सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 409, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें- ८।११ § ७५५ ] अष्टमोऽध्यायः २९७
वर्णनाम शुक्लवर्णनाम चेति । पूर्वशरीराकाराविनाशो यस्योदयाद् भवति तदानुपूर्व्यनाम ।
तच्चतुर्विधम्—नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम मनुष्यगतिप्रायोग्यानु-
पूर्व्यनाम देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम चेति । यस्योदयादयःपिण्डवद् गुरुत्वान्नाधः पतति न चार्क-
तूलवल्लघुत्वादूर्ध्वं गच्छति तदगुरुलघुनाम । यस्योदयात्स्वयं कृतोद्वन्धनमेरुप्रपतनादिनिमित्त
उपघातो भवति तदुपघातनाम । यन्निमित्तः परशस्त्रादेर्व्याघातस्तत्परघातनाम । यदुदयान्निर्वृत्त- ५
मातपनं तदातपनाम । तदादित्ये वर्तते । यन्निमित्तमुद्योतनं तदुद्योतनाम । तच्चन्द्रखद्योतादिषु
वर्तते । यद्धेतुरुच्छ्वासस्तदुच्छ्वासनाम । विहाय आकाशम् । तत्र गतिनिर्वर्तकं तद्विहायोगतिनाम ।
तद् द्विविधम्—प्रशस्ताप्रशस्तभेदात् । शरीरनामकर्मोदयान्निर्वर्त्यमानं शरीरमेकात्मोपभोगकारणं
यतो भवति तत्प्रत्येकशरीरनाम । बहूनामात्मनामुपभोगहेतुत्वेन साधारणं शरीरं यतो भवति
तत्साधारणशरीरनाम । यदुदयाद् द्वीन्द्रियादिषु जन्म तत्त्रसनाम । यन्निमित्त एकेन्द्रियेषु प्रादुर्भाव- १०
स्तत्स्थावरनाम । यदुदयादन्यप्रीतिप्रभवस्तत्सुभगनाम । यदुदयाद्रूपादिगुणोपेतोऽप्यप्रीतिकरस्तद्
दुर्भगनाम । यन्निमित्तं मनोज्ञस्वरनिर्वर्तनं तत्सुस्वरनाम । तद्विपरीतं दुःस्वरनाम । यदुदयाद्-
रमणीयत्वं तच्छुभनाम । तद्विपरीतमशुभनाम । सूक्ष्मशरीरनिर्वर्तकं सूक्ष्मनाम । अन्यबाधाकरशरीर-
कारणं बादरनाम । यदुदयादाहारादिपर्याप्तिनिर्वृत्तिः तत्पर्याप्तिनाम । तत् षड्विधम्—आहार-
पर्याप्तिकाम शरीरपर्याप्तिनाम इन्द्रियपर्याप्तिनाम प्राणापानपर्याप्तिनाम भाषापर्याप्तिनाम मनःपर्याप्ति- १५
शुक्लवर्ण नामकर्म । जिसके उदयसे पूर्व शरीरके आकारका विनाश नहीं होता है वह आनुपूर्व्य
नामकर्म है । वह चार प्रकारका है—नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्य
नामकर्म, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म । जिसके उदयसे
लोहेके पिण्डके समान गुरु होनेसे न तो नीचे गिरता है और न अर्कतूलके समान लघु होनेसे ऊपर
जाता है वह अगुरुलघु नामकर्म है । जिसके उदयसे स्वयंकृत उद्बन्धन और पहाड़से गिरना २०
आदि निमित्तक उपघात होता है वह उपघात नामकर्म है । जिसके उदयसे परशस्त्रादिकका
निमित्त पाकर व्याघात होता है वह परघात नामकर्म है । जिसके उदयसे शरीरमें आतपकी प्राप्ति
होती है वह आतप नामकर्म है। वह सूर्यबिम्बमें होता है। जिसके निमित्तसे शरीरमें उद्योत
होता है वह उद्योत नामकर्म है । वह चन्द्रबिम्ब और जुगनू आदिमें होता है । जिसके निमित्तसे
उच्छ्वास होता है वह उच्छ्वास नामकर्म है । विहायस्का अर्थ आकाश है। उसमें गतिका निर्वर्तक २५
कर्म विहायोगति नामकर्म है। प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे वह दो प्रकारका है। शरीर नामकर्म-
के उदयसे रचा गया जो शरीर जिसके निमित्तसे एक आत्माके उपभोगका कारण होता है वह
प्रत्येक शरीर नामकर्म है। बहुत आत्माओंके उपभोगका हेतुरूपसे साधारण शरीर जिसके निमित्त-
से होता है वह साधारणशरीर नामकर्म है । जिसके उदयसे द्वीन्द्रियादिकमें जन्म होता है वह
त्रस नामकर्म है। जिसके निमित्तसे एकेन्द्रियोंमें उत्पत्ति होती है वह स्थावर नामकर्म है । जिसके ३०
उदयसे अन्यजनप्रीतिकर अवस्था होती है वह सुभग नामकर्म है । जिसके उदयसे रूपादि गुणोंसे
युक्त होकर भी अप्रीतिकर अवस्था होती है वह दुर्भग नामकर्म है । जिसके निमित्तसे मनोज्ञ
स्वरकी रचना होती है वह सुस्वर नामकर्म है। इससे विपरीत दुःस्वर नामकर्म है । जिसके
उदयसे रमणीय होता है वह शुभ नामकर्म है । इससे विपरीत अशुभ नामकर्म है । सूक्ष्म शरीरका
निर्वर्तक कर्म सूक्ष्म नामकर्म है । अन्य बाधाकर शरीरका निर्वर्तक कर्म बादर नामकर्म है । ३५
जिसके उदयसे आहार आदि पर्याप्तियोंकी रचना होती है वह पर्याप्ति नामकर्म है । वह
छह प्रकारका है—आहारपर्याप्ति नामकर्म, शरीरपर्याप्ति नामकर्म, इन्द्रियपर्याप्ति नामकर्म, प्राणा-
१. मरुत्प्र-मु. ।
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