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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 558 में से

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पृष्ठ 413

§ ७६२. मोहनीयस्योत्कृष्टस्थितिप्रतिपत्त्यर्थमाह —
सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥
§ ७६३. 'सागरोपमकोटीकोट्यः पराः स्थितिः' इत्यनुवर्तते । इयमपि परा स्थितिर्मिथ्या-
दृष्टेः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रियस्य पर्याप्तकस्यावसेया । इतरेषां¹ यथागममवगमः कर्तव्यः ।
§ ७६४. नामगोत्रयोरुत्कृष्टस्थितिप्रतिपत्त्यर्थमाह—
विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥
§ ७६५. 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' इत्यनुवर्तते । इयमप्युत्कृष्टा स्थितिर्मिथ्यादृष्टेः
संज्ञिपञ्चेन्द्रियपर्याप्तकस्य । इतरेषां यथागममवबोद्धव्या ।
§ ७६६. अथायुषः कोत्कृष्टा स्थितिरित्युच्यते—
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥
§ ७६७. पुनः 'सागरोपम'ग्रहणं कोटीकोटिनिवृत्त्यर्थम् । 'परा स्थितिः'इत्यनुवर्तते । इयमपि
पूर्वोक्तस्यैव । शेषाणामागमतोऽवसेया ।
विशेषार्थ—कर्मोंकी स्थिति तीन प्रकारसे प्राप्त होती है—बन्धसे, संक्रमसे और सत्त्वसे ।
यहाँपर बन्धकी अपेक्षा उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति बतलायी गयी है। अतितीव्र संक्लेश परिणामोंसे
मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय कर्मकी
तीस कोटाकोटि सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बाँधता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
§ ७६२. मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटाकोटि सागरोपम है ॥१५॥
§ ७६३. इस सूत्रमें 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है । यह
भी उत्कृष्ट स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके जानना चाहिए । इतर जीवोंके
आगमके अनुसार ज्ञान कर लेना चाहिए ।
§ ७६४. नाम और गोत्रकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
नाम और गोत्रकी उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटाकोटि सागरोपम है ॥१६॥
§ ७६५. 'सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है। यह भी उत्कृष्ट
स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके जानना चाहिए। इतर जीवोंके आगमके अनुसार
जान लेना चाहिए ।
§ ७६६. अब आयु कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आयुकी उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागरोपम है ॥१७॥
§ ७६७. इस सूत्र में पुनः 'सागरोपम' पदका ग्रहण कोटाकोटी पदकी निवृत्तिके लिए दिया
है। यहाँ 'परा स्थितिः' पदकी अनुवृत्ति होती है। यह भी पूर्वोक्त जीवके होती है। शेष जीवोंके
आगमसे जान लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी मिथ्यादृष्टि कहा है। सो
यह इस अभिप्रायसे कहा है कि मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव भी नरकायु बन्धके योग्य
उत्कृष्ट संक्लेश परिणामोंके होने पर नरकायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध करता है। इसका यह अभिप्राय
नहीं कि अन्य गुणस्थानवालेके आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध नहीं होता । देवायुका तैंतीस साग-
१. -सेया । अन्येषां यथागममवगमः कर्तव्यः आ०, दि० १ । -सेया । इतरेषां यथागममवगन्तव्यम् ?