सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० सर्वार्थसिद्धौ [ ८।७ § ७४३ -
व्यक्तिर्यस्य भविष्यति स भव्यः । यस्य तु न भविष्यति सोऽभव्य इति । कनकेतरपाषाणवत् ।
§ ७४३. आह, उक्तो ज्ञानावरणोत्तरप्रकृतिविकल्पः । इदानीं दर्शनावरणस्य वक्तव्य इत्यत
आह—
चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ॥७॥
§ ७४४. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानामिति दर्शनावरणापेक्षया भेदनिर्देशः—चक्षुर्दर्शनावरणम-
चक्षुर्दर्शनावरणमवधिदर्शनावरणं केवलदर्शनावरणमिति । मदखेदक्लमविनोदनार्थः स्वापो निद्रा ।
तस्या उपर्यु परि वृत्तिर्निद्रानिद्रा । या क्रियात्मानं प्रचलयति सा प्रचला शोकश्रममदादिप्रभवा
आसीनस्यापि नेत्रगात्रविक्रियासूचिका । सैव पुनःपुनरावर्तमाना¹ प्रचलाप्रचला । स्वप्ने² यया
वीर्यविशेषाविर्भावः सा स्त्यानगृद्धिः । स्त्यायतेरनेकार्थत्वात्स्वप्नार्थ इह गृह्यते, गृद्धेरपि दीप्तिः ।
कनक पाषाण और इतर पाषाणकी तरह सम्यग्दर्शनादि रूपसे व्यक्ति होगी वह भव्य है और
जिसके नहीं होगी वह अभव्य है।
विशेषार्थ—यहाँ ज्ञानावरण कर्मके पाँच उत्तर-भेदोंका निर्देश किया गया है। मूलमें ज्ञान
एक है। उसके ये पांच भेद आवरणकी विशेषतासे प्राप्त होते हैं। धवला टीकामें इस विषयका
स्पष्टीकरण करनेके लिए सूर्य और मेघपटलका उदाहरण दिया गया है। वहाँ बतलाया है कि जिस
प्रकार अति सघन मेघपटल सूर्यको आच्छादित करते हैं तो भी अतिमन्द सूर्य किरणें मेघपटलमेंसे
प्रस्फुटित होती रहती हैं उसी प्रकार केवलज्ञानावरण कर्मके आवृत होनेपर भी कुछ न कुछ ज्ञानांश
प्रस्फुटित होता रहता है और उसीको आवृत करनेसे चार उत्तर आवरण कर्म प्राप्त होते हैं। इस
प्रकार कुल ज्ञानावरण कर्म पाँच हैं जो भव्य और अभव्य दोनोंके पाये जाते हैं। शास्त्रमें भव्य और
अभव्य संज्ञा बन्ध विशेषकी अपेक्षा से दी गयी है। जीवके ये भेद इसी अपेक्षासे जानने चाहिए।
इन भेदोंका अन्य कोई निमित्त नहीं है। बन्ध दो प्रकारका होता है–एक बन्ध वह जो सन्तानकी
अपेक्षा अनादि अनन्त होता है और दूसरा वह जो अनादि सान्त होता हैं। जिन जीवोंके कर्मका
अनादि-अनन्त बन्ध होता है वे अभव्य कहलाते हैं और जिनके अनादिसान्त बन्ध होता है वे भव्य
माने गये हैं। इसलिए शक्ति सब जीवोंके एक-सी होकर भो उसके व्यक्त होनेमें अन्तर हो जाता है।
शास्त्रमें इस भेदको समझानेके लिए कनकपाषाण और अन्धापाषाण उदाहरण रूपसे उपस्थित
किये गये हैं सो इस दृष्टान्तसे भी उक्त कथनकी ही पुष्टि होती है। इस प्रकार ज्ञानावरण कर्मके
पाँच भेद क्यों हैं इस बातका खुलासा किया।
§ ७४३. ज्ञानावरण कर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे। अब दर्शनावरण कर्मके कहने चाहिए
इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन इन चारोंके चार आवरण तथा निद्रा,
निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचला-प्रचला और स्त्यानगृद्धि ये पाँच निद्रादिक ऐसे नौ दर्शनावरण हैं ॥७॥
§ ७४४. चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवलका दर्शनावरणकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है;
यथा-चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण। मद, खेद
और परिश्रमजन्य थकावटको दूर करनेके लिए नींद लेना निद्रा है। इसकी उत्तरोत्तर प्रवृत्ति होना
निद्रानिद्रा है। जो शोक, श्रम और मद आदिके कारण उत्पन्न हुई है और जो बैठे हुए प्राणीके भी
नेत्र, गात्रकी विक्रियाकी सूचक है ऐसी जो क्रिया आत्माको चलायमान करती है वह प्रचला है।
तथा उसकी पुनः-पुनः आवृत्ति होना प्रचलाप्रचला है। जिसके निमित्तसे स्वप्नमें वीर्यविशेषका
आविर्भाव होता है वह स्त्यानगृद्धि है। 'स्त्यायति' धातुके अनेक अर्थ हैं। उनमेंसे यहां स्वप्न अर्थ
१. -वर्त्यमाना आ०, दि०, १, दि० २ । २. स्वप्नेऽपि यया मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।