सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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नाम चेति । षड्विधपर्याप्त्यभावहेतुरपर्याप्तिनाम । स्थिरभावस्य निर्वर्तकं स्थिरनाम । तद्वि-
परीतमस्थिरनाम । प्रभोपेतशरीरकारणमादेयनाम । निष्प्रभशरीरकारणमनादेयनाम । पुण्यगुण-
ख्यापनकारणं यशःकीर्तिनाम । तत्प्रत्यनीकफलमयशःकीर्तिनाम । आहंत्यकारणं तीर्थंकरत्वनाम ।
पानपर्याप्ति नामकर्म, भाषापर्याप्ति नामकर्म और मनःपर्याप्ति नामकर्म । जो छह प्रकारकी पर्या-
प्तियोंके अभावका हेतु है वह अपर्याप्ति नामकर्म है । स्थिरभावका निर्वर्तक कर्म स्थिर नामकर्म
है । इससे विपरीत अस्थिर नामकर्म है । प्रभायुक्त शरीरका कारण आदेय नामकर्म है । निष्प्रभ
शरीरका कारण अनादेय नामकर्म है । पुण्य गुणोंकी प्रसिद्धिका कारण यशःकीर्ति नामकर्म है।
इससे विपरीत फलवाला अयशःकीर्ति नामकर्म है । आर्हन्त्यका तीर्थंकर नामकर्म है ।
विशेषार्थ—यहाँ नामकर्मकी उत्तर प्रकृतियोंके कार्योंकी चर्चा की गयी है । मूल कर्म
आठ हैं। उनमें से सात कर्म जीवविपाकी माने गये हैं । नामकर्म जीवविपाकी और पुद्गलविपाकी
दोनों प्रकारका है । जिन कर्मोंका विपाक जीवमें होता है वे जीवविपाकी हैं और जिनका विपाक
पुद्गलमें होता है वे पुद्गलविपाकी हैं। यह इनका शब्दार्थ है । इसे ध्यानमें रखते हुए इनके
अर्थकी विस्तृत चर्चा करना आवश्यक है । साधारणतः सभी कर्म जीवनके राग, द्वेष आदि परि-
णामोंका निमित्त पाकर बँधते हैं अतएव उनका विपाक जीवमें ही होता है। अर्थात् उनके उदय-
का निमित्त पाकर जीवमें तत्तत्प्रकारक योग्यताएँ आती हैं। फिर भी कर्मोंके जीवविपाकी,
पुद्गलविपाकी, क्षेत्रविपाकी और भवविपाकी ऐसे भेद करनेका क्या कारण है यही बात यहाँ
देखनी है। जीवका संसार जीव और पुद्गल इन दोके मेलसे होता है । वहाँ रहते हुए वह विविध
गतियोंमें जन्म लेता है, मरता है और उनके अनुरूप नाना शरीरोंको धारण करता है। यह
सब अकारण नहीं हो सकता, इसलिए इनकी प्राप्तिके निमित्तभूत नाना प्रकारके कर्म माने जाते हैं।
जिनको शास्त्रमें भवविपाकी कहा है वे उस उस पर्यायमें अवस्थानके कारण होनेसे उस संज्ञाको
प्राप्त होते हैं। जिनको क्षेत्रविपाकी कहा है वे एक गतिसे दूसरी गतिके लिए जाते समय अन्त-
रालमें जीवका आकार बनाये रखते हैं। जिन्हें पुद्गलविपाकी कहा है वे नाना प्रकारके शरीर
और भोगक्षम इन्द्रियोंकी प्राप्तिमें सहायक होते हैं और जीवविपाकी कहे जाते हैं। वे जीवके विविध
प्रकारके परिणाम और उसकी विविध अवस्थाओंके होनेमें सहायता करते हैं। इस प्रकार कार्य-
भेदसे कर्मोंको इन चार भागोंमें विभक्त किया गया है। वस्तुतः सभी कर्म जीवकी उस उस कर्मके
नामानुरूप योग्यताके होनेमें सहायता करते हैं और उस उस योग्यतासे युक्त जीव तदनुरूप कार्य
करता है । उदाहरणार्थ—औदारिक शरीर नामकर्मके उदयका निमित्त पाकर जीवमें ऐसी योग्यता
उत्पन्न होती है जिससे वह योगद्वारा शरीर निर्माणके लिए औदारिक वर्गणाओंको ही ग्रहण
करता है अन्य वर्गणाओंको नहीं । वज्रर्षभनाराचसंहनन और समचतुरस्रसंस्थान नामकर्मके उदय-
का निमित्त पाकर जोवमें ऐसी योग्यता उत्पन्न होती है जिससे वह ग्रहण की गयी औदारिक
वर्गणाओंको उस रूपसे परिणमाता है । प्रश्न यह है कि पुद्गलविपाकी कर्मोंके उदयको निमित्त
पाकर यदि जीवमें कर्मोंके नामानुरूप योग्यता उत्पन्न होती है तो फिर इन्हें पुद्गलविपाकी कर्म
क्यों कहते हैं ? क्या ये कर्म जीवको माध्यम बनाकर ही अपना काम करते हैं। इनका जो काम है
वह यदि सीधा माना जाय तो क्या आपत्ति है ? उत्तर यह है कि जब तक जीवको औदारिक
आदि नोकर्मवर्गणा का निमित्त नहीं मिलता है तब तक पुद्गलविपाकी कर्म अपना कार्य करनेमें
समर्थ नहीं होते हैं। इनका विपाक पुद्गलों का निमित्त पाकर होता है इसलिए इन्हें पुद्गलविपाकी
कहते हैं । उदाहरणार्थ – कोई एक जीव दो मोड़ा लेकर यदि जन्म लेता है तो उसके प्रथम
और द्वितीय विग्रहके समय शरीर आदि पुद्गलविपाकी प्रकृतियोंका उदय नहीं होता है। तीसरे
समयमें जब वह नवीन शरीरको ग्रहण करता है तभी उसके इन प्रकृतियोंका उदय होता है। इस