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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 558 में से

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पृष्ठ 405

८।९ § ७५१ ] अष्टमोऽध्याय २९३
न्भावान्प्रतिपद्यते स स्त्रीवेदः। यस्योदयात्पौंसान्भावान्नास्कन्दति स पुंवेदः। यदुदयान्नापुंसका-
न्भावानुपव्रजति स नपुंसकवेदः।
§ ७५१. कषायवेदनीयं षोडशविधम् । कुतः। अनन्तानुबन्ध्यादिविकल्पात् । तद्यथा—
कषायाः क्रोधमानमायालोभाः । तेषां चतस्रोऽवस्थाः—अनन्तानुबन्धिनोऽप्रत्याख्यानावरणाः
प्रत्याख्यानावरणाः संज्वलनाश्चेति । अनन्तसंसारकारणत्वान्मिथ्यादर्शनमनन्तम् । तदनुबन्धिनोऽ- ५
नन्तानुबन्धिनः क्रोधमानमायालोभाः । यदुदयाद्देशविरतिं संयमासंयमाख्यामल्पामपि कतुं न
शक्नोति ते देशप्रत्याख्यानमावृण्वन्तोऽप्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोभाः । यदुदयाद्विरतिं
कृत्स्नां संयमाख्यां न शक्नोति कतुं ते कृत्स्नं प्रत्याख्यानमावृण्वन्तः प्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमान-
मायालोभाः । समेकीभावे वर्तते । संयमेन सहावस्थानादेकीभूय ज्वलन्ति संयमो वा ज्वलत्येषु
सत्स्वपीति संज्वलनाः क्रोधमानमायालोभाः । त एते समुदिताः सन्तः षोडश कषाया भवन्ति । १०
भावोंको प्राप्त होता है वह स्त्रीवेद है। जिसके उदयसे पुरुषसम्बन्धी भावोंको प्राप्त होता है वह
पुंवेद है और जिसके उदयसे नपुंसक सम्बन्धी भावोंको प्राप्त होता है वह नपुंसकवेद है।
§ ७५१. अनन्तानुबन्धी आदिके विकल्पसे कषायवेदनीयके सोलह भेद हैं। यथा—क्रोध,
मान, माया और लोभ ये कषाय हैं। इनकी चार अवस्थाएँ हैं—अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्याना-
वरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन। अनन्त संसारका कारण होनेसे मिथ्यादर्शन अनन्त कह- १५
लाता है तथा जो कषाय उसके अनुबन्धी हैं वे अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ हैं।
जिनके उदयसे जिसका दूसरा नाम संयमासंयम है ऐसी देशविरतिको यह जीव स्वल्प भी करनेमें
समर्थ नहीं होता है वे देशप्रत्याख्यानको आवृत्त करनेवाले अप्रत्याख्यानावरण, क्रोध, मान, माया
और लोभ हैं। जिनके उदयसे संयम नामवाली परिपूर्ण विरतिको यह जीव करनेमें समर्थ नहीं
होता है वे सकल प्रत्याख्यानको आवृत्त करनेवाले प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और २०
लोभ हैं। 'स' एकीभाव अर्थमें रहता है। संयमके साथ अवस्थान होनेसे एक होकर जो ज्वलित
होते हैं अर्थात् चमकते हैं या जिनके सद्भावमें संयम चमकता रहता है वे संज्वलन क्रोध, मान,
माया और लोभ हैं। ये सब मिलकर सोलह कषाय होते हैं।
विशेषार्थ—मोहनीय कर्मके दो भेद हैं—दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय । जो समीचीन
दर्शनके होनेमें बाधक कर्म है वह दर्शनमोहनीय है और जो समीचीन दर्शनके अनुकूल चारित्रके २५
होनेमें बाधक कर्म है वह चारित्रमोहनीय है। दर्शनमोहनीयके मिथ्यात्व आदिक तीन भेद हैं।
मिथ्यात्व समीचीन दर्शनका प्रतिपक्ष कर्म है। यह जीव अनादि कालसे मिथ्यादृष्टि हो रहा है।
इसे योग्य द्रव्यादिकका निमित्त मिलनेपर ही समीचीन दर्शनका श्रद्धान होता है। सर्वप्रथम यह
श्रद्धान इसके प्रतिपक्षभूत मिथ्यात्व कर्मके उपशमसे ही होता है। साधारणतः संसारमें रहनेका
काल जब अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण शेष रहता है तब यह होता है इसके पहले नहीं होता । ३०
इतने कालके शेष रहने पर होना ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है। इससे भी कम कालके
शेष रहने पर यह हो सकता है। इसका नाम प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शनका अर्थ है
समीचीन दर्शन । जैनदर्शनके अनुसार व्यक्ति-स्वातन्त्र्यकी प्राणप्रतिष्ठा करनेवाला और आत्म-
दर्शन करानेवाला दर्शन समीचीन दर्शन माना गया है। जब इस प्रकारका सम्यग्दर्शन होता
है तब इस दर्शनका प्रतिपक्षभूत कर्म तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है। जिनके नाम ३५
मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृतिमिथ्यात्व होते हैं। प्रथमका वही काम है। दूसरा
और तीसरा अपने नामानुसार काम करते हैं। अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व मिश्र परिणामके होनेमें
१. –देकीभूता ज्व—आ०, दि० १, दि० २, मु० ।