सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९४ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१० § ७५२ -
§ ७५२. मोहनीयानन्तरोद्देशभाज आयुष उत्तरप्रकृतिनिर्ज्ञापनार्थमाह—
नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥ १० ॥
§ ७५३. नारकादिषु भवसम्बन्धेनायुषो व्यपदेशः क्रियते । नरकेषु भवं नारकमायुः,
तिर्यग्योनिषु भवं तैर्यग्योनम्, मानुषेषु भवं मानुषम्, देवेषु भवं दैवमिति । नरकेषु तीव्रशीतोष्ण-
वेदनेषु यन्निमित्तं दीर्घजीवनं तन्नारकम् । एवं शेषेष्वपि ।
निमित्त होता है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व समीचीन दर्शनरूप परिणामको सदोष बनानेमें
निमित्त होता है । इस प्रकार एक मिथ्यात्व कर्म सम्यक्त्वका निमित्त पाकर तीन भागोंमें विभक्त
हो जाता है इसलिए बन्धकी अपेक्षा दर्शनमोहनीय एक होकर भी सत्ताकी अपेक्षा वह तीन प्रकार-
का माना गया है। मोहनीयका दूसरा भेद चारित्रमोहनीय है । व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी प्राणप्रतिष्ठा
करनेवाला दर्शन ही सम्यग्दर्शन है यह हम पहले बतला आये हैं । अतः हमारा इस दर्शनके अनु-
रूप जो आचार होता है वही सदाचार माना जा सकता है, अन्य नहीं । यही कारण है कि जैन-
दर्शनके अनुसार स्वावलम्बनके अनुरूप आचारको ही सदाचार कहा गया है । इसी सदाचारका
दूसरा नाम सच्चारित्र है । जो कर्म इस सच्चारित्रके होनेमें बाधक होता है उसे ही आगममें
चारित्रमोहनीय कहा है । इसके मूल भेद दो हैं—कषायवेदनीय और अकषायवेदनीय । अकषाय-
वेदनीय देशघाति कर्म होनेसे यह सम्यक् चारित्रकी प्राप्तिमें बाधक नहीं है । कषायवेदनीयके
चार भेद हैं । उनमें से अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ व्यक्तिस्वातन्त्र्यके अनुरूप
स्वावलम्बनकी धाराका जीवनमें महत्त्व प्रस्थापित नहीं होने देता । इसीसे इसे अनन्त अर्थात्
संसारका कारण कहा है । व्यक्तिस्वातन्त्र्य और स्वावलम्बनका अविनाभाव सम्बन्ध है । जीवनमें
व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी श्रद्धा होनेपर स्वावलम्बनका महत्त्व अपने आप समझमें आने लगता है । यह
नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति अपने जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी श्रद्धा तो करे पर उसकी प्राप्तिके
लिए जीवनको परावलम्बी बनाये रखनेकी ओर उसका झुकाव हो । यही कारण है कि अनन्तानु-
बन्धीचतुष्कको मिथ्यात्वका अनुबन्धी माना गया है । इस प्रकार जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्य और
तदनुरूप स्वावलम्बनके प्रति अभिरुचि हो जानेपर व्यक्ति पूर्ण स्वावलम्बी बननेके लिए उद्यत
होता है । किन्तु अनादिकालीन परतन्त्रताओंका वह युगपत् त्याग नहीं कर सकता, इसलिए
जैसी-जैसी अन्तःशुद्धि होती जाती है तदनुरूप वह स्वावलम्बी बनता जाता है । कभी-कभी ऐसा
भी होता है कि व्यक्तिके जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्य और उसके मार्ग स्वावलम्बनके प्रति पूर्ण श्रद्धाके
होनेपर भी वह उसे जीवनमें उतारनेमें अपनेको असमर्थ पाता है । इसका कारण जहाँ जीवनकी
भीतरी कमजोरी माना गया है वहाँ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ इस दशाके
बनाये रखनेमें निमित्त हैं । यही कारण है कि इन कषायोंको आंशिक स्वावलम्बनका बाधक कहा
है । और पूर्ण स्वावलम्बनमें बाधक कारण प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ माने
गये हैं । संज्वलन, क्रोध, मान, माया और लोभ स्वावलम्बनके आचरणको सदोष तो करते हैं पर
बाधक नहीं हो पाते । इस प्रकार मोहनीय और उसके अवान्तर भेदोंका क्या कार्य है इसका यहाँ
संक्षेपमें विचार किया ।
§ ७५२. मोहनीयके अनन्तर उद्देशभाक् आयु कर्मकी उत्तर प्रकृतियोंका विशेष ज्ञान
करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु ये चार आयु हैं ॥१०॥
§ ७५३. नारक आदि गतियोंमें भवके सम्बन्धसे आयुकर्मका नामकरण किया जाता है ।
यथा—नरकोंमें होनेवाली नारक आयु है, तिर्यग्योनियोंमें होनेवाली तैर्यग्योन आयु है, मनुष्यों-
में होनेवाली मानुष आयु है और देवोंमें होनेवाली देवायु है । तीव्र शीत और उष्ण वेदनावाले