सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ८।१३ § ७५८ ] अष्टमोऽध्याय २९९
§ ७५६. उक्तो नामकर्मण उत्तरप्रकृतिभेदः । तदनन्तरोद्देशभाजो गोत्रस्य प्रकृतिभेदो
व्याख्यायते—
उच्चैर्नीचैश्च ॥ १२ ॥
§ ७५७. गोत्रं द्विविधम्—उच्चैर्गोत्रं नीचैर्गोत्रमिति । यस्योदयाल्लोकपूजितेषु कुलेषु जन्म¹ ५
तदुच्चैर्गोत्रम् । यदुदयाद्गर्हितेषु कुलेषु जन्म² तन्नीचैर्गोत्रम् ।
§ ७५८. अष्टम्याः कर्मप्रकृतेरुत्तरप्रकृतिनिर्देशार्थमाह—
दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥ १३ ॥
प्रकार विचार करनेसे ज्ञात होता है कि शरीर आदि नामकर्मकी प्रकृतियोंकी पुद्गलविपाकी संज्ञा
क्यों है ? इसी प्रकार भवविपाकी और क्षेत्रविपाकी प्रकृतियोंके सम्बन्धमें भी स्पष्ट जानना चाहिए ।
भवकी कारणभूत जो आयुकर्मकी प्रकृतियां हैं और जिनका उदय तत्तत् भव तक ही सीमित १०
है इसीसे इनकी भवविपाकी संज्ञा है । क्षेत्रविपाकी प्रकृतियाँ दो भवके अन्तरालवर्ती क्षेत्रमें अपना
काम करती हैं इसलिए इनकी क्षेत्रविपाकी संज्ञा है । यद्यपि बाह्य सुपुत्रादिके निमित्तसे सातादि
जीवविपाकी प्रकृतियोंका भी उदय देखा जाता है पर ये बाह्यनिमित्त उनके उदयके अविनाभावी
कारण नहीं हैं । कदाचित् इन बाह्य निमित्तोंके रहते हुए भी उनसे प्रतिकूल प्रकृतियोंका उदय
देखा जाता है और कदाचित् इन निमित्तोंके अभावमें भी उनका उदय देखा जाता है इसलिए १५
निमित्तोंकी प्रधानता न होनेसे सातादि प्रकृतियोंकी जीवविपाकी संज्ञा है । इस प्रकार सब कर्म-
प्रकृतियां कितने भागोंमें बटी हुई हैं और उनकी जीवविपाकी आदि संज्ञा होनेका क्या कारण है
इसका विचार किया ।
§ ७५६. नामकर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे । इसके बाद कहने योग्य गोत्रकर्मके प्रकृति-
विकल्पोंका व्याख्यान करते हैं— २०
उच्चगोत्र और नीचगोत्र ये दो गोत्रकर्म हैं ॥१२॥
§ ७५७. गोत्रकर्म दो प्रकारका है—उच्चगोत्र और नीचगोत्र । जिसके उदयसे लोकपूजित
कुलोंमें जन्म होता है वह उच्चगोत्र है । जिसके उदयसे गर्हित कुलोंमें जन्म होता है वह नीच-
गोत्र है ।
विशेषार्थ—ऐसा निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध है कि जिसके उच्चगोत्रका उदय होता है वह २५
ऐसे माता पिता के यहां जन्म लेता है जहां सदाचारकी प्रवृत्ति हो या उस ओर झुकाव हो या ऐसी
प्रवृत्ति वाले व्यक्तियोंके साथ सम्पर्क हो । और जिसके नीचगोत्र कर्मका उदय होता है वह विरुद्ध
प्रवृत्तिवाले माता पिताके यहाँ जन्म लेता है । कुल, गोत्र, सन्तान और परम्परा इनका एक अर्थ
है । परम्परा दो प्रकारसे चलती है एक पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रमूलक परम्परा और दूसरी आचार-
विचार मूलक परम्परा । यहाँ दूसरी प्रकारकी परम्परा ली गयी है । गोत्रका सम्बन्ध शरीर या ३०
रक्तसे न होकर जीवके आचार-विचारसे है । गोत्रकर्मको जीवविपाकी कहनेका कारण भी यही है ।
इस प्रकार गोत्रकर्म, उसके भेद और उनके स्वरूपका संक्षेपमें विचार किया ।
§ ७५८. आठवीं कर्म प्रकृतिकी उत्तर प्रकृतियोंका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं ।
दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य इनके पाँच अन्तराय हैं ॥१३॥ ३५
१. जन्मकारणं तदु-आ०, दि० १, दि० २ । २. जन्मकारणं तन्नी-आ० दि०, १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri