सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१४ § ७५९ -
§ ७५९. अन्तरायापेक्षया भेदनिर्देशः क्रियते—दानस्यान्तरायो लाभस्यान्तराय इत्यादि ।
दानादिपरिणामव्याघातहेतुत्वात्तद्व्यपदेशः । यदुदयाद्दातुकामोऽपि न प्रयच्छति, लब्धुकामोऽपि न
लभते, भोक्तुमिच्छन्नपि न भुङ्क्ते, उपभोक्तुमभिवाञ्छन्नपि नोपभुङ्क्ते, उत्साहितुकामोऽपि
नोत्सहते त एते पञ्चान्तरायस्य भेदाः ।
§ ७६०. व्याख्याताः प्रकृतिबन्धविकल्पाः । इदानीं स्थितिबन्धविकल्पो वक्तव्यः । सा
स्थितिर्द्विविधा—उत्कृष्टा जघन्या च । तत्र यासां कर्मप्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिः समाना तन्निर्दें-
शार्थमुच्यते—
आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥
§ ७६१. मध्येऽन्ते वा तिसृणां ग्रहणं माभूदिति 'आदितः' १इत्युच्यते । 'अन्तरायस्य' इति
वचनं व्यवहितग्रहणार्थम् । सागरोपममुक्तपरिमाणम् । कोटीनां कोट्यः कोटीकोट्यः । परा उत्कृष्टे-
त्यर्थः । एतदुक्तं भवति—ज्ञानावरणदर्शनावरणवेदनीयान्तरायाणामुत्कृष्टा स्थितिस्त्रिंशत्सागरोपम-
कोटीकोट्य इति । सा कस्य भवति । मिथ्यादृष्टेः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रियस्य पर्याप्तकस्य । अन्येषामार्ग-
मात्संप्रत्ययः कर्तव्यः ।
§ ७५९. यहाँ अन्तरायकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है । यथा—दान का अन्तराय, लाभका
अन्तराय इत्यादि । इन्हें दानादि परिणामके व्याघातका कारण होनेसे यह संज्ञा मिली है । जिनके
उदयसे देनेकी इच्छा करता हुआ भी नहीं देता है, प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हुआ भी नहीं प्राप्त
करता है, भोगनेकी इच्छा करता हुआ भी नहीं भोग सकता है, उपभोग करनेकी इच्छा करता
हुआ भी उपभोग नहीं ले सकता है और उत्साहित होनेकी इच्छा रखता हुआ भी उत्साहित नहीं
होता है इस प्रकार ये पांच अन्तरायके भेद हैं ।
विशेषार्थ—जीवकी दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पाँच लब्धियाँ हैं । अन्तरायकर्म
इन पाँच जीवभावोंकी अभिव्यक्तिमें बाधक कारण है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । कहीं कहीं
अन्तराय कर्मके क्षय व क्षयोपशमका फल बाह्य सामग्रीकी प्राप्ति कहा गया है पर वह उपचार
कथन है । तत्त्वतः बाह्य सामग्री पर है । उसकी प्राप्ति जीवविपाकी अन्तराय कर्मके क्षय व क्षयो-
पशमका फल नहीं हो सकता । परमें स्वका भाव मिथ्यात्वका फल है और उसका स्वीकार कषाय-
का फल है ऐसा यहाँ समझना चाहिए ।
§ ७६०. प्रकृतिबन्धके भेद कहे । इस समय स्थितिबन्धके भेद कहने चाहिए । वह स्थिति
दो प्रकारकी है—उत्कृष्ट स्थिति और जघन्य स्थिति । उनमें जिन कर्मप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थिति
समान है उनका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आदिकी तीन प्रकृतियाँ अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वेदनीय तथा अन्तराय इन
चारकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम है ॥१४॥
§ ७६१. बीचमें या अन्तमें तीन का ग्रहण न होवे इसलिए सूत्रमें 'आदितः' पद कहा है ।
अन्तरायकर्मका पाठ प्रारम्भके तीन कर्मोंके पाठसे व्यवहित है उसका ग्रहण करनेके लिए, 'अन्त-
रायस्य' वचन दिया है । सागरोपमका परिमाण पहले कह आये हैं । कोटियोंकी कोटि कोटाकोटि
कहलाती है । पर शब्द उत्कृष्ट वाची है । उक्त कथनका यह अभिप्राय है कि ज्ञानावरण, दर्शना-
वरण, वेदनीय और अन्तरायकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम होती है । शंका—
यह उत्कृष्ट स्थिति किसे प्राप्त होती है ? समाधान—मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, पंचेन्द्रिय और पर्याप्तक
जीवको प्राप्त होती है । अन्य जीवोंके आगमसे देखकर ज्ञान कर लेना चाहिए ।
१. आदित उच्च-आ०, दि० १, दि० २ ।
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