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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 558 में से

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पृष्ठ 416

३०४ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।२३ § ७७८ -
७७८. पीडानुग्रहावात्मने प्रदायाभ्यवहृतौदनादिविकारवत्पूर्वस्थितिक्षयादवस्थानाभावातक-
र्मणो निवृत्तिर्निर्जरा । सा द्विपकारा—विपाकजा इतरा च । तत्र चतुर्गतावनेकजातिविशेषावघूर्णिते¹
संसारमहार्णवे चिरं परिभ्रमतः शुभाशुभस्य कर्मणः क्रमेण परिपाककालप्राप्तस्यानुभवोदयावलि-
स्रोतोऽनुप्रविष्टस्यारब्धफलस्य या निवृत्तिः सा विपाकजा निर्जरा। यत्कर्माप्राप्तविपाककालमौप-
क्रमिकक्रियाविशेषसामर्थ्यादनुदीर्णं बलादुदीर्योदयावलिं प्रवेश्य वेद्यते आम्रपनसादिपाकवत् सा
अविपाकजा निर्जरा । 'च'शब्दो निमित्तान्तरसमुच्चयार्थः । 'तपसा निर्जरा च' इति वक्ष्यते ततश्च
भवति अन्यतश्चेति सूत्रार्थो योजितः । किमर्थमिह निर्जरानिर्देशः क्रियते, संवरात्परा निर्देष्टव्या
उद्देशवत् । लध्वर्थमिह वचनम् । तत्र हि पाठे 'विपाकोऽनुभवः' इति पुनरनुवादः कर्तव्यः स्यात् ।
§ ७७८. जिस प्रकार भात आदिका मल निवृत्त होकर निर्जीण हो जाता है उसी प्रकार
आत्माका भला-बुरा करके पूर्व प्राप्त स्थितिका नाश हो जानेसे स्थिति न रहनेके कारण कर्मकी
निवृत्तिका होना निर्जरा है। वह दो प्रकारकी है—विपाकजा और अविपाकजा । उसमें अनेक
जाति विशेष रूपी भँवर युक्त चार गतिरूपी संसार महासमुद्रमें चिरकाल तक परिभ्रमण करनेवाले
इस जीवके क्रमसे परिपाक कालको प्राप्त हुए और अनुभवोदयावलि रूपी सोतेमें प्रविष्ट हुए ऐसे
शुभाशुभ कर्मका फल देकर जो निवृत्ति होती है वह विपाकजा निर्जरा है। तथा आम और पनस
को औपक्रमिक क्रियाविशेषके द्वारा जिस प्रकार अकालमें पका लेते हैं उसी प्रकार जिसका विपाक-
काल अभी नहीं प्राप्त हुआ है फिर भी औपक्रमिक क्रियाविशेषकी सामर्थ्यसे उदयावलिके बाहर
स्थित जो कर्म बलपूर्वक उदयावलिमें प्रविष्ट कराके अनुभवा जाता है वह अविपाकजा निर्जरा है।
सूत्रमें 'च' शब्द अन्य निमित्तका समुच्चय करनेके लिए दिया है। तपसा निर्जरा च' यह आगे
कहेंगे, इसलिए 'च' शब्दके देनेका यह प्रयोजन है कि पूर्वोक्त प्रकारसे निर्जरा होती है और अन्य
प्रकारसे भी। शंका—यहाँ निर्जराका उल्लेख किसलिए किया है, क्योंकि उद्देश्यके अनुसार उसका
संवरके बाद उल्लेख करना ठीक होता ? समाधान—थोड़ेमें बोध करानेके लिए यहाँ निर्जराका
उल्लेख किया है। संवरके बाद पाठ देने पर 'विपाकोऽनुभवः' इसका फिरसे अनुवाद करना पड़ता।
विशेषार्थ—अनुभव, अनुभाग या फलदानशक्ति इनका एक अर्थ है। कर्मका बन्ध होते समय
जिस कर्मकी जो प्रकृति होती है उसके अनुरूप उसे फलदानशक्ति प्राप्त होतो है। उदाहरणार्थ—
ज्ञानावरणकी ज्ञानको आवृत्त करनेकी प्रकृति है इसलिए इसे इसीके अनुरूप फलदानशक्ति प्राप्त
होती है। प्रकृतिका अर्थ स्वभाव है और अनुभवका अर्थ है उस स्वभावके अनुरूप उसे भोगना ।
साधारणतः यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि प्रकृति और अनुभवका यही अर्थ है तो इन्हें
अलग अलग मानना उचित नहीं है, क्योंकि जिस कर्मकी जैसी प्रकृति होगी उसके अनुरूप उसका
भोग सुतरां सिद्ध है। इसलिए प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्ध ये दो स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते, किन्तु
अनुभवबन्धका अन्तर्भाव प्रकृतिबन्धमें ही हो जाता है। यदि कहा जाय कि ज्ञानावरण आदि रूप-
से कर्मकी प्रकृति फलदानशक्तिके निमित्तसे होती है इसलिए प्रकृतिबन्धमें अनुभवबन्धका अन्तर्भाव
नहीं किया जा सकता सो इसका यह समाधान है कि जब कि प्रकृतिबन्धका कारण योग है और
अनुभवबन्धका कारण कषाय है तब फिर फलदान शक्तिके निमित्तसे कर्मकी प्रकृति बनती है यह
कैसे माना जा सकता है। थोड़ी देरको यह मान भी लिया जाय तब भी यह प्रश्न खड़ा रहता है
कि प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्धको अलग अलग क्यों माना गया है और उनके अलग अलग
माननेके योग और कषाय दो स्वतन्त्र कारण क्यों बतलाये गये हैं। सूत्रकारने बन्धके चार भेद
करके भी विपाक अर्थात् कर्मभोगको अनुभव कहा है और उसे प्रकृतिके अनुरूप बतलाया है।
१. -घूर्णिते आ०, दि० १, दि० २ ।