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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 558 में से

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पृष्ठ 399

– ८।३ § ७३६ ] अष्टमोऽध्यायः २८७
स्यासंयमः । आयुषो भवधारणम् । नाम्नो नारकादिनामकरणम् । गोत्रस्योच्चैर्नीचैःस्थानसंशब्द-
नम् । अन्तरायस्य दानादिविघ्नकरणम् । तदेवंलक्षणं कार्यं प्रक्रियते प्रभवत्यस्या इति प्रकृतिः ।
तत्स्वभावादप्रच्युतिः स्थितिः । यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां माधुर्यस्वभावादप्रच्युतिः
स्थितिः । तथा ज्ञानावरणादीनामर्थावगमादिस्वभावादप्रच्युतिः स्थितिः । तद्रसविशेषोऽनुभवः ।
यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमन्दादिभावेन रसविशेषः । तथा कर्मपुद्गलानां स्वगत-
सामर्थ्यविशेषोऽनुभवः । इयत्तावधारणं प्रदेशः । कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कन्धानां परमाणुपरिच्छेदे-
नावधारणं प्रदेशः । ‘विधि’-शब्दः प्रकारवचनः । त एते प्रकृत्यादयश्चत्वारस्तस्य बन्धस्य प्रकाराः।
तत्र योगनिमित्तौ प्रकृतिप्रदेशौ । कषायनिमित्तौ स्थित्यनुभवौ । तत्प्रकर्षाप्रकर्षभेदात्तद्बन्धविचित्र-
भावः । तथा चोक्तम्—
“जोगा' पयडि-पएसा ठिदिअणुभागा कसायदो कुणदि ।
अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधट्ठिदिकारणं णत्थि ॥”
संवेदन कराना साता और असाता वेदनीयकी प्रकृति है। तत्त्वार्थका श्रद्धान न होने देना
दर्शनमोहकी प्रकृति है। असंयमभाव चारित्रमोहकी प्रकृति है। भवधारण आयु कर्मकी प्रकृति
है। नारक आदि नामकरण नामकर्मकी प्रकृति है। उच्च और नीच स्थानका संशब्दन गोत्र
कर्मकी प्रकृति है तथा दानादिमें विघ्न करना अन्तराय कर्मकी प्रकृति है। इस प्रकारका
कार्य किया जाता है अर्थात् जिससे होता है वह प्रकृति है। जिसका जो स्वभाव है उससे च्युत
न होना स्थिति है। जिस प्रकार बकरी, गाय और भैंस आदिके दूधका माधुर्यस्वभावसे
च्युत न होना स्थिति है उसी प्रकार ज्ञानावरण आदि कर्मोंका अर्थका ज्ञान न होने देना आदि
स्वभावसे च्युत न होना स्थिति है। इन कर्मोंके रसविशेषका नाम अनुभव है। जिस प्रकार बकरी,
गाय और भैंस आदिके दूधका अलग-अलग तीव्र मन्द आदि रसविशेष होता है उसी प्रकार कर्म
पुद्गलोंका अलग अलग स्वगत सामर्थ्यविशेष अनुभव है। तथा इयत्ताका अवधारण करना प्रदेश
है। अर्थात् कर्मरूपसे परिणत पुद्गलस्कन्धोंका परमाणुओंकी जानकारी करके निश्चय करना
प्रदेशबन्ध है। 'विधि' शब्द प्रकारवाची है। ये प्रकृति आदिक चार उस बन्धके प्रकार हैं। इनमें
से योगके निमित्तसे प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध होता है तथा कषायके निमित्तसे स्थितिबन्ध और
अनुभवबन्ध होता है। योग और कषायमें जैसा प्रकर्षाप्रकर्षभेद होता है उसके अनुसार बन्ध भी
नाना प्रकारका होता है। कहा भी है- 'यह जीव योगसे प्रकृति और प्रदेश बन्धको तथा कषायसे
स्थिति और अनुभाग बन्धको करता है। किन्तु जो जीव योग और कषायरूपसे परिणत नहीं है
और जिनके योग और कषायका उच्छेद हो गया है उनके कर्मबन्धकी स्थितिका कारण नहीं पाया
जाता ।।'
विशेषार्थ- इस सूत्रमें बन्धके चार भेदोंका निर्देश किया है। साम्परायिक आस्रवसे जो भी
कर्म बँधता है उसे हम इन चार रूपोंमें देखते हैं। बँधे हुए कर्मका स्वभाव क्या है, स्थिति कितनी
है, अपने स्वभावानुसार वह न्यूनाधिक कितना काम करेगा और आत्मासे कितने प्रमाणमें व किस
रूपमें वह बन्धको प्राप्त होता है। यही वे चार प्रकार हैं। कर्मके इन चार प्रकारोंके मुख्य कारण
दो हैं-योग और कषाय । योगके निमित्तसे प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध होता है तथा कषायके
निमित्तसे स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध होता है। इसका अर्थ है कि जहाँ योग और कषाय नहीं
है वहाँ कर्मबन्ध भी नहीं है। कषाय दसवें गुणस्थान तक पाया जाता है। ग्यारहवें गुणस्थानमें
जीव कषायरूपसे परिणत नहीं होता और बारहवें गुणस्थानमें उसका उच्छेद अर्थात् अभाव है,
१. मूला० २४४ । पंचसं० ४, ५०७ । गो० क०, गा० २५७ ।