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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 558 में से

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पृष्ठ 415

पाको विपाकः। असावनुभव इत्याख्यायते । शुभपरिणामानां प्रकर्षभावाच्छुभप्रकृतीनां प्रकृष्टोऽनुभवः
अशुभप्रकृतीनां निकृष्टः । अशुभपरिणामानां प्रकर्षभावादशुभप्रकृतीनां प्रकृष्टोऽनुभवः शुभप्रकृतीनां
निकृष्टः । स एवं प्रत्ययवशादुपात्तोऽनुभवो द्विधा प्रवर्तते स्वमुखेन परमुखेन च । सर्वासां मूल-
प्रकृतीनां स्वमुखेनैवानुभवः । उत्तरप्रकृतीनां तुल्यजातीयानां परमुखेनापि भवति आयुर्दर्शनचारित्र-
मोहवर्जनाम् । न हि नरकायुर्मुखेन तिर्यगायुर्मनुष्यायुर्वा विपच्यते । नापि दर्शनमोहश्चारित्रमोह- ५
मुखेन, चारित्रमोहो वा दर्शनमोहमुखेन ।
§ ७७५. आह अभ्युपेमः प्रागुपचितनानाप्रकारकर्मविपाकोऽनुभवः । इदं तु न विजानीमः
किमयं प्रसंख्यातोऽप्रसंख्यातः । इत्यत्रोच्यते प्रसंख्यातोऽनुभूयत इति ब्रूमहे । कुतः । यतः—
स यथानाम ॥२२॥
§ ७७६. ज्ञानावरणस्य फलं ज्ञानाभावो दर्शनावरणस्यापि¹ फलं दर्शनशक्त्युपरोध इत्येव- १०
माद्यन्वर्थसंज्ञानिर्देशात्सर्वासां कर्मप्रकृतीनां सविकल्पानामनुभवसंप्रत्ययो जायते ।
§ ७७७. आह, यदि विपाकोऽनुभवः प्रतिज्ञायते, तत्कर्मानुभूतं सत्² किमाभरणवदवतिष्ठते
आहोस्विनिष्पीतसारं प्रच्यवते । इत्यत्रोच्यते—
ततश्च निर्जरा ॥२३॥
भावसद्भाव निमित्तभेदसे उत्पन्न हुआ वैश्वरूप नाना प्रकारका पाक विपाक है । इसीको अनुभव १५
कहते हैं । शुभ परिणामोंके प्रकर्षभावके कारण शुभ प्रकृतियोंका प्रकृष्ट अनुभव होता है और अशुभ
प्रकृतियोंका निकृष्ट अनुभव होता है । तथा अशुभ परिणामोंके प्रकर्षभावके कारण अशुभ प्रकृतियों-
का प्रकृष्ट अनुभव होता है और शुभ प्रकृतियोंका निकृष्ट अनुभव होता है । इस प्रकार कारणवशसे
प्राप्त हुआ वह अनुभव दो प्रकारसे प्रवृत्त होता है—स्वमुखसे और परमुखसे । सब मूल प्रकृतियों-
का अनुभव स्वमुखसे ही प्रवृत्त होता है । आयु, दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयके सिवा तुल्य- २०
जातीय उत्तरप्रकृतियोंका अनुभव परमुखसे भी प्रवृत्त होता है । नरकायुके मुखसे तिर्यंचायु या
मनुष्यायुका विपाक नहीं होता । और दर्शनमोह चारित्रमोहरूपसे और चारित्रमोह दर्शनमोहरूपसे
विपाकको नहीं प्राप्त होता ।
§ ७७५. शंका—पहले संचित हुए नाना प्रकारके कर्मोंका विपाक अनुभव है यह हम स्वी-
कार करते हैं किन्तु यह नहीं जानते कि क्या यह प्रसंख्यात होता है या अप्रसंख्यात होता है ? २५
समाधान—हम कहते हैं कि यह प्रसंख्यात अनुभवमें आता है । शंका—किस कारणसे । समाधान—
यतः—
वह जिस कर्मका जैसा नाम है उसके अनुरूप होता है ॥२२॥
§ ७७६. ज्ञानावरणका फल ज्ञानका अभाव करना है । दर्शनावरणका भी फल दर्शनशक्ति-
का उपरोध करना है इत्यादि रूपसे सब कर्मोंकी सार्थक संज्ञाका निर्देश किया है अतएव अपने ३०
अवान्तर भेदसहित उनमें किसका क्या अनुभव है इसका ज्ञान हो जाता है ।
§ ७७७. यदि विपाकका नाम अनुभव है ऐसा स्वीकार करते हो तो अनुभूत होने पर वह
कर्म आभरणके समान अवस्थित रहता है या फल भोग लेनेके बाद वह झर जाता है ? इस बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इसके बाद निर्जरा होती है ॥२३॥ ३५
१. -णस्य फलं मु० । २. भूतं किमा -मु० ।