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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 558 में से

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पृष्ठ 403
  • ८।९ § ७४७ ] अष्टमोऽध्यायः २९१
    स्त्याने स्वप्ने गृद्ध्यति दीव्यते यदुदयादात्मा रौद्रं बहुकर्म करोति सा स्त्यानगृद्धिः । इह निद्रादि-
    भिर्दर्शनावरणं सामानाधिकरण्येनाभिसंबध्यते—निद्रादर्शनावरणं निद्रानिद्रादर्शनावरणमित्यादि ।
    § ७४५. तृतीयस्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिप्रतिपादनार्थमाह—
    सदसद्वेद्ये ॥८॥
    § ७४६. यदुदयाद्देवादिगतिषु शारीरमानससुखप्राप्तिस्तत्सद्वेद्यम् । प्रशस्तं वेद्यं सद्वेद्यमिति । ५
    यत्फलं दुःखमनेकविधं तदसद्वेद्यम् । अप्रशस्तं वेद्यमसद्वेद्यमिति ।
    § ७४७. चतुर्थ्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिविकल्पनिदर्शनार्थमाह—
    दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्व-
    मिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्न-
    पुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलन- १०
    विकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥९॥
    लिया गया है और 'गृद्धि' दीप्यते जो स्वप्नमें प्रदीप्त होती है 'स्त्यानगृद्धि' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ
    है—स्त्याने स्वप्ने गृद्ध्यति धातुका दीप्ति अर्थ लिया गया है। अर्थात् जिसके उदयसे रौद्र बहु कर्म
    करता है वह स्त्यानगृद्धि है। यहाँ निद्रादि पदोंके साथ दर्शनावरण पदका सामानाधिकरण रूपसे
    सम्बन्ध होता है यथा—निद्रादर्शनावरण, निद्रानिद्रादर्शनावरण आदि । १५
    विशेषार्थ—यहाँ दर्शनावरण कर्मके नौ भेद गिनाये हैं। दर्शनके कुल भेद चार हैं उनकी
    अपेक्षा प्रारम्भके चार भेद गिनाये हैं। निद्रादिक सामान्य आवरण कर्म हैं पर संसारी जीवके पहले
    दर्शनोपयोग होता है और ये निद्रादिक उस उपयोगमें बाधक हैं इसलिए इन निद्रा आदि पाँच कर्मों-
    की दर्शनावरणके भेदोंमें परिगणना की जाती है। इससे दर्शनावरण कर्मके नौ भेद सिद्ध होते हैं।
    § ७४५. तृतीय प्रकृतिकी उत्तर प्रकृतिको बतलाने के लिए कहते हैं— २०
    सद्वेद्य और असद्वेद्य ये दो वेदनीय हैं ॥८॥
    § ७४६. जिसके उदयसे देवादि गतियोंमें शरीर और मन सम्बन्धी सुखकी प्राप्ति होती है
    वह सद्वेद्य है। प्रशस्त वेद्यका नाम सद्वेद्य है। जिसके फलस्वरूप अनेक प्रकारके दुख मिलते हैं वह
    असद्वेद्य है। अप्रशस्त वेद्यका नाम असद्वेद्य है।
    विशेषार्थ—यहाँ वेदनीय कर्मके दो भेद गिनाये हैं। यह जीवविपाकी कर्म है। जीवका २५
    साता और असातारूप परिणाम इसके उदयके निमित्तसे होता है। अन्य बाह्य सामग्रीको इसका
    फल कहा है पर वह उपचार कथन है। वस्तुतः बाह्य सामग्री साता और असाताके उदयमें
    निमित्त है, इसलिए बाह्य सामग्रीकी प्राप्ति वेदनीय कर्मका फल नहीं माना जा सकता। देवगति,
    नरकगति और भोगभूमिमें बाह्य सामग्रीकी प्राप्तिका कारण तत्तत्पर्यायकी लेश्या है और कर्मभूमिमें
    बाह्य सामग्रीकी प्राप्तिके अनेक कारण हैं। इस प्रकार वेदनीय कर्मके दो भेद और उनका कार्य ३०
    जानना चाहिए।
    § ७४७. अब चौथी मूल प्रकृतिके उत्तर प्रकृति विकल्प दिखलानेके लिए आगेका सूत्र
    कहते हैं—
    दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और कषाय वेदनीय इनके क्रमसे तीन,
    दो, नौ और सोलह भेद हैं। सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और तदुभय ये तीन दर्शनमोहनीय हैं, अकषाय- ३५
    वेदनीय और कषायवेदनीय ये दो चारित्र मोहनीय हैं। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,
    स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ये नौ अकषायवेदनीय हैं। तथा अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान,
    प्रत्याख्यान और संज्वलन ये प्रत्येक क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे सोलह कषायवेद-
    नीय हैं ॥९॥
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri