मकी प्रकृति है। इस प्रकारका
कार्य किया जाता है अर्थात् जिससे होता है वह प्रकृति है। जिसका जो स्वभाव है उससे च्युत
न होना स्थिति है। जिस प्रकार बकरी, गाय और भैंस आदिके दूधका माधुर्यस्वभावसे
च्युत न होना स्थिति है उसी प्रकार ज्ञानावरण आदि कर्मोंका अर्थका ज्ञान न होने देना आदि
स्वभावसे च्युत न होना स्थिति है। इन कर्मोंके रसविशेषका नाम अनुभव है। जिस प्रकार बकरी,
गाय और भैंस आदिके दूधका अलग-अलग तीव्र मन्द आदि रसविशेष होता है उसी प्रकार कर्म
पुद्गलोंका अलग अलग स्वगत सामर्थ्यविशेष अनुभव है। तथा इयत्ताका अवधारण करना प्रदेश
है। अर्थात् कर्मरूपसे परिणत पुद्गलस्कन्धोंका परमाणुओंकी जानकारी करके निश्चय करना
प्रदेशबन्ध है। 'विधि' शब्द प्रकारवाची है। ये प्रकृति आदिक चार उस बन्धके प्रकार हैं। इनमें
से योगके निमित्तसे प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध होता है तथा कषायके निमित्तसे स्थितिबन्ध और
अनुभवबन्ध होता है। योग और कषायमें जैसा प्रकर्षाप्रकर्षभेद होता है उसके अनुसार बन्ध भी
नाना प्रकारका होता है। कहा भी है- 'यह जीव योगसे प्रकृति और प्रदेश बन्धको तथा कषायसे
स्थिति और अनुभाग बन्धको करता है। किन्तु जो जीव योग और कषायरूपसे परिणत नहीं है
और जिनके योग और कषायका उच्छेद हो गया है उनके कर्मबन्धकी स्थितिका कारण नहीं पाया
जाता ।।'
विशेषार्थ- इस सूत्रमें बन्धके चार भेदोंका निर्देश किया है। साम्परायिक आस्रवसे जो भी
कर्म बँधता है उसे हम इन चार रूपोंमें देखते हैं। बँधे हुए कर्मका स्वभाव क्या है, स्थिति कितनी
है, अपने स्वभावानुसार वह न्यूनाधिक कितना काम करेगा और आत्मासे कितने प्रमाणमें व किस
रूपमें वह बन्धको प्राप्त होता है। यही वे चार प्रकार हैं। कर्मके इन चार प्रकारोंके मुख्य कारण
दो हैं-योग और कषाय । योगके निमित्तसे प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध होता है तथा कषायके
निमित्तसे स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध होता है। इसका अर्थ है कि जहाँ योग और कषाय नहीं
है वहाँ कर्मबन्ध भी नहीं है। कषाय दसवें गुणस्थान तक पाया जाता है। ग्यारहवें गुणस्थानमें
जीव कषायरूपसे परिणत नहीं होता और बारहवें गुणस्थानमें उसका उच्छेद अर्थात् अभाव है,
१. मूला० २४४ । पंचसं० ४, ५०७ । गो० क०, गा० २५७ ।
§ ७३७. तत्राद्यस्य प्रकृतिबन्धस्य भेदप्रदर्शनार्थमाह—
आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ॥४॥
§ ७३८. आद्यः प्रकृतिबन्धो ज्ञानावरणाद्यष्टविकल्पो वेदितव्यः । आवृणोत्याव्रियतेऽनेनेति
वा आवरणम् । तत्प्रत्येकमभिसंबध्यते—ज्ञानावरणं दर्शनावरणमिति । वेदयति वेद्यत इति वा
वेदनीयम् । मोहयति १मोह्यतेऽनेनेति वा मोहनीयम् । इत्यनेन नारकादिभवमित्यायुः । नमयत्या-
त्मानं नम्यतेऽनेनेति वा नाम । उच्चैर्नीचैश्च गीयते शब्द्यत इति वा गोत्रम् । दातृदेयादीनामन्तरं
मध्यमेतीत्यन्तरायः । एकेनात्मपरिणामेनादीयमानाः पुद्गला ज्ञानावरणाद्यनेकभेदं प्रतिपद्यन्ते
सकृदुपभुक्तान्नपरिणामरसरुधिरादिवत् ।
§ ७३९. आह, उक्तो मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविधः । इदानीमुत्तरप्रकृतिबन्धो वक्तव्य इत्यत
आह—
इसलिए इस जीवके स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध दसवें गुणस्थान तक ही होता है । आगे ग्यारहवें,
बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें यद्यपि सातावेदनीयका बन्ध होता है पर वहाँ कषाय न होनेसे
उसका प्रकृति और प्रदेशबन्ध ही होता है। यहाँ प्रश्न होता है कि यदि इन गुणस्थानोंमें साता-
वेदनीयका बिना स्थितिके बन्ध होता है तो उसका आत्माके साथ अवस्थान कैसे होगा और यदि
बिना अनुभागसे बन्ध होता है तो उसका विपाक सातारूप कैसे होगा ? समाधान यह है कि इन
गुणस्थानोंमें ईर्यापथ आस्रव होनेसे कर्म आते हैं और चले जाते हैं। उनका दो, तीन आदि समय
तक अवस्थान नहीं होता । इसलिए तो यहाँ स्थितिबन्धका निषेध किया है और अनुभाग भी
कषायके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले अनुभागसे यहाँ प्राप्त होनेवाला अनुभाग अनन्तगुणा हीन होता
है, इसलिए यहाँ अनुभागबन्धका भी निषेध किया है। योग तेरहवें और कषाय दसवें गुणस्थान
तक होता है, इसलिए स्थिति और अनुभागबन्ध दसवें तक और प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध
तेरहवें तक होते हैं। अयोगिकेवली गुणस्थानमें योगका अभाव है इसलिए वहाँ किसी प्रकारका भी
बन्ध नहीं होता । इस प्रकार यहाँ बन्धके भेद और उनके कारणोंका विचार किया ।
§ ७३७. अब प्रकृतिबन्धके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पहला अर्थात् प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र
और अन्तरायरूप है ॥४॥
§ ७३८. आदिका प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरणादि आठ प्रकारका जानना चाहिए । जो आवृत्त
करता है या जिसके द्वारा आवृत्त किया जाता है वह आवरण कहलाता है । वह प्रत्येकके साथ
सम्बन्धको प्राप्त होता है यथा-ज्ञानावरण और दर्शनावरण । जो वेदन कराता है या जिसके द्वारा
वेदा जाता है वह वेदनीय कर्म है। जो मोहित करता है या जिसके द्वारा मोहा जाता है वह मोहनीय
कर्म है। जिसके द्वारा नारक आदि भवको जाता है वह आयुकर्म है । जो आत्माको नमाता है या
जिसके द्वारा आत्मा नमता है वह नामकर्म है। जिसके द्वारा जीव उच्च नीच गीयते अर्थात् कहा
जाता है वह गोत्र कर्म है। जो दाता और देय आदिका अन्तर कराता है अर्थात् बीचमें आता है
वह गोत्र कर्म है। एक बार खाये गये अन्नका जिस प्रकार रस, रुधिर आदि रूपसे अनेक प्रकारका
परिणमन होता है उसी प्रकार एक आत्म-परिणामके द्वारा ग्रहण किये गये पुद्गल ज्ञानावरण
आदि अनेक भेदोंको प्राप्त होते हैं ।
§ ७३९. मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कहा। अब उत्तर प्रकृतिबन्धका कथन करते हैं—
१. मुह्यते इति मु० । २. - दुपयुक्ता-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० ।
- ८।६ § ७४२ ] अष्टमोऽध्यायः २८९
पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥५॥
§ ७४०. द्वितीयग्रहणमिह कर्तव्यं द्वितीय उत्तरप्रकृतिबन्ध एवंविकल्प इति । न कर्तव्यम्;
पारिशेष्यात्सिद्धेः । आद्यो १मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविकल्प उक्तः । ततः पारिशेष्यादयमुत्तरप्रकृति-
विकल्पविधिर्भवति । 'भेद'शब्दः पञ्चादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यते—पञ्चभेदं ज्ञानावरणीयं
नवभेदं दर्शनावरणीयं द्विभेदं वेदनीयं अष्टाविंशतिभेदं मोहनीयं चतुर्भेदमायुः द्विचत्वारिंशद्भेदं ५
नाम द्विभेदं गोत्रं पञ्चभेदोऽन्तराय इति ।
§ ७४१. यदि ज्ञानावरणं पञ्चभेदं तत्प्रतिपत्तिरुच्यतामित्यत आह—
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥६॥
§ ७४२. मत्यादीनि ज्ञानानि व्याख्यातानि । तेषामावृतेरावरणभेदो भवतीति पञ्चोत्तर-
प्रकृतयो वेदितव्याः । अत्र चोद्यते—अभव्यस्य मनःपर्ययज्ञानशक्तिः केवलज्ञानशक्तिश्च स्याद्वा न १०
वा । यदि स्यात् तस्याभव्यत्वाभावः । अथ नास्ति तत्रावरणद्वयकल्पना व्यर्थेति । उच्यते—
आदेशवचनान्न दोषः । द्रव्यार्थादेशान्मनःपर्ययकेवलज्ञानशक्तिसंभवः । पर्यायार्थादेशात्तच्छक्त्य-
भावः । यद्येवं भव्याभव्यविकल्पो नोपपद्यते; उभयत्र तच्छक्तिसद्भावात् । न शक्तिभावाभावापेक्षया
भव्याभव्यविकल्प इत्युच्यते । कुतस्तर्हि । व्यक्तिसद्भावासद्भावापेक्षया । सम्यग्दर्शनादिभि²-
आठ मूल प्रकृतियोंके अनुक्रमसे पांच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच १५
भेद हैं ॥५॥
§ ७४०. शंका—यहाँ द्वितीय पदका ग्रहण करना चाहिए, जिससे मालूम पड़े कि द्वितीय
उत्तर प्रकृतिबन्ध इतने प्रकारका है ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि पारिशेष्य न्यायसे
उसकी सिद्धि हो जाती है। आदिका मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कह आये हैं। इसलिए
पारिशेष्य न्यायसे ये उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद समझने चाहिए । भेद शब्द पाँच आदि शब्दोंके २०
साथ यथाक्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होता है । यथा—पाँच भेदवाला ज्ञानावरण, नौ भेदवाला
दर्शनावरण, दो भेदवाला वेदनीय, अट्ठाईस भेदवाला मोहनीय, चार भेदवाला आयु, ब्यालीस
भेदवाला नाम, दो भेदवाला गोत्र और पाँच भेदवाला अन्तराय ।
§ ७४१. यदि ज्ञानावरण कर्म पाँच प्रकारका है, तो उसका ज्ञान कराना है अतः आगेका
सूत्र कहते हैं— २५
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान इनको आवरण करनेवाले
कर्म पाँच ज्ञानावरण हैं ॥६॥
§ ७४२. मति आदि ज्ञानोंका व्याख्यान कर आये हैं। उनका आवरण करनेसे आवरणोंमें
भेद होता है इसलिए ज्ञानावरण कर्मकी पाँच उत्तर प्रकृतियाँ जानना चाहिए । शंका—अभव्य
जीवके मनःपर्ययज्ञानशक्ति और केवलज्ञानशक्ति होती है या नहीं होती। यदि होती है तो उसके ३०
अभव्यपना नहीं बनता । यदि नहीं होती हैं तो उसके उक्त दो आवरण-कर्मोंकी कल्पना करना
व्यर्थ है ? समाधान—आदेश वचन होनेसे कोई दोष नहीं है । अभव्यके द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा
मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है पर पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा उसके उसका
अभाव है। शंका—यदि ऐसा है तो भव्याभव्य विकल्प नहीं बन सकता है क्योंकि दोनोंके मनः-
पर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है ? समाधान—शक्तिके सद्भाव और असद्भावकी ३५
अपेक्षा भव्याभव्य विकल्प नहीं कहा गया है। शंका—तो किस आधारसे यह विकल्प कहा गया
है ? समाधान—व्यक्तिकी सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षा यह विकल्प कहा गया है । जिसके
१. मूलः प्रकृ-मु० । २. -नादिव्यक्ति-आ०, दि० १, दि० २, ता० ।
३७
२९० सर्वार्थसिद्धौ [ ८।७ § ७४३ -
व्यक्तिर्यस्य भविष्यति स भव्यः । यस्य तु न भविष्यति सोऽभव्य इति । कनकेतरपाषाणवत् ।
§ ७४३. आह, उक्तो ज्ञानावरणोत्तरप्रकृतिविकल्पः । इदानीं दर्शनावरणस्य वक्तव्य इत्यत
आह—
चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ॥७॥
§ ७४४. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानामिति दर्शनावरणापेक्षया भेदनिर्देशः—चक्षुर्दर्शनावरणम-
चक्षुर्दर्शनावरणमवधिदर्शनावरणं केवलदर्शनावरणमिति । मदखेदक्लमविनोदनार्थः स्वापो निद्रा ।
तस्या उपर्यु परि वृत्तिर्निद्रानिद्रा । या क्रियात्मानं प्रचलयति सा प्रचला शोकश्रममदादिप्रभवा
आसीनस्यापि नेत्रगात्रविक्रियासूचिका । सैव पुनःपुनरावर्तमाना¹ प्रचलाप्रचला । स्वप्ने² यया
वीर्यविशेषाविर्भावः सा स्त्यानगृद्धिः । स्त्यायतेरनेकार्थत्वात्स्वप्नार्थ इह गृह्यते, गृद्धेरपि दीप्तिः ।
कनक पाषाण और इतर पाषाणकी तरह सम्यग्दर्शनादि रूपसे व्यक्ति होगी वह भव्य है और
जिसके नहीं होगी वह अभव्य है।
विशेषार्थ—यहाँ ज्ञानावरण कर्मके पाँच उत्तर-भेदोंका निर्देश किया गया है। मूलमें ज्ञान
एक है। उसके ये पांच भेद आवरणकी विशेषतासे प्राप्त होते हैं। धवला टीकामें इस विषयका
स्पष्टीकरण करनेके लिए सूर्य और मेघपटलका उदाहरण दिया गया है। वहाँ बतलाया है कि जिस
प्रकार अति सघन मेघपटल सूर्यको आच्छादित करते हैं तो भी अतिमन्द सूर्य किरणें मेघपटलमेंसे
प्रस्फुटित होती रहती हैं उसी प्रकार केवलज्ञानावरण कर्मके आवृत होनेपर भी कुछ न कुछ ज्ञानांश
प्रस्फुटित होता रहता है और उसीको आवृत करनेसे चार उत्तर आवरण कर्म प्राप्त होते हैं। इस
प्रकार कुल ज्ञानावरण कर्म पाँच हैं जो भव्य और अभव्य दोनोंके पाये जाते हैं। शास्त्रमें भव्य और
अभव्य संज्ञा बन्ध विशेषकी अपेक्षा से दी गयी है। जीवके ये भेद इसी अपेक्षासे जानने चाहिए।
इन भेदोंका अन्य कोई निमित्त नहीं है। बन्ध दो प्रकारका होता है–एक बन्ध वह जो सन्तानकी
अपेक्षा अनादि अनन्त होता है और दूसरा वह जो अनादि सान्त होता हैं। जिन जीवोंके कर्मका
अनादि-अनन्त बन्ध होता है वे अभव्य कहलाते हैं और जिनके अनादिसान्त बन्ध होता है वे भव्य
माने गये हैं। इसलिए शक्ति सब जीवोंके एक-सी होकर भो उसके व्यक्त होनेमें अन्तर हो जाता है।
शास्त्रमें इस भेदको समझानेके लिए कनकपाषाण और अन्धापाषाण उदाहरण रूपसे उपस्थित
किये गये हैं सो इस दृष्टान्तसे भी उक्त कथनकी ही पुष्टि होती है। इस प्रकार ज्ञानावरण कर्मके
पाँच भेद क्यों हैं इस बातका खुलासा किया।
§ ७४३. ज्ञानावरण कर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे। अब दर्शनावरण कर्मके कहने चाहिए
इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन इन चारोंके चार आवरण तथा निद्रा,
निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचला-प्रचला और स्त्यानगृद्धि ये पाँच निद्रादिक ऐसे नौ दर्शनावरण हैं ॥७॥
§ ७४४. चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवलका दर्शनावरणकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है;
यथा-चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण। मद, खेद
और परिश्रमजन्य थकावटको दूर करनेके लिए नींद लेना निद्रा है। इसकी उत्तरोत्तर प्रवृत्ति होना
निद्रानिद्रा है। जो शोक, श्रम और मद आदिके कारण उत्पन्न हुई है और जो बैठे हुए प्राणीके भी
नेत्र, गात्रकी विक्रियाकी सूचक है ऐसी जो क्रिया आत्माको चलायमान करती है वह प्रचला है।
तथा उसकी पुनः-पुनः आवृत्ति होना प्रचलाप्रचला है। जिसके निमित्तसे स्वप्नमें वीर्यविशेषका
आविर्भाव होता है वह स्त्यानगृद्धि है। 'स्त्यायति' धातुके अनेक अर्थ हैं। उनमेंसे यहां स्वप्न अर्थ
१. -वर्त्यमाना आ०, दि०, १, दि० २ । २. स्वप्नेऽपि यया मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।
- ८।९ § ७४७ ] अष्टमोऽध्यायः २९१
स्त्याने स्वप्ने गृद्ध्यति दीव्यते यदुदयादात्मा रौद्रं बहुकर्म करोति सा स्त्यानगृद्धिः । इह निद्रादि-
भिर्दर्शनावरणं सामानाधिकरण्येनाभिसंबध्यते—निद्रादर्शनावरणं निद्रानिद्रादर्शनावरणमित्यादि ।
§ ७४५. तृतीयस्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिप्रतिपादनार्थमाह—
सदसद्वेद्ये ॥८॥
§ ७४६. यदुदयाद्देवादिगतिषु शारीरमानससुखप्राप्तिस्तत्सद्वेद्यम् । प्रशस्तं वेद्यं सद्वेद्यमिति । ५
यत्फलं दुःखमनेकविधं तदसद्वेद्यम् । अप्रशस्तं वेद्यमसद्वेद्यमिति ।
§ ७४७. चतुर्थ्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिविकल्पनिदर्शनार्थमाह—
दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्व-
मिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्न-
पुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलन- १०
विकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥९॥
लिया गया है और 'गृद्धि' दीप्यते जो स्वप्नमें प्रदीप्त होती है 'स्त्यानगृद्धि' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ
है—स्त्याने स्वप्ने गृद्ध्यति धातुका दीप्ति अर्थ लिया गया है। अर्थात् जिसके उदयसे रौद्र बहु कर्म
करता है वह स्त्यानगृद्धि है। यहाँ निद्रादि पदोंके साथ दर्शनावरण पदका सामानाधिकरण रूपसे
सम्बन्ध होता है यथा—निद्रादर्शनावरण, निद्रानिद्रादर्शनावरण आदि । १५
विशेषार्थ—यहाँ दर्शनावरण कर्मके नौ भेद गिनाये हैं। दर्शनके कुल भेद चार हैं उनकी
अपेक्षा प्रारम्भके चार भेद गिनाये हैं। निद्रादिक सामान्य आवरण कर्म हैं पर संसारी जीवके पहले
दर्शनोपयोग होता है और ये निद्रादिक उस उपयोगमें बाधक हैं इसलिए इन निद्रा आदि पाँच कर्मों-
की दर्शनावरणके भेदोंमें परिगणना की जाती है। इससे दर्शनावरण कर्मके नौ भेद सिद्ध होते हैं।
§ ७४५. तृतीय प्रकृतिकी उत्तर प्रकृतिको बतलाने के लिए कहते हैं— २०
सद्वेद्य और असद्वेद्य ये दो वेदनीय हैं ॥८॥
§ ७४६. जिसके उदयसे देवादि गतियोंमें शरीर और मन सम्बन्धी सुखकी प्राप्ति होती है
वह सद्वेद्य है। प्रशस्त वेद्यका नाम सद्वेद्य है। जिसके फलस्वरूप अनेक प्रकारके दुख मिलते हैं वह
असद्वेद्य है। अप्रशस्त वेद्यका नाम असद्वेद्य है।
विशेषार्थ—यहाँ वेदनीय कर्मके दो भेद गिनाये हैं। यह जीवविपाकी कर्म है। जीवका २५
साता और असातारूप परिणाम इसके उदयके निमित्तसे होता है। अन्य बाह्य सामग्रीको इसका
फल कहा है पर वह उपचार कथन है। वस्तुतः बाह्य सामग्री साता और असाताके उदयमें
निमित्त है, इसलिए बाह्य सामग्रीकी प्राप्ति वेदनीय कर्मका फल नहीं माना जा सकता। देवगति,
नरकगति और भोगभूमिमें बाह्य सामग्रीकी प्राप्तिका कारण तत्तत्पर्यायकी लेश्या है और कर्मभूमिमें
बाह्य सामग्रीकी प्राप्तिके अनेक कारण हैं। इस प्रकार वेदनीय कर्मके दो भेद और उनका कार्य ३०
जानना चाहिए।
§ ७४७. अब चौथी मूल प्रकृतिके उत्तर प्रकृति विकल्प दिखलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और कषाय वेदनीय इनके क्रमसे तीन,
दो, नौ और सोलह भेद हैं। सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और तदुभय ये तीन दर्शनमोहनीय हैं, अकषाय- ३५
वेदनीय और कषायवेदनीय ये दो चारित्र मोहनीय हैं। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,
स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ये नौ अकषायवेदनीय हैं। तथा अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान,
प्रत्याख्यान और संज्वलन ये प्रत्येक क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे सोलह कषायवेद-
नीय हैं ॥९॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
नं स शोकः।
Wait, in line 13: "यदुदयाद्देशादिष्वात्सुक्यं" - wait, look at the 3:
Is the 3 after 'यदुदयाद्' or after 'देशादिष्वात्सुक्यं'?
Let's look at line 13:
"यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं" or "यदुदयाद्देशादिष्वात्सुक्यं³"?
Look at the '३': it is directly above/after 'यदुदया': "यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं"!!
Wait, look at footnote 3: "३. -दयाद्विषयादि-मु०, ता०, ना० ।"
Yes! The variant is "-दयाद्विषयादि-" instead of "-दयाद्देशादि-"! So the footnote marker ३ is right between 'यदुदया' and 'देशादिष्वात्सुक्यं'!
Wait, is there a 'द्' before देशादि?
The text has: "यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं" or "यदुदयाद्³देशादिष्वात्सुक्यं"?
There is no 'द्'! It's printed "यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं" or "यदुदया³ देशादिष्वात्सुक्यं"!
Wait, let's look closely at line 1
८।९ § ७५१ ] अष्टमोऽध्याय २९३
न्भावान्प्रतिपद्यते स स्त्रीवेदः। यस्योदयात्पौंसान्भावान्नास्कन्दति स पुंवेदः। यदुदयान्नापुंसका-
न्भावानुपव्रजति स नपुंसकवेदः।
§ ७५१. कषायवेदनीयं षोडशविधम् । कुतः। अनन्तानुबन्ध्यादिविकल्पात् । तद्यथा—
कषायाः क्रोधमानमायालोभाः । तेषां चतस्रोऽवस्थाः—अनन्तानुबन्धिनोऽप्रत्याख्यानावरणाः
प्रत्याख्यानावरणाः संज्वलनाश्चेति । अनन्तसंसारकारणत्वान्मिथ्यादर्शनमनन्तम् । तदनुबन्धिनोऽ- ५
नन्तानुबन्धिनः क्रोधमानमायालोभाः । यदुदयाद्देशविरतिं संयमासंयमाख्यामल्पामपि कतुं न
शक्नोति ते देशप्रत्याख्यानमावृण्वन्तोऽप्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोभाः । यदुदयाद्विरतिं
कृत्स्नां संयमाख्यां न शक्नोति कतुं ते कृत्स्नं प्रत्याख्यानमावृण्वन्तः प्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमान-
मायालोभाः । समेकीभावे वर्तते । संयमेन सहावस्थानादेकीभूय ज्वलन्ति संयमो वा ज्वलत्येषु
सत्स्वपीति संज्वलनाः क्रोधमानमायालोभाः । त एते समुदिताः सन्तः षोडश कषाया भवन्ति । १०
भावोंको प्राप्त होता है वह स्त्रीवेद है। जिसके उदयसे पुरुषसम्बन्धी भावोंको प्राप्त होता है वह
पुंवेद है और जिसके उदयसे नपुंसक सम्बन्धी भावोंको प्राप्त होता है वह नपुंसकवेद है।
§ ७५१. अनन्तानुबन्धी आदिके विकल्पसे कषायवेदनीयके सोलह भेद हैं। यथा—क्रोध,
मान, माया और लोभ ये कषाय हैं। इनकी चार अवस्थाएँ हैं—अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्याना-
वरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन। अनन्त संसारका कारण होनेसे मिथ्यादर्शन अनन्त कह- १५
लाता है तथा जो कषाय उसके अनुबन्धी हैं वे अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ हैं।
जिनके उदयसे जिसका दूसरा नाम संयमासंयम है ऐसी देशविरतिको यह जीव स्वल्प भी करनेमें
समर्थ नहीं होता है वे देशप्रत्याख्यानको आवृत्त करनेवाले अप्रत्याख्यानावरण, क्रोध, मान, माया
और लोभ हैं। जिनके उदयसे संयम नामवाली परिपूर्ण विरतिको यह जीव करनेमें समर्थ नहीं
होता है वे सकल प्रत्याख्यानको आवृत्त करनेवाले प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और २०
लोभ हैं। 'स' एकीभाव अर्थमें रहता है। संयमके साथ अवस्थान होनेसे एक होकर जो ज्वलित
होते हैं अर्थात् चमकते हैं या जिनके सद्भावमें संयम चमकता रहता है वे संज्वलन क्रोध, मान,
माया और लोभ हैं। ये सब मिलकर सोलह कषाय होते हैं।
विशेषार्थ—मोहनीय कर्मके दो भेद हैं—दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय । जो समीचीन
दर्शनके होनेमें बाधक कर्म है वह दर्शनमोहनीय है और जो समीचीन दर्शनके अनुकूल चारित्रके २५
होनेमें बाधक कर्म है वह चारित्रमोहनीय है। दर्शनमोहनीयके मिथ्यात्व आदिक तीन भेद हैं।
मिथ्यात्व समीचीन दर्शनका प्रतिपक्ष कर्म है। यह जीव अनादि कालसे मिथ्यादृष्टि हो रहा है।
इसे योग्य द्रव्यादिकका निमित्त मिलनेपर ही समीचीन दर्शनका श्रद्धान होता है। सर्वप्रथम यह
श्रद्धान इसके प्रतिपक्षभूत मिथ्यात्व कर्मके उपशमसे ही होता है। साधारणतः संसारमें रहनेका
काल जब अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण शेष रहता है तब यह होता है इसके पहले नहीं होता । ३०
इतने कालके शेष रहने पर होना ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है। इससे भी कम कालके
शेष रहने पर यह हो सकता है। इसका नाम प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शनका अर्थ है
समीचीन दर्शन । जैनदर्शनके अनुसार व्यक्ति-स्वातन्त्र्यकी प्राणप्रतिष्ठा करनेवाला और आत्म-
दर्शन करानेवाला दर्शन समीचीन दर्शन माना गया है। जब इस प्रकारका सम्यग्दर्शन होता
है तब इस दर्शनका प्रतिपक्षभूत कर्म तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है। जिनके नाम ३५
मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृतिमिथ्यात्व होते हैं। प्रथमका वही काम है। दूसरा
और तीसरा अपने नामानुसार काम करते हैं। अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व मिश्र परिणामके होनेमें
१. –देकीभूता ज्व—आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
२९४ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१० § ७५२ -
§ ७५२. मोहनीयानन्तरोद्देशभाज आयुष उत्तरप्रकृतिनिर्ज्ञापनार्थमाह—
नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥ १० ॥
§ ७५३. नारकादिषु भवसम्बन्धेनायुषो व्यपदेशः क्रियते । नरकेषु भवं नारकमायुः,
तिर्यग्योनिषु भवं तैर्यग्योनम्, मानुषेषु भवं मानुषम्, देवेषु भवं दैवमिति । नरकेषु तीव्रशीतोष्ण-
वेदनेषु यन्निमित्तं दीर्घजीवनं तन्नारकम् । एवं शेषेष्वपि ।
निमित्त होता है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व समीचीन दर्शनरूप परिणामको सदोष बनानेमें
निमित्त होता है । इस प्रकार एक मिथ्यात्व कर्म सम्यक्त्वका निमित्त पाकर तीन भागोंमें विभक्त
हो जाता है इसलिए बन्धकी अपेक्षा दर्शनमोहनीय एक होकर भी सत्ताकी अपेक्षा वह तीन प्रकार-
का माना गया है। मोहनीयका दूसरा भेद चारित्रमोहनीय है । व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी प्राणप्रतिष्ठा
करनेवाला दर्शन ही सम्यग्दर्शन है यह हम पहले बतला आये हैं । अतः हमारा इस दर्शनके अनु-
रूप जो आचार होता है वही सदाचार माना जा सकता है, अन्य नहीं । यही कारण है कि जैन-
दर्शनके अनुसार स्वावलम्बनके अनुरूप आचारको ही सदाचार कहा गया है । इसी सदाचारका
दूसरा नाम सच्चारित्र है । जो कर्म इस सच्चारित्रके होनेमें बाधक होता है उसे ही आगममें
चारित्रमोहनीय कहा है । इसके मूल भेद दो हैं—कषायवेदनीय और अकषायवेदनीय । अकषाय-
वेदनीय देशघाति कर्म होनेसे यह सम्यक् चारित्रकी प्राप्तिमें बाधक नहीं है । कषायवेदनीयके
चार भेद हैं । उनमें से अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ व्यक्तिस्वातन्त्र्यके अनुरूप
स्वावलम्बनकी धाराका जीवनमें महत्त्व प्रस्थापित नहीं होने देता । इसीसे इसे अनन्त अर्थात्
संसारका कारण कहा है । व्यक्तिस्वातन्त्र्य और स्वावलम्बनका अविनाभाव सम्बन्ध है । जीवनमें
व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी श्रद्धा होनेपर स्वावलम्बनका महत्त्व अपने आप समझमें आने लगता है । यह
नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति अपने जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी श्रद्धा तो करे पर उसकी प्राप्तिके
लिए जीवनको परावलम्बी बनाये रखनेकी ओर उसका झुकाव हो । यही कारण है कि अनन्तानु-
बन्धीचतुष्कको मिथ्यात्वका अनुबन्धी माना गया है । इस प्रकार जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्य और
तदनुरूप स्वावलम्बनके प्रति अभिरुचि हो जानेपर व्यक्ति पूर्ण स्वावलम्बी बननेके लिए उद्यत
होता है । किन्तु अनादिकालीन परतन्त्रताओंका वह युगपत् त्याग नहीं कर सकता, इसलिए
जैसी-जैसी अन्तःशुद्धि होती जाती है तदनुरूप वह स्वावलम्बी बनता जाता है । कभी-कभी ऐसा
भी होता है कि व्यक्तिके जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्य और उसके मार्ग स्वावलम्बनके प्रति पूर्ण श्रद्धाके
होनेपर भी वह उसे जीवनमें उतारनेमें अपनेको असमर्थ पाता है । इसका कारण जहाँ जीवनकी
भीतरी कमजोरी माना गया है वहाँ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ इस दशाके
बनाये रखनेमें निमित्त हैं । यही कारण है कि इन कषायोंको आंशिक स्वावलम्बनका बाधक कहा
है । और पूर्ण स्वावलम्बनमें बाधक कारण प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ माने
गये हैं । संज्वलन, क्रोध, मान, माया और लोभ स्वावलम्बनके आचरणको सदोष तो करते हैं पर
बाधक नहीं हो पाते । इस प्रकार मोहनीय और उसके अवान्तर भेदोंका क्या कार्य है इसका यहाँ
संक्षेपमें विचार किया ।
§ ७५२. मोहनीयके अनन्तर उद्देशभाक् आयु कर्मकी उत्तर प्रकृतियोंका विशेष ज्ञान
करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु ये चार आयु हैं ॥१०॥
§ ७५३. नारक आदि गतियोंमें भवके सम्बन्धसे आयुकर्मका नामकरण किया जाता है ।
यथा—नरकोंमें होनेवाली नारक आयु है, तिर्यग्योनियोंमें होनेवाली तैर्यग्योन आयु है, मनुष्यों-
में होनेवाली मानुष आयु है और देवोंमें होनेवाली देवायु है । तीव्र शीत और उष्ण वेदनावाले
८।११ § ७५५ ] अष्टमोऽध्यायः २९५
§ ७५४. आयुश्चतुर्विधं व्याख्यातम् । तदनन्तरमुद्दिष्टं यन्नामकर्म तदुत्तरप्रकृतिनिर्णयार्थ-
माह—
गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानु-
पूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रस-
सुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥११॥ ५
§ ७५५. यदुदयादात्मा भवान्तरं गच्छति सा गतिः । सा चतुर्विधा—नरकगतिस्तिर्यग्गति-
र्मनुष्यगतिर्देवगतिश्चेति१ । यन्निमित्त आत्मनो नारको भावस्तन्नरकगतिनाम । एवं शेषेष्वपि
योज्यम्२ । तासु नरकादिगतिष्वव्यभिचारिणा सादृश्येनैकीकृतोऽर्थात्मा जातिः । तन्निमित्तं जाति-
नाम । तत्पञ्चविधम्—एकेन्द्रियजातिनाम द्वीन्द्रियजातिनाम त्रीन्द्रियजातिनाम चतुरिन्द्रियजाति-
नाम पञ्चेन्द्रियजातिनाम चेति । यदुदयादात्मा एकेन्द्रिय इति शब्द्यते तदेकेन्द्रियजातिनाम । एवं १०
शेषेष्वपि योज्यम् । यदुदयादात्मनः शरीरनिर्वृत्तिस्तच्छरीरनाम । तत्पञ्चविधम्—औदारिकशरीर-
नाम वैक्रियिकशरीरनाम आहारकशरीरनाम तैजसशरीरनाम कार्मणशरीरनाम चेति । तेषां
नरकोंमें जिसके निमित्तसे दीर्घ जीवन होता है वह नारक आयु है। इसी प्रकार शेष आयुओंमें भी
जानना चाहिए।
विशेषार्थ—दस प्राणोंमें आयु प्राण मुख्य है। यह जीवित रहनेका सर्वोत्कृष्ट निमित्त माना १५
गया है। इसके सद्भावमें प्राणीका जीवन है और इसके अभावमें वह मरा हुआ माना जाता है।
अन्नादिक तो आयुको कायम रखनेमें सहकारीमात्र हैं। भवधारण करनेका मुख्य कारण आयुकर्म
ही है ऐसा यहाँ समझना चाहिए।
§ ७५४. चार प्रकारके आयुका व्याख्यान किया। इसके अनन्तर जो नामकर्म कहा गया है
उसकी उत्तर प्रकृतियोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस,
गन्ध, वर्ण, आनुपूर्व्य, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास और विहायोगति
तथा प्रतिपक्षभूत प्रकृतियोंके साथ अर्थात् साधारण शरीर और प्रत्येक शरीर, स्थावर और त्रस,
दुर्भग और सुभग, दुःस्वर और सुस्वर, अशुभ और शुभ, बादर और सूक्ष्म, अपर्याप्त और पर्याप्त,
अस्थिर और स्थिर, अनादेय और आदेय, अयशःकीर्ति और यशःकीर्ति एवं तीर्थकरत्व ये ब्यालीस २५
नामकर्मके भेद हैं ॥११॥
§ ७५५. जिसके उदयसे आत्मा भवान्तरको जाता है वह गति है। वह चार प्रकारकी
है—नरकगति, तिर्यंग्गति, मनुष्यगति और देवगति। जिसका निमित्त पाकर आत्माका नारक
भाव होता है वह नरकगति नामकर्म है। इसी प्रकार शेष गतियोंमें भी योजना करनी चाहिए।
उन नरकादि गतियोंमें जिस अव्यभिचारी सादृश्यसे एकपनेका बोध होता है वह जाति है। और ३०
इसका निमित्त जाति नामकर्म है। वह पांच प्रकारका है—एकेन्द्रिय जाति नामकर्म, द्वीन्द्रिय
जाति नामकर्म, त्रीन्द्रिय जाति नामकर्म, चतुरिन्द्रिय जाति नामकर्म और पंचेन्द्रिय जाति नामकर्म।
जिसके उदयसे आत्मा एकेन्द्रिय कहा जाता है वह एकेन्द्रिय जाति नामकर्म है। इसी प्रकार शेष
जातियोंमें भी योजना करनी चाहिए। जिसके उदयसे आत्माके शरीरकी रचना होती है वह
शरीर नामकर्म है। वह पाँच प्रकारका है—औदारिक शरीर नामकर्म, वैक्रियिक शरीर नामकर्म, ३५
आहारक शरीर नामकर्म, तैजस शरीर नामकर्म और कार्मण शरीर नामकर्म । इनका विशेष
१. –गतिर्देवगतिम॑नुष्यगतिश्चेति मु० । २. योज्यन्ते । तासु आ० ।
विशेषो व्याख्यातः । यदुदयादङ्गोपाङ्गविवेकस्तदङ्गोपाङ्गनाम । तत् त्रिविधम्—औदारिकशरीरा-
ङ्गोपाङ्गनाम वैक्रियिकशरीराङ्गोपाङ्गनाम आहारकशरीराङ्गोपाङ्गनाम चेति । यन्निमित्तात्परि-
निष्पत्तिस्तन्निर्माणम् । तद् द्विविधं—स्थाननिर्माणं प्रमाणनिर्माणं चेति । तज्जातिनामोदयापेक्षं
चक्षुरादीनां स्थानं प्रमाणं च निर्वर्तयति । निर्मीयतेऽनेनेति निर्माणम् । शरीरनामकर्मोदयवशादु-
पात्तानां पुद्गलानामन्योन्यप्रदेशसंश्लेषणं यतो भवति तद्बन्धननाम । यदुदयादौदारिकादिशरी-
राणां विवरविरहितान्योन्यप्रदेशानुप्रवेशेन एकत्वापादनं भवति तत्संघातनाम । यदुदयादौदारिका-
दिशरीराकृतिनिर्वृत्तिर्भवति तत्संस्थाननाम । तत् षोढा विभज्यते—समचतुरस्रसंस्थाननाम न्यग्रोध-
परिमण्डलसंस्थाननाम स्वातिसंस्थाननाम कुब्जकसंस्थाननाम वामनसंस्थाननाम हुण्डसंस्थाननाम
चेति । यस्योदयादस्थिबन्धनविशेषो भवति तत्संहनननाम । तत् षड्विधम्—वज्रर्षभनाराचसंहनन-
नाम वज्रनाराचसंहनननाम नाराचसंहनननाम अर्धनाराचसंहनननाम कीलिकोसंहनननाम
असंप्राप्तासृपाटिकासंहनननाम चेति । यस्योदयात्स्पर्शप्रादुर्भावस्तत्स्पर्शनाम । तदष्टविधम्—
कर्कशनाम मृदुनाम गुरुनाम लघुनाम स्निग्धनाम रूक्षनाम शीतनाम उष्णनाम चेति । यन्निमित्तो
रसविकल्पस्तद्रसनाम । तत्पञ्चविधम्—तिक्तनाम कटुकनाम कषायनाम आम्लनाम मधुरनाम
चेति । यदुदयप्रभवो गन्धस्तद्गन्धनाम । तद्द्विविधम्—सुरभिगन्धनाम असुरभिगन्धनाम चेति ।
यद्धेतुको वर्णविभागस्तद्वर्णनाम । तत्पञ्चविधम्—कृष्णवर्णनाम नीलवर्णनाम रक्तवर्णनाम हारिद्र-
व्याख्यान पहले कर आये हैं । जिसके उदयसे अंगोपांगका भेद होता है वह अंगोपांग नामकर्म है ।
वह तीन प्रकारका है—औदारिक शरीर अंगोपांग नामकर्म, वैक्रियिक शरीर अंगोपांग नामकर्म
और आहारक शरीर अंगोपांग नामकर्म । जिसके निमित्तसे परिनिष्पत्ति अर्थात् रचना होती है
वह निर्माण नामकर्म है । वह दो प्रकारका है—स्थाननिर्माण और प्रमाणनिर्माण । वह जाति
नामकर्मके उदयका अवलम्बन लेकर चक्षु आदि अवयवोंके स्थान और प्रमाणकी रचना करता है ।
निर्माण शब्दका व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है—‘निर्मीयतेऽनेनेति निर्माणम्’ जिसके द्वारा रचना की जाती
है वह निर्माण कहलाता है । शरीर नामकर्मके उदयसे प्राप्त हुए पुद्गलोंका अन्योन्य प्रदेश संश्लेष
जिसके निमित्तसे होता है वह बन्धन नामकर्म है । जिसके उदयसे औदारिक आदि शरीरोंकी
छिद्र रहित होकर परस्पर प्रदेशोंके अनुप्रवेश द्वारा एकरूपता आती है वह संघात नामकर्म है ।
जिसके उदयसे औदारिक आदि शरीरोंकी आकृति बनती होती है वह संस्थान नामकर्म है । वह
छह प्रकारका है—समचतुरस्रसंस्थान नामकर्म, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान नामकर्म, स्वातिसंस्थान
नामकर्म, कुब्जकसंस्थान नामकर्म, वामनसंस्थान नामकर्म और हुण्डसंस्थान नामकर्म । जिसके
उदयसे अस्थियोंका बन्धन विशेष होता है वह संहनन नामकर्म है । वह छह प्रकारका है—वज्र-
र्षभनाराच संहनन नामकर्म, वज्रनाराचसंहनन नामकर्म, नाराचसंहनन नामकर्म, अर्धनाराचसंहं-
नन नामकर्म, कीिकासंहनन नामकर्म और असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन नामकर्म । जिसके उदयसे
स्पर्शकी उत्पत्ति होती है वह स्पर्श नामकर्म है । वह आठ प्रकारका है—कर्कश नामकर्म, मृदु
नामकर्म, गुरु नामकर्म, लघु नामकर्म, स्निग्ध नामकर्म, रूक्ष नामकर्म, शीत नामकर्म और उष्ण
नामकर्म । जिसके उदयसे रसमें भेद होता है वह रस नामकर्म है । वह पाँच प्रकारका है—तिक्त
नामकर्म, कटु नामकर्म, कषाय नामकर्म, अम्ल नामकर्म और मधुर नामकर्म । जिसके उदयसे
गन्धकी उत्पत्ति होती है वह गन्ध नामकर्म है । वह दो प्रकारका है—सुरभिगन्ध नामकर्म और
असुरभिगन्ध नामकर्म । जिसके निमित्तसे वर्णमें विभाग होता है वह वर्ण नामकर्म है । वह पाँच
प्रकारका है—कृष्णवर्ण नामकर्म, नीलवर्ण नामकर्म, रक्तवर्ण नामकर्म, हारिद्रवर्ण नामकर्म और
१. कीलितसं-मु० । कीलसं-दि० २ । २. -प्राप्तासृक्पा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. -नाम दुरभिगन्ध-
आ०, दि० १, दि० २ । ४. हरिद्वर्ण-मु० ।
- ८।११ § ७५५ ] अष्टमोऽध्यायः २९७
वर्णनाम शुक्लवर्णनाम चेति । पूर्वशरीराकाराविनाशो यस्योदयाद् भवति तदानुपूर्व्यनाम ।
तच्चतुर्विधम्—नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम मनुष्यगतिप्रायोग्यानु-
पूर्व्यनाम देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम चेति । यस्योदयादयःपिण्डवद् गुरुत्वान्नाधः पतति न चार्क-
तूलवल्लघुत्वादूर्ध्वं गच्छति तदगुरुलघुनाम । यस्योदयात्स्वयं कृतोद्वन्धनमेरुप्रपतनादिनिमित्त
उपघातो भवति तदुपघातनाम । यन्निमित्तः परशस्त्रादेर्व्याघातस्तत्परघातनाम । यदुदयान्निर्वृत्त- ५
मातपनं तदातपनाम । तदादित्ये वर्तते । यन्निमित्तमुद्योतनं तदुद्योतनाम । तच्चन्द्रखद्योतादिषु
वर्तते । यद्धेतुरुच्छ्वासस्तदुच्छ्वासनाम । विहाय आकाशम् । तत्र गतिनिर्वर्तकं तद्विहायोगतिनाम ।
तद् द्विविधम्—प्रशस्ताप्रशस्तभेदात् । शरीरनामकर्मोदयान्निर्वर्त्यमानं शरीरमेकात्मोपभोगकारणं
यतो भवति तत्प्रत्येकशरीरनाम । बहूनामात्मनामुपभोगहेतुत्वेन साधारणं शरीरं यतो भवति
तत्साधारणशरीरनाम । यदुदयाद् द्वीन्द्रियादिषु जन्म तत्त्रसनाम । यन्निमित्त एकेन्द्रियेषु प्रादुर्भाव- १०
स्तत्स्थावरनाम । यदुदयादन्यप्रीतिप्रभवस्तत्सुभगनाम । यदुदयाद्रूपादिगुणोपेतोऽप्यप्रीतिकरस्तद्
दुर्भगनाम । यन्निमित्तं मनोज्ञस्वरनिर्वर्तनं तत्सुस्वरनाम । तद्विपरीतं दुःस्वरनाम । यदुदयाद्-
रमणीयत्वं तच्छुभनाम । तद्विपरीतमशुभनाम । सूक्ष्मशरीरनिर्वर्तकं सूक्ष्मनाम । अन्यबाधाकरशरीर-
कारणं बादरनाम । यदुदयादाहारादिपर्याप्तिनिर्वृत्तिः तत्पर्याप्तिनाम । तत् षड्विधम्—आहार-
पर्याप्तिकाम शरीरपर्याप्तिनाम इन्द्रियपर्याप्तिनाम प्राणापानपर्याप्तिनाम भाषापर्याप्तिनाम मनःपर्याप्ति- १५
शुक्लवर्ण नामकर्म । जिसके उदयसे पूर्व शरीरके आकारका विनाश नहीं होता है वह आनुपूर्व्य
नामकर्म है । वह चार प्रकारका है—नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्य
नामकर्म, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म । जिसके उदयसे
लोहेके पिण्डके समान गुरु होनेसे न तो नीचे गिरता है और न अर्कतूलके समान लघु होनेसे ऊपर
जाता है वह अगुरुलघु नामकर्म है । जिसके उदयसे स्वयंकृत उद्बन्धन और पहाड़से गिरना २०
आदि निमित्तक उपघात होता है वह उपघात नामकर्म है । जिसके उदयसे परशस्त्रादिकका
निमित्त पाकर व्याघात होता है वह परघात नामकर्म है । जिसके उदयसे शरीरमें आतपकी प्राप्ति
होती है वह आतप नामकर्म है। वह सूर्यबिम्बमें होता है। जिसके निमित्तसे शरीरमें उद्योत
होता है वह उद्योत नामकर्म है । वह चन्द्रबिम्ब और जुगनू आदिमें होता है । जिसके निमित्तसे
उच्छ्वास होता है वह उच्छ्वास नामकर्म है । विहायस्का अर्थ आकाश है। उसमें गतिका निर्वर्तक २५
कर्म विहायोगति नामकर्म है। प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे वह दो प्रकारका है। शरीर नामकर्म-
के उदयसे रचा गया जो शरीर जिसके निमित्तसे एक आत्माके उपभोगका कारण होता है वह
प्रत्येक शरीर नामकर्म है। बहुत आत्माओंके उपभोगका हेतुरूपसे साधारण शरीर जिसके निमित्त-
से होता है वह साधारणशरीर नामकर्म है । जिसके उदयसे द्वीन्द्रियादिकमें जन्म होता है वह
त्रस नामकर्म है। जिसके निमित्तसे एकेन्द्रियोंमें उत्पत्ति होती है वह स्थावर नामकर्म है । जिसके ३०
उदयसे अन्यजनप्रीतिकर अवस्था होती है वह सुभग नामकर्म है । जिसके उदयसे रूपादि गुणोंसे
युक्त होकर भी अप्रीतिकर अवस्था होती है वह दुर्भग नामकर्म है । जिसके निमित्तसे मनोज्ञ
स्वरकी रचना होती है वह सुस्वर नामकर्म है। इससे विपरीत दुःस्वर नामकर्म है । जिसके
उदयसे रमणीय होता है वह शुभ नामकर्म है । इससे विपरीत अशुभ नामकर्म है । सूक्ष्म शरीरका
निर्वर्तक कर्म सूक्ष्म नामकर्म है । अन्य बाधाकर शरीरका निर्वर्तक कर्म बादर नामकर्म है । ३५
जिसके उदयसे आहार आदि पर्याप्तियोंकी रचना होती है वह पर्याप्ति नामकर्म है । वह
छह प्रकारका है—आहारपर्याप्ति नामकर्म, शरीरपर्याप्ति नामकर्म, इन्द्रियपर्याप्ति नामकर्म, प्राणा-
१. मरुत्प्र-मु. ।
३८
२९८ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।११ ६ ७५५ -
नाम चेति । षड्विधपर्याप्त्यभावहेतुरपर्याप्तिनाम । स्थिरभावस्य निर्वर्तकं स्थिरनाम । तद्वि-
परीतमस्थिरनाम । प्रभोपेतशरीरकारणमादेयनाम । निष्प्रभशरीरकारणमनादेयनाम । पुण्यगुण-
ख्यापनकारणं यशःकीर्तिनाम । तत्प्रत्यनीकफलमयशःकीर्तिनाम । आहंत्यकारणं तीर्थंकरत्वनाम ।
पानपर्याप्ति नामकर्म, भाषापर्याप्ति नामकर्म और मनःपर्याप्ति नामकर्म । जो छह प्रकारकी पर्या-
प्तियोंके अभावका हेतु है वह अपर्याप्ति नामकर्म है । स्थिरभावका निर्वर्तक कर्म स्थिर नामकर्म
है । इससे विपरीत अस्थिर नामकर्म है । प्रभायुक्त शरीरका कारण आदेय नामकर्म है । निष्प्रभ
शरीरका कारण अनादेय नामकर्म है । पुण्य गुणोंकी प्रसिद्धिका कारण यशःकीर्ति नामकर्म है।
इससे विपरीत फलवाला अयशःकीर्ति नामकर्म है । आर्हन्त्यका तीर्थंकर नामकर्म है ।
विशेषार्थ—यहाँ नामकर्मकी उत्तर प्रकृतियोंके कार्योंकी चर्चा की गयी है । मूल कर्म
आठ हैं। उनमें से सात कर्म जीवविपाकी माने गये हैं । नामकर्म जीवविपाकी और पुद्गलविपाकी
दोनों प्रकारका है । जिन कर्मोंका विपाक जीवमें होता है वे जीवविपाकी हैं और जिनका विपाक
पुद्गलमें होता है वे पुद्गलविपाकी हैं। यह इनका शब्दार्थ है । इसे ध्यानमें रखते हुए इनके
अर्थकी विस्तृत चर्चा करना आवश्यक है । साधारणतः सभी कर्म जीवनके राग, द्वेष आदि परि-
णामोंका निमित्त पाकर बँधते हैं अतएव उनका विपाक जीवमें ही होता है। अर्थात् उनके उदय-
का निमित्त पाकर जीवमें तत्तत्प्रकारक योग्यताएँ आती हैं। फिर भी कर्मोंके जीवविपाकी,
पुद्गलविपाकी, क्षेत्रविपाकी और भवविपाकी ऐसे भेद करनेका क्या कारण है यही बात यहाँ
देखनी है। जीवका संसार जीव और पुद्गल इन दोके मेलसे होता है । वहाँ रहते हुए वह विविध
गतियोंमें जन्म लेता है, मरता है और उनके अनुरूप नाना शरीरोंको धारण करता है। यह
सब अकारण नहीं हो सकता, इसलिए इनकी प्राप्तिके निमित्तभूत नाना प्रकारके कर्म माने जाते हैं।
जिनको शास्त्रमें भवविपाकी कहा है वे उस उस पर्यायमें अवस्थानके कारण होनेसे उस संज्ञाको
प्राप्त होते हैं। जिनको क्षेत्रविपाकी कहा है वे एक गतिसे दूसरी गतिके लिए जाते समय अन्त-
रालमें जीवका आकार बनाये रखते हैं। जिन्हें पुद्गलविपाकी कहा है वे नाना प्रकारके शरीर
और भोगक्षम इन्द्रियोंकी प्राप्तिमें सहायक होते हैं और जीवविपाकी कहे जाते हैं। वे जीवके विविध
प्रकारके परिणाम और उसकी विविध अवस्थाओंके होनेमें सहायता करते हैं। इस प्रकार कार्य-
भेदसे कर्मोंको इन चार भागोंमें विभक्त किया गया है। वस्तुतः सभी कर्म जीवकी उस उस कर्मके
नामानुरूप योग्यताके होनेमें सहायता करते हैं और उस उस योग्यतासे युक्त जीव तदनुरूप कार्य
करता है । उदाहरणार्थ—औदारिक शरीर नामकर्मके उदयका निमित्त पाकर जीवमें ऐसी योग्यता
उत्पन्न होती है जिससे वह योगद्वारा शरीर निर्माणके लिए औदारिक वर्गणाओंको ही ग्रहण
करता है अन्य वर्गणाओंको नहीं । वज्रर्षभनाराचसंहनन और समचतुरस्रसंस्थान नामकर्मके उदय-
का निमित्त पाकर जोवमें ऐसी योग्यता उत्पन्न होती है जिससे वह ग्रहण की गयी औदारिक
वर्गणाओंको उस रूपसे परिणमाता है । प्रश्न यह है कि पुद्गलविपाकी कर्मोंके उदयको निमित्त
पाकर यदि जीवमें कर्मोंके नामानुरूप योग्यता उत्पन्न होती है तो फिर इन्हें पुद्गलविपाकी कर्म
क्यों कहते हैं ? क्या ये कर्म जीवको माध्यम बनाकर ही अपना काम करते हैं। इनका जो काम है
वह यदि सीधा माना जाय तो क्या आपत्ति है ? उत्तर यह है कि जब तक जीवको औदारिक
आदि नोकर्मवर्गणा का निमित्त नहीं मिलता है तब तक पुद्गलविपाकी कर्म अपना कार्य करनेमें
समर्थ नहीं होते हैं। इनका विपाक पुद्गलों का निमित्त पाकर होता है इसलिए इन्हें पुद्गलविपाकी
कहते हैं । उदाहरणार्थ – कोई एक जीव दो मोड़ा लेकर यदि जन्म लेता है तो उसके प्रथम
और द्वितीय विग्रहके समय शरीर आदि पुद्गलविपाकी प्रकृतियोंका उदय नहीं होता है। तीसरे
समयमें जब वह नवीन शरीरको ग्रहण करता है तभी उसके इन प्रकृतियोंका उदय होता है। इस
- ८।१३ § ७५८ ] अष्टमोऽध्याय २९९
§ ७५६. उक्तो नामकर्मण उत्तरप्रकृतिभेदः । तदनन्तरोद्देशभाजो गोत्रस्य प्रकृतिभेदो
व्याख्यायते—
उच्चैर्नीचैश्च ॥ १२ ॥
§ ७५७. गोत्रं द्विविधम्—उच्चैर्गोत्रं नीचैर्गोत्रमिति । यस्योदयाल्लोकपूजितेषु कुलेषु जन्म¹ ५
तदुच्चैर्गोत्रम् । यदुदयाद्गर्हितेषु कुलेषु जन्म² तन्नीचैर्गोत्रम् ।
§ ७५८. अष्टम्याः कर्मप्रकृतेरुत्तरप्रकृतिनिर्देशार्थमाह—
दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥ १३ ॥
प्रकार विचार करनेसे ज्ञात होता है कि शरीर आदि नामकर्मकी प्रकृतियोंकी पुद्गलविपाकी संज्ञा
क्यों है ? इसी प्रकार भवविपाकी और क्षेत्रविपाकी प्रकृतियोंके सम्बन्धमें भी स्पष्ट जानना चाहिए ।
भवकी कारणभूत जो आयुकर्मकी प्रकृतियां हैं और जिनका उदय तत्तत् भव तक ही सीमित १०
है इसीसे इनकी भवविपाकी संज्ञा है । क्षेत्रविपाकी प्रकृतियाँ दो भवके अन्तरालवर्ती क्षेत्रमें अपना
काम करती हैं इसलिए इनकी क्षेत्रविपाकी संज्ञा है । यद्यपि बाह्य सुपुत्रादिके निमित्तसे सातादि
जीवविपाकी प्रकृतियोंका भी उदय देखा जाता है पर ये बाह्यनिमित्त उनके उदयके अविनाभावी
कारण नहीं हैं । कदाचित् इन बाह्य निमित्तोंके रहते हुए भी उनसे प्रतिकूल प्रकृतियोंका उदय
देखा जाता है और कदाचित् इन निमित्तोंके अभावमें भी उनका उदय देखा जाता है इसलिए १५
निमित्तोंकी प्रधानता न होनेसे सातादि प्रकृतियोंकी जीवविपाकी संज्ञा है । इस प्रकार सब कर्म-
प्रकृतियां कितने भागोंमें बटी हुई हैं और उनकी जीवविपाकी आदि संज्ञा होनेका क्या कारण है
इसका विचार किया ।
§ ७५६. नामकर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे । इसके बाद कहने योग्य गोत्रकर्मके प्रकृति-
विकल्पोंका व्याख्यान करते हैं— २०
उच्चगोत्र और नीचगोत्र ये दो गोत्रकर्म हैं ॥१२॥
§ ७५७. गोत्रकर्म दो प्रकारका है—उच्चगोत्र और नीचगोत्र । जिसके उदयसे लोकपूजित
कुलोंमें जन्म होता है वह उच्चगोत्र है । जिसके उदयसे गर्हित कुलोंमें जन्म होता है वह नीच-
गोत्र है ।
विशेषार्थ—ऐसा निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध है कि जिसके उच्चगोत्रका उदय होता है वह २५
ऐसे माता पिता के यहां जन्म लेता है जहां सदाचारकी प्रवृत्ति हो या उस ओर झुकाव हो या ऐसी
प्रवृत्ति वाले व्यक्तियोंके साथ सम्पर्क हो । और जिसके नीचगोत्र कर्मका उदय होता है वह विरुद्ध
प्रवृत्तिवाले माता पिताके यहाँ जन्म लेता है । कुल, गोत्र, सन्तान और परम्परा इनका एक अर्थ
है । परम्परा दो प्रकारसे चलती है एक पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रमूलक परम्परा और दूसरी आचार-
विचार मूलक परम्परा । यहाँ दूसरी प्रकारकी परम्परा ली गयी है । गोत्रका सम्बन्ध शरीर या ३०
रक्तसे न होकर जीवके आचार-विचारसे है । गोत्रकर्मको जीवविपाकी कहनेका कारण भी यही है ।
इस प्रकार गोत्रकर्म, उसके भेद और उनके स्वरूपका संक्षेपमें विचार किया ।
§ ७५८. आठवीं कर्म प्रकृतिकी उत्तर प्रकृतियोंका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं ।
दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य इनके पाँच अन्तराय हैं ॥१३॥ ३५
१. जन्मकारणं तदु-आ०, दि० १, दि० २ । २. जन्मकारणं तन्नी-आ० दि०, १, दि० २ ।
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३०० सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१४ § ७५९ -
§ ७५९. अन्तरायापेक्षया भेदनिर्देशः क्रियते—दानस्यान्तरायो लाभस्यान्तराय इत्यादि ।
दानादिपरिणामव्याघातहेतुत्वात्तद्व्यपदेशः । यदुदयाद्दातुकामोऽपि न प्रयच्छति, लब्धुकामोऽपि न
लभते, भोक्तुमिच्छन्नपि न भुङ्क्ते, उपभोक्तुमभिवाञ्छन्नपि नोपभुङ्क्ते, उत्साहितुकामोऽपि
नोत्सहते त एते पञ्चान्तरायस्य भेदाः ।
§ ७६०. व्याख्याताः प्रकृतिबन्धविकल्पाः । इदानीं स्थितिबन्धविकल्पो वक्तव्यः । सा
स्थितिर्द्विविधा—उत्कृष्टा जघन्या च । तत्र यासां कर्मप्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिः समाना तन्निर्दें-
शार्थमुच्यते—
आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥
§ ७६१. मध्येऽन्ते वा तिसृणां ग्रहणं माभूदिति 'आदितः' १इत्युच्यते । 'अन्तरायस्य' इति
वचनं व्यवहितग्रहणार्थम् । सागरोपममुक्तपरिमाणम् । कोटीनां कोट्यः कोटीकोट्यः । परा उत्कृष्टे-
त्यर्थः । एतदुक्तं भवति—ज्ञानावरणदर्शनावरणवेदनीयान्तरायाणामुत्कृष्टा स्थितिस्त्रिंशत्सागरोपम-
कोटीकोट्य इति । सा कस्य भवति । मिथ्यादृष्टेः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रियस्य पर्याप्तकस्य । अन्येषामार्ग-
मात्संप्रत्ययः कर्तव्यः ।
§ ७५९. यहाँ अन्तरायकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है । यथा—दान का अन्तराय, लाभका
अन्तराय इत्यादि । इन्हें दानादि परिणामके व्याघातका कारण होनेसे यह संज्ञा मिली है । जिनके
उदयसे देनेकी इच्छा करता हुआ भी नहीं देता है, प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हुआ भी नहीं प्राप्त
करता है, भोगनेकी इच्छा करता हुआ भी नहीं भोग सकता है, उपभोग करनेकी इच्छा करता
हुआ भी उपभोग नहीं ले सकता है और उत्साहित होनेकी इच्छा रखता हुआ भी उत्साहित नहीं
होता है इस प्रकार ये पांच अन्तरायके भेद हैं ।
विशेषार्थ—जीवकी दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पाँच लब्धियाँ हैं । अन्तरायकर्म
इन पाँच जीवभावोंकी अभिव्यक्तिमें बाधक कारण है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । कहीं कहीं
अन्तराय कर्मके क्षय व क्षयोपशमका फल बाह्य सामग्रीकी प्राप्ति कहा गया है पर वह उपचार
कथन है । तत्त्वतः बाह्य सामग्री पर है । उसकी प्राप्ति जीवविपाकी अन्तराय कर्मके क्षय व क्षयो-
पशमका फल नहीं हो सकता । परमें स्वका भाव मिथ्यात्वका फल है और उसका स्वीकार कषाय-
का फल है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।
§ ७६०. प्रकृतिबन्धके भेद कहे । इस समय स्थितिबन्धके भेद कहने चाहिए । वह स्थिति
दो प्रकारकी है—उत्कृष्ट स्थिति और जघन्य स्थिति । उनमें जिन कर्मप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति
समान है उनका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आदिकी तीन प्रकृतियाँ अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वेदनीय तथा अन्तराय इन
चारकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम है ॥१४॥
§ ७६१. बीचमें या अन्तमें तीन का ग्रहण न होवे इसलिए सूत्रमें 'आदितः' पद कहा है ।
अन्तरायकर्मका पाठ प्रारम्भके तीन कर्मोंके पाठसे व्यवहित है उसका ग्रहण करनेके लिए, 'अन्त-
रायस्य' वचन दिया है । सागरोपमका परिमाण पहले कह आये हैं । कोटियोंकी कोटि कोटाकोटि
कहलाती है । पर शब्द उत्कृष्ट वाची है । उक्त कथनका यह अभिप्राय है कि ज्ञानावरण, दर्शना-
वरण, वेदनीय और अन्तरायकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम होती है । शंका—
यह उत्कृष्ट स्थिति किसे प्राप्त होती है ? समाधान—मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, पंचेन्द्रिय और पर्याप्तक
जीवको प्राप्त होती है । अन्य जीवोंके आगमसे देखकर ज्ञान कर लेना चाहिए ।
१. आदित उच्च-आ०, दि० १, दि० २ ।
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§ ७६२. मोहनीयस्योत्कृष्टस्थितिप्रतिपत्त्यर्थमाह —
सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥
§ ७६३. 'सागरोपमकोटीकोट्यः पराः स्थितिः' इत्यनुवर्तते । इयमपि परा स्थितिर्मिथ्या-
दृष्टेः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रियस्य पर्याप्तकस्यावसेया । इतरेषां¹ यथागममवगमः कर्तव्यः ।
§ ७६४. नामगोत्रयोरुत्कृष्टस्थितिप्रतिपत्त्यर्थमाह—
विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥
§ ७६५. 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' इत्यनुवर्तते । इयमप्युत्कृष्टा स्थितिर्मिथ्यादृष्टेः
संज्ञिपञ्चेन्द्रियपर्याप्तकस्य । इतरेषां यथागममवबोद्धव्या ।
§ ७६६. अथायुषः कोत्कृष्टा स्थितिरित्युच्यते—
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥
§ ७६७. पुनः 'सागरोपम'ग्रहणं कोटीकोटिनिवृत्त्यर्थम् । 'परा स्थितिः'इत्यनुवर्तते । इयमपि
पूर्वोक्तस्यैव । शेषाणामागमतोऽवसेया ।
विशेषार्थ—कर्मोंकी स्थिति तीन प्रकारसे प्राप्त होती है—बन्धसे, संक्रमसे और सत्त्वसे ।
यहाँपर बन्धकी अपेक्षा उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति बतलायी गयी है। अतितीव्र संक्लेश परिणामोंसे
मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय कर्मकी
तीस कोटाकोटि सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बाँधता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
§ ७६२. मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटाकोटि सागरोपम है ॥१५॥
§ ७६३. इस सूत्रमें 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है । यह
भी उत्कृष्ट स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके जानना चाहिए । इतर जीवोंके
आगमके अनुसार ज्ञान कर लेना चाहिए ।
§ ७६४. नाम और गोत्रकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
नाम और गोत्रकी उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटाकोटि सागरोपम है ॥१६॥
§ ७६५. 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है। यह भी उत्कृष्ट
स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके जानना चाहिए। इतर जीवोंके आगमके अनुसार
जान लेना चाहिए ।
§ ७६६. अब आयु कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आयुकी उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागरोपम है ॥१७॥
§ ७६७. इस सूत्र में पुनः 'सागरोपम' पदका ग्रहण कोटाकोटी पदकी निवृत्तिके लिए दिया
है। यहाँ 'परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है। यह भी पूर्वोक्त जीवके होती है। शेष जीवोंके
आगमसे जान लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी मिथ्यादृष्टि कहा है। सो
यह इस अभिप्रायसे कहा है कि मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव भी नरकायु बन्धके योग्य
उत्कृष्ट संक्लेश परिणामोंके होने पर नरकायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध करता है। इसका यह अभिप्राय
नहीं कि अन्य गुणस्थानवालेके आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध नहीं होता । देवायुका तैंतीस साग-
१. -सेया । अन्येषां यथागममवगमः कर्तव्यः आ०, दि० १ । -सेया । इतरेषां यथागममवगन्तव्यम् ?
३०२ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१८ § ७६८ -
§ ७६८. उक्तोत्कृष्टा स्थितिः । इदानीं जघन्या स्थितिर्वक्तव्या । तत्र समानजघन्यस्थितीः
पञ्च प्रकृतीरवस्थाप्य तिसृणां जघन्यस्थितिप्रतिपत्त्यर्थं सूत्रद्वयमुपन्यस्यते लघ्वर्थम्—
अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य ॥१८॥
§ ७६९. अपरा जघन्या इत्यर्थः । वेदनीयस्य द्वादश मुहूर्ताः ।
नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥
§ ७७०. 'मुहूर्ता' इत्यनुवर्तते । 'अपरा स्थितिः' इति च ।
§ ७७१. अवस्थापितप्रकृतिजघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥२०॥
§ ७७२. शेषाणां पञ्चानां प्रकृतीनामन्तर्मुहूर्तापरा स्थितिः । ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां
जघन्या स्थितिः सूक्ष्मसांपराये, मोहनीयस्य अनिवृत्तिबादरसांपराये । आयुषः संख्येयवर्षायुष्षु¹
तिर्यक्षु मनुष्येषु च ।
§ ७७३. आह, उभयी स्थितिरभिहिता । ज्ञानावरणादीनाम् अथानुभवः किंलक्षण
इत्यत आह—
विपाकोऽनुभवः ॥२१॥
§ ७७४. विशिष्टो नानाविधो वा पाको विपाकः । पूर्वोक्तकषायतीव्रमन्दादिभावास्रवविशेषा-
द्विशिष्टः पाको विपाकः । अथवा द्रव्यक्षेत्रकालभवभावलक्षणनिमित्तभेदजनितवैश्वरूप्यो नानाविधः
रोषम उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सकल संयमके धारी सम्यग्दृष्टिके ही होता है । पर टीकाकारने यहाँ
उसके कहनेकी विवक्षा नहीं की ।
§ ७६८. उत्कृष्ट स्थिति कही । अब जघन्य स्थिति कहनी चाहिए । उसमें समान जघन्य
स्थितिवाली पाँच प्रकृतियोंको स्थगित करके थोड़ेमें कहनेके अभिप्रायसे तीन प्रकृतियोंकी जघन्य
स्थितिका ज्ञान करानेके लिए दो सूत्र कहते हैं—
वेदनीयकी जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है ॥१८॥
§ ७६९. अपरा अर्थात् जघन्य । यह वेदनीयकी बारह मुहूर्त है ।
नाम और गोत्रकी जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है ॥१९॥
§ ७७०. यहाँ 'मुहूर्ता' पदकी अनुवृत्ति होती है और 'अपरा स्थितिः' पदकी भी ।
§ ७७१. अब स्थगित की गयीं प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
बाकीके पाँच कर्मोंकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है ॥२०॥
§ ७७२. शेष पाँच प्रकृतियोंकी अन्तर्मुहूर्त जघन्य स्थिति है । ज्ञानावरण, दर्शनावरण और
अन्तरायकी जघन्य स्थिति सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें, मोहनीयकी जघन्य स्थिति अनिवृत्ति बादर-
साम्पराय गुणस्थानमें और आयुको जघन्य स्थिति संख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंचों और मनुष्यों-
में प्राप्त होती है ।
§ ७७३. दोनों प्रकारकी स्थिति कही । अब ज्ञानावरणादिकके अनुभवका क्या स्वरूप है
इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विपाक अर्थात् विविध प्रकारके फल देनेकी शक्तिका पड़ना ही अनुभव है ॥२१॥
§ ७७४. विशिष्ट या नाना प्रकारके पाकका नाम विपाक है । पूर्वोक्त कषायोंके तीव्र, मन्द
आदिरूप भावास्रवके भेदसे विशिष्ट पाकका होना विपाक है । अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और
१. -युष्कति-मु० ।
पाको विपाकः। असावनुभव इत्याख्यायते । शुभपरिणामानां प्रकर्षभावाच्छुभप्रकृतीनां प्रकृष्टोऽनुभवः
अशुभप्रकृतीनां निकृष्टः । अशुभपरिणामानां प्रकर्षभावादशुभप्रकृतीनां प्रकृष्टोऽनुभवः शुभप्रकृतीनां
निकृष्टः । स एवं प्रत्ययवशादुपात्तोऽनुभवो द्विधा प्रवर्तते स्वमुखेन परमुखेन च । सर्वासां मूल-
प्रकृतीनां स्वमुखेनैवानुभवः । उत्तरप्रकृतीनां तुल्यजातीयानां परमुखेनापि भवति आयुर्दर्शनचारित्र-
मोहवर्जनाम् । न हि नरकायुर्मुखेन तिर्यगायुर्मनुष्यायुर्वा विपच्यते । नापि दर्शनमोहश्चारित्रमोह- ५
मुखेन, चारित्रमोहो वा दर्शनमोहमुखेन ।
§ ७७५. आह अभ्युपेमः प्रागुपचितनानाप्रकारकर्मविपाकोऽनुभवः । इदं तु न विजानीमः
किमयं प्रसंख्यातोऽप्रसंख्यातः । इत्यत्रोच्यते प्रसंख्यातोऽनुभूयत इति ब्रूमहे । कुतः । यतः—
स यथानाम ॥२२॥
§ ७७६. ज्ञानावरणस्य फलं ज्ञानाभावो दर्शनावरणस्यापि¹ फलं दर्शनशक्त्युपरोध इत्येव- १०
माद्यन्वर्थसंज्ञानिर्देशात्सर्वासां कर्मप्रकृतीनां सविकल्पानामनुभवसंप्रत्ययो जायते ।
§ ७७७. आह, यदि विपाकोऽनुभवः प्रतिज्ञायते, तत्कर्मानुभूतं सत्² किमाभरणवदवतिष्ठते
आहोस्विनिष्पीतसारं प्रच्यवते । इत्यत्रोच्यते—
ततश्च निर्जरा ॥२३॥
भावसद्भाव निमित्तभेदसे उत्पन्न हुआ वैश्वरूप नाना प्रकारका पाक विपाक है । इसीको अनुभव १५
कहते हैं । शुभ परिणामोंके प्रकर्षभावके कारण शुभ प्रकृतियोंका प्रकृष्ट अनुभव होता है और अशुभ
प्रकृतियोंका निकृष्ट अनुभव होता है । तथा अशुभ परिणामोंके प्रकर्षभावके कारण अशुभ प्रकृतियों-
का प्रकृष्ट अनुभव होता है और शुभ प्रकृतियोंका निकृष्ट अनुभव होता है । इस प्रकार कारणवशसे
प्राप्त हुआ वह अनुभव दो प्रकारसे प्रवृत्त होता है—स्वमुखसे और परमुखसे । सब मूल प्रकृतियों-
का अनुभव स्वमुखसे ही प्रवृत्त होता है । आयु, दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयके सिवा तुल्य- २०
जातीय उत्तरप्रकृतियोंका अनुभव परमुखसे भी प्रवृत्त होता है । नरकायुके मुखसे तिर्यंचायु या
मनुष्यायुका विपाक नहीं होता । और दर्शनमोह चारित्रमोहरूपसे और चारित्रमोह दर्शनमोहरूपसे
विपाकको नहीं प्राप्त होता ।
§ ७७५. शंका—पहले संचित हुए नाना प्रकारके कर्मोंका विपाक अनुभव है यह हम स्वी-
कार करते हैं किन्तु यह नहीं जानते कि क्या यह प्रसंख्यात होता है या अप्रसंख्यात होता है ? २५
समाधान—हम कहते हैं कि यह प्रसंख्यात अनुभवमें आता है । शंका—किस कारणसे । समाधान—
यतः—
वह जिस कर्मका जैसा नाम है उसके अनुरूप होता है ॥२२॥
§ ७७६. ज्ञानावरणका फल ज्ञानका अभाव करना है । दर्शनावरणका भी फल दर्शनशक्ति-
का उपरोध करना है इत्यादि रूपसे सब कर्मोंकी सार्थक संज्ञाका निर्देश किया है अतएव अपने ३०
अवान्तर भेदसहित उनमें किसका क्या अनुभव है इसका ज्ञान हो जाता है ।
§ ७७७. यदि विपाकका नाम अनुभव है ऐसा स्वीकार करते हो तो अनुभूत होने पर वह
कर्म आभरणके समान अवस्थित रहता है या फल भोग लेनेके बाद वह झर जाता है ? इस बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इसके बाद निर्जरा होती है ॥२३॥ ३५
१. -णस्य फलं मु० । २. भूतं किमा -मु० ।
३०४ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।२३ § ७७८ -
७७८. पीडानुग्रहावात्मने प्रदायाभ्यवहृतौदनादिविकारवत्पूर्वस्थितिक्षयादवस्थानाभावातक-
र्मणो निवृत्तिर्निर्जरा । सा द्विपकारा—विपाकजा इतरा च । तत्र चतुर्गतावनेकजातिविशेषावघूर्णिते¹
संसारमहार्णवे चिरं परिभ्रमतः शुभाशुभस्य कर्मणः क्रमेण परिपाककालप्राप्तस्यानुभवोदयावलि-
स्रोतोऽनुप्रविष्टस्यारब्धफलस्य या निवृत्तिः सा विपाकजा निर्जरा। यत्कर्माप्राप्तविपाककालमौप-
क्रमिकक्रियाविशेषसामर्थ्यादनुदीर्णं बलादुदीर्योदयावलिं प्रवेश्य वेद्यते आम्रपनसादिपाकवत् सा
अविपाकजा निर्जरा । 'च'शब्दो निमित्तान्तरसमुच्चयार्थः । 'तपसा निर्जरा च' इति वक्ष्यते ततश्च
भवति अन्यतश्चेति सूत्रार्थो योजितः । किमर्थमिह निर्जरानिर्देशः क्रियते, संवरात्परा निर्देष्टव्या
उद्देशवत् । लध्वर्थमिह वचनम् । तत्र हि पाठे 'विपाकोऽनुभवः' इति पुनरनुवादः कर्तव्यः स्यात् ।
§ ७७८. जिस प्रकार भात आदिका मल निवृत्त होकर निर्जीण हो जाता है उसी प्रकार
आत्माका भला-बुरा करके पूर्व प्राप्त स्थितिका नाश हो जानेसे स्थिति न रहनेके कारण कर्मकी
निवृत्तिका होना निर्जरा है। वह दो प्रकारकी है—विपाकजा और अविपाकजा । उसमें अनेक
जाति विशेष रूपी भँवर युक्त चार गतिरूपी संसार महासमुद्रमें चिरकाल तक परिभ्रमण करनेवाले
इस जीवके क्रमसे परिपाक कालको प्राप्त हुए और अनुभवोदयावलि रूपी सोतेमें प्रविष्ट हुए ऐसे
शुभाशुभ कर्मका फल देकर जो निवृत्ति होती है वह विपाकजा निर्जरा है। तथा आम और पनस
को औपक्रमिक क्रियाविशेषके द्वारा जिस प्रकार अकालमें पका लेते हैं उसी प्रकार जिसका विपाक-
काल अभी नहीं प्राप्त हुआ है फिर भी औपक्रमिक क्रियाविशेषकी सामर्थ्यसे उदयावलिके बाहर
स्थित जो कर्म बलपूर्वक उदयावलिमें प्रविष्ट कराके अनुभवा जाता है वह अविपाकजा निर्जरा है।
सूत्रमें 'च' शब्द अन्य निमित्तका समुच्चय करनेके लिए दिया है। तपसा निर्जरा च' यह आगे
कहेंगे, इसलिए 'च' शब्दके देनेका यह प्रयोजन है कि पूर्वोक्त प्रकारसे निर्जरा होती है और अन्य
प्रकारसे भी। शंका—यहाँ निर्जराका उल्लेख किसलिए किया है, क्योंकि उद्देश्यके अनुसार उसका
संवरके बाद उल्लेख करना ठीक होता ? समाधान—थोड़ेमें बोध करानेके लिए यहाँ निर्जराका
उल्लेख किया है। संवरके बाद पाठ देने पर 'विपाकोऽनुभवः' इसका फिरसे अनुवाद करना पड़ता।
विशेषार्थ—अनुभव, अनुभाग या फलदानशक्ति इनका एक अर्थ है। कर्मका बन्ध होते समय
जिस कर्मकी जो प्रकृति होती है उसके अनुरूप उसे फलदानशक्ति प्राप्त होतो है। उदाहरणार्थ—
ज्ञानावरणकी ज्ञानको आवृत्त करनेकी प्रकृति है इसलिए इसे इसीके अनुरूप फलदानशक्ति प्राप्त
होती है। प्रकृतिका अर्थ स्वभाव है और अनुभवका अर्थ है उस स्वभावके अनुरूप उसे भोगना ।
साधारणतः यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि प्रकृति और अनुभवका यही अर्थ है तो इन्हें
अलग अलग मानना उचित नहीं है, क्योंकि जिस कर्मकी जैसी प्रकृति होगी उसके अनुरूप उसका
भोग सुतरां सिद्ध है। इसलिए प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्ध ये दो स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते, किन्तु
अनुभवबन्धका अन्तर्भाव प्रकृतिबन्धमें ही हो जाता है। यदि कहा जाय कि ज्ञानावरण आदि रूप-
से कर्मकी प्रकृति फलदानशक्तिके निमित्तसे होती है इसलिए प्रकृतिबन्धमें अनुभवबन्धका अन्तर्भाव
नहीं किया जा सकता सो इसका यह समाधान है कि जब कि प्रकृतिबन्धका कारण योग है और
अनुभवबन्धका कारण कषाय है तब फिर फलदान शक्तिके निमित्तसे कर्मकी प्रकृति बनती है यह
कैसे माना जा सकता है। थोड़ी देरको यह मान भी लिया जाय तब भी यह प्रश्न खड़ा रहता है
कि प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्धको अलग अलग क्यों माना गया है और उनके अलग अलग
माननेके योग और कषाय दो स्वतन्त्र कारण क्यों बतलाये गये हैं। सूत्रकारने बन्धके चार भेद
करके भी विपाक अर्थात् कर्मभोगको अनुभव कहा है और उसे प्रकृतिके अनुरूप बतलाया है।
१. -घूर्णिते आ०, दि० १, दि० २ ।
- ८।२३ § ७७८ ] अष्टमोऽध्यायः ३०५
इससे तो यही सिद्ध होता है कि वस्तुतः ये दो नहीं हैं, किन्तु बन्ध समयकी अपेक्षा जिसका नाम
प्रकृति है उदयकालकी अपेक्षा उसे ही अनुभव कहते हैं ? समाधान यह है कि कर्मबन्धके समय कर्म-
का विविधरूपसे विभाग योगके निमित्तसे ही होता है और विभागको प्राप्त हुए कर्मोंमें हीनाधिक
फलदानशक्तिका प्राप्त होना कषायके निमित्तसे होता है, इसलिए ये दोनों स्वतन्त्र माने गये हैं।
यद्यपि यह ठीक है कि बिना शक्तिके किसी कर्मकी प्रकृति नहीं बन सकती। स्वतन्त्र प्रकृति कहनेसे
उसकी शक्तिका बोध हो ही जाता है फिर भी ऐसी शक्तिकी एक सीमा होती है। उसका उल्लंघन
कर जो न्यूनाधिक शक्ति पायी जाती है उसीका बोध कराना अनुभागबन्धका काम है। उदाहरणार्थ
ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें सातावेदनीयका प्रकृति बन्ध होता है और यह प्रकृति-
बन्ध एक नियत मर्यादामें अनुभागको लिये हुए ही होता है फिर भी यहाँ अनुभागबन्धका निषेध
किया गया है सो इसका कारण यह है कि जो अनुभाग सकषाय अवस्थामें सातावेदनीयका प्राप्त
होता था वह यहाँ प्राप्त नहीं होता है। सकषाय अवस्थामें प्राप्त होनेवाले जघन्य अनुभागसे भी
यह अनन्तवें भागमात्र होता है। इतना कम अनुभाग सकषाय अवस्थामें नहीं प्राप्त हो सकता।
इससे प्रकृतिबन्धसे अनुभागबन्धके अलग कहनेकी उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह
है कि प्रकृतिबन्धमें कर्मभेदको स्वीकार करके भी न्यूनाधिक फलदान शक्ति नहीं स्वीकार
की गयी है किन्तु अनुभागबन्धमें इसका और इसके कारणका स्वतन्त्र रूपसे विचार किया जाता
है इसलिए प्रकृतिबन्ध और उसका कारण स्वतन्त्र है तथा अनुभागबन्ध और उसका कारण
स्वतन्त्र है यह निश्चित होता है। अब रही सूत्रकारके विपाकको अनुभव कहनेकी बात सो
इस कथनमें भी यही अभिप्राय छिपा हुआ है। सब जीवोंका विपाक एक प्रकारका नहीं होता,
वह न्यूनाधिक देखा जाता है और विपाककी यह न्यूनाधिकता अकारण नहीं हो सकती।
यही कारण है कि सूत्रकार अनुभवबन्धकी स्वतन्त्र परिगणना करते हैं और उसकी पुष्टि
विपाकके द्वारा दिखलाते हैं। इस प्रकार अनुभवबन्ध क्या है और उसे स्वतन्त्र क्यों कहा इसका
विचार किया।
फिर भी यह अनुभाग बन्धकालमें जैसा प्राप्त होता है एकान्ततः वैसा ही नहीं बना रहता
है। अपने अवस्थान कालके भीतर वह बदल भी जाता है और नहीं भी बदलता है। बदलनेसे
इसकी तीन अवस्थाएँ होती हैं—संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण। संक्रमण अवान्तर प्रकृतियोंमें
होता है, मूल प्रकृतियोंमें नहीं होता। उसमें भी आयुकर्मकी अवान्तर प्रकृतियों का संक्रमण नहीं
होता और दर्शनमोहनीयका चारित्रमोहनीय रूपसे तथा चारित्रमोहनीयका दर्शनमोहनीयरूपसे
संक्रमण नहीं होता। संक्रमणके चार भेद हैं—प्रकृतिसंक्रमण, स्थितिसंक्रमण, अनुभागसंक्रमण
और प्रदेशसंक्रमण। जहाँ प्रकृतिसंक्रमण और प्रदेशसंक्रमणकी मुख्यता होती है वहाँ वह संक्रमण
शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है और जहाँ मात्र स्थितिसंक्रमण अनुभागसंक्रमण होता है वहाँ
वह उत्कर्षण और अपकर्षण शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है। बन्धकालमें जो स्थिति और
अनुभाग प्राप्त होता है उसमें कमी होना अपकर्षण है और घटी हुई स्थिति व अनुभागमें वृद्धि
होना उत्कर्षण है। इस प्रकार विविध अवस्थाओंमें-से गुजरते हुए उदयकालमें जो अनुभाग रहता
है उसका परिपाक होता है। अनुदय अवस्थाको प्राप्त प्रकृतियोंका परिपाक उदय अवस्थाको प्राप्त
सजातीय प्रकृति रूपसे होता है। इसके विषयमें यह नियम है कि उदयवाली प्रकृतियोंका फल
स्वमुखसे मिलता है और अनुदयवाली प्रकृतियोंका फल परमुखसे मिलता है। उदाहरणार्थ—
साताका उदय रहने पर उसका भोग सातारूपसे ही होता है किन्तु तब असाता स्तिबुक
संक्रमण द्वारा सातारूपसे परिणमन करती जाती है इसलिए इसका उदय परमुखसे होता है।
उदय कालके एक समय पहले अनुदयरूप प्रकृतिके निषेकका उदयको प्राप्त हुई प्रकृतिरूपसे परिणम
३९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
is next to line 25)
" कर्म प्रकृतियोंके कारणभूत प्रति समय योगविशेषसे सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाही और स्थित"
Line 25:
"अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु सब आत्मप्रदेशोंमें (सम्बन्धको प्राप्त) होते हैं ॥२४॥"
Line 26:
" § ७८०. नामप्रत्ययाः—नामके कारणभूत कर्मपरमाणु नामप्रत्यय कहलाते हैं। 'नाम' इस"
Line 27:
"पद द्वारा सब कर्मप्रकृतियाँ कही जाती हैं। जिसकी पुष्टि 'स यथानाम' इस सूत्रवचनसे होती है।"
Line 28:
"इस पदद्वारा हेतुका कथन किया गया है। सर्वतः—प्रदेशबन्ध सब भवोंमें होता है। 'सर्वेषु भवेषु"
Line 29:
"इति सर्वतः' यह इसकी व्युत्पत्ति है। सर्व शब्दसे 'दृश्यन्तेऽन्यतोऽपि' इस सूत्र द्वारा तसि प्रत्यय"
Line 30:
(Marginal '३०')
"करनेपर सर्वतः पद बनता है। इस पदद्वारा कालका ग्रहण किया गया है। एक-एक जीवके व्यतीत"
Line 31:
"हुए अनन्तानन्त भव होते हैं और आगामी संख्यात, असंख्यात व अनन्तानन्त भव होते हैं। योग-"
Line 32:
"विशेषात्—योगविशेषरूप निमित्तसे कर्मरूप पुद्गल ग्रहण किये जाते