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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 558 में से

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पृष्ठ 407

८।११ § ७५५ ] अष्टमोऽध्यायः २९५
§ ७५४. आयुश्चतुर्विधं व्याख्यातम् । तदनन्तरमुद्दिष्टं यन्नामकर्म तदुत्तरप्रकृतिनिर्णयार्थ-
माह—
गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानु-
पूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रस-
सुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥११॥ ५
§ ७५५. यदुदयादात्मा भवान्तरं गच्छति सा गतिः । सा चतुर्विधा—नरकगतिस्तिर्यग्गति-
र्मनुष्यगतिर्देवगतिश्चेति१ । यन्निमित्त आत्मनो नारको भावस्तन्नरकगतिनाम । एवं शेषेष्वपि
योज्यम्२ । तासु नरकादिगतिष्वव्यभिचारिणा सादृश्येनैकीकृतोऽर्थात्मा जातिः । तन्निमित्तं जाति-
नाम । तत्पञ्चविधम्—एकेन्द्रियजातिनाम द्वीन्द्रियजातिनाम त्रीन्द्रियजातिनाम चतुरिन्द्रियजाति-
नाम पञ्चेन्द्रियजातिनाम चेति । यदुदयादात्मा एकेन्द्रिय इति शब्द्यते तदेकेन्द्रियजातिनाम । एवं १०
शेषेष्वपि योज्यम् । यदुदयादात्मनः शरीरनिर्वृत्तिस्तच्छरीरनाम । तत्पञ्चविधम्—औदारिकशरीर-
नाम वैक्रियिकशरीरनाम आहारकशरीरनाम तैजसशरीरनाम कार्मणशरीरनाम चेति । तेषां
नरकोंमें जिसके निमित्तसे दीर्घ जीवन होता है वह नारक आयु है। इसी प्रकार शेष आयुओंमें भी
जानना चाहिए।
विशेषार्थ—दस प्राणोंमें आयु प्राण मुख्य है। यह जीवित रहनेका सर्वोत्कृष्ट निमित्त माना १५
गया है। इसके सद्भावमें प्राणीका जीवन है और इसके अभावमें वह मरा हुआ माना जाता है।
अन्नादिक तो आयुको कायम रखनेमें सहकारीमात्र हैं। भवधारण करनेका मुख्य कारण आयुकर्म
ही है ऐसा यहाँ समझना चाहिए।
§ ७५४. चार प्रकारके आयुका व्याख्यान किया। इसके अनन्तर जो नामकर्म कहा गया है
उसकी उत्तर प्रकृतियोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस,
गन्ध, वर्ण, आनुपूर्व्य, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास और विहायोगति
तथा प्रतिपक्षभूत प्रकृतियोंके साथ अर्थात् साधारण शरीर और प्रत्येक शरीर, स्थावर और त्रस,
दुर्भग और सुभग, दुःस्वर और सुस्वर, अशुभ और शुभ, बादर और सूक्ष्म, अपर्याप्त और पर्याप्त,
अस्थिर और स्थिर, अनादेय और आदेय, अयशःकीर्ति और यशःकीर्ति एवं तीर्थकरत्व ये ब्यालीस २५
नामकर्मके भेद हैं ॥११॥
§ ७५५. जिसके उदयसे आत्मा भवान्तरको जाता है वह गति है। वह चार प्रकारकी
है—नरकगति, तिर्यंग्गति, मनुष्यगति और देवगति। जिसका निमित्त पाकर आत्माका नारक
भाव होता है वह नरकगति नामकर्म है। इसी प्रकार शेष गतियोंमें भी योजना करनी चाहिए।
उन नरकादि गतियोंमें जिस अव्यभिचारी सादृश्यसे एकपनेका बोध होता है वह जाति है। और ३०
इसका निमित्त जाति नामकर्म है। वह पांच प्रकारका है—एकेन्द्रिय जाति नामकर्म, द्वीन्द्रिय
जाति नामकर्म, त्रीन्द्रिय जाति नामकर्म, चतुरिन्द्रिय जाति नामकर्म और पंचेन्द्रिय जाति नामकर्म।
जिसके उदयसे आत्मा एकेन्द्रिय कहा जाता है वह एकेन्द्रिय जाति नामकर्म है। इसी प्रकार शेष
जातियोंमें भी योजना करनी चाहिए। जिसके उदयसे आत्माके शरीरकी रचना होती है वह
शरीर नामकर्म है। वह पाँच प्रकारका है—औदारिक शरीर नामकर्म, वैक्रियिक शरीर नामकर्म, ३५
आहारक शरीर नामकर्म, तैजस शरीर नामकर्म और कार्मण शरीर नामकर्म । इनका विशेष
१. –गतिर्देवगतिम॑नुष्यगतिश्चेति मु० । २. योज्यन्ते । तासु आ० ।