सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

विशेषो व्याख्यातः । यदुदयादङ्गोपाङ्गविवेकस्तदङ्गोपाङ्गनाम । तत् त्रिविधम्—औदारिकशरीरा-
ङ्गोपाङ्गनाम वैक्रियिकशरीराङ्गोपाङ्गनाम आहारकशरीराङ्गोपाङ्गनाम चेति । यन्निमित्तात्परि-
निष्पत्तिस्तन्निर्माणम् । तद् द्विविधं—स्थाननिर्माणं प्रमाणनिर्माणं चेति । तज्जातिनामोदयापेक्षं
चक्षुरादीनां स्थानं प्रमाणं च निर्वर्तयति । निर्मीयतेऽनेनेति निर्माणम् । शरीरनामकर्मोदयवशादु-
पात्तानां पुद्गलानामन्योन्यप्रदेशसंश्लेषणं यतो भवति तद्बन्धननाम । यदुदयादौदारिकादिशरी-
राणां विवरविरहितान्योन्यप्रदेशानुप्रवेशेन एकत्वापादनं भवति तत्संघातनाम । यदुदयादौदारिका-
दिशरीराकृतिनिर्वृत्तिर्भवति तत्संस्थाननाम । तत् षोढा विभज्यते—समचतुरस्रसंस्थाननाम न्यग्रोध-
परिमण्डलसंस्थाननाम स्वातिसंस्थाननाम कुब्जकसंस्थाननाम वामनसंस्थाननाम हुण्डसंस्थाननाम
चेति । यस्योदयादस्थिबन्धनविशेषो भवति तत्संहनननाम । तत् षड्विधम्—वज्रर्षभनाराचसंहनन-
नाम वज्रनाराचसंहनननाम नाराचसंहनननाम अर्धनाराचसंहनननाम कीलिकोसंहनननाम
असंप्राप्तासृपाटिकासंहनननाम चेति । यस्योदयात्स्पर्शप्रादुर्भावस्तत्स्पर्शनाम । तदष्टविधम्—
कर्कशनाम मृदुनाम गुरुनाम लघुनाम स्निग्धनाम रूक्षनाम शीतनाम उष्णनाम चेति । यन्निमित्तो
रसविकल्पस्तद्रसनाम । तत्पञ्चविधम्—तिक्तनाम कटुकनाम कषायनाम आम्लनाम मधुरनाम
चेति । यदुदयप्रभवो गन्धस्तद्गन्धनाम । तद्द्विविधम्—सुरभिगन्धनाम असुरभिगन्धनाम चेति ।
यद्धेतुको वर्णविभागस्तद्वर्णनाम । तत्पञ्चविधम्—कृष्णवर्णनाम नीलवर्णनाम रक्तवर्णनाम हारिद्र-
व्याख्यान पहले कर आये हैं । जिसके उदयसे अंगोपांगका भेद होता है वह अंगोपांग नामकर्म है ।
वह तीन प्रकारका है—औदारिक शरीर अंगोपांग नामकर्म, वैक्रियिक शरीर अंगोपांग नामकर्म
और आहारक शरीर अंगोपांग नामकर्म । जिसके निमित्तसे परिनिष्पत्ति अर्थात् रचना होती है
वह निर्माण नामकर्म है । वह दो प्रकारका है—स्थाननिर्माण और प्रमाणनिर्माण । वह जाति
नामकर्मके उदयका अवलम्बन लेकर चक्षु आदि अवयवोंके स्थान और प्रमाणकी रचना करता है ।
निर्माण शब्दका व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है—‘निर्मीयतेऽनेनेति निर्माणम्’ जिसके द्वारा रचना की जाती
है वह निर्माण कहलाता है । शरीर नामकर्मके उदयसे प्राप्त हुए पुद्गलोंका अन्योन्य प्रदेश संश्लेष
जिसके निमित्तसे होता है वह बन्धन नामकर्म है । जिसके उदयसे औदारिक आदि शरीरोंकी
छिद्र रहित होकर परस्पर प्रदेशोंके अनुप्रवेश द्वारा एकरूपता आती है वह संघात नामकर्म है ।
जिसके उदयसे औदारिक आदि शरीरोंकी आकृति बनती होती है वह संस्थान नामकर्म है । वह
छह प्रकारका है—समचतुरस्रसंस्थान नामकर्म, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान नामकर्म, स्वातिसंस्थान
नामकर्म, कुब्जकसंस्थान नामकर्म, वामनसंस्थान नामकर्म और हुण्डसंस्थान नामकर्म । जिसके
उदयसे अस्थियोंका बन्धन विशेष होता है वह संहनन नामकर्म है । वह छह प्रकारका है—वज्र-
र्षभनाराच संहनन नामकर्म, वज्रनाराचसंहनन नामकर्म, नाराचसंहनन नामकर्म, अर्धनाराचसंहं-
नन नामकर्म, कीिकासंहनन नामकर्म और असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन नामकर्म । जिसके उदयसे
स्पर्शकी उत्पत्ति होती है वह स्पर्श नामकर्म है । वह आठ प्रकारका है—कर्कश नामकर्म, मृदु
नामकर्म, गुरु नामकर्म, लघु नामकर्म, स्निग्ध नामकर्म, रूक्ष नामकर्म, शीत नामकर्म और उष्ण
नामकर्म । जिसके उदयसे रसमें भेद होता है वह रस नामकर्म है । वह पाँच प्रकारका है—तिक्त
नामकर्म, कटु नामकर्म, कषाय नामकर्म, अम्ल नामकर्म और मधुर नामकर्म । जिसके उदयसे
गन्धकी उत्पत्ति होती है वह गन्ध नामकर्म है । वह दो प्रकारका है—सुरभिगन्ध नामकर्म और
असुरभिगन्ध नामकर्म । जिसके निमित्तसे वर्णमें विभाग होता है वह वर्ण नामकर्म है । वह पाँच
प्रकारका है—कृष्णवर्ण नामकर्म, नीलवर्ण नामकर्म, रक्तवर्ण नामकर्म, हारिद्रवर्ण नामकर्म और
१. कीलितसं-मु० । कीलसं-दि० २ । २. -प्राप्तासृक्पा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. -नाम दुरभिगन्ध-
आ०, दि० १, दि० २ । ४. हरिद्वर्ण-मु० ।