सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।१८ § ७६८ -
§ ७६८. उक्तोत्कृष्टा स्थितिः । इदानीं जघन्या स्थितिर्वक्तव्या । तत्र समानजघन्यस्थितीः
पञ्च प्रकृतीरवस्थाप्य तिसृणां जघन्यस्थितिप्रतिपत्त्यर्थं सूत्रद्वयमुपन्यस्यते लघ्वर्थम्—
अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य ॥१८॥
§ ७६९. अपरा जघन्या इत्यर्थः । वेदनीयस्य द्वादश मुहूर्ताः ।
नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥
§ ७७०. 'मुहूर्ता' इत्यनुवर्तते । 'अपरा स्थितिः' इति च ।
§ ७७१. अवस्थापितप्रकृतिजघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥२०॥
§ ७७२. शेषाणां पञ्चानां प्रकृतीनामन्तर्मुहूर्तापरा स्थितिः । ज्ञानदर्शनावरणान्तरायाणां
जघन्या स्थितिः सूक्ष्मसांपराये, मोहनीयस्य अनिवृत्तिबादरसांपराये । आयुषः संख्येयवर्षायुष्षु¹
तिर्यक्षु मनुष्येषु च ।
§ ७७३. आह, उभयी स्थितिरभिहिता । ज्ञानावरणादीनाम् अथानुभवः किंलक्षण
इत्यत आह—
विपाकोऽनुभवः ॥२१॥
§ ७७४. विशिष्टो नानाविधो वा पाको विपाकः । पूर्वोक्तकषायतीव्रमन्दादिभावास्रवविशेषा-
द्विशिष्टः पाको विपाकः । अथवा द्रव्यक्षेत्रकालभवभावलक्षणनिमित्तभेदजनितवैश्वरूप्यो नानाविधः
रोषम उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सकल संयमके धारी सम्यग्दृष्टिके ही होता है । पर टीकाकारने यहाँ
उसके कहनेकी विवक्षा नहीं की ।
§ ७६८. उत्कृष्ट स्थिति कही । अब जघन्य स्थिति कहनी चाहिए । उसमें समान जघन्य
स्थितिवाली पाँच प्रकृतियोंको स्थगित करके थोड़ेमें कहनेके अभिप्रायसे तीन प्रकृतियोंकी जघन्य
स्थितिका ज्ञान करानेके लिए दो सूत्र कहते हैं—
वेदनीयकी जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है ॥१८॥
§ ७६९. अपरा अर्थात् जघन्य । यह वेदनीयकी बारह मुहूर्त है ।
नाम और गोत्रकी जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है ॥१९॥
§ ७७०. यहाँ 'मुहूर्ता' पदकी अनुवृत्ति होती है और 'अपरा स्थितिः' पदकी भी ।
§ ७७१. अब स्थगित की गयीं प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
बाकीके पाँच कर्मोंकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है ॥२०॥
§ ७७२. शेष पाँच प्रकृतियोंकी अन्तर्मुहूर्त जघन्य स्थिति है । ज्ञानावरण, दर्शनावरण और
अन्तरायकी जघन्य स्थिति सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें, मोहनीयकी जघन्य स्थिति अनिवृत्ति बादर-
साम्पराय गुणस्थानमें और आयुको जघन्य स्थिति संख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंचों और मनुष्यों-
में प्राप्त होती है ।
§ ७७३. दोनों प्रकारकी स्थिति कही । अब ज्ञानावरणादिकके अनुभवका क्या स्वरूप है
इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विपाक अर्थात् विविध प्रकारके फल देनेकी शक्तिका पड़ना ही अनुभव है ॥२१॥
§ ७७४. विशिष्ट या नाना प्रकारके पाकका नाम विपाक है । पूर्वोक्त कषायोंके तीव्र, मन्द
आदिरूप भावास्रवके भेदसे विशिष्ट पाकका होना विपाक है । अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और
१. -युष्कति-मु० ।