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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 558 में से

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पृष्ठ 400

§ ७३७. तत्राद्यस्य प्रकृतिबन्धस्य भेदप्रदर्शनार्थमाह—
आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ॥४॥
§ ७३८. आद्यः प्रकृतिबन्धो ज्ञानावरणाद्यष्टविकल्पो वेदितव्यः । आवृणोत्याव्रियतेऽनेनेति
वा आवरणम् । तत्प्रत्येकमभिसंबध्यते—ज्ञानावरणं दर्शनावरणमिति । वेदयति वेद्यत इति वा
वेदनीयम् । मोहयति १मोह्यतेऽनेनेति वा मोहनीयम् । इत्यनेन नारकादिभवमित्यायुः । नमयत्या-
त्मानं नम्यतेऽनेनेति वा नाम । उच्चैर्नीचैश्च गीयते शब्द्यत इति वा गोत्रम् । दातृदेयादीनामन्तरं
मध्यमेतीत्यन्तरायः । एकेनात्मपरिणामेनादीयमानाः पुद्गला ज्ञानावरणाद्यनेकभेदं प्रतिपद्यन्ते
सकृदुपभुक्तान्नपरिणामरसरुधिरादिवत् ।
§ ७३९. आह, उक्तो मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविधः । इदानीमुत्तरप्रकृतिबन्धो वक्तव्य इत्यत
आह—
इसलिए इस जीवके स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध दसवें गुणस्थान तक ही होता है । आगे ग्यारहवें,
बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें यद्यपि सातावेदनीयका बन्ध होता है पर वहाँ कषाय न होनेसे
उसका प्रकृति और प्रदेशबन्ध ही होता है। यहाँ प्रश्न होता है कि यदि इन गुणस्थानोंमें साता-
वेदनीयका बिना स्थितिके बन्ध होता है तो उसका आत्माके साथ अवस्थान कैसे होगा और यदि
बिना अनुभागसे बन्ध होता है तो उसका विपाक सातारूप कैसे होगा ? समाधान यह है कि इन
गुणस्थानोंमें ईर्यापथ आस्रव होनेसे कर्म आते हैं और चले जाते हैं। उनका दो, तीन आदि समय
तक अवस्थान नहीं होता । इसलिए तो यहाँ स्थितिबन्धका निषेध किया है और अनुभाग भी
कषायके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले अनुभागसे यहाँ प्राप्त होनेवाला अनुभाग अनन्तगुणा हीन होता
है, इसलिए यहाँ अनुभागबन्धका भी निषेध किया है। योग तेरहवें और कषाय दसवें गुणस्थान
तक होता है, इसलिए स्थिति और अनुभागबन्ध दसवें तक और प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध
तेरहवें तक होते हैं। अयोगिकेवली गुणस्थानमें योगका अभाव है इसलिए वहाँ किसी प्रकारका भी
बन्ध नहीं होता । इस प्रकार यहाँ बन्धके भेद और उनके कारणोंका विचार किया ।
§ ७३७. अब प्रकृतिबन्धके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पहला अर्थात् प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र
और अन्तरायरूप है ॥४॥
§ ७३८. आदिका प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरणादि आठ प्रकारका जानना चाहिए । जो आवृत्त
करता है या जिसके द्वारा आवृत्त किया जाता है वह आवरण कहलाता है । वह प्रत्येकके साथ
सम्बन्धको प्राप्त होता है यथा-ज्ञानावरण और दर्शनावरण । जो वेदन कराता है या जिसके द्वारा
वेदा जाता है वह वेदनीय कर्म है। जो मोहित करता है या जिसके द्वारा मोहा जाता है वह मोहनीय
कर्म है। जिसके द्वारा नारक आदि भवको जाता है वह आयुकर्म है । जो आत्माको नमाता है या
जिसके द्वारा आत्मा नमता है वह नामकर्म है। जिसके द्वारा जीव उच्च नीच गीयते अर्थात् कहा
जाता है वह गोत्र कर्म है। जो दाता और देय आदिका अन्तर कराता है अर्थात् बीचमें आता है
वह गोत्र कर्म है। एक बार खाये गये अन्नका जिस प्रकार रस, रुधिर आदि रूपसे अनेक प्रकारका
परिणमन होता है उसी प्रकार एक आत्म-परिणामके द्वारा ग्रहण किये गये पुद्गल ज्ञानावरण
आदि अनेक भेदोंको प्राप्त होते हैं ।
§ ७३९. मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कहा। अब उत्तर प्रकृतिबन्धका कथन करते हैं—
१. मुह्यते इति मु० । २. - दुपयुक्ता-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० ।