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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 558 में से

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पृष्ठ 417
  • ८।२३ § ७७८ ] अष्टमोऽध्यायः ३०५
    इससे तो यही सिद्ध होता है कि वस्तुतः ये दो नहीं हैं, किन्तु बन्ध समयकी अपेक्षा जिसका नाम
    प्रकृति है उदयकालकी अपेक्षा उसे ही अनुभव कहते हैं ? समाधान यह है कि कर्मबन्धके समय कर्म-
    का विविधरूपसे विभाग योगके निमित्तसे ही होता है और विभागको प्राप्त हुए कर्मोंमें हीनाधिक
    फलदानशक्तिका प्राप्त होना कषायके निमित्तसे होता है, इसलिए ये दोनों स्वतन्त्र माने गये हैं।
    यद्यपि यह ठीक है कि बिना शक्तिके किसी कर्मकी प्रकृति नहीं बन सकती। स्वतन्त्र प्रकृति कहनेसे
    उसकी शक्तिका बोध हो ही जाता है फिर भी ऐसी शक्तिकी एक सीमा होती है। उसका उल्लंघन
    कर जो न्यूनाधिक शक्ति पायी जाती है उसीका बोध कराना अनुभागबन्धका काम है। उदाहरणार्थ
    ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें सातावेदनीयका प्रकृति बन्ध होता है और यह प्रकृति-
    बन्ध एक नियत मर्यादामें अनुभागको लिये हुए ही होता है फिर भी यहाँ अनुभागबन्धका निषेध
    किया गया है सो इसका कारण यह है कि जो अनुभाग सकषाय अवस्थामें सातावेदनीयका प्राप्त
    होता था वह यहाँ प्राप्त नहीं होता है। सकषाय अवस्थामें प्राप्त होनेवाले जघन्य अनुभागसे भी
    यह अनन्तवें भागमात्र होता है। इतना कम अनुभाग सकषाय अवस्थामें नहीं प्राप्त हो सकता।
    इससे प्रकृतिबन्धसे अनुभागबन्धके अलग कहनेकी उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह
    है कि प्रकृतिबन्धमें कर्मभेदको स्वीकार करके भी न्यूनाधिक फलदान शक्ति नहीं स्वीकार
    की गयी है किन्तु अनुभागबन्धमें इसका और इसके कारणका स्वतन्त्र रूपसे विचार किया जाता
    है इसलिए प्रकृतिबन्ध और उसका कारण स्वतन्त्र है तथा अनुभागबन्ध और उसका कारण
    स्वतन्त्र है यह निश्चित होता है। अब रही सूत्रकारके विपाकको अनुभव कहनेकी बात सो
    इस कथनमें भी यही अभिप्राय छिपा हुआ है। सब जीवोंका विपाक एक प्रकारका नहीं होता,
    वह न्यूनाधिक देखा जाता है और विपाककी यह न्यूनाधिकता अकारण नहीं हो सकती।
    यही कारण है कि सूत्रकार अनुभवबन्धकी स्वतन्त्र परिगणना करते हैं और उसकी पुष्टि
    विपाकके द्वारा दिखलाते हैं। इस प्रकार अनुभवबन्ध क्या है और उसे स्वतन्त्र क्यों कहा इसका
    विचार किया।
    फिर भी यह अनुभाग बन्धकालमें जैसा प्राप्त होता है एकान्ततः वैसा ही नहीं बना रहता
    है। अपने अवस्थान कालके भीतर वह बदल भी जाता है और नहीं भी बदलता है। बदलनेसे
    इसकी तीन अवस्थाएँ होती हैं—संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण। संक्रमण अवान्तर प्रकृतियोंमें
    होता है, मूल प्रकृतियोंमें नहीं होता। उसमें भी आयुकर्मकी अवान्तर प्रकृतियों का संक्रमण नहीं
    होता और दर्शनमोहनीयका चारित्रमोहनीय रूपसे तथा चारित्रमोहनीयका दर्शनमोहनीयरूपसे
    संक्रमण नहीं होता। संक्रमणके चार भेद हैं—प्रकृतिसंक्रमण, स्थितिसंक्रमण, अनुभागसंक्रमण
    और प्रदेशसंक्रमण। जहाँ प्रकृतिसंक्रमण और प्रदेशसंक्रमणकी मुख्यता होती है वहाँ वह संक्रमण
    शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है और जहाँ मात्र स्थितिसंक्रमण अनुभागसंक्रमण होता है वहाँ
    वह उत्कर्षण और अपकर्षण शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है। बन्धकालमें जो स्थिति और
    अनुभाग प्राप्त होता है उसमें कमी होना अपकर्षण है और घटी हुई स्थिति व अनुभागमें वृद्धि
    होना उत्कर्षण है। इस प्रकार विविध अवस्थाओंमें-से गुजरते हुए उदयकालमें जो अनुभाग रहता
    है उसका परिपाक होता है। अनुदय अवस्थाको प्राप्त प्रकृतियोंका परिपाक उदय अवस्थाको प्राप्त
    सजातीय प्रकृति रूपसे होता है। इसके विषयमें यह नियम है कि उदयवाली प्रकृतियोंका फल
    स्वमुखसे मिलता है और अनुदयवाली प्रकृतियोंका फल परमुखसे मिलता है। उदाहरणार्थ—
    साताका उदय रहने पर उसका भोग सातारूपसे ही होता है किन्तु तब असाता स्तिबुक
    संक्रमण द्वारा सातारूपसे परिणमन करती जाती है इसलिए इसका उदय परमुखसे होता है।
    उदय कालके एक समय पहले अनुदयरूप प्रकृतिके निषेकका उदयको प्राप्त हुई प्रकृतिरूपसे परिणम
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    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri