सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 418, कुल 558 में से
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" कर्म प्रकृतियोंके कारणभूत प्रति समय योगविशेषसे सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाही और स्थित"
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"अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु सब आत्मप्रदेशोंमें (सम्बन्धको प्राप्त) होते हैं ॥२४॥"
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" § ७८०. नामप्रत्ययाः—नामके कारणभूत कर्मपरमाणु नामप्रत्यय कहलाते हैं। 'नाम' इस"
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"पद द्वारा सब कर्मप्रकृतियाँ कही जाती हैं। जिसकी पुष्टि 'स यथानाम' इस सूत्रवचनसे होती है।"
Line 28:
"इस पदद्वारा हेतुका कथन किया गया है। सर्वतः—प्रदेशबन्ध सब भवोंमें होता है। 'सर्वेषु भवेषु"
Line 29:
"इति सर्वतः' यह इसकी व्युत्पत्ति है। सर्व शब्दसे 'दृश्यन्तेऽन्यतोऽपि' इस सूत्र द्वारा तसि प्रत्यय"
Line 30:
(Marginal '३०')
"करनेपर सर्वतः पद बनता है। इस पदद्वारा कालका ग्रहण किया गया है। एक-एक जीवके व्यतीत"
Line 31:
"हुए अनन्तानन्त भव होते हैं और आगामी संख्यात, असंख्यात व अनन्तानन्त भव होते हैं। योग-"
Line 32:
"विशेषात्—योगविशेषरूप निमित्तसे कर्मरूप पुद्गल ग्रहण किये जाते