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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 558 में से

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पृष्ठ 401
  • ८।६ § ७४२ ] अष्टमोऽध्यायः २८९
    पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥५॥
    § ७४०. द्वितीयग्रहणमिह कर्तव्यं द्वितीय उत्तरप्रकृतिबन्ध एवंविकल्प इति । न कर्तव्यम्;
    पारिशेष्यात्सिद्धेः । आद्यो १मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविकल्प उक्तः । ततः पारिशेष्यादयमुत्तरप्रकृति-
    विकल्पविधिर्भवति । 'भेद'शब्दः पञ्चादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यते—पञ्चभेदं ज्ञानावरणीयं
    नवभेदं दर्शनावरणीयं द्विभेदं वेदनीयं अष्टाविंशतिभेदं मोहनीयं चतुर्भेदमायुः द्विचत्वारिंशद्भेदं ५
    नाम द्विभेदं गोत्रं पञ्चभेदोऽन्तराय इति ।
    § ७४१. यदि ज्ञानावरणं पञ्चभेदं तत्प्रतिपत्तिरुच्यतामित्यत आह—
    मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥६॥
    § ७४२. मत्यादीनि ज्ञानानि व्याख्यातानि । तेषामावृतेरावरणभेदो भवतीति पञ्चोत्तर-
    प्रकृतयो वेदितव्याः । अत्र चोद्यते—अभव्यस्य मनःपर्ययज्ञानशक्तिः केवलज्ञानशक्तिश्च स्याद्वा न १०
    वा । यदि स्यात् तस्याभव्यत्वाभावः । अथ नास्ति तत्रावरणद्वयकल्पना व्यर्थेति । उच्यते—
    आदेशवचनान्न दोषः । द्रव्यार्थादेशान्मनःपर्ययकेवलज्ञानशक्तिसंभवः । पर्यायार्थादेशात्तच्छक्त्य-
    भावः । यद्येवं भव्याभव्यविकल्पो नोपपद्यते; उभयत्र तच्छक्तिसद्भावात् । न शक्तिभावाभावापेक्षया
    भव्याभव्यविकल्प इत्युच्यते । कुतस्तर्हि । व्यक्तिसद्भावासद्भावापेक्षया । सम्यग्दर्शनादिभि²-
    आठ मूल प्रकृतियोंके अनुक्रमसे पांच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच १५
    भेद हैं ॥५॥
    § ७४०. शंका—यहाँ द्वितीय पदका ग्रहण करना चाहिए, जिससे मालूम पड़े कि द्वितीय
    उत्तर प्रकृतिबन्ध इतने प्रकारका है ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि पारिशेष्य न्यायसे
    उसकी सिद्धि हो जाती है। आदिका मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कह आये हैं। इसलिए
    पारिशेष्य न्यायसे ये उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद समझने चाहिए । भेद शब्द पाँच आदि शब्दोंके २०
    साथ यथाक्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होता है । यथा—पाँच भेदवाला ज्ञानावरण, नौ भेदवाला
    दर्शनावरण, दो भेदवाला वेदनीय, अट्ठाईस भेदवाला मोहनीय, चार भेदवाला आयु, ब्यालीस
    भेदवाला नाम, दो भेदवाला गोत्र और पाँच भेदवाला अन्तराय ।
    § ७४१. यदि ज्ञानावरण कर्म पाँच प्रकारका है, तो उसका ज्ञान कराना है अतः आगेका
    सूत्र कहते हैं— २५
    मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान इनको आवरण करनेवाले
    कर्म पाँच ज्ञानावरण हैं ॥६॥
    § ७४२. मति आदि ज्ञानोंका व्याख्यान कर आये हैं। उनका आवरण करनेसे आवरणोंमें
    भेद होता है इसलिए ज्ञानावरण कर्मकी पाँच उत्तर प्रकृतियाँ जानना चाहिए । शंका—अभव्य
    जीवके मनःपर्ययज्ञानशक्ति और केवलज्ञानशक्ति होती है या नहीं होती। यदि होती है तो उसके ३०
    अभव्यपना नहीं बनता । यदि नहीं होती हैं तो उसके उक्त दो आवरण-कर्मोंकी कल्पना करना
    व्यर्थ है ? समाधान—आदेश वचन होनेसे कोई दोष नहीं है । अभव्यके द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा
    मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है पर पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा उसके उसका
    अभाव है। शंका—यदि ऐसा है तो भव्याभव्य विकल्प नहीं बन सकता है क्योंकि दोनोंके मनः-
    पर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है ? समाधान—शक्तिके सद्भाव और असद्भावकी ३५
    अपेक्षा भव्याभव्य विकल्प नहीं कहा गया है। शंका—तो किस आधारसे यह विकल्प कहा गया
    है ? समाधान—व्यक्तिकी सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षा यह विकल्प कहा गया है । जिसके
    १. मूलः प्रकृ-मु० । २. -नादिव्यक्ति-आ०, दि० १, दि० २, ता० ।
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